काव्य गुण-दोष Kaavy Gun-Dosh

 काव्य गुण-दोष Kaavy Gun-Dosh


काव्य गुण-दोष Kaavy Gun-Dosh


काव्य गुण

काव्य के अंगों में रस , गुण , रीति , अलंकार आदि की गणना की जाती है । रस को काव्य की आत्मा माना गया हैं । रस के उत्कर्ष में सहायक तत्त्व या स्थायी धर्म को काव्य गुण कहा जाता है । ये काव्य के रस का उत्कर्ष बढ़ाते हैं । इनके प्रयोग से काव्य की सरसता में वृद्धि होती है तथा गुणों का अभाव काव्य में दोष उत्पन्न करता है । गुणहीन काव्य अधम कोटि का काव्य माना गया है । दोषों का अभाव , रस के आश्रित रहने वाले काव्य के स्थायी धर्म तथा रस के उत्कर्ष के कारणों को काव्य गुण कहते हैं । 

आचार्य वामन के अनुसार – “विशेष प्रकार की पद रचना को रीति कहते हैं । यह रीति गुणों पर आश्रित होती है ।“

 आचार्य विश्वनाथ पदों के संयोजन या संगठन को रीति कहते हैं । यह रसों का उपकार करने वाली होती है । 

भरत मुनि ने काव्य गुणों की संख्या दस मानते हैं - 

श्लेष , प्रसाद , समता , समाधि , माधुर्य , ओज , सौकुमार्य , अर्थ शक्ति , उदारता , कान्ति । 

आचार्य दण्डी भी इन्हीं दस गुणों को काव्य के गुण मानते हैं । 

आचार्य मम्मट ने काव्य प्रकाश में सभी गुणों को तीन गुणों में समाहित किया है – 

माधुर्य , ओज , प्रसाद


माधुर्य गुण

माधुर्य  का शाब्दिक अर्थ है- शहद जैसा मीठा । जिस काव्य रचना के पढ़ने या सुनने से पाठक या श्रोता का चित्त द्रवित हो उठता है वहाँ माधुर्य गुण होता है । अर्थात् अन्तः करण को आनंद , उल्लास , से द्रवित करने वाली कोमल मधुर वर्णों युक्त रचना में माधुर्य गुण होता है । शृंगार या करूण रस के प्रसंगों में सहृदय सामाजिक का मन द्रवीभूत हो उठता है । माधुर्य गुण ट वर्ग ( ट ठ ड ढ ण ) को छोड़कर क से भ तक के वर्णों से युक्त , आनुनासिक वर्णों की अधिकता , अल्प समास या समास का अभाव , कोमलकान्त पदावली युक्त , श्रुति मधुर शब्दों का प्रयोग होता है । 

भिखारी दास ने इसका लक्षण इस प्रकार बताया है –

अनुस्वार औ वर्गजुत , सवै बरन अटवर्ग

अच्छर जा में मृदु परै , सौ माधुर्य निसर्ग । 

उदाहरण 

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय । 

सौंह करे , भौंहनि हँसे , देन कहे नट जाय ।। 

हमारे हरि हारिल की लकरी 

मन वचक्रम नन्द नंदन सो , उरि यह दृढ़ करि पकरी । 

जागत सोवत अपने सौ सुख कान्ह कान्ह जकरी ।

ओज 

ओज शब्द का शाब्दिक अर्थ है - तेज , प्रकाश , दीप्ति । जिस काव्य रचना को सुनने या पढ़ने में चित्त का विस्तार हो और मन में तेज उत्पन्न हो , वहाँ ओज गुण अभिव्यंजित होता है । इससे चित्त में दीप्ति व आवेग उत्पन्न होते हैं । इसमें द्वित्व वर्णों , संयुक्त वर्णी रेफ , पुरूष वर्गों , लम्बे - लम्बे समासों का , मूर्धन्य ध्वनियों आदि का प्रयोग किया जाता है । युद्ध वर्णन , वीरों के स्वभाव , वेशभूषा प्रकृति के विराट दृश्यों के प्रकटीकरण के लिए ओज गुण का प्रयोग किया जाता है ।

 भरतमुनि समास युक्त पदों वाली , गम्भीर अर्थयुक्त श्रवण सुखद पदावलीको ओजगुण के उपयुक्त मानते हैं । दण्डी समास युक्त पदों की बहुलता से पूर्ण रचना को ओजगुण युक्त मानते हैं । आचार्य वामन संयुक्त अक्षरों व संश्लिष्ट पदों का प्रयोग आवश्यक मानते हैं । मम्मट वीर रस , वीभत्स रस , रौद्ररस में ओज गुण का प्रयोग होना स्वीकार करते हैं । 

 

उदाहरण 

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे॥

कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥


प्रसाद गुण

प्रसाद का शाब्दिक अर्थ होता है - प्रसन्नता । जिस रचना में सुबोधता , स्वच्छता हो अर्थात अर्थ सुनते ही समझ में आ जाए , ऐसी रचना प्रसाद गुण से युक्त मानी जाती हैं । प्रसाद गुण में सरल , सहज , भाव व्यंजक शब्दो का प्रयोग किया जाता है । अर्थ की सुबोधता या सुस्पष्टता इसकी विशेषता है । प्रसाद गुण सभी रसों में विद्यमान रहता हैं । 

आचार्य मम्मट के अनुसार “जिस प्रकार अग्नि सूखे इंधन में तत्काल व्याप्त हो जाती है , उसी प्रकार चित्त तुरन्त व्याप्त होने वाली रचना में प्रसाद गुण होता है ।“ 

आचार्य दण्डी के अनुसार “प्रसाद गुण वहाँ होता है जहाँ सुनते ही शब्द का अर्थ समझ में आ जाए ।“

भिखारीदास ने इसका लक्षण इस प्रकार लिखा है -

 मन रोचक अक्षर परें , सो है सिथिल शरीर । 

गुण प्रसाद जल सूक्ति ज्यों , प्रघटै अरथ गम्भीर ।। 

उदाहरण

जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरति देखि तिन तैसी । 

विनती सुन लो हे भगवान , हम सब बालक हैं नादान । 

विद्या बुद्धि नहीं कुछ पास , हमें बना लो अपना दास ।। 

यह ऐसा संसार है जैसा सैंवल फूल,

दिन दस के व्यौहार को , झूठे रंग न भूल ।


 

काव्य दोष 

काव्य में दोष उसे कहते हैं जो रस का अपकर्ष करते हैं । जहाँ भाव ग्रहण करने में कोई बाधा उत्पन्न हो जाय या गतिरोध आ जाये तो साहित्य शास्त्र की भाषा में उसे दोष कहा जाता है । अर्थात् - जो काव्य के आस्वादन में उद्वेग उत्पन्न करता है अथवा किसी वस्तु के द्वारा कविता के मुख्य अर्थ को समझने में बाधा पहुँचती है या उसकी सुन्दरता में कमी आती है तो उसे काव्य दोष कहा जाता है । काव्यास्वादन में वर्ग , शब्द , वाक्य गठन , अलंकार , रस , छन्द , आदि का समुचित प्रयोग नहीं होने पर बाधा उपस्थित होती है और रचना का सौन्दर्य एवं महत्व घट जाता है । 

काव्य दोष के प्रकार

शब्दगत दोष , अर्थगत दोष , रसगत दोष । 

शब्दगत दोष – 

शब्द में पाये जाने वाले दोष को शब्दगत दोष कहते हैं । शब्दगत दोष 16 प्रकार के होते हैं ।

उदाहरण

कवि के कठिनता कर्म की करते नहीं हम धृष्टता । 

पर क्या न विषमोत्कृष्टता करती विचारोत्कृष्टता ॥ 

पाहाँ पर ' विषमोत्कृष्टता ' और विचारोत्कृष्टता शब्द कर्णकटु है , अतः यहाँ पर ' श्रुतिकटुत्व ' नामक शब्द दोष है ।


अर्थगत दोष – 

जहाँ कविता में ऐसे अर्थ का दोष हो , जो वास्तविक अर्थ पोषक नहीं हो , तो वहाँ पर अर्थ - दोष माना जाता है । अर्थगत दोषों की संख्या 23 है । 

उदाहरण 

लीन्हो उरगारि पहार बिसाल चाल्यो तेहि काल विलंब न लायो । 

मारुत नन्दन मारुत को , मन को खगराज को वेग लजायो । 

सभी तीखी तुरा ' तिसी ' कहतो पै हिये उपमा को समाऊ न आयो । 

मानो प्रत्तच्छ परव्वत की नभ लीक लसी कपि यो धुकि बायो ॥ 

यहाँ द्वितीय पंक्ति में ' मन को ' शब्द सबसे पीछे होना चाहिए था , क्योंकि मन का वेग खगराज गरुड़ के वेग से अधिक माना जाता है । इसमें शब्दों का क्रम गलत होने से दुष्क्रमत्व दोष है । 


रसगत दोष – 

जहाँ मुख्यार्थ द्वारा व्यक्त होने वाले रस के परिपाक में अड़चन आती है , वहाँ रस का दोष माना जाता है । 

उदाहरण

मधु कहता है ब्रज वाले उन पड़पद्मों का करके ध्यान । 

जाओ जहाँ पुकार रहे हैं श्रीमधुसूदन मोद निधान ।। 

करो प्रेम मधुपान शीघ्र ही यथा समय कर यान विधान । 

यौवन के सरसाल योग में कालरोग है अति बलवान ।। 

यहाँ श्रृंगार रस के वर्णन में ' कालरोग ' का प्रयोग करना दोष है । 


प्रमुख दोष 

श्रुतिकटुत्व दोष 

कवि जहाँ कठोर वर्णों के प्रयोग करता है जो सुनने में अच्छे नही लगते अथवा कानों में खटकते हैं तो उसे श्रुतिकदुत्व दोष कहते हैं । 

उदाहरण

कवि के कठिनता कर्म की करते नहीं हम धृष्टता । 

पर क्या न विषमोत्कृष्टता करती विचारोत्कृष्टता ॥ 

घट्ट - घट्ट घटित घनौही दुःख अट्ट अट्ट

चट्ट चट्ट चटकत सुहागन की बलियाँ 

पट्ट पट्ट आँसुओं गिरत भूमि झट्ट झट्ट

रट्ट रट्ट नाम हूं पछार खहि अलिऔं ।।


च्युत संस्कृति दोष 

जब कोई शब्द व्याकरण के नियमों के विरूद्ध प्रयुक्त होता है तब भाषा के संस्कार के गिर जाने ( च्युत होने ) के कारण वहाँ च्युत संस्कृति दोष होता है । 

उदाहरण

तत्व वचन सीता जब बोला

हरि प्रेरित लक्षिमन मन डोला 

बोला के स्थान पर बोली होना चाहिये ।

 

ग्राम्यत्व दोष 

जब कवि अपनी भाषा में गंवारू या बोलचाल की भाषा के शब्दों का प्रयोग करता है तो उसमे प्रान्तीय या देशज शब्द आ जाने से ग्राम्यत्व दोष होता है ।

उदाहरण

ऐरे ब्रजनन्द तेरे मुख की चकोर हूँ मैं

ऐरे घनश्याम तेरे रूप की हूँ चातकी । 

ऐरे शब्द ग्रामीण बोल-चाल का शब्द है ।


अश्लीलत्व दोष 

जब कवि घृणास्पद , लज्जास्पद , या अमंगल सूचक शब्दों का प्रयोग कर देता है , जिससे काव्य में फूहड़पन और भद्दापन आ जाता है , वहाँ अश्लीलत्व दोष होता है ।

उदाहरण

लगे थूक कर चाटने अभी अभी श्रीमान् । 

थूककर चाटना , अभद्र प्रतीत होता है । 

अभिप्रेत पद प्रिया ने पाया

प्रेत पद पाया का अर्थ शब्दों से मर गया भी ध्वनित होता है । जो अमंगल सूचक है । 


क्लिष्टत्व दोष 

जहाँ किसी शब्द का अर्थ तुरन्त समझने में कठिनाई हो वहाँ क्लिष्टत्व दोष होता है । 

उदाहरण

कहत कत परदेसी की बात

मंदिर अरध अवधि हरि बदि गये , 

हरि - आहार चलि जात ।

वेद , नखत , ग्रह जोरि अरथ क्ररि , 

को बरजे हम खात । 

सूरदास के इस कूट पद में गोपियां श्री कृष्ण के विरह से व्याकुल है । 

मंदिर अरध = घर का अर्द्ध भाग अर्थात् पिछवाड़ा 

हरि आहार = सिंह का भोजन = मांस / महीना 

नखत = 27, वेद = 4 , ग्रह = 9 

 27 + 4 + 9 जोड़ने पर चालीस हुए ( 40 ) 

जिनके आधे = 20 ( विष ) 

अर्थात् गोपियां विष खाने पर मजबूर हो जाती है । इस तरह अर्थ समझने में बौद्धिक व्यायाम करना पड़ता हैं ।

न्यून पदत्व दोष – 

न्यून पदत्व दोष जहाँ वाक्य रचना में किसी शब्द की कमी रह जाती है वहाँ न्यून पदत्व दोष होता है ।

उदाहरण

पानी पावक पवन प्रभु ज्यों असाधु त्यों साधु

यहाँ जल , अग्नि , वायु और राजा जैसे बुरे के साथ वैसे ही भले के साथ व्यवहार करते हैं । यहाँ असाधु एवं साधु के आगे प्रति या साथ जैसा कोई अर्थ वाचक शब्द समझने के लिए अपेक्षित है , पर है नहीं । अतः यह न्यून पदत्व दोष है । 

अधिक पदत्व दोष 

जब वाक्य में आवश्यकता से अधिक शब्द या शब्दों का निरर्थक प्रयोग किया जाय तब अधिक पदत्व दोष होता है ।

उदाहरण

दास बनने का बहाना किस लिये , क्या मुझे दासी कहाना इसलिये

देव होकर तुम सदा मेरे रहो , और देवी ही मुझे रक्खो अहो

अंतिम चरण में अहो शब्द निरर्थक है । अतः अधिक पदत्व दोष है ।


अक्रमत्व दोष

जब वाक्य में शब्द का क्रम वाक्य रचना की दृष्टि से दूषित या अनुचित हों , तब अक्रमत्व दोष होता है ।

उदाहरण

थे मानवता से भाई दोनों हीन हुए । 

थे का स्थान हुए के पश्चात् और दोनों का प्रयोग भाई से पूर्व होना चाहिए । तभी अर्थ सहजता से स्पष्ट हो सकता है ।


दुष्क्रमत्व दोष 

जब क्रम शास्त्र अथवा लोक की दृष्टि से दूषित या अनुचित हो वहाँ दुष्क्रमत्व दोष होता है । 

उदाहरण

राजन देहु तरंग मोहि अथवा देह मतंग । 

यहाँ मतंग तुरंग की अपेक्षा अधिक मूल्यवान होता है । अतः पहले मांग मतंग की होनी चाहिए जो तुरंग नहीं देगा वह मतंग क्या देगा । अतः यहाँ दुष्क्रमत्व दोष है ।

पुनरूक्त दोष 

जब अर्थ की पुनरूक्ति हो अर्थात् जब वही बात दूसरे शब्दों द्वारा फिर कही जाए तब पुनरूक्ति दोष होता है । 

उदाहरण

कोमल वचन सभी को भाते , अच्छे लगते मधुर वचन । 

यहाँ अच्छे लगते सभी को भाते का ही अर्थ बताता है तथा कोमल वचन व मधुर वचन भी वही अर्थ दर्शाते हैं । अतः अच्छे लगते मधुर वचन में पुनरूक्त दोष  है । 

विशेष

कई बार शब्द की पुनरूक्ति काव्य की शोभा बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं । इसमें पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार का कारण भी बन जाता है । 

हतवृत दोष या छन्दोभंग दोष 

जब छंद के नियमों , अनुशासनका पालन नहीं किया जाय तब हतवृत या छन्दोभंग दोष होता हैं । छंद की नियत मात्राओं , वर्गों की संख्या या गणों की व्यवस्था नियम के अनुसार न हो यति भंग होता हो गति भंग होता हो रस के अनुकुल छंद का प्रयोग न होता हो ।

उदाहरण 

राम लच्छन चले वनवास = 15 मात्राएँ हैं यह चौपाई छंद का = 16 मात्राएँ का चरण है । 

इस चरण में मात्राएँ तो ठीक है परन्तु गति उपयुक्त नहीं होने से गति भंग दोष से छन्दोभंग दोष हुआ ।


शब्द – शक्ति <> मुहावरे <> लोकोक्ति <> छन्द <> मात्रिक छन्द <> वर्णिक छंद <> अलंकार  <> शब्दालंकार <> अर्थालंकार

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