पद्मावती समय Padmavati Samaya कथानक

 पद्मावती समय 
Padmavati Samaya
भाग - 1 (कथानक)

कथानक पद्मावती समय Padmavati Samaya

पृथ्वीराज रासो चन्दबरदायी कृत महाकाव्यात्मक ग्रंथ है । इसके वृहद संस्करण में 66 आध्याय हैं और कुल 16306 छंदों की योजना है । इसके प्रत्येक अध्याय में पृथ्वीराज चौहान के जीवन से संबंधित कथा का वर्णन है । उसी कथा के आधार पर अध्याय का नामकरण किया गया है । अध्याय के लिए समय , खण्ड , प्रस्ताव आदि शब्दों का  प्रयोग किया गया है , लेकिन वृहद रूपान्तर के खण्डों के लिए समयों अथवा समय शब्द ही प्रयुक्त हुआ है । पद्मावती समय पृथ्वीराज रासो का बीसवां अध्याय है । इसमें रासो के नायक दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान और समुद्रशिखर के राजा विजय की पुत्री राजकुमारी पद्मावती के पारस्परिक प्रेम और विवाह का वर्णन किया गया है । ' पद्मावती समय ' के कथानक का संक्षिप्त रूप इस प्रकार से है -

राजा विजय और पद्मावती

दिल्ली के पूर्व दिशा में समुद्र शिखर नाम का एक विशाल किला था । वहां पर विजय नाम का राजा राज्य करता था । वह अनेक किलों का स्वामी तथा यादव वंश का शक्तिशाली शासक था । उसके पास अपार धन - वैभव , विशाल चतुरंगिणी सेना और विशाल राज्य था । बड़े बड़े वीर और प्रतापी राजा उसकी सेवा में लगे रहते थे । उसी के समान उसके दस पुत्र तथा एक पुत्री थी । उसकी सुंदर रानी का नाम पद्मसेन था । उसी ने पद्मावती नाम की एक सुंदर कन्या को जन्म दिया । पद्मावती चन्द्रमा की सोलह कलाओं के समान अनित्य सुन्दरी थी । रति के समान वह सबको मोह लेती थी । पशु - पक्षी , मनुष्य , देवता आदि सभी उसके सौन्दर्य को देखकर आसक्त हो जाते थे । उसमें सभी शुभ लक्षण थे । शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त वह 64 कलाओं , सभी विद्याओं और चारों वेदों के अध्ययन में भी प्रवीण थी । अभी उसने वयः संधि को प्राप्त किया था । परन्तु वसन्त की शोभा के समान वह सभी के मनों में आनन्द तथा उल्लास उत्पन्न कर देती थी । 

पद्मावती और शुक मिलन 

एक दिन पद्मावती अपनी सखियों के साथ राजमहल के उद्यान में क्रीड़ा कर रही थी । अचानक उसने वहां एक शुक को देखा । वह उसे देखकर प्रसन्न हो गई । परन्तु शुक पद्मावती के लाल होठों को बिम्बा फल समझ कर उसकी ओर झपटा । पद्मावती ने तत्काल उसे पकड़ लिया और राजमहल में अपने साथ ले गई एक स्वर्ण पिंजरे में उसने तोते को बन्द कर दिया । धीरे - धीरे पद्मावती शुक ( तोते ) के साथ घुल - मिल गई । वह दिन - भर का खेल कूद भूलकर उसी के साथ रमण करने लगी । धीरे - धीरे वह तोते को राम नाम का पाठ पढ़ाने लगी । उधर शुक पदमावती के अप्रतिम रूप सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हो गया था । उसने मन ही मन भगवान शंकर और पार्वती से प्रार्थना की कि इस पद्मावती का विवाह तो पृथ्वीराज के साथ होना चाहिए । वह शुक बड़ा विद्वान् था । वह पद्मावती को नाना प्रकार की कहानियां सुनाने लगा और पद्मावती भी तल्लीन होकर उसकी कथाओं को सुनने लगी ।

पद्मावती शुक – संवाद

एक दिन पद्मावती ने शुक से पूछा कि तुम्हारा परिचय क्या है ? तू किस देश का निवासी है ? और वहां पर कौन राजा राज्य करता है ? शुक ने पद्मावती बताया कि वह दिल्ली का निवासी है । दिल्ली नाम का एक किला है जहां इन्द्र के अवतार के रूप में पृथ्वीराज चौहान राज्य करते हैं । उसकी आयु 16 वर्ष है । वह सांभर नरेश सोमेश्वर का चौहान वंशी राजा हैं वह महान् वीर योद्धा , तथा साहसी राजा है उसने गजनी के राजा शहाबुद्दीन को हराकर तीन बार बन्दी बनाया और उसकी प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया । उसके धनुष पर लोहे की जंजीर की डोरी बढ़ती है और वह अचूक शब्द - भेदी बाण चलाता है । वह राजा बलि के समान दृढ - प्रतिज्ञ , कर्ण के समान दानी , राजा हरिश्चन्द्र के समान शीलवान् , विक्रमादित्य के समान न्यायप्रिय तथा इंद्र के समान बलशाली है । उसके प्रचण्ड तेजस्वी चरित्र को देखकर लगता है मानो यह साक्षात् कामदेव का अवतार है । शुक के मुख से पृथ्वीराज के रूप - सौन्दर्य और वीरता का वर्णन सुनकर पद्मावती पृथ्वीराज से प्रेम करने लगी । बाल्य अवस्था की क्रीड़ाओं को पार कर पद्मावती ने यौवनावस्था में कदम रखा । यह देखकर माता - पिता को उसके योग्य वर खोजने की चिंता समाने लगी । राजा विजय ने अपने कुल पुरोहित को बुलवाकर आदेश दिया कि वह किसी शीलवान् तथा श्रेष्ठ राजकुमार के साथ पद्मावती की सगाई पक्की कर दे । राजा ने कुल पुरोहित को शगुन का सामान देकर विदा कर दिया । यह समाचार सुनकर सारे नगर में आनन्द और उल्लास छा गया । उधर कुल पुरोहित योग्य वर को खोजता हुआ शिवालिक पर्वत की तलहटी में कुमायूं नामक किले में जा पहुंचा । वहां के राजा का नाम कुमोदमणि था । उसके पास भी अपार धन सम्पत्ति तथा विशाल सेना थी । कुल पुरोहित ने उसी के साथ पद्मावती की सगाई पक्की कर दी । 

कुमोदमणि का प्रस्थान

कुछ समय के बाद कुमोदमणि अपने अनेक अधीन राजा और गणपतियों को लेकर एक विशाल बारात सजाकर बड़ी धूम - धाम से समुदशिखर की ओर चल पड़ा । उसके साथ सेना के दस हजार घुड़सवार , 500  हाथी और असंख्य पैदल सैनिक थे । ये समाचार सुनकर समुद्र शिखर दुर्ग में शहनाईयां और मंगल पाच बजने लगे । बारात के स्वागत के लिए असंख्य मण्डप और तोरन बनाए गए । विवाह की तैयारियां देखकर पद्मावती का मन व्याकुल हो उठा । उसने एकान्त में शुक को कहा कि वह दिल्ली जाकर पृथ्वीराज को यहां आने का निमन्त्रण दे आए । उसने यह भी कहा कि जब तक मेरे प्राण रहेंगे तब तक पृथ्वीराज ही मेरे प्रिय बने रहेंगे । उसने तोते को एक पत्र भी लिखकर दिया जिनमें विवाह  तिथि लिखी हुई थी । उस पत्र में उसने यह भी लिखा था कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था , उसी प्रकार तुम नगर के शिव मन्दिर से प्रातःकाल मेरा हरण कर लेना । पत्र लेकर शुक ने तत्काल दिल्ली के लिए प्रस्थान किया । 

शुक पृथ्वीराज मिलन 

पदमावती का पत्र लेकर वह शुक वायुवेग दिल्ली की ओर उड़ने लगा । तत्काल उसने वह पत्र पृथ्वीराज को दे दिया । पत्र पढ़ते ही पथ्थीराज ने अपने प्रधान सेनापति चमुंडराय को दिल्ली गढ़ का भार सौंप दिया और स्वयं असंख्य शूर - धीरों , सामन्तों , 300 सैनिकों तथा कवि चंद के साथ समुदशिखर के लिए चल पड़ा । जिस दिन राजा कुमोदमणि अपनी बारात के साथ समुदशिखर दुर्ग में पहुंचा । उसी दिन पृथ्वीराज मी गुप्त रूप से वहां पहुंच गया था । दुर्भाग्य से बादशाह शहाबुद्दीन गोरी को भी पृथ्वीराज की इस यात्रा का पता चल गया । भयंकर योद्धाओं से युक्त अपनी सेना को सजाकर वह पृथ्वीराज के लौटने के मार्ग पर प्रतीक्षा करने लगा । इधर चंदबरदाई ने भी पृथ्वीराज को गोरी के इस अभियान की सूचना दे दी । 

युद्ध वर्णन

राजा कुमोद्मणि की बारात के आने के समाचार को सुनकर समुदशिखर के सभी पुत्र बारात के स्वागत की तैयारियां करने लगे । नगर की सभी स्त्रियां बारात देखने के लिए अपने - अपने छज्जों में सुशोभित हो रही थी । अचानक शुक ने आकर पृथ्वीराज के आगमन की सूचना पद्मावती को दी । यह समाचार सुनते ही पद्मावती आनंदित हो उठी । उसने मेले वस्त्र त्यागकर स्नान किया और सोलह श्रृंगार करके पूजा करने के लिए शिव मन्दिर में गई मन्दिर में पहुंच कर उसने शंकर - पार्वती की प्रार्थना तथा चारों ओर प्रदक्षिणा करके उन्हें प्रणाम किया । वहां उपस्थित पृथ्वीराज को देखकर वह मन्द मन्द मुसकाई और उसने मुख को धुंघट से ढक लिया । पृथ्वीराज ने पद्मावती का हाथ पकड़कर उसे अपने घोडे पर बिठा लिया और दिल्ली की ओर रवाना हो गया । पदमावती हरण का समाचार शीघ्र ही राजा विजय को मिल गया । परिणामस्वरूप समुदशिखर नगर में युद्ध के नगाड़े बजने जगे । हाथी घोड़ों की विशाल सेना पृथ्वीराज का पीछा करने लगी । राजा विजय और कुमोदमणि दोनों की सेनाओं ने जाकर पृथ्वीराज को घेर लिया । फलतः पृथ्वीराज ने मुड़कर अपनी सेना के साथ दोनों राजाओं का सामना किया । इस भयंकर युद्ध में दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी और योद्धा कट - कटकर गिरने लगे । अन्ततः कुमोद्मणि के सभी योद्धा मारे गए और विजय प्राप्त करके पृथ्वीराज दिल्ली की ओर चल पड़ा । 

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पृथ्वीराज और गोरी युद्ध वर्णन

इसी बीच गोरी पृथ्वीराज की प्रतीक्षा कर रहा था । वह पृथ्वीराज का रास्ता रोककर खड़ा हो गया । उसकी सेना के पास विभिन्न प्रकार के हथियार थे । तोप , तलवार , बन्दूक , धनुष बाण आदि से सजी उसकी सेना बड़ी भयंकर लग रही थी । उसकी सेना का एक एक योद्धा हजार शत्रुओं का सामना करने में समर्थ था । स्वयं गारी अपनी सेना का संचालन कर रहा था । शीघ्र ही गौरी की सेना ने पृथ्वीराज को चारों ओर से घेर लिया । युद्ध क्षेत्र में बड़े - बड़े नगाड़े बजने लगे और दोनों पक्षों के योद्धा आपस में लड़ने लगे । पृथ्वीराज ने एक हाथ में घोड़े की लगाम पकड़ी और दूसरी हाथ में तलवार लेकर वह शत्रुओं पर टूट पड़ा । काफी समय तक यह भयंकर युद्ध चलता रहा । काफी समय तक यह निर्णय करना कठिन था कि कौन हारेगा और विजयी होगा । समूचा युद्ध क्षेत्र हाथी , घोड़ों और सैनिकों के कटे अंगों से भर गया था । 

पृथ्वीराज की विजय

युद्ध में निर्णय न होता देखकर पृथ्वीराज क्रोधित हो उठे । वे तलवार के साथ शत्रुओं पर ऐसे टेट पड़े जैसे सिंह हाथी के झुण्ड पर टूट पड़ता है । पृथ्वीराज ने अपनी तलवार से शत्रु के हाथियों के मस्तक फाड़ दिए । परिणाम यह हुआ कि युद्ध क्षेत्र में भगदड़ मच गई । हाथी उलटकर अपनी सेना को कुचलने लगे । उस समय युद्ध क्षेत्र में इतनी धूल उड़ी कि दिन के समय ही रात हो गई । पृथ्वीराज चौहान ने अचानक शहाबुद्दीन गौरी की गर्दन में अपना धनुष डालकर उसे पकड़ लिया । ऐसा लगा मानो बाज ने झपटा मारकर चिड़िया को पकड़ लिया हो । इस प्रकार पृथ्वीराज गौरी को कैद करके उसकी सेना को चीरता हुआ आगे बढ़ गया । इस युद्ध में गौरी के 500 सरदार मारे गए और पृथ्वीराज के कई योद्धा वीर – गति को प्राप्त हुए । युद्ध क्षेत्र में पृथ्वीराज को पूर्ण विजय प्राप्त हुई अन्ततः वह बन्दी गौरी को साथ लेकर दिल्ली की ओर चल पड़ा । 

पृथ्वीराज और पद्मावती विवाह

पृथ्वीराज पद्मावती और गौरी के साथ दिल्ली पहुंचा । यहां से वह दिल्ली के पास स्थित अष्टभुजा देवी के मंदिर गया । वहां उसने ब्राह्मणों को बुलवाकर अपने विवाह का शुभ मुहूर्त निकलवाया । शुभ मुहूर्त में वेद मंत्रों के उच्चारण के बीच पृथ्वीराज और पद्मावती का विवाह हुआ । विवाह के पश्चात् पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को 8000 सुन्दर घोड़े देने का दण्ड दिया । इसके पश्चात् पृथ्वीराज  याचकों को दान देकर अपने दुर्ग में चला गया । यह सब देखकर पृथ्वीराज के सभी सामन्त अत्यधिक प्रसन्न हुए और नगर में आनन्द के नगाड़े बजने जगे । चन्द्रमुखी और मृगनयनी सुंदरियों ने सोने के थाल में आरती सजाकर पृथ्वीराज और पद्मावती का स्वागत किया । इस अवसर पर मंगल गीत गाए और राजा के सिर पर मुकुट रखकर तिलक किया गया । इस प्रकार विवाह कार्य सम्पन्न करके पृथ्वीराज अपनी पत्नी पद्मावती के साथ दुर्ग में प्रवेश कर गया ।

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