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भाषा की शिक्षण विधि , भाषा शिक्षण के उपागम , भाषा दक्षता का विकास भाग-2

 भाषा की शिक्षण विधि , भाषा शिक्षण के उपागम , भाषा दक्षता का विकास
भाग-2
Language teaching method, language teaching approach, development of language proficiency 
part-2

Language teaching method, language teaching approach, development of language proficiency part-2

हिंदी भाषा की शिक्षण विधियाँ 

वैसे भाषा शिक्षण में अनेक विधियों का प्रयोग होता है ; परन्तु कुछ महत्त्वपूर्ण निम्न है -

प्रत्यक्ष विधि 

प्रत्यक्ष विधि का अर्थ होता है- वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप में दिखाना । इस विधि को सुगम पद्धति अथवा प्राकृतिक विधि भी कहते हैं । वस्तुओं व जीव जन्तुओं का चित्र अथवा प्रतिमान दिखाकर क्रियाओं को करके दिखाना । इस पद्धति का मुख्य सिद्धांत यह है कि जिस प्रकार बालक श्रवण एवं अनुकरण द्वारा मातृभाषा सीख लेता है , उसी प्रकार वह दूसरी भाषा भी सीख सकता है । इस पद्धति में अन्य भाषा को स्वतंत्र एवं पृथक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है । इस पद्धति में मातृभाषा के प्रयोग को सीमित कर दिया जाता है और सम्पूर्ण वाक्य को इकाई माना जाता है । सीमित शब्द - ज्ञान का प्रयोग करके शब्दावली को नियंत्रित कर दिया जाता है । प्रत्यक्ष पद्धति में अन्य भाषा के अध्ययन के समय अन्य भाषा में ही आदेश - निर्देश दिये जाते हैं और उसी में विचारों की अभिव्यक्ति की जाती है । 

इस विधि का प्रयोग सर्वप्रथम फ्रांस में 1901 ई . में अंग्रेजी भाषा के लिए किया गया । बंगाल में श्री टिपिंग , बम्बई में फ्रेज़र , मद्रास में श्री येट्स को इस पद्धति को सर्वप्रथम अपनाने का श्रेय दिया जाता है । इस विधि में तीन मुख्य बातों का ध्यान रखा जाता है -

  1. मातृभाषा का प्रयोग वर्जित है ।
  2. मौखिक कार्य को प्रधानता
  3. वस्तु और शब्द के मध्य सीधा सम्बन्ध स्थापित कर पढ़ाना

प्रत्यक्ष विधि के लाभ

  • इस पद्धति में वार्तालाप , मौखिक कार्य एवं बोलने के अभ्यास पर बल दिया जाता है ।
  •  इस पद्धति से व्याकरण - अनुवाद प्रणाली के दोष दूर हो जाते हैं । व्याकरण की सहायता इस पद्धति में नहीं ली जाती है ।
  • दूसरी भाषा सिखाने में उसी भाषा का माध्यम अपनाया जाता है , अतः अनुवाद की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
  • भाषा के दो आधारभूत कौशलों - सुनने और बोलने को सीखने का पर्याप्त अवसर मिलता है तथा उस भाषा की ध्वनियों एवं उच्चारणों से बालक सहज ही परिचित हो जाता है । इसमें बच्चे को ' अ ' से अनार ' ई ' से ईख चार्ट में चित्र के साथ या प्रत्यक्ष दिखाकर इन अक्षरों को लिखकर दिया जाता है ।

प्रत्यक्ष विधि के दोष

  • प्रत्यक्ष विधि से सीमित शब्दावली का ही ज्ञान दिया जा सकता है । अनेक शब्द ऐसे होते हैं जिनकी प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हो सकती ।
  •  सुनने और बोलने पर अधिक बल होने से वाचन और लेखन गौण हो जाते हैं । 
  • इस विधि से कुछ संज्ञा शब्दों- पुस्तक , कलम , गेंद , कागज , कुर्सी , मेज , लड़का , लड़की आदि का ज्ञान तो करा दिया जाता है पर भाववाचक शब्दों एवं विशेषणों एवं संरचनात्मक शब्दों के ज्ञान में कठिनाई होती है । 
  • इसके द्वारा केवल संज्ञा या उन शब्दों का ज्ञान दिया जा सकता है जिनका चित्र आदि बन सके या जिन चीजों को कक्षा तक लाया जा सके । 
  • प्रत्यक्ष पद्धति से पढ़ाने में लेखन तथा व्याकरण का ज्ञान रह जाता है । 
  • इस विधि से वाक्य - संरचनाओं का भी पर्याप्त ज्ञान नहीं कराया जा सकता । प्रश्नोत्तर विधि द्वारा कुछ इने - गिने बाक्यों की संरचना तो बता दी जाती है जैसे , यह क्या है ? वह क्या है ? पर सभी प्रकार की वाक्य - संरचनाओं का ज्ञान कराना बहुत कठिन है ।

सूत्र विधि 

यह विधि संस्कृत से आई है । व्याकरण के नियमों को सूत्र के रूप में परिणत कर लिया जाता है । सूत्र कण्ठस्थ करा दिए जाते हैं , उदाहरणों द्वारा इन सूत्रों को स्पष्ट कर दिया जाता है । नियम से उदाहरण की ओर जाती है । 

गुण 

  • पाठ्य - पुस्तक प्रणाली का रूपांतर है ।
  • व्याकरण के नियम सूत्रों के रूप में रटा दिए जाते हैं । फिर उनके उदाहरण देकर उनकी उपयोगिता बता दी जाती है । पाणिनी की अष्टाध्यायी सूत्रों में है । सर्वप्रसिद्ध ' सिद्धांत - कौमुदी ' भी सूत्र रूप में पढ़ाई जाती है । 
  • जहाँ पाठ्य - पुस्तक प्रणाली में लाम्बे - चौड़े नियम याद कराए जाते हैं , वहाँ सूत्र प्रणाली से संक्षिप्त सूत्र याद कराए जाते हैं । 

दोष

  • सूत्र - प्रणाली सर्वथा दोष - युक्त है । 
  • नीरस व शुष्क होना अनावश्यक दबाव डालती है । 

व्याकरण अनुवाद विधि

संस्कृत , अरबी , ग्रीक , लैटिन आदि के शिक्षण की यह प्राचीनतम व परम्परागत विधि है । यह अनुवाद के सिद्धांत पर कार्य करती है । संस्कृत में डॉ . रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर द्वारा सर्वप्रथम अपनाये जाने के कारण भण्डारकर विधि भी कहते हैं । इससे बड़े समूह में सरलता से पढ़ाया जा सकता है । इस प्रणाली में बोलने की अपेक्षा लिखने और पढ़ने पर तथा भाषा की अपेक्षा भाषा के तत्वों के ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है । भाषा - कौशलों की दक्षता का उद्देश्य हो तथा दवितीय भाषा के ढाँचों ( ध्वनियों , शब्दों , पदों एवं वाक्यों के ढाँचे ) का ज्ञान कराना । बालक को इन ढाँचों का प्रयोग आना चाहिए न कि नियम । 

दोष 

  • उच्च कक्षाओं के लिए ही उपयोगी है । 
  • व्याकरण ही अध्ययन का मुख्य विषय है । 
  • इसमें उच्चारणाभ्यास मौखिक कार्य , रसानुभूति आदि उपेक्षित 
  • इस विधि में अन्य भाषा के व्याकरण की मातृभाषा के व्याकरण के साथ तुलना की जाती है ।
  • इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम व्याकरण फिर शब्द , वाक्य संरचना , संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण , कारक आदि का ज्ञान दिया जाता है ।

 गुण

  • दवितीय भाषा के शब्दों एवं बाक्य रचनाओं का ज्ञान तथा मातृभाषा के अवतरणों का द्वितीय भाषा में अनुवाद कराया जाता है । 

पर्यवेक्षित अध्ययन विधि

पर्यवेक्षित अध्ययन विधि , जो कुशल शिक्षक के निरीक्षण और निर्देशन में सम्पन्न होती है । 

बॉसिंग " कुशल शिक्षक के निर्देशन से उच्च स्तरीय प्रदत्त कार्य को पूर्ण करने के लिए कुशल अध्ययन की तकनीकियों को समझने और उन पर अधिकार प्राप्त करने का नाम ही पर्यवेक्षित अध्ययन है । "

विद्यार्थी को योग्य निर्देशन द्वारा शिक्षण विधियों से परिचित कराकर कुशल बनाना ।

बाईनिंग व बाईनिंग “ मेज वा दराजों के चारों ओर बैठे हुए कार्यरत समूह वा कक्षा के शिष्यों का शिक्षक द्वारा पर्यवेक्षण करना ही पर्यवेक्षित अध्ययन है । "

शिक्षक , बालकों की सहायता और उचित निर्देशन द्वारा उनकी समस्याओं को सुलझाने का पूर्णतया प्रयत्न करता है । 

" छात्रों के शान्तिपूर्वक अध्ययन एवं प्रयोगशालीय क्रियाओं के बहिर्पक्षीय ' दर्शन ' तथा प्रभावपूर्ण दिशा - निर्देशन का नाम ही पर्यवेक्षित अध्ययन है । " 

पर्यवेक्षित अध्ययन के गुण - दोष 

  • छात्र अपनी -अपनी क्षमताओं के अनुसार अध्ययन करते है । 
  • शिक्षक और विद्यार्थी के सम्बन्ध सहानुभूति तथा सहयोग पूर्ण होते हैं । 
  • शिक्षक निर्देशक के रूप में होता है । 
  • अध्ययन के प्रति रुचि , कठिनाइयों को सुलझाने की कुशलताएँ आ जाती हैं । 
  • सामाजिक भावना का विकास स्वतः ही होता रहता है ।
  • इस विधि की सफलता शिक्षक की योग्यता , उसके व्यवहार आदि पर निर्भर करती है ।
  • यह विधि अधिक समय लेती है ।
  • हिन्दी भाषा - शिक्षण में द्रुत पाठ पुस्तकों के पढ़ाने में इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है । 

पर्यवेक्षित अध्ययन में ध्यान रखने योग्य बातें 

  • प्रदत्त कार्य को समझना । 
  • मुख्य बिन्दुओं का पुनरावलोकन व अध्ययन , शब्द कोष को देखना ।
  • मुख्य विषय को समझना ।

मुनरों ने छात्रों के स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत अध्ययन के लिए  9 नियम निर्धारित किये हैं -

  1. वैयक्तिक भिन्नता आधारित 
  2. आवश्यकतानुसार निर्देशन 
  3. स्वाध्यायशीलता 
  4. समस्या समाधान 
  5. छात्रों की कमज़ोरी को दूर करना  ।
  6. संगोष्ठी परियोजना 
  7. विषय विशेषज्ञ 
  8. अध्ययन कक्ष 
  9. समय सारणी

आगमन - निगमन विधि 

आगमन विधि 

अनुभवों , प्रयोगों तथा उदाहरणों का अध्ययन करके नियम बनाये जाते हैं । यह ' विशिष्ट से सामान्य की ओर ' तथा ' स्थूल से सूक्ष्म की ओर ' पर आधारित है । प्रत्यक्ष उदाहरणों , अनुभवों तथा प्रयोगों से निष्कर्ष निकालना । जिसमें उदाहरणों की सहायता से सामान्य नियम का निर्धारण किया जाता है , आगमन शिक्षण - विधि कहलाती है । आगमन या सामान्यानुमान विधि भी कहते हैं । प्रयोग विधि को ' आगमन विधि ' भी कहा जाता है । यह सूत्र - प्रणाली से सर्वथा विपरीत है , इससे नियम आदि विद्यार्थियों से ही निकलवाये जाते हैं । विद्यार्थियों के सामने उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं , विद्यार्थियों की सहायता से व्यापक नियम का निर्माण किया जाता है ।

परिभाषा 

जॉयसी " आगमन विशेष दृष्टान्तों की सहायता से सामान्य नियमों को विधिपूर्वक प्राप्त करने की क्रिया है ।

यंग- इस विधि में बालक विभिन्न स्थूल तथ्यों के आधार पर अपनी मानसिक शक्ति का प्रयोग करते हुए स्वयं किसी विशेष सिद्धांत , नियम से सूत्र तक पहुँचता है ।

 लैण्डल " जब बालकों के समक्ष अनेक तथ्यों , उदाहरणों एवं वस्तुओं को प्रस्तुत किया जाता है , तत्पश्चात् बालक स्वयं ही निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करते हैं , तब वह विधि आगमन विधि कहलाती है । " 

आगमन विधि द्वारा शिक्षण करते समय मुख्य रूप से निम्न सोपानों का प्रयोग किया जाता है 

  • उदाहरणों का प्रस्तुतीकरण
  • निरीक्षण नियमीकरण या सामान्यीकरण 
  • परीक्षण एवं सत्यापन 

उपर्युक्त सोपानों का अनुसरण करते हुए बालक आगमन विधि द्वारा ज्ञान अर्जित करते हैं तथा उनकी विभिन्न मानसिक शक्तियों का भी विकास होता है । 

आगमन विधि के गुण 

  • यह मनोवैज्ञानिक विधि है , जिससे आत्म - निर्भरता व आत्म विश्वास उत्पन्न होता है । क्योंकि छात्र स्वयं नियम की खोज करते हैं । 
  • इससे , नियमों , सम्बन्धों , सूत्रों तथा नवीन सिद्धांतों आदि का प्रतिपादन करने में सहायता मिलती है ।
  • छोटी कक्षाओं के लिए उपयोगी एवं उपयुक्त विधि है । 
  • इस विधि दवारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी होता है । 
  • बालकों की आलोचनात्मक निरीक्षण एवं तर्क शक्ति का विकास होता है । 
  • छात्रों की मानसिक शक्तियों का विकास होता है । 
  • इस वैज्ञानिक विधि द्वारा अर्जित ज्ञान प्रत्यक्ष तथ्यों पर आधारित होता है । नियम की खोज बालक स्वयं करते हैं । उनमें आत्म - विश्वास की वृद्धि होती है । बालक अधिक क्रियाशील रहते हैं । 
  • इसमें तर्क , विचार एवं निर्णय शक्ति का विकास होता है । इससे नियम , सूत्रों का निर्धारण एवं सामान्यीकरण की प्रक्रिया का ज्ञान । 

आगमन विधि की सीमाएँ 

  • इसकी गति धीमी है , समय और परिश्रम अधिक होता है ।
  • सभी स्तर के बालकों के लिए आसान नहीं है । वह निम्न कक्षाओं के लिए ही उपयोगी है । ज्ञान क्रमबद्ध नहीं होता है ।
  • अनुभवी एवं योग्य अध्यापक ही प्रयोग कर सकते हैं । 
  • परिणाम पूर्णतया सत्य नहीं होते हैं । 

निगमन विधि 

निगमन विधि के आधार की यह धारणा है कि सत्य शाश्वत व अपरिवर्तनीय होता है । निगमन विधि आगमन विधि के बिल्कुल विपरीत है । निगमन विधि में सामान्य नियम या सूत्र को विशिष्ट उदाहरणों वा परिस्थितियों में लागू करते हैं । इसे उच्च कक्षाओं के शिक्षण में अधिक प्रयुक्त किया जाता है । 

कार्य विधि - नियम से उदाहरण की ओर , सामान्य से विशिष्ट की ओर तथा प्रमाण से प्रत्यक्ष की ओर , सूक्ष्म से स्थूल की ओर अग्रसर होते हैं । सूत्रों , नियमों तथा सम्बन्धों आदि की प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुति । 

निगमन विधि के गुण 

  • कार्य अत्यन्त सरल एवं सुविधाजनक । 
  • स्मरण शक्ति विकसित होती है । 
  • आगमन विधि से नियम और परिभाषाओं की खोज कर उसका पुष्टिकरण निगमन विधि के द्वारा करा दिया जाता है ।
  • नवीन समस्याओं का समाधान । 
  • क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त ।
  • नियमों , सिद्धांतों एवं सूत्रों की सत्यता की जाँच में आसानी ।
  • अभ्यास कार्य शीघ्रता तथा आसानी से ।

निगमन विधि की दोष 

  • मानसिक शक्ति का विकास नहीं , रटने की आदत पड़ जाती है ।
  • छात्र में आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास उत्पन्न नहीं होता है ।
  • इस विधि में बालक यंत्रवत कार्य करते हैं ।
  • इस विधि द्वारा अर्जित ज्ञान अस्पष्ट एवं अस्थायी होता है ।
  • तर्क , चिन्तन एवं अन्वेषण शक्तियों के विकास का अवसर नहीं मिलता । 
  • यह विधि मनोहिन्दी के सिद्धांतों के विपरीत है ; क्योंकि यह स्मृति केन्द्रित विधि है ।
  • छोटी कक्षाओं के लिए उपयोगी नहीं है ।

अभिक्रमित अनुदेशन विधि

अभिक्रमित अधिगम शिक्षण की व्यक्तिगत पद्धति है । अभिक्रमित अनुदेशन के लिए स्वयं अनुदेशन सामग्री की आवश्यकता होती है । इस सामग्री की सहायता से छात्र स्वयं ही अधिगम करता है । सन् 1963 ई . में भारत में सर्वप्रथम अधिक्रमित अनुदेशन का श्री गणेश हुआ । सन् 1966 ई . में एक संगठन का निर्माण किया , जिसे इण्डियन एसोशियन ऑफ़ प्रोग्गाम्ड लर्निंग ' ( IAPL ) कहते हैं इसमें 500 सदस्य है । 

जेम्स ई . एस्पिच तथा विल विलियम्स " अभिक्रमित अनुदेशन अनुभवों का वह नियोजित क्रम है , जो उद्दीपक अनुक्रिया सम्बन्धों के रूप में कुशलता की ओर ले जाता है । 

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक " अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण सामग्री को छोटे - छोटे पदों में व्यवस्थित करने की एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसका निर्माण छात्र को स्वयं अध्ययन के माध्यम से ज्ञात से अज्ञात , नवीन एवं अधिक जटिल ज्ञान तथा सिद्धांतों की ओर ले जाती है । 

अभिक्रमित अनुदेशन की गुण

  • सामग्री की क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुति है । सही अनुक्रियाओं के लिए पुनर्बलन दिया जाता है । 
  • पूर्व व्यवहारों तथा धारणाओं का विशिष्टीकरण करना । 
  • छोटे - छोटे पदों में प्रस्तुत करना पड़ता ( तार्किक क्रम में ) ।
  • छात्र तथा अनुदेशन के मध्य अन्तःक्रिया , अनुक्रिया , पृष्ठपोषण , उद्दीपन , अनुक्रिया तथा पुनर्बलन क्रियाशील रहते है । 
  • व्यक्तिगत भिन्नता के अनुसार सीखने का अवसर । 

अभिक्रमित शिक्षण का उपयोग 

  • प्राथमिक शिक्षा के स्तर उन्नयन में सहयोगी  । 
  • उपचारात्मक शिक्षण में अभिक्रमित शिक्षण उपयोगी  ।
  • हिन्दी एवं अन्य भाषा शिक्षण में अभिक्रमित शिक्षण सामग्री पुस्तक के रूप में छात्रों को उपलब्ध करायी जा सकती है या फिर टेप रिकार्ड्स द्वारा भी भाषा शिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है । 
  • हिन्दी एवं हिन्दी के क्षेत्र में अभिक्रमित शिक्षण सामग्री नये नये शीर्षकों पर तैयार कराकर शिक्षकों को उपलब्ध कराई जाए तो शिक्षकों की अपनी व्यावसायिक दक्षता में वृद्धि होगी और वे छात्रों का अभीष्ट मार्गदर्शन कर सकेंगे । 
  • शिक्षण में कमजोर व धीमी गति वाले छात्रों की शिक्षा में , औद्योगिक कर्मचारियों के प्रशिक्षण देने में बैंकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण में एवं सेना में अफसरों को प्रशिक्षण देने में अभिक्रमित शिक्षण विधि की उपयोगिता होती है । 

भाषा - संसर्ग विधि

इस प्रणाली में व्याकरण के नियमों का ज्ञान कराए बिना , भाषा के शुद्ध रूप का अनुकरण करने का अवसर प्रदान कर छात्रों को भाषा के शुद्ध रूप का प्रयोग करना सिखाया जाता है । प्राथमिक कक्षाओं में व्याकरण पढ़ने की यही प्रणाली लाभदायक है । इसके दवारा प्रारंभिक कक्षाओं में रचना तथा अभ्यास द्वारा भाषा का शुद्ध प्रयोग कराया जाता है । प्राथमिक स्तर पर बच्चों को व्यावहारिक व्याकरण का ज्ञान देने के लिए तो यह विधि उपयोगी है । 

दोष 

  • व्याकरण के नियमों का ज्ञान नहीं हो पाएगा । 
  • समय अधिक व्यय होगा । 
  • व्याकरण सैद्धांतिक का ज्ञान न दिया जाकर उसके व्यावहारिक पक्ष पर जोर दिया जाता है । 
  • यह मनोवैज्ञानिक अवश्य है , क्योंकि विद्यार्थियों को बुद्धि और तर्क से काम लेना पड़ता है ।
  • भाषा की शिक्षा दी जा सकती है , व्याकरण की नहीं । भाषा - शिक्षण की विधि कही जा सकती है , व्याकरण - शिक्षण की नहीं । 

साहचर्य विधि

इस विधि का आविष्कार श्रीमती मारिया मान्टेसरी ने किया था । इस विधि में कई चित्र तथा वस्तुएँ कमरे में एकत्रित कर ली जाती है , जो बालकों की अनुभव - परिधि के भीतर हों । इन वस्तुओं तथा चित्रों आदि के नाम कार्डो पर लिखे होते हैं । अभ्यास करते - करते बालक अनेक शब्दों और वस्तुओं से परिचय प्राप्त कर लेता है । 

दोष

  • केवल कुछ संज्ञाओं का ही जान , उपयोग केवल छोटी कक्षाओं तक ही सीमित है । 

व्याख्यान - विधि 

सर्वाधिक प्राचीन विधि है । यह प्रयोग में सरल , क्रमबद्ध व कम परिश्रम वाली होने के कारण ही व्याख्या को मृत मानने के बावजूद भी इसकी महत्ता कम नहीं हुई है । ज्ञान स्थानान्तरण का उपयुक्त स्रोत है , यह केवल सर्जनात्मक विधि है । अध्यापक केन्द्र बिन्दु पर सक्रिय होता है । छात्र निष्क्रिय श्रोता मात्र होते हैं । 

व्याख्यान विधि के पद

  1. विषय वस्तु व प्रकरण निर्धारित करना
  2. अध्यापक दवारा योजना बनाना ( क ) पूर्व ज्ञान निर्धारण ( ख ) उद्देश्य निर्धारित करना ( ग ) पाठ्यवस्तु की रूपरेखा ( घ ) उदाहरणों को स्थान । 
  3. प्रस्तुतिकरण 
  4. सारांश प्रस्तुत 
  5. मूल्यांकन

गुण 

  • समय , श्रम व धन की बचत
  • जीवनी , आत्मकथा हेतु सर्वोत्तम । 
  • सरल , संक्षिप्त एवं तीव्र गति से चलने वाली । 
  • तार्किक क्रम सरलता से स्थापित । 

दोष 

  • अमनोवैज्ञानिक विधि , छात्र निष्क्रिय , श्रोता इनकी रूचियों , प्रवृत्तियों व योग्यताओं का ध्यान नहीं । 
  • प्रयोगात्मक कार्य व मौलिकता का अभाव ।
  • करके सीखने के सिद्धांत की अवहेलना , हिन्दी का वास्तविक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है ।
  • प्रजातांत्रिक भावना के विपरीत प्रभुत्ववादी विधि । 
  • निम्न कक्षाओं के लिए अनुपयोगी , स्वाध्याय की प्रवृत्ति को कम करना । 

व्याख्यान विधि का प्रयोग 

  • नवीन पाठ का प्रारम्भ । 
  • सामान्यीकरण करना ।
  • जीवनी या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से परिचित करवाने ।
  • सारांश देना । 
  • व्याख्यान विधि के प्रयोग हेतु सुझाव
  • उच्चारण , स्वर का उतार - चढ़ाव , हाव - भाव , आवाज आदि का ध्यान रखना चाहिए । 
  • प्रस्तावना , भूमिका , संक्षिप्तिकरण या सांराश के समय इस विधि का प्रयोग ।
  • प्रश्न पूछते रहना चाहिए । 

प्रदर्शन विधि 

किसी घटना को दृश्य के रूप में प्रस्तुत करना तकनीकी भाषा में प्रदर्शन कहलाता है । " मूर्त से अमूर्त ' शिक्षण सूत्र का प्रयोग किया जाता है । पाठ द्विपक्षीय हो जाता है , रुचि बनी रहती हैं व छात्रों की निरीक्षण एवं तर्क शक्ति का भी पर्याप्त विकास होता है ।

गुण

  • यह विधि मनोवैज्ञानिक व कम खर्चीली है । 
  • विषयवस्तु का अधिक स्पष्टीकरण व स्थायी ज्ञान । 
  • शिक्षक के लिए समय और शक्ति की दृष्टि से प्रदर्शन अधिक उपयुक्त विधि है ।

दोष 

  • शिक्षक केन्द्रित व व्यक्तिगत भिन्नता के लिए कोई स्थान नहीं है ।
  • केवल कुछ छात्र ही सक्रिय रह पाते हैं , अधिकांश छात्र निष्क्रिय रहते हैं । करके सीखने के सिद्धांत के लिए कोई स्थान नहीं है । 
  • प्रयोगशाला सम्बन्धी अपेक्षित कौशल का विकास नहीं हो पाता । 

श्रुतलेखन - अभ्यास विधि

अध्यापक बोलता जाता है और बालक सुनकर लिखते जाते हैं ।

श्रुतिलेख का उद्देश्य 

वर्तनी दोष दूर करना , शुद्ध लिखने की क्षमता का विकास करना 

श्रुतलेख प्रक्रिया 

  • पहले दिन ही संकेत दे दें । 
  • गद्यांश तथा 10 कठिन शब्द होने चाहिए । 
  • श्रुतलेख लिखाने के बाद एक बार पुनः द्रुत वाचन कर दे । 
  • जाँच कार्य करें , अशुधियों में गोला लगाएँ , शुद्ध रूप हाशिये में लिखे तथा अशुद्धियों को दस - दस बार लिखने को कहा जाये । 

हरबर्टीय विधि 

 प्रारंभ में इस प्रणाली के चार भाग थे 

  1. स्पष्टता ( Clearness ) 
  2. सम्बद्धता ( Association )
  3. व्यवस्था ( System ) 
  4. विधि ( Method )

संशोधित रूप हर्बर्ट की पंचपदी के नाम से प्रसिद्ध है । ये पाँचों निम्न प्रकार है

  1. प्रस्तावना ( Preparation ) 
  2. प्रस्तुतीकरण ( Presentation ) 
  3. तुलना व सहयोग ( Comparison and Association )
  4. सामान्यीकरण ( Generalization ) 
  5. प्रयोग ( Application )

तुलना और सहयोग के द्वारा पाठ का स्पष्टीकरण अधिक सरलता से किया जा सकता है । सामान्यीकरण के दवारा बालक स्वयं नियम की खोज करता है । पाठ - सूत्र का स्वरूप नीचे दिया जा रहा है -

विद्यालय का नाम ............

पाठ संख्या ............          कक्षा ......             दिनांक ........... 

विषय ..........              प्रकरण.........      कालांश ................ 

  1. पाठ शिक्षण के उद्देश्य - 

  • सामान्य उद्देश्य 
  • विशिष्ट उद्देश्य 
  1. सहायक सामग्री 
  2. पूर्व - जान 
  3. प्रस्तावना 
  4. उद्देश्य - कथन 
  5. प्रस्तुतीकरण 
  6. श्यामपटूट सारांश 
  7. बोध प्रश्न 
  8. पुनरावृत्ति 
  9. गृह – कार्य

ध्वन्यात्मक विधि 

प्रारम्भिक अवस्था में बालकों के सामने समान ध्वनि वाले शब्द रखे जाते है । इस विधि में बच्चों की शब्दावली में शब्द पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते । किसी एक ही वाक्य में शब्दों का मेल होता है । इस विधि में शब्दों , वाक्य खण्डों और वाक्यों की ध्वनियों पर अधिक ध्यान दिया जाता है । इस विधि में ध्वनियों का , उनके उच्चारण तथा अक्षर विन्यास का भी अभ्यास हो जाता है । ये विधि संश्लेषणात्मक कही जाती हैं । क्योंकि इनमें अक्षर से आरंभ करते हैं और अक्षरों के जोड़ या संश्लेषण से शब्द बनाते हैं ।

वाचन - विधि 

भाषा में वाचन के लिये ऊंचे स्वर में पढ़ना या पढ़कर मुनाना है । शिक्षा के क्षेत्र में वाचन से तात्पर्य अर्थ ग्रहण करने से है । 

वाचन के उद्देश्य

  • भाव ठीक - ठीक समझने की क्षमता उत्पन्न करना । 
  • शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराना । 
  • अभिव्यक्ति की क्षमता । 
  • उनमें पढ़ते हुए लिपिबद्ध विचारों के अर्थ ग्रहण करने की क्षमता उत्पन्न करना ।
  • त्वरित गति से पढ़ने का अभ्यास करना । 
  • छात्र कहानियों , कविताओं , नाटकों , उपन्यासों तथा समाचार पत्रों के पढ़ने में रुचि लें । 

वाचन शिक्षण का क्रम 

छात्रों को वाचन की पूर्ण अवस्था तक पहुंचाने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से वाचन के विभिन्न स्तरों पर निपुण बनाया जाये । वाचन शिक्षण की निम्नलिखित तीन अवस्थायें है 

  • पुस्तकों को पढ़ने के लिए रुचि उत्पन्न करना ।
  • शब्द , वाक्यांशों व वाक्यों का बोध करना ।
  • गम्भीर की प्रवृत्ति उत्पन्न करना विश्लेषण एवं निष्कर्ष की क्षमता उत्पन्न करना ।

समवाय विधि

  1. उद्योग 
  2. भौतिक वातावरण 
  3. सामाजिक वातावरण 

ये तीनों समवाय के केन्द्र हैं । समवाय प्रणाली में ज्ञान और कर्म के विभिन्न सम्बन्ध पर जोर दिया जाता है । हरबर्ट ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया , कि जब तक नए पाठ को पूर्व - जान के साथ न जोड़ा जाए , तब तक नया पाठ पूर्ण रूप से हदयंगम नहीं हो सकता । 

हरबर्ट का सहसम्बन्ध का सिद्धांत - हबार्ट ने दो प्रकार का सहसम्बन्ध दर्शाया -

क्षैतिज सहसम्बन्ध एक विषय का अन्य विषयों के साथ कह सकते हैं 

लम्बीय सहसम्बन्ध एक ही विषय के विभिन्न आगों का 

फ्रोबेल की जीवन केन्द्रित शिक्षा- फ्रोबेल ने पहली बार शिक्षा केन्द्र के धुरे को पाठ्य - विषयों से हटा कर बालक की ओर लगाया । बालक खेल - खेल में ही भाषा सीखें । 

डिवी का सामंजस्यीकरण का सिद्धांत - फ्रोबेल के केन्द्रीकरण के सिद्धांत में दो सुधार किए । पाठ्यक्रम ज्ञानात्मक होने के बदले क्रियात्मक या अनुभवात्मक बन गया । 

गाँधी जी का समवाय का सिद्धांत- बुनियादी शिक्षा में कर्म और ज्ञान का अटूट सम्बन्ध है । 

समवाय का व्यापक रूप - व्यापक रूप में समवाय सिद्धांत में वे सभी मुख्य बातें आ जाती है , जो हर्बर्ट आदि शिक्षा शास्त्रियों ने प्रतिपादित की हैं जैसे - भाषा के विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध , गद्य पाठ के साथ शेष अंगों का सम्बन्ध , भाषा का अन्य विषयों के साथ सम्बन्ध , भाषा का उद्योग , भौतिक वातावरण या सामाजिक वातावरण के साथ समवाय ।

समवाय की आवश्यकता

परिष्कृत पाठ्यक्रम हेतु , समय सारिणी का न्यूनबन्धन हेतु , कक्षा - अध्यापक की व्यवस्था हेतु , उपकरण के उचित प्रयोग हेतु प्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा शिक्षण हेतु , परीक्षा या जाँच कार्य हेतु , समवाय के उचित अवसर प्रदान करने हेतु , समवाय के केन्द्र औद्योगिक कार्य कताई , बुनाई , कृषि , लकड़ी का काम , रसोई का काम , सिलाई , रंगाई , धुलाई आदि ।

भौतिक वातावरण , सामाजिक वातावरण , गद्य - पाठ जिसको केन्द्र मान कर , उच्चारण , वाचन , शब्दावली , साहित्य परिचय , व्याकरण , मौखिक तथा लिखित रचना की शिक्षा दी जा सकती है । 

समवाय मुक्त पाठ- भाषा शिक्षण में निम्न पाठ समवाय के बिना पढ़ाने में कोई आपत्ति नहीं -

प्रयोग द्वारा व्याकरण ( मिडिल कक्षाओं में ) , साहित्यिक व्याख्या और समीक्षा गद्य - पाठ पर रचना नये बातावरण पर रचना  अनुवाद और सारांश ।

दल - शिक्षण विधि या टोली शिक्षण विधी

David Warwick " टोली शिक्षण व्यवस्था का एक स्वरूप है , जिसमें कई शिक्षक अपने स्रोतों , अभिरुचियों तथा दक्षताओं को एकत्रित करते हैं और छात्रों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षकों की एक टोली द्वारा प्रस्तुत किया जाता है , वे विद्यालय की सुविधाओं का समुचित उपयोग करते हैं । "

शैवलिन तथा ओल्ड के अनुसार - “ दल - शिक्षण अनुदेशात्मक - संगठन का वह प्रकार है , जिसमें शिक्षण प्रदान करने वाले व्यक्तियों को कुछ छात्र सौंप दिए जाते हैं । शिक्षण प्रदान करने वालों की संख्या दो या उससे अधिक होती है , जिन्हें शिक्षक का दायित्व सौंपा जाता है , जो एक ही छात्र समूह को सम्पूर्ण विषय वस्तु या उसके किसी महत्त्वपूर्ण अंग का एक साथ शिक्षण करते हैं । "

जे.पी. पुरोहित के अनुसार- दल शिक्षण अध्यापन की आधुनिक विधि है । इस विधि के अनुसार दो या दो से अधिक अध्यापक मिलकर नियमित रूप से किसी कक्षा का अध्यापन संबंधी योजना बनाते हैं , उसे क्रियान्वित करते हैं तथा उसका मूल्यांकन करते हैं

दल शिक्षण की विशेषताएं

  • दल शिक्षण सहकारिता की भावना पर आधारित है । 
  • बाहर के विषय - विशेषणों की सहायता । 
  • मुख्य उद्देश्य शिक्षण - अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना है ।

दल - शिक्षण की कार्य - प्रणाली 

इसके निम्नलिखित तीन प्रमुख सोपान हैं 

  1. नियोजन 
  2. क्रियान्वयन 
  3. मूल्यांकन 

नियोजन 

छात्रों का पूर्वज्ञान ज्ञात किया जाता है , शिक्षण विधियों , सहायक सामग्री , दृश्य - श्रव्य वस्तु का निर्धारण किया जाता है । उन्हें उद्देश्य रूप में लिखते हैं । कौनसी विधियाँ काम में ली जानी चाहिए आदि का निर्धारण किया जाता है । इस प्रकार योजना निर्मित की जाती है । 

क्रियान्वयन 

निर्मित योजना को क्रियान्वित किया जाता है , गति प्रदान की जाती है तथा क्रियान्वयन में सभी अध्यापकों का सहयोग अपेक्षित होता है ।

मूल्यांकन 

तृतीय सोपान के अन्तर्गत छात्रों द्वारा अधिक विषय - वस्तु का विश्लेषण के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है । छात्र ने कितना अधिगम किया , कितना उसने व्यवहार में ढाला आदि । 

दल - शिक्षण के लाभ

  • अनुशासनहीनता की समस्या उत्पन्न नहीं होती है । 
  • छात्र तथा शिक्षकों के मध्य अधिक निकट सम्बन्ध स्थापित होता है । 
  • संतुलित सामाजिक विकास संभव । श्रव्य - दृश्य सामग्री सामग्री का प्रयोग करना संभव । 
  • वाद - विवाद को प्रमुख स्थान , नियोजित शिक्षण संभव है । 
  • छात्रों को विभिन्न विषयों की आधुनिकतम जानकारी प्राप्त होती है । 

दल - शिक्षण की सीमाएं 

  • आर्थिक भार अधिक हो जाता है ।
  • समन्वय करने में कठिनाई हो जाती है ।

भाषा - प्रयोगशाला विधि 

कक्षा - अध्यापन का पूरक ही ' भाषा - प्रयोगशाला है । भाषा रिकॉर्डिंग , अधिक स्वाभाविक वातावरण की सृष्टि करता है । भाषा - शिक्षण में प्रारंभ में पढ़ने - लिखने के स्थान पर सुनने बोलने पर बल दिया जाता है । भाषा में तीव्रता से गति आती है । सभी पक्षों पर समान बल दिया जाना चाहिए । 

प्रो . एडविन पैकर के अनुसार " भाषा - प्रयोगशाला वैद्युतिकीय साजसज्जा से युक्त एक शिक्षण - कक्ष होता है , जिसका उपयोग भाषाओं में समूह शिक्षण के लिए किया जाता है । 

भाषा प्रयोगशाला विधि की उपयोगिता

  • भाषा प्रयोगाशाला में कक्षा में पढ़ाई गई पाठ - सामग्री का अभ्यास कराया जाता है ।
  • पाठ्य - सामग्री दुहराने के लिए अवसर प्राप्त होता है । 
  • अपनी - अपनी गति से विद्यार्थी अभ्यास कर सकता है । 
  • शिक्षक व्यक्तिगत ध्यान दे सकता है ।
  • तत्काल अशुद्धि ठीक कर शुद्ध उच्चारण सुनने की सुविधा भाषा - प्रयोगशाला में अधिक संभव है ।  
  • ' प्रबलन ' प्राप्त होता है और आत्म - विश्वास बढ़ता है । 
  • कक्षा में दुहराने में जो समय लगता है , उसकी बचत होती है । 
  • भाषा के विभिन्न पक्षों का अध्यापन भाषा प्रयोगशाला में सरलता से संभव है शब्दावली - श्रवणाभ्यास तथा - अनुच्छेद को बोधगम्य कराना -उपवाक्य - वाक्य ध्वनिभेद - उच्चारण अनुकृति - पदबंध - मुक्त भाषण -पठन आदि ।

भाषा प्रयोगशाला के प्रकार 

भाषा प्रयोगशालाएं कई प्रकार की हो सकती हैं ।

तार की दृष्टि से

  • तार युक्त प्रयोगशाला - विद्यार्थी को निश्चित स्थान पर बैठना होता है ।
  • तार मुक्त प्रयोगशाला - समस्त व्यवस्था तार - मुक्त होने के कारण तथा बैट्री - चालित रिसीवर होने के कारण विद्यार्थी बूथ को कहीं भी उठाया या रखा जा सकता है । काफी सरल तथा कम खर्चीली है । 

प्रोग्राम की दृष्टि से - प्रोग्राम से तात्पर्य उस पाठ्य - सामग्री से है जो शिक्षक प्रसारित करता है । एक साथ एकाधिक प्रोग्राम प्रसारित किए जा सकते हैं । 

विद्यार्थी की क्रियाशीलता की दृष्टि से

इसमें विद्यार्थी के पास न कोई माइक होता है और न टेपरिकॉर्डर । दूसरी ओर शिक्षक कन्सोल से सिवाय प्रसारण के कुछ नहीं कर सकता है , जिसके फलस्वरूप शिक्षक , विद्यार्थी कोई बातचीत नहीं कर सकता । 

श्रव्य क्रियाशील ( ऑडियो एक्टिव ) प्रयोग शाला ( ए.ए.प्रकार )

 इस प्रकार की प्रयोगशाला में विद्यार्थी हेंड सेट की सहायता से प्रसारित पाठकों को तो सुन ही सकता है पर साथ ही माइक के माध्यम से दुहराये गए पाठ को स्वयं भी सुन सकता है और अध्यापक के पास तक भी भेज सकता है । विद्यार्थी के पास अपना टेपरिकॉर्डर नहीं होता जिससे वह मास्टर टेप के पाठ को और अपने उच्चारण को टेप कर सके । इसको ही ब्राडकास्ट प्रयोगशाला भी कहा जाता है ।

श्रव्य क्रियाशील - मिलान ( ऑडियो एक्टिव कम्पेयर ) प्रयोगशाला ( ए.ए.सी. प्रकार ) 

विद्यार्थी मास्टर टेप को सुन सकता है , दुहराता है और रिकॉर्ड भी करता है । यह सबसे अधिक सुविधाजनक है । भारतीय भाषा संस्थान , मैसूर तथा इसके विभिन्न केन्द्र - मैसूर , भुवनेश्वर , पटियाला ; केन्द्रीय हिन्दी संस्थान , आगरा तथा लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी , मसूरी आदि स्थानों पर इस प्रकार की ही प्रयोगशालाएं हैं । इसको पुस्तकालय ( लाइब्रेरी ) प्रयोगशाला भी कहते हैं । इसका आधुनिक रूप डायल प्रयोगशाला है । दूरस्थ नियंत्रण ( रिमोट कंट्रोल ) भी संभव है । स्थानानुसार 8,16,32,40 बूथ लगाये जा सकते हैं । .

शिक्षक को अनेक सुविधाएँ प्राप्त हैं । टेपरिकॉर्डरों से पाठ प्रसारित करना , माइक से प्रसारण , हेंड सेट का उपयोग ( सुनने , वार्तालाप करने अथवा शंका समाधान करने के लिए ) इस प्रकार पाठ प्रसारित करने में भी सक्षम नहीं वरन् पूरा - पूरा नियंत्रण रख सकता है । 

व्यतिरेकी विधि

' व्यतिरेकी विधि ' में मातृभाषा और सीखी जाने वाली द्वितीय भाषा दोनों का भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है ।  ध्वन्यात्मक संरचना , रूप रचना , वाक्य गठन , मुहावरे , शब्द समूह आदि के क्षेत्र में मातृभाषा और द्वितीय भाषा का अन्तर - समानता , असमानता - स्पष्ट रूप से जान लेने से बालक नई भाषा के यथार्थ स्वरूप को ठीक प्रकार से पहचानता और ग्रहण करता है । द्वितीय भाषा शिक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर है , कि मातृभाषा तथा द्वितीय भाषा का ऐसा वर्णनात्मक व्याकरण बनना चाहिए जो उन दोनों के सही रूप को प्रकट कर सके । व्याकरणिक नियमों को कंठस्थ करने की जगह भाषाई कौशलों का अर्जन और अभ्यास अधिक उपयोगी माना जाता है । 

अनुकरणात्मक विधि

इस विधि में विद्यार्थी अध्यापक का अनुकरण करके ही सीखते हैं , अनुकरण विधि प्रारिम्भक स्तर पर उपयोगी होती है । प्रारम्भिक स्तर पर यह लेखन व उच्चारण के लिए उपयुक्त होती है तथा माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर रचना हेतु उपयुक्त रहती है । लेखन हेतु दो प्रकार का अनुकरण होता है – 

रूपरेखा अनुकरण 

मुद्रित पुस्तिकाएँ जिनमें अक्षर या वाक्य बिन्दु रूप में लिखे होते हैं , बालक उन बिन्दुओं पर पेन्सिल या बालपैन फेरता है और अभ्यास करके अक्षरों या शब्दों को लिखना सीख जाता है । जैसे- ' अ ' 

स्वतंत्र अनुकरण

अध्यापक श्यामपट , स्लेट  या अभ्यास पुस्तिका पर अक्षर लिख देता है और बालक से कहता है कि वह स्वयं उसी प्रकार के अक्षर लिखें । जैसे- ' अ ' को देखकर बालक भी ऐसा ही लिखने का प्रयास करता है । 

उच्चारण अनुकरण 

इस पद्धति में अध्यापक एक - एक शब्द कहता जाता है और बालक उस शब्द की ध्वनि का अनुकरण करते चलते हैं । अनुकरण विधि उन भाषाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है , जहाँ पर एक अक्षर की एक से अधिक ध्वनियाँ होती हैं अथवा जहाँ पर लिखा कुछ जाता है और पढ़ा कुछ जाता है , जैसे - अंग्रेजी में put पुट ( U = 3 ) But बट ( U- अ ) आदि । 

रचना अनुकरण 

इस विधि में जिस प्रकार की भाषा और शैली में रचना करानी होती है , उसी भाषा और शैली पर आधारित रचना ( गद्य , पद्य , नाटक आदि ) को विद्यार्थियों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया जाता है । छात्र दिये हुए विषय पर उसी के अनुरूप रचना करने का प्रयास करते हैं । जैसे - होली का लेख बताकर दीपावली पर लेख लिखाना । 

यह विधि पूर्णतः मनोवैज्ञानिक नहीं है , इसमें छात्रों की भाषा तो अपनी होती है ; किन्तु शैली के लिए उन्हें आदर्श रचना पर ही निर्भर रहना पड़ता है । अतः यह विधि माध्यमिक कक्षाओं के लिए ही उपयुक्त हो सकती है । 

इकाई विधि 

शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य रूप से इस पद का प्रयोग 1920 ई . से हुआ । जेम्स एम.ली  ने इसे विषय - वस्तु के क्षेत्र के संगठन का ढाँचा माना है । परन्तु बाद में इसको एक शिक्षण विधि के रूप में भी ग्रहण किया गया ।

थॉमस एम . रिस्क " इकाई किसी समस्या , योजना या सम्बन्धित सीखने वाली क्रियाओं की समग्रता या एकता को प्रकट करती है । " 

 मॉरिसन " इकाई वातावरण , संगठित विज्ञान , कला या आचरण का एक व्यापक एवं महत्त्वपूर्ण अंग होती है , जिसे सीखने के फलस्वरूप व्यक्तित्व में सामंजस्य आ जाता है । "

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् ( NCERT ) " इकाई एक निर्देशात्मक यूक्ति है , जो छात्रों को समवेत रूप में ज्ञान प्रदान करती है । " 

इकाई विधि की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हेनरी हेरेप ने ( 1930 ई . ) में प्रस्तुत की हैं , जो निम्न हैं -

इकाई किसी रुचि पर आधारित कार्य का एक बड़ा भाग होता है । इकाई ज्ञान की किसी शाखा का तार्किक विभाजन है , जिसमें क्रियाओं तथा इन्द्रियानुभवों को केवल तार्किकता की दृष्टि से स्थान दिया जाता है । इकाई - कार्य पूर्ण अनुभव है , जिसमें छात्र एक निश्चित एवं उपयोगी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संलग्न रहते हैं । इकाई रुचि के विशेष केन्द्रों पर आधारित कक्षा के सम्पूर्ण कार्य का खण्डों में विभाजन है । इकाई किसी विषय का एक बड़ा उपविभाग होता है , जिसका कोई मूलभूत सिद्धांत या प्रकरण होता है । छात्रों की क्रियाओं को इस सिद्धांत या प्रकरण के अनुसार ऐसे ढंग से नियोजित किया जाता है , जिससे कि उन्हें विषय के आवश्यक तत्वों का पूर्ण ज्ञान हो जाये । 

बाइनिंग व बाइनिंग " इस विधि में अधिक समय लगता है । साथ ही बार - बार की पुनरावृत्ति से कक्षा का वातावरण भी नीरस हो जाता है । " 

यह विधि निरीक्षित अध्ययन तथा प्रयोगशाला विधि का मिश्रित रूप मानी जाती है ।

इकाई विधि के लाभ 

  • छात्रों में सहयोग , विनम्रता , नेतृत्व , सहकारिता , धैर्य , सहनशीलता आदि गुणों का विकास किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त छात्रों में उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य करने की भावना उत्पन्न की जा सकती है ।
  • इसके द्वारा छात्रों में स्वाध्याय की आदत का निर्माण किया जा सकता है ।
  • यह विधि वातावरण सम्बन्धी इकाइयों का प्रयोग करके छात्रों को वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता प्रदान करती है । 
  • यह बालकों में विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करती है । इसमें छात्रों की वैयक्तिकता की सन्तुष्टि की जा सकती है । 
  • यह विधि विविध प्रकार की क्रियाओं , अनुभवों व समस्याओं का आयोजन करके क्रियाशीलता के सिद्धांत पर बल देती है ।  
  • इसके द्वारा छात्रों में योजना बनाने का गुण उत्पन्न किया जा सकता है । 
  • यह कक्षा - कार्य को अधिक साभिप्राययुक्त , रोचक तथा सक्रिय बनाती है ।

इकाई विधि के दोष 

  • इकाई विधि अन्य विधियों की भांति , सभी प्रकार के ज्ञानोपार्जन के लिए उपयुक्त नहीं हैं । इसके द्वारा हम छात्रों को अनुभूति का पाठ नहीं दे सकते अर्थात् इसके द्वारा छात्रों में सौंदर्य - भावना का विकास नहीं किया जा सकता । इसके न तो शिक्षण पद ही निश्चित हैं और न उनके लिए समय की सीमा ही निर्धारित है । शिक्षक की जरा - सी असावधानी से छात्रों का बहुमूल्य समय बर्बाद हो सकता है । इन शिक्षण - पदों का सभी विषयों के शिक्षण में प्रयोग नहीं किया जा सकता है । 

रसास्वादन विधि 

अध्यापक का लक्ष्य कविता का अर्थ बतलाना न होकर कविता का आनन्द लेने में छात्रों को समर्थ बनाना है । यह उपसंहार विधि है अर्थात् कविता की सामान्य रूप से व्याख्या कर देने के पश्चात् उसकी रसानुभूति कराने के लिए है । कवि के अभिप्रेरित भावों तक छात्रों को ले जाना रसानुभूति में सहायक होता है । कविता के भावों को हृदयंगम करके कवि के साथ तादात्म्य स्थापित करना और भाव - विभोर होकर कविता का आनंद लेना इस विधि की सार्थकता है । इसका प्रयोग सभी स्तरों पर हो सकता है । जब छोटे - छोटे बच्चे प्रयाणगीतों का पाठ करते हुए अभिनय करते - करते तन्मय हो जाते है , उस समय रसानुभूति काव्यास्वादन की चरम सीमा होती है । 

भाषा शिक्षण के उपागम एवं दक्षता विकास 

यहाँ उपागम से अभिप्राय है , कि किसी कार्य को " एप्रोच " भाषा शिक्षन में प्रमुख एप्रोच या उपागम निम्न है 

हरबर्ट उपागम पंचपदी शिक्षण उपागम 

मॉरिसन उपागम इकाई शिक्षण उपागम 

ब्लूम का उपागम मूल्यांकन शिक्षण उपागम

पाठ - योजना की आवश्यकता एवं महत्त्व 

डेविस के अनुसार

शिक्षक के लिए कोई अन्य वस्तु इतनी घातक नहीं जितना कि पाठ की तैयारी कम होना । 

  • शिक्षण कार्य नियोजित ढंग से करना । 
  • शिक्षण विधियों का पूर्व निर्धारण । 
  • सहायक सामग्री का निर्धारण । 
  • समय का सदुपयोग । 
  • आत्मविश्वास की भावना का विकास । 
  • प्रभावी शिक्षण ।
  • शिक्षण कार्य का मूल्याकंना अनुशासन में सहायक ।

पाठ योजना के सिद्धांत 

  • शिक्षण छात्रों के मानसिक स्तर के अनुसार करना । 
  • व्यक्तिगत विभिन्नता का ध्यान । 
  • विषयवस्तु का उचित क्रम से आगे बढ़ाना सरल से कठिन । 
  • पाठ के सभी पक्ष शामिल 

योजना - किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक करते हुए निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है । योजना से कार्य की अनुमानित रूप - रेखा के बारे में मार्ग - दर्शन मिलता है । इससे कार्य में क्रमबद्धता आती है ।  यह निम्नांकित प्रकार की होती है -

वार्षिक योजना 

भाषा - शिक्षण कार्य के अंतर्गत अध्यापक द्वारा सत्र - पर्यन्त शिक्षण कार्य एवं अन्य करणीय कार्यों की जो समय - सारणी तैयार की जाती है वह वार्षिक योजना कहलाती है । 

वार्षिक योजना की आवश्यकता एवं महत्व 

  • उपलब्ध समय का पूर्वानुमान , उपसत्रों की संख्या निर्धारण ,
  • पाठ्यक्रम का खंडों में विभाजन , विषय वस्तु और उद्देश्यों में तारतम्य ,
  • शिक्षण विधि का निर्धारण , सहायक सामग्री का चयन , मूल्यांकन - योजना बनाना 

मासिक योजना

प्रत्येक महीने के शिक्षण कार्य की जो योजना होती है वह मासिक योजना कहलाती है । 

इकाई योजना

इकाई पाठ योजना संपूर्ण शिक्षण प्रक्रिया का स्पष्ट चित्रण है । पाठ्यक्रम का विषय समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु योजनाबद्ध कार्य करने की दृष्टि से कुछ इकाइयों में विभक्त कर लिया जाता है और फिर उन पाठों को एक इकाई मानकर विभिन्न पाठ्यांश बनाए जाते हैं । इस योजना को इकाई पाठ योजना कहते है । इन्हीं इकाइयों और उप - इकाइयों के आधार पर पाठ्यक्रम को वार्षिक मासिक , साप्ताहिक एवं दैनिक पाठ योजना का आधार बनाया जाता है ।

इकाई योजना की उपयोगिता 

  • विषयवस्तु को छोटी - छोटी सार्थक इकाइयों में वर्गीकृत । वार्षिक , मासिक , साप्ताहिक व दैनिक शिक्षण संभव ।
  • पाठ या प्रकरण को भागों में विभाजित । भाषा के स्वरूप के आधार पर विभाजित ।
  • शिक्षण विधियों , सहायक - सामग्री के चयन में सहायक । मूल्यांकन तकनीकों का पूर्व निर्धारण ।

दैनिक पाठ योजना 

एक इकाई को कक्षा में पढ़ाने के लिए कई दैनिक पाठों में विभक्त करना होता है , जो प्रत्येक कालांश के लिए दैनिक पाठ योजना कहलाती है ।

पद्य शिक्षण में पाठ योजना के सोपान 

  1. उद्देश्य एवं अपेक्षित परिवर्तन 
  2. पूर्वं ज्ञान 
  3. सहायक सामग्री 
  4. उत्प्रेरणात्मक उपक्रम या प्रस्तावना 
  5. उद्देश्य कथन या पाठ्यांशाभिसूचन , 
  6. प्रस्तुतीकरण 
  • ( क ) आदर्श वाचन ( तीन बार ) 
  • ( ख ) अनुकरण वाचन 
  • ( ग ) अशुद्धि संशोधन 
  • ( घ ) काठिन्य निवारण
  •  ( ड ) भाव - बोध - संबंधी प्रश्न पूछना
  •  ( च ) पुनः सस्वर वाचन 
  • ( छ ) भाव - विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछना
  •  ( ज ) सौन्दर्यानुभूति संबंधी प्रश्न पूछना

  7. मूल्यांकन 
  8. गृहकार्य

गद्य शिक्षण में पाठ - योजना के सोपान

  1. उद्देश्य एवं अपेक्षित परिवर्तन निर्धारित करना । 
  2. पूर्व ज्ञान प्राप्त करना । 
  3. सहायक सामग्री या उद्योतन सामग्री का उपयोग करना उत्प्रेरणात्मक उपक्रम या प्रस्तावना करना ।
  4. पाठ्यांशाभिसूचन या उद्देश्य कथन करना । 
  5. प्रस्तुतीकरण 
  • ( क ) आदर्श वाचन ( एक बार होता है ) 
  • ( ख ) अनुकरण वाचन 
  • ( ग ) वाचन में होनेवाली अशुद्धि का संशोधन  
  • ( घ ) बोध प्रश्न करना 
  • ( ड ) मौन वाचन करवाना 
  • ( च ) आत्मीकरण ( विभिन्न विधियों द्वारा ) ( जैसे - विलोम , पर्यायवाची , संधि , समास , उपसर्ग , प्रत्यय , वाक्य प्रयोग आदि दवारा अपरिचित भाषा - सामग्री को परिचित बनाना ) 
  • ( छ ) विचार - विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछना । मूल्यांकन हेतु प्रश्न पूछना । 
  6. गृहकार्य देना । 


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