जायसी ग्रन्थावली Jayasi Granthavali

जायसी ग्रन्थावली
Jayasi Granthavali
( सं . रामचन्द्र शुक्ल )

जायसी ग्रन्थावली Jayasi Granthavali
मलिक मोहम्मद जायसी

हिन्दी का सूफी काव्य फारसी सूफी काव्य तथा इस्लाम से प्रेरित होते हुए भी भारतीय था । धार्मिक दृष्टि से देखने वाले लोगों ने इसको इस्लाम का प्रचारक माना तो कुछ लोगों ने इसको अभारतीय घोषित किया । सूफी कवियों ने भारतीय प्रेमाख्यानों की परंपरा में अपने काव्यों की रचना की । प्रारम्भ में सूफी इस्लाम के प्रचारक थे परन्तु वे मुल्लावाद के विरोधी भी थे । सूफियों ने तसव्वुफ के आधार पर मुल्लावाद का विरोध किया और निश्छल ईश्वरीय प्रेम पर जोर दिया । सूफी शब्द सूफ से बना है । जिसका अर्थ पवित्र और सफेद उन है । सूफी संत सफेद ऊनी चोंगा पहनते थे और वैभवशाली जीवन के विरोधी थे । सूफियों के अनुसार मुहम्मद साहब को ईश्वर से दो प्रकार की वाणियाँ प्राप्त हुई थी - ' इल्म ए - सकीना ' ( ग्रन्थ ग्रथित ज्ञान ) , जो कुरान शरीफ में संग्रहीत है । दूसरी ' इल्म - ए - सिना ' जो हृदय में निहित थी । सूफियों ने इल्म - ए - सिना को अपनाया । सूफी काव्य का प्रारम्भ ईरान में 11 वीं शताब्दी में हुआ और 18 वीं शताब्दी में समाप्त हो गया । सूफी काव्य में रहस्यवादी भावना भी आई । रहस्य- भावना के माध्यम से कवियों ने मनुष्य की एकता का प्रतिपादन किया । सामंती शासन ने सूफियों का विरोध किया और मंसूर हल्लास को मौत की सजा दी । हिन्दी सूफी कवियों की जमीन भारतीय है जबकि दक्षिणी हिन्दी के सूफी कवियों की जमीन ईरानी है | हिन्दी सूफी कवियों ने भारत में लोक प्रचलित कहानियों को अपनाया जबकि दक्षिणी हिन्दी कवियों ने ईरानी लोक कथाओं को अपनाया । लौकिक प्रेम की इन कहानियों के सहारे सूफियों ने उससे अलौकिक प्रेम का आभास दिया जो सूफी साधना के मूल में है । उनका रंग इस्लामी और ढंग ईरानी है । हिन्दी सूफी कवियों ने अपने जनपद की रीति - नीति , मौसम , ऋतु वर्णन , छंद , कथानक रूढ़ियों आदि को इस तरह से अपनाया कि उनका काव्य पूर्ण रूप से भारतीय बन गया । इन कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं । जायसी का जन्म संभवतः 800 हि० एवं 900 हि० के मध्य, तदनुसार सन 1397 ई० और 1494 ई० के बीच किसी समय हुआ होगा तथा तीस वर्ष की अवस्था पा चुकने पर उन्होंने काव्य-रचना का प्रारंभ किया होगा। पद्मावत का रचनाकाल इन्होंने 947 हि० अर्थात 1540 ई० बतलाया है। पद्मावत के अंतिम अंश (653) के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि उसे लिखते समय तक ये वृद्ध हो चुके थे।
मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में पदमावतकार मलिक मुहम्मद जायसी का महत्व इसलिए सर्वाधिक है कि इन्होंने हिन्दू - मुस्लिम द्वंद्व के प्रश्न को विषय वस्तु के रूप में रचनात्मक स्तर पर ग्रहण किया । यह जायसी का रचनात्मक साहस ही कहा जाएगा कि उन्होंने प्रेम और नियति के समक्ष अपने धर्म में आस्था रखते हुए इस द्वंद्व की निरर्थकता को लोकभाषा में सम्प्रेषित किया । अपनी कृति ' पदमावत ' में वे यह प्रतिपादित करते है कि जीवन की सार्थकता मानवीय प्रेम है | प्रेम ही सार तत्व है । संघर्ष की अंतिम परिणति लोक निरर्थकता में सिद्ध होती है । वे ऐसा प्रेम चाहते है जो मनुष्य को ही बैकुंठ बना दे । प्रेम की पीर सारी कमियों के होते हुए मनुष्य में बैकुंठ हो जाने की अनुभूति जाग्रत कर सकता है । इसी प्रेम की कसौटी पर उन्होंने अपने युग को कसा और उनकी अनुभूति में वह गहरी विषाददृष्टि उत्पन्न हुई जिसमें एक तरफ आदमी बैकुंठ हो जाता है तो दूसरी तरफ एक मुट्ठी खाक रह जाता है । जायसी यह बात भली - भाँति देख - समझ चुके थे कि तुर्की अरबी , हिन्दुस्तानी आदि जितनी भी भाषाएँ हैं अगर उनमें प्रेम मार्ग का वर्णन है तो वे सभी रचनाएँ पाठकों - श्रोताओं के द्वारा सराही गयी हैं । ' पदमावत ' प्रेम कथा की रचना का उद्देश्य यह था कि शायद यह निशानी संसार में बची रह जाए । उन्होंने कहा है - " फूल मरै , पै मरै न बासू । जायसी ने काव्य संरचना की ऐसी पद्धति विकसित की है जो ' मुख देखी की जगह आँखों में आँसू भर आने की विवशता उत्पन्न कर देती है - ' जेई मुख देखा तेइ हंसा , सुना तो आए आँसू ।यहाँ बादशाह शेरशाह ने जब उनकी कुरूपता पर व्यंग्य किया था उस प्रसंग का संदर्भ भी है । जायसी अत्यंत कुरूप , काणे और एक कान से सुनते नहीं थे । जिसने भी उनकी कविता सुनी उसकी आँखों में आँसू आ गए । जायसी का रचनाकार के रूप में यही व्यक्तित्व है जो शताब्दियों से धूमिल नहीं हो सका है ।
कृतियाँ
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जायसी के केवल तीन ग्रन्थों का उल्लेख किया है पद्मावत , अखरावट , आखरी कलाम । आधुनिक शोध के द्वारा चित्ररेखा , कहरनामा और कान्हावत तीन ग्रन्थों को भी इनकी रचना माना जाता है । परन्तु इनकी ख्याति का आधार पद्मावत है जो प्रेमाख्यानक काव्य है । जो अवधी भाषा में लोक प्रचलित कथानक के आधार पर फारसी की मसनवी शैली में रचित है । जायसी की सभी रचनाएँ अभी उपलब्ध नहीं हैं । पद्मावत को आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जायसी की अंतिम रचना कहा है ।
जायसी से पूर्व भी प्रेमाख्यान लिखे गए । सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने प्रेमाख्यान लिखे और सूफी मत का प्रतिपादन किया । असाइत कृत हंसावली ( 1370 ई . ) को हिन्दी का पहला सूफी काव्य माना जाता है । इसके बाद मुल्ला दाउद का चन्दायन ( 1379 ई . ) दामोदर कवि कृत लखनसेन पद्मावती कथा ( 1459 ई . ) , कुतुबन कृत मृगावती ( 1503 ई . ) गणपति कृत माधवनल कामकन्दला ( 1527 ई . ) जायसी कृत पद्मावत ( 1540 ई . ) , मंझन कृत मधुमालती ( 1545 ई . ) , उसमान कृत चित्रावली ( 1613 ई . ) आदि हिन्दी के प्रमुख प्रेमाख्यानक काव्य है । इनके अतिरिक्त दक्षिण भारत में भी अनेक प्रेमाख्यानक काव्य लिखे गये । सूफियों से पहले जैन कवियों ने भी प्रेम कथाओं के आधार पर चरित काव्य लिखे थे और जैन धर्म का प्रचार किया । प्रेमाख्यानों की परंपरा में संयोग और वियोग दोनों का चित्रण किया जाता है । किन्तु फारसी के सूफी प्रेमाख्यानों में केवल वियोग का चित्रण किया जाता है । सूफी प्रेमाख्यान परंपरा ने ' पदमावत ' का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यह एक सफल प्रेमाख्यान है । लोकवृत्त और ऐतिहासिक वृत्त का इस तरह का आमना - सामना जायसी के अपने रचना विधान की मौलिक उपज है । संसार के महाकाव्यों में शायद ही कहीं यथार्थ के ऐसे विखंडी रूप का चित्रण हुआ हो । पदमावत हिन्दी - काव्य की अनुपम धरोहर के रूप में अमर है । जायसी सूफी काव्य परंपरा के प्रेमाख्यानक काव्य रचने वाले कवियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि हैं । अन्य सूफी कवियों के समान आपने भी भारतीय लोकजीवन में प्रचलित पद्मिनी और राजा रत्नसेन की प्रेमकथा को अपने महाकाव्य ' पद्मावत ' का आधार बनाया । जायसी ने फारसी और भारतीय काव्य परंपराओं का समन्वय किया । फारसी से इन्होंने मसनवी शैली को अपनाया और ठेठ अवधी भाषा में ' पद्मावत ' की रचना की । अवधी के साथ इनकी भाषा में तत्कालीन राजस्थानी और ब्रज भाषा का भी प्रभाव दिखाई देता है । फारसी भाषा के शब्दों का रूप जायसी ने प्रयोग किया है । जायसी के मन में हिन्दू और मुसलमान धर्मों के मध्य सद्भाव उत्पन्न करने की इच्छा थी । इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने ' पद्मावत ' की रचना की । हिन्दू जीवन पद्धति का उन्होंने अपने महाकाव्य में यथास्थान वर्णन किया है । भारतीय लोकगाथाओं और लोककथाओं में प्रचलित काव्य रूढ़ियों और कथानक रूढियों का प्रयोग किया है । हिन्दुओं के त्योहारों और धार्मिक मान्यताओं का भी ' पद्मावत ' में सुन्दर वर्णन उपलब्ध है । जायसी का ' पद्मावत ' प्रबंध काव्य है जिसको हम महाकाव्य की संज्ञा दे सकते हैं । ' पदमावत ' में सभी रसों का वर्णन है किन्तु श्रृंगार रस के संयोग एवं वियोग पक्ष में से वियोग श्रृंगार अद्भुत है । नागमती का विरह वर्णन हिन्दी साहित्य का ही नहीं विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है । वियोग वर्णन में जायसी ने कहीं - कहीं ऊहात्मक चित्रण किया है । जिसका कारण फारसी साहित्य का प्रभाव है । जायसी के पद्मावत में नागमती का वियोग वर्णन करते हुए जायसी ने नागमती की विरह वेदना का भव्य चित्रण किया है । यह वियोग वर्णन हिन्दी ही नहीं संसार की अन्य भाषाओं में भी अद्वितीय है । नागमती चित्तौड़गढ़ की रानी है किन्तु वह वियोग की स्थिति में अपना आभिजात्य त्यागकर सामान्य नारी के स्तर पर वियोग वेदना में अपना दुख प्रकट करती है । पद्मिनी भी राजकुमारी नहीं बल्कि एक सामान्य परिवार की लड़की बन जाती है और वह भी योग्य वर से विवाह के लिए मनौती माँगती है । जायसी की यह रचना हिन्दी साहित्य के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है और साहित्यिक महत्त्व के अतिरिक्त हिन्दू - मुस्लिम एकता के लिए भी इसका महत्त्व रहा है , आज भी है और वर्तमान परिस्थितियों में भविष्य में भी रहेगा | संप्रति देश में हिन्दू - मुस्लिम दंगे - फसाद हो रहे हैं , ऐसे समय में जायसी के ' पद्मावत ' की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है ।
हिन्दी साहित्य के महान आलोचक व साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रन्थ जायसी ग्रन्थावली में जायसी के ‘पद्मावत’ , ‘अखरावट’ व ‘आख़िरी कलाम’ को संकलित व सम्पादित किया है । इसी ग्रन्थ में आचार्य शुक्ल ने जायसी के जीवन पर भी विस्तार से लिखा है । हम यहाँ विद्यार्थियों व पाठकों की सुविधा हेतु ‘जायसी ग्रन्थावली’ की यथावत रख रहें है । आशा है सभी इससे लाभान्वित होंगे ।


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