कबीर के पद Kabir ke Pad

 कबीर के पद 
Kabir ke Pad

कबीर ग्रन्थावली (सं. श्यामसुन्दर दास)

कबीर के पद Kabir ke Pad

मध्यकालीन भक्त,कवि व सन्त कबीर को मौखिक परम्परा का कवि माना जाता है । कबीर ने स्वयं किसी भी कृति को लिपिबद्ध नही किया बल्कि उनके अनुयायियों व श्रद्धालुओं ने उनके उपदेशों को अपने हृदय में संकलित व संरक्षित किया । इनके कुछ पद सिख धर्म के सबसे बड़े ग्रन्थ गुरुग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं। आधुनिक काल में भी अनेक विद्वानों ने इनके उपदेशों को संकलित व संपादित करने का महनीय प्रयास किया । जिनमें सबसे सराहनीय कार्य हिंदी के अनन्य साधक, विद्वान्, आलोचक और शिक्षाविद् डॉ श्यामसुन्दर दास द्वारा कबीर ग्रंथावली (1928) के रूप में किया गया । यहां पर हम डॉ श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित कबीर ग्रन्थावली के आरम्भिक बीस पद व्याख्या सहित दे रहें हैं आशा है हमारा यह प्रयास अध्येताओं व प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा ।

( 1 ) 

  • दुलहनी गावहु मंगलाचार 
  • हम घरि आए हो राजा राम भरतार ।। टेक ।। 
  • तनरत करि में मनरत करिए , पंचतत्त बराती । 
  • रामदेव मोरे पाहुन आए मैं जीवन में माती ।। 
  • सरीर सरोवर बेदी करिहबमा वेव प्रचार । 
  • रामदेव संगि भौवरी हूं , धंनि धनि भाग हमार ।।
  • सुरतेतीसू कौतिन आये , मुनिवर साहस अत्यासी । 
  • कहै कबीर हम व्याहि चले है , पुरिष एक अविनासी ।। 

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि हे सुहागिन नारियो । अब तुम विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले मंगलमय गीत को गाओ क्योंकि आज मेरे घर में मेरे पति रूपी राजा राम अर्थात परमात्मा आए हैं । मेरा तन और मन दोनों ही उनके प्रेम या आसिक्त मैं लीन हो गए हैं । पाँचों तत्व - (पृथ्वी , आकाश , अग्नि , पानी व वायु ) राजा राम के साथ बराती बन कर आए हैं । रामदेव अर्थात परमात्मा मेरे यहाँ पर अतिथि बन कर आए हैं और मैं अपने यौवन अर्थात उनकी भक्ति में मदमस्त हो गई हूँ । मैं अपने शरीर रूपी कुण्ड को विवाह की वेदी बना कर इस विवाह की परिक्रमाएं पूरी करूंगी । मेरा जीवन धन्य है अर्थात यह मेरा सौभाग्य है कि मेरा व परमात्मा का मिलन हो रहा है । मेरे व परमात्मा के इस विवाह अर्थात मिलन को देखने के लिए तैतीस करोड देवी देवता और अठ्यासी हजार मुनिजन यहाँ पर आए हैं । कबीर दास जी कहते हैं कि इस प्रकार मेरी आत्मा उस एक अविनाशी पुरूष अर्थात परमात्मा के साथ विवाह करके जा रही है ।

( 2 ) 

  • बहुत दिनन थे में प्रतिम पाये , 
  • भाग बड़े घरि बैठे आये ।। टेक ।। 
  • मंगलाचार माहि मन राखों , राम रसांझणा रसना चाी । 
  • मंदिर मोहि भयो उजियारा , ले सूती अपनी पीव पियारा ।।
  • मैं रनि रासी जे निधि पाई , हमाहि कहाँ यह तुमहि बड़ाई । 
  • कहै कबीर मैं कुछ न कीन्हा सखी सुहाग राम मोहि दीन्हा ।। 

व्याख्या 

कबीरदास जी कहते हैं कि मेरी आत्मा रूपी प्रेमिका को बहुत दिनों के बाद अपने प्रियतम अर्थात परमात्मा से मिलने का अवसर मिला है । यह मेरे परम सौभाग्य की बात है कि आज वह प्रियतम बिना किसी प्रयास के ही मिल गया क्योंकि वह स्वयं मेरे घर अर्थात मेरे पास आया है । आत्मा व परमात्मा के इस महामिलन के अवसर पर मेरा मन मंगलाचार कर रहा है और मेरी जीभ राम रूपी रसायन के स्वाद को चख रही है । कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा व परमात्मा के मिलन के अवसर पर भक्त के हदय में असीम आनंद है और वह बार - बार उस परमात्मा के नाम का ही स्मरण कर रहा है । कबीर दास जी कहते हैं कि अब मेरे मन रूपी मंदिर में ज्ञान व प्रेम के प्रकाश से उजाला हो गया है और मेरी सतीरूपी आत्मा अपने प्यारे प्रियत्तम के साथ मिलन के सुख का आनंद उठा रही है । कबीर दास जी कहते हैं कि परमात्मा के मिलन से जो निधियाँ अर्थात सुख मुझे मिले हैं , उनकी मैं तुमसे कहाँ तक प्रशंसा कर अर्थात उन सुखों का वर्णन नहीं किया जा सकता । कबीर दास जी कहते हैं कि परमात्मा के साथ होने वाले इस मिलन में मेरा कोई योग नहीं है । यह तो मेरे प्रियतम राम ने अनुकम्पा करके मुझे इस महामिलन के अवसर को प्रदान किया है ।

( 3 ) 

  • अब तोहि जान न देहू राम पियारे , 
  • ज्यू भाव त्यू होह हमारे ।। टेक ।। 
  • बहुत दिनन के बिछूरे हरि पाये , भाग बड़े घरि बैठे आये ।। 
  • चरननि लागिं करौं बरियायी , प्रेम प्रीति राखों उरझाई । 
  • इत मन मंदिर रही नित चोप , कहै कबीर परहु मति घोष ।।

व्याख्या

हे प्रियतम राम । अब मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी । तुम्हें जिस प्रकार से भी अच्छा लगे या जैसे तुम चाहो , वैसे तुम मेरे ही बनकर रहो । हे परमात्मा । मैंने बहुत दिनों तक तुम से बिछुड़कर अर्थात तुम से दूर रह कर अब फिर से प्राप्त किया है । यह मेरा परम सौभाग्य है कि अब तुम मुझे घर बैठे ही प्राप्त हो गए अर्थात तुम्हें पाने के लिए मुझे कहीं न तो जाना पड़ा और न ही कार्य करना पड़ा । अब तो मैं तुम्हें बलपूर्वक रोक कर तुम्हारी हर सम्भव सेवा करूंगी और तुम्हें अपने प्रेम व स्नेह के जाल में उलझा कर रखूगी ताकि तुम मुझे छोड़कर न चले जाओ । हे प्रियतम राम ! अब तुम मेरे मन रूपी मंदिर में भली प्रकार से रहो और मुझे छोड़कर कहीं और जाने के धोखे में मत पड़िए । 

( 4 ) 

  • मन के मोहन बीदुला , यह मन लागी तोहि । 
  • चरन कवल मन मौनिया , और न मा मोहि रे ।।टेक ।। 
  • घट दल कंवल निवासिया , चहुं की फेरि मिलाई रे । 
  • वहूँ के बीधि समाधियाँ , तहाँ काल न पारी आरे ।। 
  • अष्ट कंवल बल भीतरा , तहाँ श्रीरंग केलि कराइरे ।
  • सतगुरू मिले तो पाइये , नहि ती जन्म अक्यारथ जाइ रे ।। 
  • कदली कुसुम बल भीतरी , तहाँ दस औगुल का बीच रे । 
  • तहाँ दुवादस खोजि ले जनम होत नहीं मीच रे ।। 
  • बंक नालि के अंतर , पछिम दिसों की बाट रे । 
  • नीमर मर रस पीजिये , तहाँ मेवर गुफा के घाट रे ।। 
  • त्रिवेणी मनाइ न्हवाइए सुरति मिले जो हाथि रे । 
  • तहाँ न फिरि मध जोइए सनकादिक मिलि है साथि रे ।। 
  • गगन गरजि मध जोइसे , तहाँ दी तार उनंत रे । 
  • बिजुरी चमकि धन बरपि है , तहाँ भजित है सब संत रे ।। 
  • पोडस केवल जब चेतिया , तब मिलि गये श्री बनवारी रे । 
  • जुरामरणा अम भाजिया , पुनरपि जनम निवारि रे ।। 
  • गुर गमित पाइए अंपि मरे जिनि कोइ रे । 
  • नहीं कबीरा रमि रया सहज समाधी सोहरे || 

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि हे मेरे मनमोहन विष्णु ( प्रभु विट्ठल ) । मेरा यह मन तो केवल आप में ही अनुरक्त है । मेरे मन ने आपके कमल के समान सुन्दर चरणों को ही अपना सब कुछ मान लिया है और उसे अब आपके अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता है । हे प्रभु । आप चार दल वाले कमल अर्थात स्वाधिष्ठान में निवास करते हैं और चारों ओर भागने वाले मेरे चंचल मन को अपनी ओर फेर कर अपने में मिला लिया है । अब मेरा मन दो दो वाले कमल अर्थात आज्ञाचक्र में स्थापित हो गया है जहाँ पर मत्यु भी उसके समीप नहीं पहुंचती है । हे प्रभु । आप आठों कमलों अर्थात मूलाधार , स्वाधिष्ठान , मणिपुर आदि चक्रों के मध्य क्रीड़ा करते हैं । आपके इस रूप की प्राप्ति केवल सद्गुरू के मार्गदर्शन से ही सम्भव है अन्यथा यह जन्म और जीवन दोनों ही व्यर्थ चले जाते । कदली कुसुम के अन्दर जहाँ पर हृदय कमल है वहां दस अंगुल का स्थान है और उसी स्थान पर मनुष्य को बारह दल वाले कमल अर्थात अनाहत चक्र को खोज लेना चाहिए । उस स्थान पर जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति नहीं होती है । मेरुदण्ड अर्थात थंकनाल के भीतर पश्चिम दिशा में सुषुम्ना नाड़ी का रास्ता है और वहां पर शून्य गुफा ( बहमरन्य ) से निरंतर झरते हुए अमृतरस को पीना चाहिए । इडा ,पिंगला व सुषुम्ना के संगम स्थल अर्थात त्रिकुटी को ही त्रिवेणी मानकर उसके सुरति या स्मरण रूपी जल में मन को स्नान कराना चाहिए । वहां पहुंच कर संसार की ओर देखकर किसी की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वहां पर सनक , सनंद आदि ऋषियों का साथ मिल जाता है । गगन की गर्जना अर्थात अनाहत नाद को सुनकर ऊपर की ओर देखना चाहिए वहाँ पर अनंत तारे दिखाई पड़ेंगे । वहाँ पर उस गगन में ज्योतिर्मय परमात्मा की कान्ति रूपी बिजली चमकती है और अमृत वर्षा में सभी संतादि भीगते हुए आनंद प्राप्त करते हैं । सोलह दल वाले कमल अर्थात विशुद्ध चक्र की प्राप्ति पर मन को प्रभु का साक्षात्कार अर्थात दर्शन होते हैं । उनके दर्शन होते ही वृद्धावस्था , मृत्यु आदि का भ्रम भाग गया और इस प्रकार पुनर्जन्म या बार - बार जन्म लेने के चक्र से मुक्ति मिल गई कोई व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए भले ही अथक परिश्रम करता हुआ मर जाए परन्तु जब तक सदगुरू की कृपा नहीं होती है , तब तक साधक उस अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता । कबीर दास जी कहते हैं कि मेरा मन इस सहज समाधि में उस प्रमात्मा को प्राप्त कर अब वहीं पर रम गया है अर्थात लीन हो गया है । 

( 5 ) 

  • गोकल नाइक बीतुला , मेरी मन लागौ तोहि रे । 
  • बहुमक दिन बिछुरै भये , तेरी औसरि आर्य मोहि ।। टेक ।। 
  • करम कोटि को ग्रेह रच्यों रे , नेह कये की आस रे । 
  • आपहिं आप बैंधाइया , बैलोचन मरति पियास रे ।। 
  • आपा पर संमि चीन्हिये , दीस सरबसमान ।
  • इहि पद नरहरि मेटिये , छाडि कपट अभिमान रे ।। 
  • नों कलहूँ चलि जाइये नौ सिर ली भार । 
  • रसनी रसहि बिचारिये , सारंग श्रीरंग धार रे ।। 
  • साथै सिधि ऐसी पाइये , किंवा होइ महोइ । 
  • जे विठ न्यौंन न उपर्ज , तो अहुटि है जिनि कोई रे । 
  • एक जुगति एक मिले किंवा जोग कि भोग । 
  • इन दून्यू फल पाइये , राँम नाम सिधि जोग रे । 
  • प्रेम भगति ऐसी कीजिये , मुखि अंम त बरिष चंद रे ।
  • कबीर आपही आप बिचारिये , तब केता होइ अनंद रे ।। 
  • तुम्ह जिनि जानी गीत है , यहू निज ब्रहम विचार । 
  • केवल काहि समझाया , आतम साधन सार रे ।। 
  • चरन वल चित लाइये , रॉम नाम गुन गाइ । 
  • कहै कबीर संसा नहीं , भगति मुकति गति पाइ रे ।।

व्याख्या

कबीर जी कहते हैं कि हे गोकुल के नायक श्रीकृष्ण ! मेरा मन तो केवल आप में ही आसक्त हो गया है । मुझे आपसे बिछुड़े हुए बहुत दिन बीत चुके हैं और इसीलिए अब मुझे आपकी बहुत याद आती है । मैंने इस संसार में प्रेम को प्राप्त करने की आशा में करोडौ प्रकार के कर्म करके अपने लिए घर को रचाकर अर्थात घर को बसा कर स्वयं को अपने आप से बाँध लिया है अर्थात में केवल स्वार्थ सिद्धि के बारे में सोचता हूँ । अब मेरी ये दोनों आँखें आपके दर्शन की प्यास लिए हुए मर रही है । कबीरदास जी मनुष्यों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य ! तू अपने और पराए को समान समझ और सभी को समानता की दृष्टि से देख । यदि तू अपना कपट और अभिमान को त्याग कर सबके साथ समान व्यवहार करेगा तो तभी तुझे परमात्मा के दर्शन होंगे । उस परमात्मा को प्राप्त करने के लिए न तो तुझे कहीं जाने अर्थात तीर्थ यात्रा की जरूरत है और न ही तुझे अपने सिर पर भार धारण करने अर्थात शास्त्रों के ज्ञान का भार को ढोने की जरूरत है । तू अपनी जीभ से इस प्रेम रस का रसपान करके सारंगपाणि विष्णु का ध्यान कर । अर्थात ब्रह्म का आस्वादन कर । और कुछ हो या न हो साधना की सिद्धि से ही यह दशा प्राप्त होती है । जिस दृष्टि से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उससे मनुष्य आहत ही रहता है । कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान से ही मनुष्य के लोभ , मोह , आदि शोकों का निवारण होता है । कबीरदास जी कहते हैं कि एक युक्ति से केवल या तो भोग मिल सकता है या केवल योग मिल सकता है । कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में भोग या योग दोनों में से किसी एक को प्राप्त किया जा सकता है परन्तु राम नाम की सिद्धि से इन दोनों ही फलों की प्राप्ति हो सकती है । साधक को प्रेम रूपी भक्ति इस प्रकार करनी चाहिए कि मुख रूपी चन्दमा से अमृत की वर्षा हो । यदि मनुष्य अपने में ही परमात्मा का होना मान ले तो उसे कितना अर्थात अगाध आनन्द की प्राप्ति होगी । कबीरदास जी मनुष्य से कहते हैं कि जिस पद को गीत मान रहे हो , यह तो मेरा अपना ब्रह्म सम्बंधी विचार है और मैंने तो केवल आत्म - साधना के सार को इस पद में कहकर या गाकर समझाया है । इसीलिए तुम राम नाम के स्मरण करते हुए प्रभु के चरण कमल में अपना मन लगा दो । कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य ऐसा करता है उसे भक्ति व मुक्ति की प्राप्ति होने में कोई संशय नहीं रह जाता है । 

( 6 ) 

  • अब मैं पाइयो रे पाइयो ब्रह्म गियान , 
  • सहज समाधै सुख में रहिबी , कोटि कलप विश्राम ।।टेक ।।
  • गुर क पाल क पा जबकीन्हीं , हिरदै कंवल बिगासा । 
  • भागा अम दी दिस सुझ्या , परम जोति प्रकासा ।। 
  • म तक उठया धनक कर लीय , काल अहेड़ी भागा । 
  • उदय सूर निस किया पर्यानी , सावत जब जागा ।। 
  • अविगत अकल अनूपम देख्या , कहतों कह्या न जाई । 
  • सैन कर मन ही मन रहस , गुंगें जॉनि मिठाई ।। 
  • पहुप बिना एक तरवर फलिया , बिन कर तूर बजाया । 
  • नारी बिना नीर पट भरिया , सहज रूप सो पाया ।। 
  • देखत काँच भया तन कंचन , बिना बानी मन मौनी । 
  • उडया विहंगम खोज न पाया , ज्यू जल जलहि समानी ।। 
  • पूज्या देव बहुरि नहीं पूजा , नहाये उदिकन नौ । 
  • भागा अम ये कहीं कहतो , आये बहुरि न ऑन ।। 
  • आपै मैं तब आया निरष्या , अपन पै आपा सूझ्या । 
  • आपै कहत सुनत पुनि अपनी , अपन पै आपा बूझ्या ।। 
  • अपनें परचे लागी तारी , अपन पै आप समानों । 
  • कहै कबीर जे आप बिचारे , मिटि गया आवन जॉनों ।।

व्याख्या 

कबीरदास जी कहते हैं कि अब मुझे शीघ्र ही ब्रहम ज्ञान प्राप्त हो जाएगा । अर्थात मुझे परमात्मा से साक्षात्कार करने का अवसर मिलेगा और फिर मैं उसी सहज समाधि के सुख में लीन रहूंगा और फिर करोड़ों कल्प तक विश्राम करूंगा अर्थात संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाऊंगा । मेरे दयालु सदगुरू ने जब मुझ पर दया करके योग - साधना का मार्ग दर्शाया तब मेरे हदय में कमल का विकास हुआ । इससे मेरा सांसारिक बन्धनों का सारा भ्रम नष्ट हो गया और मुझे दसों दिशाओं का ज्ञान मिला अर्थात सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो गई और मेरे हदय में परमात्मा की ज्योति से प्रकाश फैल गया । अज्ञान रूपी अंधकार में सोये हुए मेरे मन ने जब इस प्रकाश में जागकर भक्ति रूपी धनुष को हाथ में धारण किया तो काल रूपी शिकारी वहां से भाग गया अर्थात मैं मृत्यु का शिकार होने से बच गया । जब ज्ञान रूपी सूर्य का उदय हुआ तो रात्रि ने प्रयाण किया और इस प्रकार में सांसारिक मोह - माया रूपी निद्रा को त्याग कर खड़ा हो गया अर्थात प्रभु की भक्ति में लीन हो गया । मैने उस अविगत , अकल , अनुपम परमात्मा को देखा जिसके बारे में मैं कुछ भी बताने में असमर्थ हूँ । परमात्मा के दर्शन करने के उपरांत मेरी दशा उस गूंगे के समान हो गई है जो गुड़ की मिठास का आनंद तो ले सकता है परन्तु उसका वर्णन नहीं कर सकता । उस परमात्मा से साक्षात्कार करते समय ऐसा लगा मानो बिना फूल के ही वृक्ष पर फल लग गए हैं , हाठों में पकड़े बिना ही तुरही बज रही है , पनिहारिन के बिना ही घड़े में पानी भर गया है । इस प्रकार सहज में ही मैंने उस परम तत्व के रूप को पा लिया । उस परम तत्व के दर्शन करते ही मेरा शरीर जो कांच से बना हुआ था अब सोने का बन गया और बिना कुछ मांगे ही मुहमांगी वस्तु प्राप्त हो गई । आत्मा रूपी पक्षी उस विराट तत्व की ओर उड़ गया और उसे खोजने पर भी दूंढा न जा सका अर्थात आत्मा और परमात्मा का वैसे ही मिलन हो गया जैसे जल की बूंद अथाह जल में विलीन हो जाती है । फिर उसे दुबारा खोजा नहीं जा सकता । कबीरदास जी कहते हैं कि अब तक मैं जिन पूजनीय देवी - देताओं की पूजा करता था , अब उनकी अराधना मैं नहीं करूंगा और न ही नहाने वाले जलाशय अर्थात पवित्र तीर्थ स्थल पर जाकर स्नान करुंगा । ऐसी बातें कहते ही मेरे धर्मान्धता , पाखंड आदि सम्बंधी सारे भ्रम समाप्त हो गए और इस प्रकार सच्चे ज्ञान की प्राप्ति से मुझे यहाँ संसार में बार - बार आना न पड़ेगा । जबसे मैंने अपने अन्दर ही परमात्मा का देखा है तब से मैंने स्वयं को परमात्मा का एक अंश मान लिया है और आत्मा में परमात्मा का होना स्वीकार कर लिया है । आत्मा का कथन ही परमात्मा का कथन मान लिया है और इस प्रकार मैंने अपने आप को समझ लिया है जिस व्यक्ति ने आत्म को पहचान लिया है वह इस संसार में आवागमन के चक्कर से मुक्त हो गया है । 

( 7 ) 

  • नरहरि सहर्जही जिनि जौना । 
  • गत फल फूल तत तर पलब , अंकूर बीज नानी ।।टेक ।। 
  • प्रकट प्रकास ग्यान गुरगमि थै , ब्रह्म अगनि प्रजारी । 
  • ससि हरि सूरदूर दूरंतर , लागी जोग जुग तारी ।। 
  • अलटे पवन चक्र पट वेधा , मेर संड सरपूरा । 
  • गगन गरजि मन सुंनि समानी , बाजे अनहद तूरा ।। 
  • सुमति सरीर कबीर विषारी , त्रिकुटि संगम स्वामी । 
  • आनंद काल फूटे , सुख में सुरति समानी ।।

व्याख्या 

उस प्रभु को केवल सहज - साधना के द्वारा ही जाना जा सकता है । उस साधना के द्वारा माया रूपी वृक्ष के काम - वासना रूपी फल फूल , मोह रूपी पल्लव , पुनर्जन्म रूपी अंकुर तथा मनोविकार रूपी बीज नष्ट हो जाते हैं । गुरू के उपदेश से ही मेरे शरीर में ब्रह्म रूपी अग्नि प्रज्जवलित हुई और मेरे हृदय में ज्ञान रूपी प्रकाश भर गया । चन्द्रमा ( इडा ) तथा सूर्य ( पिंगला ) जो दूर - दूर थे , अब योग व ध्यान से उनकी दूरी समाप्त हो गई है । इस प्रकार साधक की समाधि लग गई है । शरीर में विद्यमान पवन रूपी पाप की गति उलट गई है और मुण्डलिनी जागृत होकर मेरूदण्ड से होती हुई तथा मूलाधार , मणिपुर आदि छहों चक्रों को बंधती हुई सहस्रार तक पहुंच गई है । शून्य चक्र में पहुंचकर मन को गगन की गर्जना समान रूप से सुनाई दे रही है तथा वहाँ पर अनहद नाद का तूरा बज रहा है । कबीरदास जी विचार करके कहते हैं कि यह शरीर सुमति अर्थात सदबुद्धि से युक्त है और आज्ञाचक्र अर्थात त्रिकुटी ( जहाँ पर इड़ा व सुषुम्ना मिलती है ) के संगम पर परमात्मा का आत्मा से मिलन हो गया है । जो साधक इस परम पद को प्राप्त कर लेता है वह मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है सुख रूपी स्मृति में रम जाता है । 

( 8 ) 

  • मन रे मन ही उलटि समाना । 
  • गुर प्रसादि अकलि भई तोकी नहीं तर था बेगानी ।। टेक ।।
  • ने दरि दूरनियरा , जिनि जैसा करि जाना । 
  • औ ली ठीका चढ़या बलीर्ड , जिनि पीया तिनि माना ।। 
  • उलटे पवन चक्र घट बेघा , सुंनि सुरति लै लागी । 
  • अमर न मर मर नहीं जीवे , ताहि खोजि बैरागी ।।
  • अन कथा कवन सो कहिये , है कोई चतुर बिबेकी । 
  • कहै कबीर गुर दिया पलीता , सौ मल बिरलै देखी ।।

व्याख्या  

कबीरदास जी कहते हैं कि मेरा मन उलटकर अपने में ही लीन हो गया । कहने का तात्पर्य यह है कि साधक का मन जो पहले काम - वासना में भटका करता था अब अपने अन्दर ही परमात्मा के दर्शन करने के लिए प्रयास करने लगा । गुरू की कृपा रूपी प्रसाद को प्राप्त करके ही मुझे ज्ञान का लाभ हुआ अन्यथा मैं तो अपने से ही पराया था । जिस वस्तु ( मन ) को मैं निकट मानता था वह दूरी पर होती थी और जिसे ( परमात्मा को ) मैं दूर मानता था यह निकट थी । अब मुझे पता चला है कि जिसने परमात्मा को जिस रूप में जाना , उसी रूप में उसे प्राप्त किया । कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा को दूर - दराज के तीर्थ - स्थलों , मंदिरों में खोजने वालों से परमात्मा दूर हो जाता है और मन में झांक कर देखने वाले को परमात्मा धर व अपने शरीर में दिखाई दे जाते हैं । जिस व्यक्ति ने अपनी मनोवृत्तियों को अधोमुखी करके ( मुंढेर के पानी को ऊपर चढ़ाकर ) उस प्रेम रूपी जल को पिया है उसी ने उस रस को माना है । कुण्डलिनी जाग्रत होकर छह चक्रों को बेधती हुई शून्य रूपी सुरति में लीन हो गई । कबीर दास जी कहते हैं कि हे बैरागी ! तुम उस तत्व की खोज करो जिसको प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अमर होने पर मरता नहीं है और इसी प्रकार वह मर कर जीवित भी नहीं होता अर्थात आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है । इस अपूर्व कथा को अब किससे कहा जाए , क्या कोई ऐसा चतुर व विवेकी व्यक्ति है जो इस कथा को समझ सके । कबीर दास कहते है कि गुरू ने अब मेरे मन में ज्ञान का पलीता लगा दिया है और उसकी ज्वाला को कोई विरला व्यक्ति ही देख सकता है । 

 ( 9 ) 

  • इति तत राम जपहु रे प्रौनी , बुझौ अकथ कहाणी । 
  • हरि का भाव होइ जा परि जाग्रत पनि बिहानी।।टेक ।। 
  • इन डारे , सुनहाँ डोर , स्यंध रहे बन धे । 
  • पंच कुटंब मिलि मुझन लागे , बाजत सवय संधेरै ।। 
  • राहै मग ससा बन घेरे , पारधी बॉण न मेले । 
  • सायर जले सकल बन दाझे , मंछ अहेरा खेले ।। 
  • सोई पंडित सो तत ज्ञाता , जो इति पदहि विचार । 
  • कहै कबीर सोई गुर मेरा , आप तिर मोहि तारे ।।

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि हे प्राणियो ! इस संसार का सार तत्त्व राम ही है और तुम उसी सार तत्व राम के नाम का जप करो । उस राम की अकथनीय कहानी को समझने का प्रयास करो । जिस व्यक्ति या साधक के हृदय में राम का स्मरण करना ही सर्वोपरि भाव है , वह साधक की रात जागते हुए व्यतीत होती है । हे साधक ! माया रूपी डायन ने मन रूपी कुत्ते को फांसने के लिए अनेक प्रकार के मनोविकार रूपी डोरे डाल दिए है । अहंकार रूपी सिंह ने जीवन रूपी वन को घेर लिया है । पांचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी परिवार ने आपस में झगडना आरम्भ कर दिया है तथा अब चारों ओर विषय रूपी शब्द बज रहे हैं । इन विषय रूपी शब्द को सुनकर तृष्णा रूपी मृग भागना चाहता है और वासना रूपी खरगोश ने जीवन रूपी बन को घेर रखा है । फिर भी साधक की जीवात्मा रूपी अहेरी इन पर अपने बाण का संधान नहीं कर रहा है । इस शरीर रूपी सागर में आग लग गई है और इससे जीवन रूपी वन भी जल गया है परन्तु शरीर रूपी सागर में रहने वाली मन रूपी मछली अभी भी शिकार कर रही है । कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ सामान्य व्यक्ति सांसारिक विषय - वासना में लीन रहता है , वहीं साधक उससे अप्रभावित रहता है । इस पद पर भली - भांति विचार करके अपना दृढ निश्चय धारण कर सकता है वही व्यक्ति इस संसार के सार - तत्व का सच्चा ज्ञाता है और वही पंडित है । कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में तो वहीं साधक मेरा गुरू हो सकता है जो स्वयं इस भवसागर से पार उतर जाए और मुझे भी इससे पार उतार दे । 

( 10 )

  • अवधू ग्यान लहरि धुनि मांडी रे । 
  • सबद अतीत अनाहद राता , इहि बिधि त्रिष्णां चाँडी ।। टेक।। 
  • बन के ससै समंद पर कीया मंछा बसै पहाड़ी । 
  • सुई पीव बाम्हण मतवाला , फल लागा बिन बाड़ी ।। 
  • पाड बुण कोली में बैठी , मैं झूटा मैं गाढ़ी । 
  • ताणे वाणे पड़ी अनवासी , सूत कहै बुणि गाड़ी ।। 
  • कहँ कबीर सुनहु रे संतो , अगम ग्यान पद माँही । 
  • गुरू प्रसाद सुई के नार्क , हस्ती आवे जाही ||

व्याख्या

कबीरदास जी कहते हैं कि हे अवधूत ! समाधि लगाने से अब ज्ञान रूपी लहरों की ध्वनि उठ रही है । इस समाधि अवस्था में अनहद नाद के आनंदप्रद शब्दों में उसका मन लीन हो गया है और उसने अपनी समस्त तृष्णा नष्ट कर दी हैं । शरीर रूपी वन में सदा चंचल रहने वाला मन रूपी खरगोश अब ब्रह्मनाड़ी अर्थात शून्य - समुद्र में लीन हो गया है तथा आत्मा रूपी मछली अब शून्य शिखर रूपी पहाड़ी पर रहने लग गई है । ब्रह्म साधना में लीन साधक अब सहसार से बहने वाले अमृत का पान करके मतवाला हो गया है और इस प्रकार बिना बगीचे के ही फल लग गया है । कहने का तात्पर्य यह है कि बिना किसी धर्माडम्बर , पाखंड के ब्रह्म की प्राप्ति हो गई है । कबीरदास जी कहते हैं कि इस अवस्था में पहुंच कर साधक की आत्मा रूपी बुनकर स्वयं ही गाड़ी है और स्वयं ही खूटा है और उसके समक्ष परमात्मा रूपी ताना - बाना पड़ा हुआ है और वह आत्मा रूपी बुनकर ध्यान रूपी महीन कपड़ा बुन रहा है । कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतो ! सुनो उस अगम्य , परम पद को प्राप्त करने के लिए गुरू की कृपा अत्यंत आवश्यक है क्योंकि गुरू की कृपा से साधना रूपी सुई के सूक्ष्म छिद्र में से जीव रूपी हाथी आता - जाता रहता है । 

( 11 )

  • एक अचंभा देख रे भाई , ठाड़ा सिंध चरा गाई ।। टेक ।। 
  • पहले पूत पीछे भई मोई , चेला के गुरू लागै पाई । 
  • जल की मछली तरवर भ्याई , पकरि बिलाई मुरगै खाई ।। 
  • बैलहि आरि गूनि धरि आई , कुत्ता ले गई बिलाई । 
  • तलिकरि साचा ऊपरिकरि मूल बहुतांति जक लागे फूल । 
  • को कबीर या पद को पूर्ण तालू तीन्यू त्रिभुवन सूझ ।।

व्याख्या 

कबीर जी कहते हैं कि हे भाई ! मैंने आज तक एक कौतुहल भरा कार्य देखा । मैंने देखा कि एक बलिष्ठ सिंह गायों को चरा रहा है अर्थात शक्तिशाली जीव अपनी इन्द्रियों के पराधीन है । मैने देखा कि पहले तो पुत्र का जन्म हुआ उसके बाद माता का आविर्भाव हुआ अर्थात पहले तो साधक का जन्म हुआ उसके बाद साधना की उत्पत्ति हुई । मैंने देखा कि गुरू ने चेले के पाँव पकड़ लिए अर्थात अनहदनाद के शब्द ने साधक को पकड़ लिया है । मैंने देखा कि जल में रहने वाली मछली ने पेड़ पर चढ़ कर बच्चों को जन्म दिया है अर्थात मूलाधार में सुप्तावस्था में रहने वाली कुण्डलिनी अब जाग्रत होकर ब्रहमान में पहुंच कर ज्ञान उत्पन्न कर रही है । मैने देखा कि मुर्गे ने बिल्ली को पकड़ कर खा लिया है अर्थात अन्तर्मुखी प्रवृत्तियाँ ने बाह्य प्रवृत्तियों को पकड़ कर अपने प्रभाव में ले लिया है । मैंने देखा कि अनाज की गठरी बैल को घर छोडकर आ गई है । अर्थात चैतन्य ने अविवेक को त्याग दिया है । मैंने देखा कि बिल्ली कुत्ते को पकड़ कर ले गई अर्थात माया ने अज्ञानी व्यक्तियों को पकड़ लिया है । मैनें देखा कि एक वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर है और उसकी शाखाएं नीचे की ओर हैं तथा उसकी ऊपर की ओर हुई जड़ों में अनेक प्रकार के फल लगे हुए हैं अर्थात मूल चेतना ब्रह्मान्ध ऊपर की ओर है जबकि उसकी नाड़ी - मण्डल नीचे की ओर है तथा साधना के सिद्ध होने पर इस मूल में आनंद , ज्ञान आदि अनेक प्रकार के फूल लगते हैं । कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति इस पद को समझ सकता है उसे तीनों भवनों का ज्ञान प्राप्त हो जाएगा ।

( 12 ) 

  • हरि के पारे बड़े पकाये , जिनि जारे तिनि पाये । 
  • गयौन अचेत फिर नए लोई . ता जननि जनमि डहकाए ।। टेक ।। 
  • धौल मंदलिया बैल रबाबी , कळवा ताल बजावै । 
  • पहरि चोलना गादह नाच , मैसी निरति कहावै ।। 
  • स्यंध बैठा पान कतर , धूस गिलौरा लाये । 
  • उंबरी बपुरी मंगल गाय , का एक आनंद सुनावै ।। 
  • कहै कबीर सुना रे संती , गझरी परबत खावा । 
  • चकवा सि अंगारे जगले , समंद आकासा धावा ||

व्याख्या 

कबीर दास जी कहते हैं कि हरि - दर्शन रूपी पारे अथवा मिठाई बड़ी यत्न करके ही पकाई जा सकती है । जिस साधक ने अपने मन में साधना रूपी भट्ठी जला ली है उसी ने इस मिठाई को पकाने में सफलता पाई है । परन्तु जो व्यक्ति अपनी अज्ञान के कारण इधर - उधर फिरते हैं वे अपने आपको धोखा देते रहते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए तीर्थ यात्रा आवश्यक नहीं है । साधना के बल पर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है । कबीर दास जी ईश्वर प्राप्ति में बाधक तत्वों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि मोह रूपी धवल ने तो मर्दल बजाना आरम्भ कर दिया तथा लोभ रूपी बैल ने रबाब बजारा शुरू कर दिया है । उनके इस सुर के साथ क्रोध रूपी कौवा ताल बजा रहा है । जीव रूपी गधे ने तृष्णा के वस्त्र पहन कर इस सुर - ताल पर नाचना आरम्भ कर दिया है । उसके साथ काम रूपी भेंसे ने भी नृत्य करना आरम्भ कर दिया है । जीव रूपी सिंह बैठा हुआ अज्ञान रूपी पान के पत्ते को चबा रहा है जबकि मन रूपी बड़ा चूहा अज्ञानता के बीले उसे बना कर दे रहा है । राग रूपी चुहिया बेचारी बैठी हुई मंगल गीत गा रही है और अंहकार रूपी कछुआ यह सब सुनकर आनंद मग्न हो रहा है । कबीर दास जी कहते हैं कि हे संतो ! अब माया रूपी भेड़ ज्ञान रूपी पर्वत को खा जाना चाहती है । मन रूपी चकवा बैठकर सांसारिक आसक्तियों रूपी अंगारों को निगल रहा है और अज्ञानता का समुद्र ज्ञान के आकाश पर छा जाना चाहता है ।

( 13 )

  • चरखा जिनि जरे । 
  • कांगी हजरी का सूत , नणद के भइया की सी ।।टेक ।। 
  • जलि जाई थलि उपजी , आई नगर मैं आप । 
  • एक अचंभा देखिया , बिटिया जायो बाप ।। 
  • बाबल मेरा ब्याह करि , बर उत्यम ले चाहि । 
  • जब लगि पर पावै नहीं , तब लग ही व्याहि ।। 
  • सुबधी के घरि तुबधी आयी , आन बहू कै भाइ । 
  • चूल्हे अगनि बताइकरि , फल सौ दीयौ ठठाइ ।। 
  • सब जगही मर जाइयों , एक बड्या जिनि मरे । 
  • सब रोशनि की साथ परषा को धरें ।।
  • कहै कबीर सो पंडित ग्याता जो या पदहि विचारे ।
  • पहले परच गुर मिल तो पी सतगुर तारे ।।

व्याख्या 

कबीर दास जी कहते हैं कि यह तन रूपी चरखा जो मैंने प्राप्त किया है , वह कभी भी नष्ट न हो । परमात्मा की सोगन्ध है कि मुझे अपने प्रियतम अर्थात में इस चरखे से उत्तम कर्म रूपी महीन कपड़े के लिए सूत कातूंगी । कहने का तात्पर्य है कि साधक को साधना की सूक्ष्म वृतियों की ओर ध्यान रखना चाहिए । जल में जन्म लेकर तथा थल में उत्पन्न होकर मेरे प्रियतम अपने आप इस शरीर रूपी नगर में आ गए है । अर्थात मैंने अपने ही अन्दर परमात्मा को पा लिया है । कबीर दास जी कहते हैं कि मैंने एक ऐसा कौतुहल भरा कार्य देखा कि बेटी ने अपने पिता को जन्म दिया है अर्थात माया ने साधक को उत्पन्न किया है । कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य का जन्म माया के प्रभाव से होता है । परन्तु बाद में यह योग साधना के बल पर नियंत्रण कर लेता है । मेरा पिता रूपी गुरू किसी कुलीन व उत्तम वर के साथ मेरा विवाह करना चाहता है परन्तु हे प्रियतम परमात्मा ! जब तक उसे उत्तम वर नहीं मिलता तब तक तू ही मेरे साथ विवाह कर ले । सदबुद्धि के घर लोभी आया है । अर्थात आत्मा पर माया अपना प्रभाव डालने के लिए आई है । वह लोभी दूसरों की बहुओं को बुरी दृष्टि से देखता है अर्थात माया आत्मा पर दुष्प्रभाव डालना चाहती है । आत्मा ने हदय रूपी चूल्हे में सारी वासनाओं को जला दिया है और अब वह चतुर्दिक फल प्राप्त करके हंस रही है । कबीर दास जी कहते हैं कि भले ही इस संसार में सभी लोग मर जाएं परन्तु एक बढई अर्थात परमात्मा नहीं मरना चाहिए जिसने जीवन रूपी चरखा बनाया है । इस संसार में चारों ओर कुप्रवृतियों रूपी रोडो अर्थात विधवाओं का आधिक्य और साथ है । अतः अब कौन व्यक्ति सुन्दर व महीन कपड़ा बनाने के लिए इस जीवन रूपी चरखे को धारण करेगा । कबीर दास जी कहते हैं कि जो भी व्यक्ति इस पद के मर्म को समझ सकता है वही व्यक्ति सध्या पंडित व ज्ञानी है । यदि मनुष्य के आचरण , व्यवहार आदि का परिचय पहले गुरू को मिल जाता है तभी वह सद्गुरू बनकर मनुष्य को इस भवसागर से पार उतार सकता है । 

( 14 ) 

  • अब मोहिले पलि नणद के बीर , अपनै देसा । 
  • इन पंचनि मिलि लूटी कुसंग आहि बदेसा ।।टेक ।। 
  • गंग तीर मोरी खेती बारी , जमुन तीर खरिहाना । 
  • सातौं बिरही मेरे नीपज , पंधू मोर किसानी ।। 
  • कह कबीर यह अकथ कथा कहती कहीन जाई । 
  • सहज भाई जिहि ऊपजे , ते रमि रहे समाई ।।

व्याख्या 

कबीर दास जी ने आत्मा को वधू अथवा पत्नी तथा परमात्मा को पति मानते हुए अपनी आत्मा की पुकार को उद्घटित किया है । आत्मा कहती है कि हे प्रियतम परमात्मा ! अब तुम मुझे अपने देश में ले चलो । इस संसार रूपी विदेश में तो काम , क्रोध , मोह , लोभ व अहंकार रूपी पाँच कुरागियों ने मिलकर मुझे लूट लिया है । कबीर दास जी ने ग्रामीण जीवन के रूपक के माध्यम से अपने आध्यात्मिक भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है कि गंगा अर्थात इड़ा के किनारे मेरे खेत हैं और जमुना अर्थात पिंगला के किनारे मेरे खलिहान है । मेरे इस खेत में सत्य , अहिंसा , अस्तेय , अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य - ये पांचों किसान मिलकर सात प्रकार के अन्न अर्थात यूचेच्छा , विचारणा , तनुमानसा , सत्त्वायति , असंसक्ति , परार्थभाखिनी और तुर्येगा ये सातो ज्ञान की भूमियाँ उत्पन्न करते हैं । कबीरदास जी कहते हैं कि सहज - साधना की यह कथा अकथनीय है । उसे कहने पर भी कहा नहीं जा सकता । जिस भी साधक के मन में सहज भाव से भक्ति उत्पन्न होती है वही साधक परमात्मा की उस परम ज्योति में लीन हो जाता है या समा जाता है ।

( 15 ) 

  • अब हम सकल कुसल करि मानी ,
  • स्वाति भई तब गोव्यद जॉनी ।।टेक ।। 
  • तन में होती कोटि उपाधि , मई सुख सजि समाधि ।। 
  • जम उलटि भये है म , दुख सुख किया विश्राम ।। 
  • वैरी अलटि भये है मीता साबत उलटि सजन भेय चीता ।। 
  • आपा जानि उलटि ले आप , ती नहीं व्याप तीन्यू ताप ।। 
  • अब मन उलटि सनातन हूवा , तब हम जानों जीवत मूवा ।। 
  • कह कबीर सुख सहज समाऊँ , आप न उरौं न और उरा।।

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं जब मैंने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है तभी मैंने समस्त प्रकार की कुशलता को अनुभव किया है तथा मेरी आत्मा को शांति प्राप्त हुई है । शरीर में करोड़ों प्रकार की व्याधियाँ होती है अर्थात मनुष्य का मन करोड़ों प्रकार की आसक्तियों के कारण अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है परन्तु जब व्यक्ति सहज - साधना में मन को लगा लेता है तब सच्चे सुख की प्राप्ति होती है । सहज - समाधि के द्वारा यमराज भी अब राम रूप में दिखाई देने लगे हैं अर्थात अब मृत्यु का भय समाप्त हो गया है और अब मन से सुख व दुख दोनों ही प्रकार के भाव समाप्त हो गए हैं तथा परमानंद की स्थिति प्राप्त हो गई है । अब तक जो शत्रु थे अब वे उलट कर मित्र बन गए हैं और जो शाक्त अर्थात नीच कार्यों को करने वाले थे वे भी अब चित को अच्छे लगने लगे हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि अब ऊँच - नीच , अच्छे - बुरे का भेद समाप्त हो गया है । यदि व्यक्ति अब दूसरों के प्रति परायापन का भाव त्यागकर सभी को अपने समान समझने लगे और अपने ही भीतर परमात्मा के दर्शन करे तो वह तीनों प्रकार के ताप - दैहिक , दैविक और भौतिक से मुक्त रहता है । कबीरदास जी कहते हैं कि अब सहज - साधना के द्वारा अस्थिर व चंचल मन भी सनातन अर्थात शाश्वत हो गया है और अब मैंने जीवन मुक्त दशा के बारे में जाना है । अब तो मैं अपनी सहज - साधना के सुख में लीन हो गया हूँ और अब मैं न तो किसी को डराऊंगा और न ही किसी से डरूँगा । 

( 16 ) 

  • सन्तो भाई आई ग्यान की औधी रे । 
  • भरम की टाटी सबै उडाणी , माया रहै न बांधी ।।टेक ।। 
  • हिति चित की धूनी गिरोनी , मोह बलिंडा तूटा । 
  • त्रिस्नों छोनि परि घर परि , कुबधि का भाँडा फूटा ।। 
  • जोगं जुगति करि संती बांधी , निरचू चुवै न पाणी । 
  • कूडकपट काया का निकल्या , हरि की गति जब जाणी ।। 
  • आंधी पीछे जो जल बूठा , प्रेम हरि जन भीनी । 
  • कहे कबीर मौन के प्रगटे , उदित भया तमीनी ।।

व्याख्या

कबीर दास जी ने आँधी के रूपक द्वारा ज्ञान के प्रभाव को चित्रित करते हुए कहा है कि हे संत भाइयो ! देखो , अब सहज साधना के द्वारा प्राप्त सच्चे ज्ञान की आधी आ गई है । इस ज्ञान की आधी के आने से मन पर जो भ्रम रूपी छप्पर पड़ा हुआ था वह सब उड़कर दूर चला गया है अर्थात मन अब भ्रम से मुक्त हो गया है । माया रूपी रस्सी ने इस भ्रम रूपी छप्पर को मन से बाध रखा था , अब ज्ञान की आधी चलने से वह बंधन भी खुल गया है । मन में राग और द्वेष रूपी जिन दो स्तम्भों पर यह भ्रम रूपी छप्पर टिका हुआ था , ज्ञान की आंधी में वे दोनों स्तम्भ भी गिर गए हैं । इस भ्रम के छप्पर की मजबूती देने के लिए मोह रूपी बंडेर सी टूट गई है । शरीर रूपी घर के ऊपर जो तृष्णा रूपी छप्पर पड़ा हुआ था , ज्ञान की आंधी में वह टूट कर नीचे गिर गया और उसके गिरते ही कुबुद्धि रूपी मिट्टी का बर्तन भी फूट गया । कबीर दास जी कहते हैं कि संतो के संसर्ग अब योग - साधना के द्वारा मोह , माया आदि को कसकर बाँध दिया है जिसके कारण अब थोड़ा सा भी पानी नहीं टपकता है । प्रभु के स्मरण से इस शरीर में जो भी विकारों का कूडा करकट था , वह निकल गया । इस जान की आधी के पश्चात जब सच्चे आनंद की वर्षा हुई तो उसमें हरि का भक्त अर्थात साधक भीगकर उसमें मग्न हो गया । कबीर दास जी कहते हैं कि ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होते ही अज्ञान रूपी अंधकार क्षीण पड़ने लगा । 

( 17 ) 

  • अब घटि प्रगट भये राम राई , 
  • साधि सरीर कनक की नाई ।।टेक ।। 
  • कनक कसौटी जैसे कसि लेइ सुनारा , सोधि सरीर भयो तन सारा ।। 
  • उपजत उपजत बहुत उपाई , मन घिर भयो त तिथि पाई ।। 
  • बाहरि पोजत जनम गंवाया , उनमनी ध्यान घट भीतरि पाया ।। 
  • बिन पर तन कांच कबीरा , परचे कंचन भया कबीरा ।।

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि अब ध्यान के द्वारा मैंने अपने ही शरीर में राजा राम के दर्शन कर लिए हैं अर्थात वे मेरे शरीर में प्रकट हो चुके हैं । इसीलिए अब मुझे अपना शरीर सोने की तरह शुद्ध करना होगा । जिस प्रकार सुनार सोने की शुद्धता को जाँचने के लिए उसे कसौटी पर कसता है उसी प्रकार मुझे योग - साधना के द्वारा अपने शरीर को शुद्ध करना है । मैंने बार - बार जन्म लेकर प्रभु के दर्शन करने का बहुत प्रयास ( उपाय ) किया परन्तु जब मेरा चंचल मन उनके चरणों में स्थिर हुआ तभी प्रभु के दर्शन करने की तिथि अर्थात अवसर प्राप्त हुआ । जब तक मैं परमात्मा को बाहर अर्थात मंदिर , मस्जिद , तीर्थ स्थल आदि में खोजता रहा अब तक मेरा जीवन व्यर्थ में ही व्यतीत होता गया परन्तु अनमना अवस्था में ध्यान किया तो मैंने उस परमात्मा को अपने ही भीतर प्राप्त कर लिया । कबीर दास जी कहते हैं कि जब तक प्रभु से परिचय नहीं हुआ था अर्थात जब तक परमात्मा के दर्शन नहीं हुए थे तब तक यह शरीर काँच के समान मूल्यहीन था परन्तु अब उनके दर्शन होते ही यह शरीर सोने के समान मूल्यवान बन गया ।

( 18 ) 

  • हिंडोलनी तहाँ झूले आतम राम ।
  • प्रेम भगति हिंडोलना , सब संतनि की विश्राम ।।टेक ।। 
  • चंद सूर दोई खंभवा , बंक नालि की डोरि । 
  • झूले पंच पियारियाँ , तहाँ मूलै जीय मोर ।।
  • बावस गम के अंतरा , तहाँ अमत की ग्रास ।
  • जिनि यह अमृत चाषिया , सो ठाकुर हम दास ।। 
  • सहज सुनि की नेहरी गगन मंडल सिरिमार । 
  • दोऊ कुल हम आगरी , जो हम झूल हिंडोल ।। 
  • अरच उरथ की गंगा जमुना , मूल कवल की घाट ।
  • षट चक्र की गागरी , त्रिवेणी संगम बाट ।। 
  • नाद व्यंद की नावरी , राम नाम कनिहार । 
  • कहै कबीर गुण गाइ ले , गुर गमि उतरी पार ।।

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि इस तन रूपी झूले में आत्म स्वरूप राम ( आत्मा परमात्मा का ही अंश है ) झूल रहे हैं । प्रेम - भक्ति रूपी झूला सभी संतों के लिए विश्राम स्थल बना हुआ है अर्थात सभी संत प्रेम भक्ति के आनंद में सरेबार है । इस झूले के दोनों और चाँद अर्थात इड़ा और सूर्य अर्थात पिंगला के दो खम्बे हैं और उन दोनों खम्बों को जोड़ने वाली डोरी बंकनाल है । इस झूले पर अपान , उदान , समान आदि पांचों प्राण जीवात्मा के साथ झूल रहे हैं । हृदय से बाहर अगुल की ऊंचाई पर सहस्रार है जहाँ पर अमृत रूपी भोजन का पास है । कहने का तात्पर्य यह है कि सहसार में निरंतर अमृत टपकता है । जिस भी साधक ने सहस्रार के इस अमृत को चख लिया या प्राप्त कर लिया , वही साधक मेरा स्वामी बन गया और मैं उसका दास बन गया । कबीर दास जी कुल वधू के रूप में अपनी आत्मा को चित्रित करते हुए कहते हैं कि सहज - सामाधि ही मेरा नैहर अर्थात मायका है और गगन मंडल अर्थात शून्य शिखर ही मेरी ससुराल है । मैं अर्थात आत्मा तो दोनों की कुलों का समान रखने वाली स्त्री के समान हूँ और इस झूले पर झूलकर अपने दोनों कुलों ( यहाँ पर इहलोक व परलोक से भी तात्पर्य हो सकता है ) का मान रखूगी । कबीर दास जी कहते हैं कि नीचे और ऊपर गंगा और जमुना अर्थात इड़ा व पिंगला है और मूलाधार ही इसका घाट है । यह शरीर अनाहत , विशुद्ध , आजा आदि छह चक्रों से बने हुए घड़े के समान है और त्रिकुटी में इडा , पिंगला सुषुम्ना की त्रिवेणी है अर्थात संगम होता है । अनहद नाद रूपी नाव में राम नाम रूपी कर्णधार अथवा सेवक बैठा हआ है।कबीर दास जी कहते हैं कि हे साधक ! अब गुरू के शान से , प्रभु स्मरण के द्वारा इस भवसागर से पार उतर जाओ ।

( 19 ) 

  • को बीन प्रेम लागी री , माई को बीन । 
  • राम रसाइण मातेरी , माई को बीन टेक ।। 
  • पाई पाई तू पुतिहाई , पाई की तूरियों वेधि खाई री , माई की बीनं ।। 
  • ऐंसें पाई पर विधुराई , रस ऑनि बनायौरी , माई की भीन ।। 
  • नाच तानी नाचे बौनी , नार्च कूच पुराना री , माई को बीन ।। 
  • करगहि बैठि कबीरा नाच , पहे कादया तौनी री , माई को बीन ।।

व्याख्या

कबीर दास जी माया को माता के रूप में सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे माँ ! अब तो मेरा मन राम के प्रति आसक्त हो गया है । इसलिए अब इस कपड़े अर्थात सांसारिक सम्बंधों को कौन सुनेगा । हे माता , मैंने तो राम रूपी रसायन चख लिया है और अब इस कपड़े को कौन बनेगा । हे माता , तू तो पैसे - पैसे के पीछे अर्थात सांसारिक सुखों के पीछे पड़ी हुई थी और पैसे के लिए ही तूने तुरी अर्थात तुरीयावस्था को बेच डाला है अब इस कपड़े को कौन थुनेगा । अब तूने सारे धन को व्यर्थ ही गंवा दिया है । और इस प्रकार धन के बिना तू अब राम - नाम रूपी रस का निर्माण कर । अब तू ही बता कि इस कपड़े को कौन बनेगा । कबीर दास जी कहते हैं कि अब तो ताना ( इला ) , बाना ( पिंगला ) के साथ - साथ पूरानी कूची ( सुषुम्ना ) भी नाच रही हैं , अब इस कपड़े को कौन बुनेगा । कबीर दास जी कहते है कि अब काल रूपी चूहे ने ताना रूपी आयु को काटना शुरू कर दिया है इसीलिए मैं अपने हाथ में करधना लेकर अर्थात योग - साधना के ध्यान में बैठ गया है । अब इस कपड़े को कौन बुनेगा ।

( 20 )

  • मैं बुनि करि सिरानी हो राम , 
  • नालि करम नहीं , ऊबरे ।।टेक ।। 
  • दखिन कूट जब सुनहीं झूका , तब हम सुगन विचारा । 
  • लरके परके सब जागत है हम धरि चोर पसारा हो राम ।। 
  • तांनी लिन्ही बीना तिन्ही , लीन्हे गोड के पळवा ।
  • इत उत चितवत कठवन लीन्हाँ , मांस चलवना उक्रया हो रोम ।। 
  • एक पग दोई पग पग , संघ सधि मिलाई । 
  • करि परपंच मोट बैधि आये , किलिकिलि सबै मिटाई हो राम ।। 
  • तांनो तनि करि बाना बुनि करि , छाक परि मोहि ध्यान । 
  • कहै कबीर में बुनि सिरौना जानत है भगाना हो राम ।। 

व्याख्या

कबीर दास जी कहते हैं कि हे राम ! मैं इस संसार में सम्बंध रूप कपड़े को बुनते बुनते थक कर शांत हो गया हूँ क्योंकि इन सम्बंधों के साथ कर्म करने से मनुष्य भवसागर से पार नहीं उतर सकता । जब मैंने मूलाधार चक्र रूपी दक्षिण दिशा में संशय रूपी कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनाई दी तब मैंने यह समझ लिया कि अब मेरी शुभ घड़ी आ गई है । यद्यपि मेरे शरीर रूपी घर में यम , नियम रूपी लड़के अभी भी जाग रहे हैं फिर भी विषय - वासना रूपी चोर मेरे इस घर में प्रवेश कर गया है । अतः मैं अपने ताने - बाने , पौधों , कठौती और कल धुल को साथ लेकर बाहर आ गया । मैंने एक पग , दूसरे पग और तीसरे पग अर्थात तीन चरणों में साधना मार्ग की संधि कर दी अर्थात मैं योग - साधना के तीनों स्तर पार गया । मैंने सभी प्रपंचों रूपी गठरी को बांध दिया , धीरे - धीरे उन्हें समाप्त कर दिया । अब मैं सांसारिक कार्यों से विरत होकर शांत भाव से राम - नाम स्मरण रूपी महीन कपड़ा बनाने लगा हूँ । अतः मुझे हर समय राम - नाम का ही ध्यान रहता है । कबीरदास जी कहते हैं कि अब मेरा कपड़े बुनने का काम शांत हो गया है अर्थात मैं आवागमन के चक्कर से मुक्त हो गया हूँ और मेरे भगवान राम इस बात को भली - भांति जानते हैं ।

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