चन्दवरदायी Chandbardai

 चन्दवरदायी 
Chandbardai 

(संवत 1205 तदनुसार 1148 ई० - संवत 1249 तदनुसार 1192 ई० )
चन्दवरदायी Chandravardai

चन्दवरदायी अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के सखा , मंत्री , सेनापति , सलाहकार एवं परम हितैषी राजकवि थे । यद्यपि इतिहास इनके बारे में चुप है तथापि ग्रंथ में आए हुए विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि इनका जन्म संवत 1205 तदनुसार 1148 ई० लाहौर वर्तमान पाकिस्तान में हुआ । ये बचपन से ही सम्राट के साथ रहे , खेले और पढ़े - लिखे । 

संस्कृत में लिखित एक श्लोक इस संबंध में उल्लेख्य है 

  • जयन्ति ये सुकृतिनो रस सिद्धा : कवीश्वरा ।
  • नास्ति येशां यश : काये जरा - मरण जं भयम् ।।                                                    ( नीतिशतकम् - भर्तृहरि ) 

अर्थात रससिद्ध महाकवियों की कृतियां उन्हें जीवित रखती हैं उनके यशरूपी शरीर में जरा - मरण का भय नहीं व्यापता । 

प्राचीन काल में भारतीय परंपरा कुछ ऐसी ही थी कि महान कवियों ने अपने संबंध में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं दी । वाल्मीकि , व्यास , कालिदास , भारवि जैसे महान कवियों ने अपने संबंध में कुछ नहीं लिखा । यह भी अनुमान है कि ये सब के सब नाम उपनाम ही रहे हैं । इन महाकवियों के वास्तविक नाम क्या थे ? जिन्होंने अपने जन्म से भारत के किस भू - भाग को गौरवान्वित किया ? कवियों ने नहीं बताया । संभवतः इन्होंने आत्म प्रचार की जरूरत ही नहीं समझी । फूल की तरह खुशबू फैलाना ही इनका कर्म था  चंदबरदाई के बारे में भी इसी तथ्य को देखा जा सकता है । एक और बात गौरतलब है उनके विपुलकाय महाकाव्य में उनकी पत्नी का उल्लेख अवश्य है जो कथा कवि को आगे बढ़ाने में प्रश्नोत्तरों का माध्यम ग्रहण करती है और समय - समय पर चंद को सत्परामर्श भी देती है । चंद के काव्य में आए वर्णनों से यह भी स्पष्ट होता है कि वे षडभाषा , व्याकरण , काव्य , साहित्य , छंदशास्त्र , ज्योतिष , नीतिशास्त्र , पुराण , नाटक आदि में पूर्णतः दीक्षित ही नहीं आधिकारिक विद्वान थे । सभा , युद्ध , मृगया , विवाह , यात्रा , यहां तक कि यदाकदा अंतरमहल तक में चंद पृथ्वीराज के साथ बैठ मंत्रणा दिया करते थे । जब शहाबुद्दीन गोरी पृथ्वीराज चौहान को कैद कर गजनी ले गया तब चंद भी वहां पहुंचो अब तक के रासो का प्रणयन वे स्वयं कर रहे थे ( इस विषय की विस्तृत जानकारी पृथ्वीराज रासो के वस्तु वर्णन में दी गई है ) किन्तु गजनी जाने के पूर्व उन्होंने यह कार्य अपने पुत्र जल्हण को सौंप दिया , जिसने उनके अधूरे ग्रन्थ को अपने ढंग से पूरा किया । गजनी पहुंचकर चंद ने बड़े बुध्दि कौशल से सम्राट को मुक्त करवाने की योजना बनाई । एक दिन शहाबुद्दीन की सभा में उन्होंने पृथ्वीराज के लक्ष्यवेध की तारीफ इस ढंग से की कि गौरी के मन में पृथ्वीराज की बाण चलाने की कुशलता देखने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई । चन्द के परामर्श के अनुसार सारा आयोजन किया गया । पृथ्वीराज ने चंद के संकेत पर बाण चलाकर गोरी का वध कर दिया , इसके बाद चन्द और पृथ्वीराज ने भी संवत 1249 तदनुसार 1192 ई० गज़नी में आत्मोत्सर्ग कर दिया । संक्षेप में चन्द के जीवन परिचय की यही रूपरेखा है जो रासो के आधार पर तैयार की जा सकती है । ऐतिहासिक दृष्टि से इसमें भी अनेक असंगतियां हैं ।

कृतियां  

हिन्दी के आदि अथवा उत्तर कालीन अपभ्रंश के अंतिम महाकवि चंदवरदायी की एकमात्र कृति ' पृथ्वीराज रासो ' 12 वीं शती के दिल्ली और अजमेर के महाबली सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय तथा उनके महान प्रतिद्वन्द्वी जयचंद , गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य , गजनी तथा लाहौर के शासक शहाबुद्दीन गोरी के राज्य , रीति नीति , शासन व्यवस्था , सैनिक - सेना - सेनापति , युद्धशैली , गुप्तचर , व्यापार मार्ग आदि का एक प्रमाण तथा मानवीय चित्तवृत्तियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषक अपने ढंग का अनूठा महाकाव्य है 

प्रकाशित संस्करण

पृथ्वीराज रासो चन्दवरदायी की सुकीर्ति का अनश्वर आधार है । इसके कई संस्करण मिलते हैं , जिन्हें मुख्यत : चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है । 

वृहद् रूपान्तर 

इसकी कई प्रतियां उदयपुर राज्य के पुस्तकालय में संरक्षित हैं । काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रतियों के आधार पर प्रकाशन के लिए संस्करण तैयार किया । इसकी उपलब्ध प्रतियां सं . 1750 के बाद की हैं । कुछ आलोचक इस संस्करण का आधार 1842 की प्रति को मानते हैं । इस संस्करण में 69 समयों ( सर्ग ) तथा 16306 छंद हैं

मध्यम रूपांतर 

इसकी कुछ प्रतियां अबोहर के साहित्य सदन , बीकानेर के जैन ज्ञान भण्डार और श्री अगर चंद नाहटा के व्यक्तिगत पुस्तकालय में संरक्षित है । पं . मथुरा प्रसाद दीक्षित ने इसी संस्करण को प्रामाणिक माना था । इसकी सभी उपलब्ध प्रतियां सं . 1700 के बाद की हैं । इसमें सात हजार छंद हैं । 

लघु रूपांतर 

इसकी तीन प्रतियां बीकानेर राज्य के अनूप संस्कृत पुस्तकालय में संरक्षित हैं । यह उन्नीस सर्गों में विभाजित है और इसमें 3500 छंद हैं । यह संस्करण डा . पी . शर्मा द्वारा संपादित और प्रकाशित हो चुका है । 

लघुतम रूपान्तर 

इस संस्करण की खोज श्री अगरचंद नाहटा ने की । इनमें अध्यायों का विभाजन नहीं है । कुल छंदों की संख्या 1300 है । प्रो . दशरथ शर्मा ने इसी संस्करण को प्रामाणिक माना है । 

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता 

पृथ्वीराज रासो हिंदी का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है। इसमें 10,000 से अधिक छंद हैं और तत्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है। इस ग्रंथ में उत्तर भारतीय क्षत्रिय समाज व उनकी परंपराओं के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है, इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है। लेकिन संभवतः सर्वाधिक विवादास्पद भी है । विवाद का मुख्य कारण इसमें ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा तथा प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव का होना है । सर्वप्रथम जोधपुर के मुरारिदान ( चारण ) और फिर उदयपुर के कवि राजा श्यामलदास ( चारण ) ने चंद ( भट्ट ) के रासो पर शंका उठाई परन्तु चारणों और भाटों के जातीय द्वेष की दुर्गन्ध का आरोप लगने के कारण इनके तर्को को अधिक बल नहीं मिला । इसके बाद प्रो . वूलर के अध्ययनों का सार निकालते हुए उनके शिष्य हर्बट मोरिसन ने उसे ( पृथ्वीराज विजय नामक ग्रंथ को ) वंशावली , शिलालेख , घटनाओं आदि के आधार पर ऐतिहासिक तथा पृथ्वीराज रासो को इन्हीं आधारों तथा बड़ी संख्या में फारसी के शब्दों को देखते हुए अनैतिहासिक घोषित किया । फिर तो रासो की प्रामाणिकता का विवाद गंभीर होता गया और विद्वानों के समूहों ने अपने अपने मत के समर्थन में तर्क देने शुरू किए । 

लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि रासो एक काव्य - ग्रंथ है , इतिहास ग्रन्थ नहीं । ऐतिहासिक वाद - विवादों के कोलाहल से दूर तामपत्रों की शुष्क जांच से परे , वंश वंशावलियों , पट्टे परवानों , शिलालेखों के द्वन्द से अलग यह हिन्दी साहित्य की अनमोल विरासत है । 

आरम्भिक दिनों में रासो को प्रामाणिक माना गया था । सर्वप्रथम इसे प्रामाणिक समझकर ही कर्नल टॉड ने तीस हजार छंदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया था । फ्रांसीसी विद्वान गार्सा द तांसी ने भी इसे प्रामाणिक माना था । बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने तो इसका प्रकाशन भी शुरू कर दिया था । किंतु इसी समय 1895 ई . में डॉ . वूलर का कश्मीर में संस्कृत में लिखा गया पृथ्वीराज विजय महाकाव्य शीर्षक ग्रंथ मिल गया । इस ग्रंथ में वर्णित घटनाएं ऐतिहासिकता की दृष्टि से शुद्ध हैं । जबकि रासो का वर्णन इसके विपरीत है । इन हालातों में रासो की प्रामाणिकता पर संदेह करते हुए प्रकाशन कार्य रोक दिया गया । देश के कुछ अन्य विद्वानों को डॉ . वूलर के कारण सोचने की नई दिशा मिली । पं . गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने ऐतिहासिकता की दृष्टि से रासो पर अनेक आक्षेप किये जिनमें से प्रमुख हैं -

  • रासो में चौहान वंश की उत्पत्ति उनके कुल और वंश परम्परा का वर्णन अशुद्ध रूप में है । 
  • पृथ्वीराज के सगे - संबंधियों का वर्णन इतिहास से मेल नहीं खाता । 
  • गुजरात के राजा भीम ने पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर का वध किया था , जो रासो में वर्णित है लेकिन इतिहास के अनुसार ठीक उस समय भीमदेव बच्चा ही था । 
  • इतिहास के अनुसार पृथ्वीराज की मृत्यु तीस वर्ष की उम्र के पहले ही हो गई थी । जबकि रासो में 11 वर्ष से लेकर 36 वर्ष की आयु तक पृथ्वीराज के चौदह विवाहों का वर्णन है । इतिहास में इनके इतने विवाहों का कहीं उल्लेख नहीं है । 
  • रासो में दिये गये सभी संवत् अशुद्ध हैं । 
  • रासो के अनुसार पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य अपने नाना अनंगपाल के द्वारा प्राप्त हुआ जबकि इतिहास के अनुसार बीसलदेव ने बहुत पहले ही दिल्ली को अपने राज्य में मिला लिया था । 
  • रासो में दी हुई संयोगिता स्वयंवर की कथा का इतिहास से कोई संबंध नहीं ।
  • शहाबुद्दीन गोरी की मृत्यु से स्वपित का पूर्णतः कल्पना प्रसूत है । क्योंकि गोरी की मृत्यु पृथ्वीराज के हाथों नहीं गोरों के द्वारा हुई थी । 

हिन्दी के अनेक विद्वानों ने इन आक्षेपों का समाधान करते हुए रासो को प्रामाणिक सिद्ध करने की कोशिश की है । इनमें श्री मोहनलाल , विष्णुलाल पांड्या , मुनि जिन विजय और डॉ . दशरथ शर्मा के नाम उल्लेख्य हैं ।

श्री पांड्या जी ने सन , संवतों संबंधी आक्षेप के समाधान में आनन्द संवत की कल्पना की और माना रासो में विक्रम संवत की जगह जो आनन्द संवत दिये गये हैं वे करीब नब्बे वर्ष पीछे हैं । 

मुनि जिन विजय जी ने पुरातन प्रबंध संग्रह की विक्रमी संवत 1528 की प्रति में से एक प्रबंध खोजा है जिसे रासो का सारांश कहा जा सकता है , इसकी घटनाएं रासो के इतिवृत से काफी कुछ मिलती - जुलती हैं । इस प्रबंध में चार छंदों को भी उद्धृत किया गया है जो थोड़े बहुत परिवर्तित रूप में रासो के अलग - अलग संस्करणों में मिलते हैं । मुनि जिन विजय ने इस प्रबंध की मूल रचना तिथि 1290 तय की है । और इसे रासो के आधार पर उचित माना है । ऐसी स्थिति में रासो का रचनाकाल 13 वीं सदी के पहले ही होना चाहिये । 

रासो की प्रामाणिकता के बारे में सर्वाधिक सराहनीय प्रयास डॉ . दशरथ शर्मा का है । उन्होंने लघुतम संस्करण को ही मूल रासो प्रमाणित किया है । श्री गौरी चंद हीराचंद ओझा के आक्षेप वृहद् संस्करण पर ही लागू होते हैं । इस संस्करण में मिलने वाली अनैतिहासिक घटनाएं लघुतम संस्करण में नहीं है । कुछ घटनाएं जैसे संयोगिता स्वयंवर , अनंगपाल द्वारा पृथ्वीराज को दिल्ली का राज दिया जाना और गोरीवध वाली घटनाएं लघु संस्करण में भी मिलती हैं किन्तु इन्होंने इन्हें ऐतिहासिक प्रमाणित किया है . " सुरजन चरित ' एवं ' पृथ्वीराज विजय ' में भी क्रमश : कांतिमती और तिलोत्तमा नामक राजकुमारियों का वर्णन मिलता है जो संयोगिता के वर्णन से मिलता जुलता है । " इस संदर्भ में डॉ . शर्मा कहते हैं- जिसकी ऐतिहासिकता के विरुद्ध सब युक्तियां हेत्वाभास मात्र हैं , उस कांतिमति संयोगिता को हम पृथ्वीराज की प्रेयसी रानी ही मानें तो दोष क्या है ? गोरी वध वाली घटना का समर्थन भी ' सुरजन चरित ' ग्रंथ से होता है । साथ ही शर्मा ने यह सिद्ध किया है कि मूल रासो अपभ्रंश में लिखा गया था । उन्होंने लघु संस्करण के कुछ हिस्सों को किंचित परिवर्तन के साथ विशुद्ध अपभ्रंश में रूपांतरित करके दिखाया है । डॉ . शर्मा की खोज के बाद रासो की प्रामाणिकता का विवाद कुछ धूमिल हो गया था । किंतु कुछ वर्ष पहले डॉ . हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पुन : इस प्रश्न को उठाया । 

डॉ . द्विवेदी का कहना है - रासो की रचना शुक - शुकी संवाद के रूप में हुई थी । अत : उन्हीं सौ को प्रामाणिक माना जाना चाहिये जो शुक - शुकी संवाद से आरम्भ होते हैं । इस आधार पर उन्होंने केवल सात सर्गों को प्रामाणिक माना -

  • आरम्भिक अंश
  • इच्छिनी का विवाह 
  • शशिव्रता का गंधर्व विवाह 
  • तोमर पहार का शहाबुद्दीन गोरी को पकड़ना
  • संयोगिता का विवाह 
  • कयमास वध 
  • गोरी वध संबंधी इतिवृत्त 

डॉ . माता प्रसाद गुप्त ने द्विवेदी जी के मतों की आलोचना करते हुए इससे असहमति जतायी । उनका तर्क है कि प्रक्षेपकारी ने भी शुक - शुकी संवाद में प्रक्षिप्त सर्गों की रचना नहीं की होगी , इसका क्या प्रमाण है । द्विवेदी जी द्वारा प्रामाणिक माने गये सर्गों में भी प्रक्षिप्त अंशों के होने की संभावना है । 

डॉ . गणपति चन्द्र गुप्त का मानना है , रासो को सर्वथा अप्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । इसके मूल रूप की खोज अभी भी बाकी है । हमारे कविगण जान - बूझकर चरित्र नायक के गौरव की गाथा के लिए ऐतिहासिक तथ्यों में परिवर्तन करते रहे हैं । अत : चंद का भी ऐसा कर देना आश्चर्य की बात नहीं । साथ ही यह भी मानना होगा कि 12 वीं सदी तक हिंदी का विकास इतना अधिक नहीं हुआ था कि वह साहित्य में प्रयुक्त होती । अत : रासो का मूलतः अपभ्रंश में रचा जाना ही अधिक संभव है । 

इस दिशा में एकमात्र ठोस प्रयत्न डॉ . विपिन बिहारी त्रिवेदी ने अपने शोध प्रबंध में किया है यह लिखते हुए कि भले ही कुछ अंशों में अथवा सम्पूर्ण रूप में रासो जाली सिद्ध हो परन्तु प्रकाशित रूप में यह जैसा जो कुछ है हमारे सामने है , उसकी साहित्यिकता की परख अक्षुण्ण रहेगी । 

रासो की मूल कथा 

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज का जन्म 1058 ई . में हुआ सं . 1065 में उनके नाना ने इन्हें गोद ले लिया । 1087 ई 0 में पृथ्वीराज कन्नौज गए और 1094 ई 0 में इनका गोरी से युद्ध हुआ | रासो के अनुसार सोमेश्वर का विवाह दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल की कन्या से हुआ पृथ्वीराज सोमेश्वर के पुत्र थे । अनंगपाल की दो कन्याएं थी सुंदरी और कमला । सुंदरी का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ । इन दोनों के पुत्र थे जयचंद । कमला का विवाह अजमेर के राजा सोमेश्वर से हुआ जिनके पुत्र थे पृथ्वीराज । इस प्रकार पृथ्वीराज और जयचंद दोनों मौसेरे भाई हुये। जब अनंगपाल ने पृथ्वीराज को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया तो जयचंद को बहुत क्रोध आया । उन्होंने राजसूय यज्ञ किया और देशभर के राजाओं को निमंत्रित किया । यज्ञ के साथ ही अपनी अपूर्व सुन्दरी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर रचा । पृथ्वीराज के न आने पर जयचंद ने उनका अपमान करने के लिए उनकी स्वर्णमूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर खड़ी करवा दी । संयोगिता पहले से ही पृथ्वीराज पर अनुरक्त थी । उसने इस मूर्ति को ही वरमाला पहना दी । क्रुद्ध होकर जयचंद ने उसे घर से निकाल गंगा किनारे के महल पर भेज दिया । खोजते - खोजते पृथ्वीराज चौहान यहीं पहुंच गये । इसी महल में संयोगिता से गंधर्व विवाह किया । इसी कारण जयचंद से युद्ध छिड़ा । अपने पराक्रम के बल पर पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर सकुशल दिल्ली पहुंच गये । पृथ्वीराज रासो की मूल कथा यही है ।

पृथ्वीराज को गोरी द्वारा बंदी बना लिया जाना , पृथ्वीराज के बाण से गोरी का वध , चंद और पृथ्वीराज के आत्मोत्सर्ग की कथा भी समानान्तर चलती है । गोरी और पृथ्वीराज के वैर का कारण यह लिखा गया है कि शहाबुद्दीन अपने यहां की एक सुंदरी पर आसक्त था और वह दूसरे पठान सरदार हुसैन शाह को चाहती थी । गोरी से तंग आकर वे दोनों पृथ्वीराज की शरण में चले गये , गोरी ने उन दोनों को लौटाने की जिद की पर पृथ्वीराज ने शरणार्थियों की रक्षा की क्षात्र परंपरा को निभाते उन्हें लौटाने से इंकार कर दिया । इसी बैर से शहाबुद्दीन ने दिल्ली पर हमले किये । इन मुख्य कथाओं के साथ अनेक राजाओं से पृथ्वीराज के युद्ध तथा अनेक राजकन्याओं से विवाह की कयाओं के साथ कई पौराणिक आख्यान - उपाख्यान भी अपने ढंग से वर्णित हुए हैं । 

प्रमुख घटनाएं

  • दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल की पुत्री का अजमेर नरेश सोमेश्वर से विवाह ।
  • पृथ्वीराज के नाना द्वारा उन्हें गोद लिया जाना ।
  • राजा समरसिंह का पृथ्वीराज का समकालीन होना और उनके पक्ष में युद्ध करना । 
  • संयोगिता हरण । 
  • पृथ्वीराज और गोरी के बीच युद्ध ।
  • पृथ्वीराज के शब्दवेधी बाण द्वारा मुहम्मद गोरी का वध ।

साहित्यिक विशेषताएं

यद्यपि कवि चन्द की एक ही रचना प्राप्त होती है लेकिन यही इनके यश के लिए पर्याप्त है । कुछ विद्वान तो इसे हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य भी घोषित करते हैं । साहित्यिक दृष्टि से यह हिन्दी की प्रथम उल्लेखनीय काव्य रचना हैं इनकी साहित्यिक विशेषताएं इस प्रकार से हैं –

प्रकृति – चित्रण

पथ्वीराज रासो  नगर , विवाह , सरंगसज्जा , युद्ध , शबु - विजय , जलकेलि , आखेट आदि वर्णनों के लिए प्रसिद्ध है । इस प्रकार के अनेक वर्णनों में कवि ने अपनी रुचि का परिचय दिया है । इसके साथ - साथ कवि ने शरद् ऋतु वर्णन और प्रक ति वर्णन भी किया है । जहां तक प्रकृति वर्णन का प्रश्न है कवि चन्द ने प्रकृति के केवल आलम्बन और उद्दीपन के रूपों का ही वर्णन किया है , लेकिन यह वर्णन भी काफी प्रभावशाली बन पड़ा हैं इस सम्बन्ध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है -

" शोभा चाहे प्रकृति की हो या मनुष्य की हो , परम्परा प्रचलित रूढ़ उपमानों के सहाने ही निखरी है । " 

अधीनस्थ सामन्तों की स्वामी भक्ति और पराक्रम अत्यन्त उज्ज्वल रूप में प्रकट हुए हैं । परन्तु प्रकृति वर्णन में कवि ने जहां कहीं केवल नामपरिगणन शैली को अपनाया है वहां नीरसता और शुष्कता उत्पन्न हो गई है । फिर भी विभिन्न ऋतु का वर्णन करते हुए कवि को अपूर्व सफलता मिली है । वसंत वर्णन अवलोकनीय है 

  • " सामग्गं कलधूत नूतन शिखरा मधुलेहि मधुवेष्टिता । 
  • वाता सीत सुगन्ध मंद सरसा आलोल साचेष्टता । 
  • कंठी कंठ कुलाहेल मुकलया कामस्थ उद्दपनी । 
  • रत्ने रत बसन्त पत्त सरसा संजोगि भोगाइते ।। " 

सौन्दर्य चित्रण

सौन्दर्य चित्रण के अन्तर्गत नख - शिख वर्णन में रासोकार चंद को अभूतपूर्व सफलता मिला है । कहा जाता है " पृथ्वीराज रासो अपने नख - शिख वर्णन के कारण हिन्दी की काव्य रचनाओं में अद्वितीय स्थान रखता है । इसमें कवि ने कल्पना की सरसता के साथ - साथ नायिका के व्यक्तित्व का भी ध्यान रखा है । " कवि ने नायिका के हृदय को मदन का अयन कहा है जहां वह छिप जाना चाहता है । उसके अधरों की उपमा पके हुए बिम्ब फल की है । पथ्वीराज रासो में एक से एक सुन्दर उपमान भरे पड़े हैं । संयोगिता के देदीप्यमान ललाट पर लगे हुए कस्तूरी के तिलक की उपमा सागर से निकले हुए नवीन चन्द्रमा की गोद में बैठे हुए मृग के साथ की है । जहां चन्दवरदायी ने संयोगिता के नख - शिख का वर्णन किया है वहां कवि उसकी सखियों का वर्णन करना नहीं भूला । बल्कि सखियों का वर्णन कवि बसन्त प्रियाओं के रूप में करता है । मनभावन रूप दर्शनीय है 

  • " अधरल पल पल्लव सुवास । 
  • मंजरिय तिलक पंजरिअ पास । 
  • अलि अलक कंठ कलमंठ मंत । 
  • संयोगि भोग बरु भयु बमंत ।। 

मानवीय नख - शिख वर्णन में सरस्वती के नख - शिख वर्णन में हमें देवी विषयक नख - शिख वर्णन का उदाहरण मिल जाता है । लेकिन यह नख - शिख न होकर शिख - नख है क्योंकि सरस्वती यहां एक देवी हैं । अतः कवि ने आराधक बनकर उसके सौन्दर्य का वर्णन किया है । कवि ने उसके कपोलों की तुलना प्रातःकाल में उदित उस चन्द्रमा के समान की है जो राहु के कलंक से बचने के लिए मृग के रथ के जुए को खींच रहा हो । परवर्ती कवियों के समान कवि चन्द का नख - शिख वर्णन सर्वथा मर्यादित और सुरुचि सम्पन्न है । सौन्दर्य चित्रण अनुकरणीय है । इस प्रकार पद्मावती के नख - शिख वर्णन भावी कवियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है 

  • मनहुं कला ससि भांन , सोलह सो बन्निय । 
  • बाल बेस ससि ता समीप , अंनित रस पिन्निय ।। 
  • विगसि कमल मग अमर , बैन पजेन मग लुट्टिय । 
  • हीर कीर अरु बिम्ब , मोति नष सिष अहि घुट्टिय ।। 
  • छप्पनि गमन्द हरि हंस गति , बिह बनाय संचै सचिय । 
  • पदमिनिय रूप पदमावतिय , मनुहं काम कामिनिरचिय ।।

युद्ध – वर्णन

चन्दबरदायी पथ्वीराज चौहान के न केवल दरबारी कवि थे , अपितु उनके सखा भी थे । इसके साथ - साथ वे एक वीर योद्धा भी थे । अवसर आने पर वे पथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करने भी जाते थे । पथ्वीराज - रासो में दो स्थलों पर युद्धों का बहुत ही सजीव वर्णन मिलता है । पहला तो पृथ्वीराज - जयचन्द युद्ध और दूसरा शहाबुद्दीन - पृथ्वीराज युद्ध । चंदवरदाई ने जयचन्द की सेना की सज्जा का वर्णन बड़े ही प्रभावशाली रूप में किया है । यद्यपि युद्ध - वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में है , लेकिन उसका प्रभाव बड़ा ही मार्मिक बन पड़ा है । इस सम्बन्ध में कवि ने यदि युद्ध - सज्जा का वर्णन किया है तो युद्ध का भी वर्णन किया है । रासो का उदाहरण अवलोकनीय है 

  • " सर करोणि रंग पलं पारि पर्क । 
  • बजइ मंस संचिं पंधि वासि करक ।
  •  डुम ढाल लोलंति हालं ति देसं । 
  • गये हंस नंसीय गेहे सुवेसं । 
  • परे पानि जंघं घरंग निनारे ।। 
  • मनउ मच्छ मछ्छं तरे तीर मारे । 
  • सिर सा सरोपां कछे सा सिवाली । 
  • गहे अतं गुध्धी स सोहै मराली । 
  • तट रंभ रत्तं भरंतं विचीरं । 
  • कंत स्याम सवेतं नीर पीरं ।। 

रस 

सामान्यतः महाकाव्य में श्रृंगार , वीर या शांत रस का परिपाक होता है । इस काव्य में श्रृंगार और वीर रस का परिपाक हुआ है । कवि चन्द ने पथ्वीराज के प्रेम का वर्णन करने के लिए श्रृंगार रस के अनेक स्थल सजाए हैं । ऐसे स्थलों पर नारियों का रूप - चित्रण तथा संयोग - वियोग सम्बन्धी विविध दशाओं का वर्णन काफी प्रभावशाली बन पड़ा है । जहां कवि ने एक ओर राजकुमारियों के नख - शिख का वर्णन किया है , वहां दूसरी ओर उनकी प्रेम - पीड़ाओं तथा सहवास का भी सुन्दर वर्णन किया है । इच्छिनी , शशिव्रता , संयोगिता , पद्मावती आदि पृथ्वीराज की अनेक रानियां थीं । कवि ने इन सबके सौन्दर्य का वर्णन नायिका भेद को ध्यान में रख कर तो नहीं किया , लेकिन फिर भी अनेक स्थलों पर नायिका भेद की छाया - सी पड़ गई है । पथ्वीराज और संयोगिता के रति - वर्णन में श्रृंगार का हृदयस्पर्शी रूप है 

  • " रस कीडत विरीत चितं दंपति दंपति रति । 
  • पंच पंच सुढए , पंच लगोति पंच पति ।। 
  • उठिय बाल सज्जिय दुकूल , सुध पंजरसु धाम चित्त । 
  • हर हराट उप्पज्यौ , तजिय अक्ककौट कान कता " 

रासों में श्रृंगार रस के संयोग - पक्ष का मुख्य रूप से वर्णन हुआ है । परन्तु संयोगिता और पृथ्वीराज के वियोग - पक्ष का भी सुन्दर परिपाक हुआ है ।

चन्द मात्र कवि नहीं थे , बल्कि योद्धा भी थे । अक्सर वे युद्ध सामग्री से सुसज्जित होकर पृथ्वीराज के साथ युद्धभूमि में भी जाते थे । यही कारण है कि इन्होंने युद्धभूमि का सजीव वर्णन किया है । सेना की व्यूह रचना के चित्र बड़े ही प्रभावशाली बन पड़े हैं । कवि की प्रत्यक्षानुभूति के वर्णनों से वीर रस फूट - फूट पड़ता है । घग्घर नदी के युद्ध - वर्णन में शौर्य का अनूठा रंग है 

  • " हुआ सद्द सुसदह नदं भरं । 
  • धन घेरिक कीय सुफौज भरं । 
  • लष लवं मिले दल सम्मिलयं । 
  • नरु भद्दव बाहल समिलयं । " 

छंद - अलंकार

पृथ्वीराज रासो को छन्दों का जंगल कहा गया है । छन्दों का जितना विविधोन्मुखी प्रयोग पृथ्वीराज रासो में हुआ है उतना किसी अन्य आदिकालीन ग्रन्थ में नहीं हुआ । इस छन्द वैविध्य को देखकर ही कहा जा सकता है कि छन्द - योजना पर कविवर चन्दबरदायी का पूर्ण अधिकार है । उन्होंने अनेक बार वर्णिक और मात्रिक छन्दों का सफल प्रयोग किया है । इनमें छप्पय , गाथा , सट्टय , पद्धरिया आदि प्रमुख छन्द हैं । कवि का छन्द प्रयोग कौशल इस बात से सिद्ध होता है कि एक ही प्रकार के वर्णन में वे विभिन्न छन्दों का बड़ी कुशलता से प्रयोग कर लेते हैं । इससे कवि के छन्द वैविध्य का ज्ञान स्वतः स्पष्ट हो जाता है । डॉ . हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनके छन्द प्रयोग के बारे में उचित ही कहा है- " वैसे तो हर बार तलवार की झंकार में तोटक , तोमर , पद्धति आदि पर उतर आते हैं , पर जमकर वे छप्पय और दोहा में ही लिखते हैं । " 

चन्दवरदायी ने अपने काव्य के भावपक्ष को समृद्ध बनाने के लिए उसमें अलंकारों का सुन्दर एवं स्वाभाविक प्रयोग किया है । उनकी अलंकार योजना पूर्णतः भावानुकूल है । यद्यपि कवि ने शब्दालंकारों में अनुप्रास तथा यमक का सर्वाधिक प्रयोग किया है , लेकिन उसमें चमत्कार प्रदर्शन की प्रवृत्ति कहीं पर भी दिखाई नहीं पड़ती । अर्थालंकारों में कवि ने प्रायः सादृश्यमूलक अलंकारों का ही प्रयोग किया है । इनमें उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा , रूपकातिशयोक्ति आदि कवि चन्द के सर्वप्रिय अलंकार हैं । उनका उपमानों का प्रयोग भी सर्वथा परम्परागत है । लेकिन कहीं - कहीं उन्होंने नवीन और मौलिक उपमानों का भी प्रयोग किया है । संयोगिता के वर्णन में कवि ने जो रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग किया है । अलंकार के सहज प्रयोग से काव्य रूप चमत्कारीक बन गया है

  •  " कुंजर उप्पर सिंहासिंह उप्पर दोय पब्बय । 
  • पब्बय उप्पर मंथ । 
  • मंथ उप्पर ससि सम्भय । 
  • ससि उप्पर इक कीर । 
  • कीर उप्पर मग विठ्ठौ । 
  • मग उप्पर कोदण्ड । 
  • संघ कदंथ बच हो ।। "

भाषा-शैली

सहृदय कवि भाषा के धनी ही नहीं हैं बल्कि भाषा मानो करबद्ध नायिका के समान कवि का अनुकरण करती हुई दिखाई देती है । कवि ने स्वयं षड्भाषा कुराण - पुराण का ज्ञाता होने का दावा किया है । नदी , वन , पर्वत , युद्ध सौन्दर्य आदि वर्णनों के सम्बन्ध में कवि ने भावनुकूल भाषा और शब्दों का प्रयोग करके अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है । युद्ध - वर्णन प्रसंग में कवि ने यदि डिंगल भाषा का प्रयोग किया है तो श्रृंगार तथा सौन्दर्य वर्णन के सन्दर्भ में पिंगल भाषा का प्रयोग किया है । रासो में कवि ने संस्कृत, अपभ्रंश , राजस्थानी , पंजाबी , ब्रज , अरबी तथा फारसी भाषाओं के शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है । युद्ध वर्णन में जहाँ कवि की भाषा आलोचना प्रधान है वहाँ श्रृंगार और अन्य रसों के वर्णन में सरस और मधुर रूप धरण कर लेती है । 

यद्यपि पृथ्वीराज रासो में अनेक प्रक्षिप्त अंश जुड़ गए हैं जिसके फलस्वरूप इसमें न तो भाषा की एकरुपता है और न ही व्याकरण का कोई व्यवस्थित रूप दिखाई देता है ।

Previous
Next Post »

उत्साहवर्धन के लिये धन्यवाद! ConversionConversion EmoticonEmoticon