सैमुअल टेलर कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत

 सैमुअल टेलर कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत
Samuel Taylor Coleridge's Imagination Theory

सैमुअल टेलर कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत

जीवन परिचय

सैम्युअल टेलर कॉलरिज का जन्म 21 अक्टूबर 1772 को इंग्लैंड के देवोन (Devon) के ऑटरी सेन्ट मैरी (Ottery St Mary) में हुआ था। उसके पिता चर्च के वाइकर (vicar) तथा किंग्स स्कूल के हेडमास्टर थे। तथा इनकी मृत्यु 25 जुलाई 1834 को हुई । ये एक अंग्रेज़ कवि, दार्शनिक व रोमांस लेखक थे जिन्होंने अपने मित्र विलियम वर्ड्सवर्थ के साथ मिलकर इंग्लैण्ड में रोमांस आन्दोलन की शुरुआत की और 'लेक पोएट्स' की स्थापना की थी। ये अपनी कविताओं द राइम ऑफ़ द एन्शियंट मेरिनर और कुबला खान के लिए जाने जाते है। कॉलेरिज अंग्रेजी कविता की स्वच्छंदतावादी धारा के प्रमुख कवियों में से थे। आलोचना के क्षेत्र में कॉलेरिज का एक महत्वपूर्ण योगदान उनके द्वारा कल्पना शक्ति का विवेचन है। कल्पना को दर्शन तथा काव्य के साथ पहले से जोड़ा जाता रहा है, परन्तु कॉलरिज ने इसका विस्तार से विवेचन किया। इनका ‘कल्पना सिद्धान्त' प्रसिद्ध है।

कॉलरिज के अनुसार - "कविता रचना का वह प्रकार है जो वैज्ञानिक कृतियों से इस अर्थ में भिन्न है कि उसका तात्कालिक प्रयोजन आनन्द है, सत्य नहीं।"

प्रमुख रचनाएं कृतियाँ

  • बायोग्राफिआ लिटरेरिया (Biographia Literaria) – इसी में कल्पना सिद्धान्त का विवेचन है।
  • एड्स टू रिफ्लेक्शन ( Aids to Reflection)
  • द फ्रेंड (The Friend (1969))
  • लिरिकल बैलेड्स ( Lyrical Ballads)
  • चर्च एंड स्टेट ( Church and State)
  • कन्फेशन्स ऑफ एन इन्क्वायरिंग स्पिरिट ( Confessions of an Inquiring Spirit)
  • द राइम ऑफ़ द एन्शियंट मेरिनर (The Rime of Ancient Mariner)
  • कुबला खान ( Kubla Khan)

कल्पना – सिद्धान्त

स्वच्छन्दतावादी कवि , दार्शनिक एवं आलोचक तथा सहजात प्रतिभा के धनी सेमुअल टेलर कॉलरिज का पाश्चात्य काव्यशास्त्र में मूर्धन्य स्थान है । ये अंग्रेजी के श्रेष्ठ आलोचक है और इनका स्थान अरस्तू तथा लोजाइनस के समकक्ष है । कॉलरिज की कृति ' बायोग्राफिया लिटरेरिया ' को अंग्रेजी समीक्षा का श्रेष्ठ ग्रन्थ माना जाता है । रिचर्ड्स तथा हर्बर्ट रीड जैसे विद्वान भी समीक्षा क्षेत्र में कॉलरिज के महत्वपूर्ण स्थान के विषय में एकमत हैं । आलोचना के सम्बन्ध में कॉलरिज ने स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण का परिचय दिया है और कहा है कि आलोचना का उद्देश्य लेखक के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना अधिक है और उसकी कृतियों पर निर्णय देने के लिए नियम बनाना कम । उनके शब्दों में ( उनका प्रयत्न ) - " To establish the principles of writing rather than to furnish rules how to pass judgement on what has been written by others . " 

कॉलरिज सभी सृजनात्मक कार्यों का श्रेय कल्पना को देते है । कल्पना सम्बन्धी उनकी धारणा बड़ी व्यापक और दर्शन प्रधान है । कल्पना की व्याख्या करते हुए कॉलरिज ने लिखा है कि स्पष्ट रूप से संसार में दो शक्तियाँ कार्य करती हैं जो एक दूसरे के सम्बन्ध में क्रियाशील और निष्क्रिय होती हैं और कार्य , बिना एक मध्यस्थ शक्ति के सम्भव नहीं है जो एक साथ सक्रिय भी है और निष्क्रिय भी । दर्शन भाषा में इस मध्यस्थ शक्ति को कल्पना की संज्ञा दी गई है । वस्तुतः कल्पना वह शक्ति है जो बहिर्जगत और अन्तर्जगत का सफल संयोजन करती है और प्रतिबोधन एवं अवबोधन के अन्तर को मिटाती है जिसे बुद्धि के सहारे नहीं मिटाया जा सकता । कल्पना पदार्थों और वस्तुओं में चेतना का संचार करती है और उन्हें जीवन्त रूप में हमारे सम्मुख पेश करती है । कॉलरिज ने कल्पना के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए इसे दो वर्गों में बाँटा है - प्राथमिक कल्पना और विशिष्ट कल्पना । 

प्राथमिक कल्पना

प्राथमिक कल्पना सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान का मूल हेतु होने के कारण वस्तुओं का प्राथमिक ज्ञान कराती है । इन्द्रियों के माध्यम से मनुष्य को जो कुछ बोध होता है उसे यही शक्ति व्यवस्थित रूप प्रदान करती है । जैसे- मनुष्य ने अपनी आँखों की सहायता से किसी वस्तु के आकार अथवा रूप का बोध प्राप्त किया , हाथ से स्पर्श करके उसकी कठोरता अथवा कोमलता का अनुभव किया , नाक से सूंघकर उसकी गंध प्राप्त की , चेतन हैं तो कान से उसके स्वर का मान किया । इन विभिन्न बोधों को व्यवस्था देकर उस वस्तु का समग्र ज्ञान कल्पना ही कराती है । इन्द्रियबोध को व्यवस्था देकर वस्तु का ज्ञान प्राप्त कराने वाली इस शक्ति को कॉलरिज ने प्राथमिक कल्पना की संज्ञा प्रदान की है । कॉलरिज के शब्दों में - ' The Primary Imagination presents to the mind its own world as external to itself . " " इस प्रकार प्राथमिक कल्पना मनुष्यों को ज्ञान प्राप्त कराती है और अव्यय स्थित इन्दिय बोधों को व्यवस्थित रूप प्रदान करती है ।

विशिष्ट कल्पना या अनुषंगी कल्पना

‘विशिष्ट कल्पना’ प्राथमिक कल्पना का सजग मानवीय प्रयोग है । इसमें इच्छा की सजगता से कार्य होता है । अतः कहा जाता है कि विशिष्ट कल्पना प्राथमिक कल्पना का ही विकसित रूप है जिसका प्रयोग सर्जक स्वेच्छा से करता है । दोनों कल्पनाओं में कोई मौलिक भेद नहीं है । मात्र रूप का भेद है , स्तर का अन्तर है । विशिष्ट कल्पना एक संयुक्त आत्मिक ऊर्जा है , जिसमें मनःशक्ति अथवा आत्मशवित के अन्य सभी पहलू - प्रत्यक्ष ज्ञान शक्ति , विचार शक्ति , संकल्प शक्ति , मनोवेग आदि सभी समाहित हो जाते हैं । विशिष्ट कल्पना का कार्य दृश्यमान प्रकृति को अपनी अन्तरात्मा के अनुरूप ढालना है । इस प्रकार विशिष्ट कल्पना ' नव आकार देने वाली और रूपान्तरित करने वाली शक्ति है ।

कल्पना और फैन्सी

कॉलरिज से पूर्व कल्पना और फैन्सी ( ललित कल्पना ) में कोई भेद नहीं माना जाता था । इन शब्दों को प्रायः पर्यायवाची माना जाता था । अन्तर केवल इतना था कि कल्पना शब्द का उद्गम लैटिन भाषा से था और फैन्सी शब्द का ग्रीक भाषा से । कॉलरिज ने इस पर्यायवाची प्रकृति का विरोध किया । कॉलरिज के अनुसार ललित कल्पना ( फैन्सी ) मात्र संकलन और संयोजन करने वाली शक्ति है । इनमें मनमानापन , यांत्रिकता निर्जीवता होती है । कल्पना रचनात्मक एकत्रीकरण प्रतिमा तथा सौन्दर्यात्पादक शक्ति है । फैन्सी का सम्बन्ध केवल मस्तिष्क से होता है जबकि कल्पना का सम्बन्ध आत्मा व मन से होता है । इस प्रकार ' फैन्सी ' वस्तुतः स्मृति का एक ढंग है जिसमें समय और स्थान का कोई क्रम नहीं है । कल्पना प्रतिमा से सम्बन्धित है जो नैसर्गिक होती है और फैन्सी ( ललित कल्पना ) निपुणता से सम्बन्धित है जो अर्जित की जा सकती है । कॉलरिज का फैन्सी विषयक यही दृष्टिकोण हैं ।

कल्पना और काव्य 

कल्पना कवि का अनिवार्य गुण है । विशिष्ट कल्पना के क्षणों में वह काव्य की ऊँचाई पर , अपने आदर्श के निकटतम पहुँच जाता है । कल्पना का प्रयोग कवि अपने उत्कर्ष के क्षणों में ही कर पाता है जबकि आत्मा की देवी शक्ति अपनी पराकाष्ठा पर होती है । कॉलरिज के अनुसार कल्पना एक समन्वयकारी शक्ति है जो वस्तुओं के विभिन्न पक्षों के एक संश्लिष्ट अन्विति के रूप में ढालती है । इसमें काव्य में पुनः सृजन होता है । विभिन्न भावों के एकीकरण की प्रक्रिया में विसवादी गुणों का सामंजस्य एवं संतुलन भी कल्पना ही करती है । वे विसवादी गुण है –

  • अत्यधिक क्रम के साथ अत्यधिक भावना ।
  • पुरातन एवं परिचित वस्तुओं में नवीनता और ताजगी की भावना ।
  • प्रकृति को चिन्तन एवं चिन्तन को प्रकृति बनाना तथा बाह्य को आन्तरिक एवं आन्तरिक को बाह्य बनाना । 
  • प्रमुख पाश्चात्य चिन्तक और उनके सिद्धान्त 
  • साम्य के साथ अन्तर । 
  • यथार्थ वस्तु में कल्पना के मेल के साथ सत्य । 
  • निरन्तर को क्षण में बदलना ।

उपर्युक्त विसवादी गुणों की परिधि में सभी प्रकार की विरोधी बातें आ जाती हैं जिनकी कल्पना समंजन करती है । 

काव्य सम्बन्धी विचार 

कॉलरिज के अनुसार काव्य , रचना का वह प्रकार है जो विज्ञान की कृतियों से इसलिए भिन्न होता है कि उसका तत्काल लक्ष्य सत्य है जो विज्ञान की कृतियों से इसलिए भिन्न होता है कि उसका आनन्द सम्पूर्ण कृति से उत्पन्न होता है तथा वह आनन्द कृति के प्रत्येक अवयव के द्वारा प्राप्त संतुष्टि के मेल में होता है । ( बायोग्राफिया लिटरेरिया ) इस प्रकार काव्य का तात्कालिक लक्ष्य आनन्द प्रदान करना है । काव्य का आनन्द सम्पूर्ण कृति से मिलता है । काव्य का मुख्य लक्ष्य आनन्द है और लक्ष्य गौण है । कॉलरिज ने काव्य और कविता को भिन्न कार्यों में प्रयुक्त किया है । उनके अनुसार काव्य शब्द अति व्यापक है और उसके अन्दर सभी कलाओं तथा मानव - कृतियों का समाहार हो जाता है । कॉलरिज ने अच्छी कविता की विशेषताओं की ओर भी संकेत किया है । समंजित रूप में ये विशेषताएँ इस प्रकार है

अच्छी कविता सौन्दर्य के माध्यम से तात्कालिक आनन्दोद्रेक के लिए भावों को उद्वेलित करता है । अच्छी कविता मनुष्य की सम्पूर्ण आत्मा को सक्रिय और गतिमान बनाती है । अच्छी कविता में बुद्धि और उदय का समन्वय होता है । अच्छी कविता में परिश्रम साध्य विचारावली , अभ्यास सम्भव काव्य शैली और भाव की अन्तर्धारा का प्रवाह होना आवश्यक है । अच्छी कविता सम्पूर्णता , निरन्तरता एवं नागिक ऐक्य के द्वारा सौन्दर्य का उत्पादन करती है ।

काव्यशास्त्र और साहित्यालोचन कलाविषयक दृष्टिकोण 

कॉलरिज के अनुसार कला बाहा प्रकृति की मात्र अभिव्यक्ति ही नहीं हैं , वरन् कलागत अभिव्यक्ति प्रकृति की पवित्रता की अभिव्यक्ति है , एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिसका कि सम्बन्ध मानव - प्रकृति अथवा आत्मा से होता है । उनका मत है- The very spirit of nature , which presupposes a bond between nature in the higher sense and the soul of man . " ( Biographia Literaria ) अर्थात् ( कला ) प्रकृति । पवित्रात्मा की अभिव्यक्ति है जिसमें प्रकृति और मानवात्मा में एक बन्धन की अपेक्षा की जाती है ।

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