टी.एस. एलियट - परंपरा एवं निर्वैयक्तिकता सिद्धान्त

 टी.एस. एलियट - परंपरा एवं निर्वैयक्तिकता सिद्धान्त
TS  Eliot - Tradition and Impersonality Theory

टी.एस. एलियट

जीवन परिचय

टी.एस. एलियट (Thomas Stearns Eliot) का जन्म 26 सितंबर 1888, सेंट लुइस, मिसूरी, संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ । एलियट ने आरम्भिक शिक्षा के बाद 1911 से 1914 तक हार्वर्ड में संस्कृत और पालि भाषा का अध्ययन किया। 26 वर्ष की आयु में अमरीका छोड़कर इंग्लैंड में बस गए और 1927 में ब्रिटिश नागरिक बन गए । टी.एस. इलियट कवि और आलोचक दोनों ही रूपों में आधुनिक अंग्रेजी साहित्य में विख्यात हैं । इनके काव्य और चिन्तन में एकरूपता मिलती है । अपने आलोचनात्मक निबन्धों में इन्होंने जिन काव्यगत विशेषताओं और सिद्धान्तों का उल्लेख किया है । उन्हीं को इन्होंने अपने काव्य में व्यावहारिक रूप प्रदान किया है । इसी प्रकार इनके इतिहास और संस्कृति सम्बन्धी विचार इनकी कविता और आलोचना से ध्वनित हुए हैं । इलियट ने साहित्य में चले आ रहे स्वच्छन्दतावाद के दीर्घकालीन आधिपत्य को अस्वीकार करते हुए क्लासिकल मत का प्रतिपादन किया तथा कला के मूर्तरूप को विशेष महत्त्व देते हुए कला को कलाकार का आत्म - प्रकाशन मात्र मानने वाले सभी सिद्धान्तों की विस्तृत आलोचना की । 1948 में इन्हें नोबेल-पुरस्कार (साहित्य) से सम्मानित किया गया । इनकी मृत्यु 4 जनवरी 1965, केंसिंग्टन, लंदन, यूनाइटेड किंगडम में हुई ।

कृतियां

काव्यसंग्रह

  • 'प्रफ्रूॉक ऐंड अदर आब्जॅरवेशंस' 1917 
  • 'द वेस्टलैंड' (1922)
  • 'ऐश वेन्सडे' (1930) 
  • 'फ़ोर क्वार्टेट्स' (1944)

आलोचना

  • 'द सैक्रेड वुड'(1920)
  • 'द यूस ऑव पोएट्री ऐंड द यूस ऑव क्रिटिसिज्म' (1933)
  • 'आन पोएट्री ऐंड पोएट्स' (1957)

नाटक

  • 'मर्डर इन द कैथीड्रल' (1935)
  • 'फैमिली रियूनियन' (1939)
  • 'द काकटेल पार्टी' (1950)
  • 'द कान्फ़िडेंशल क्लाक' (1955) 
  • 'द एल्डर स्टेट्समैन' (1958)

ये सभी पद्य में लिखे गए हैं एवं रंगमचं पर लोकप्रिय हुए हैं। 'मर्डर इन द कैथीड्रल' पर फ़िल्म भी बन चुकी है।

परंपरा एवं निर्वैयक्तिकता सिद्धान्त

क्लासिक

इलियट ने स्वयं घोषित किया है कि उनका साहित्यिक दृष्टिकोण मूलतः क्लासिकल या आभिजात्यवादी है । अभिजात का अभिप्राय है प्रौढ़ता या परिपक्वता । अभिजात कृति का अर्थ हुआ प्रौढ या श्रेष्ठ कृति । इलियट का कथन है कि ' क्लासिक ' की सृष्टि तभी सम्भव है जब सभ्यता परिपक्व हो , भाषा और साहित्य प्रौढ़ हो और प्रौढ मस्तिष्क की रचना हो । इस दृष्टि से साहित्य की प्रौढ़ता का अभिप्राय है तत्कालीन समाज का प्रतिबिम्ब , जिसमें साहित्य का सृजन हुआ है । इलियट ने अभिजात साहित्य की रचना के लिए तीन गुणों की आवश्यकता पर बल दिया है 

  • मस्तिष्क की प्रौढ़ता
  • शील की प्रौढ़ता
  • भाषा की प्रौढ़ता

इन तीनों के समन्वित रूप को ही वे ' साहित्यिक प्रौढ़ता ' कहते हैं । तथा तीनों की समन्वित शक्ति अभिजात्य साहित्य की सृष्टि करती है । इलियट के अनुसार प्रौढ मस्तिष्क की प्राप्ति के लिए कवि को सभ्य जातियों के सांस्कृतिक विकास और सभ्यता के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए अर्थात् उसे अतीत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होना चाहिए । शील की प्रौढ़ता से तात्पर्य चरित्र निर्माण से है । इनके अनुसार ' When the great poet is also great classic poet , he exhausts not a form , but the language or his time . " महाकवि एक विद्या का चरम विकास करता है । जबकि अभिजात कवि न केवल विद्या का , वरन अपने काल की भाषा का भी चरम विकास कर उसकी सम्भावना का अन्त कर देता है । 

परम्परा का सिद्धान्त 

इलियट ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा ' में स्पष्ट किया है कि काव्य - रचना में परम्परा का प्रमुख स्थान है और कवि की प्रतिभा केवल मध्यस्थ रूप में उसी को काव्य में प्रतिफलित होने से सहायता करती है । इन्होंने कलाकार के लिए जातीय परम्परा और ऐतिहासिक बोध की आवश्यकता पर भी बल दिया है । परम्परा को परिभाषित करते हुए इलियट ने कहा है- " Tradition is tot solely , or even primarily the maintenance of certain domatic beliefs , these beliefs have come to take their living from in the course of the formation of a tradition What I mean by tradition involves all these habitual actions , habits and customs , from the most significant religious rites to our conventional way of greeting a stranger which represent the blood bloship of the same people living in the same place . " 

अर्थात् परम्परा पूर्णतः या प्रधानतः भी कुछ मतांध - विश्वासों का परीक्षण नहीं है । ये विश्वास परम्परा के निर्माण क्रम में रूप ग्रहण करते हैं । परम्परा से वे सभी क्रियाएँ , प्रथाएँ , आचार अभिप्रेत है , जिनमें महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्यों से लेकर किसी अपरिचित के अभिप्रेत है , जिनमें महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्यों से लेकर किसी के अभिवादन की औपचारिक रीति तक सम्मिलित है और जो एक ही स्थान में रहने वाले समुदाय के लोगों के रक्त - सम्बन्ध को व्यक्त करते हैं । इस प्रकार परम्परा का यहाँ व्यापक अर्थ में प्रयोग किया गया है । इलियट की दृष्टि में परम्परा संस्कति का वह अंश है जो अतीत के दाय के रूप में प्राप्त होकर वर्तमान का निर्माण करती है और भविष्य परस्पर सम्बद्ध है । जहाँ तक वैयक्तिक प्रज्ञा का सम्बन्ध है , वह परम्परा से निरपेक्ष नहीं है । परम्परा से जुड़कर ही कवि अपनी वैयक्तिक क्षमता को अधिक सरलता से अर्जित कर सकता है । 

तुलसी के सामने राम काव्य की दीर्घ श्रृंखला थी , जिससे उन्होंने बहुत कुछ लिया किन्तु इससे उनके काव्योत्कर्ष पर कोई आँच नहीं आई । प्रसाद जी कामायनी में प्रागैतिहासिक युग से लेकर आधुनिक युग तक की भारतीय मनीषा का उत्तमांश प्रतिफलित है , किन्तु फिर भी वह आधुनिक श्रेष्ठ काव्य है । अतः वैयक्तिक प्रज्ञा के प्रस्फुटन में परम्परा श्रेष्ठ है । इलियट के अनुसार कवि के लिए अतीत की चेतना को विकसित या उपलब्ध करना आवश्यक है । इतना ही नहीं उसे इस चेतना को आजीवन विकसित करते रहना है । 

कला की निर्वैयक्तिकता

इलियट ने आत्मनिष्ठ वैयक्तिक साहित्य के स्थान से वस्तुनिष्ठ अथवा निर्वैयक्तिक साहित्य की प्रतिष्ठा की और कला की सार्वभौमिकता का प्रतिपादन किया । इनके अनुसार कवि के लिए अतीत की चेतना को विकसित करना आवश्यक है । उसे इस चेतना को आजीवन विकसित करते रहना है । कलाकार की प्रगति सतत आत्मोत्सर्ग है । जो उसके व्यक्तित्व का सतत पलायन या तिरोधान है । The progress of an artist is a continial self - sacrifice , a continual extinction of personality निर्वैयक्तिकता की स्थिति में कला विज्ञान के निकट पहुंच जाती है ।

कवि और कविता का सम्बन्ध इलियट ने कवि व्यक्तित्व को एक ऐसे माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया है जिसमें विशिष्ट या विधि संवेदन स्वच्छन्दतापूर्वक नए रूप में संयोजित हो सकते हैं । इसके लिए उन्होंने एक उत्प्रेरक का दृष्टान्त दिया है । जैसे आक्सीजन और सल्फर डाई ऑक्साइड के कक्ष में यदि प्लेटिनम का सूक्ष्म तार रखा जाए तो उससे सल्फ्यूरिक एसिड बन जाता हैं । यह परिवर्तन प्लेटिनम के रहने पर ही होता है । किन्तु नवीन सल्फ्यूरिक एसिड में न तो प्लेटिनम का चिह्न दिखाई देता है और न प्लेटिनम पर पूर्वोक्त दोनों पदार्थों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । बल्कि प्लेटिनम ज्यों का त्यों निष्क्रिय तटस्थ और अपरिवर्तित रहता है । कवि का मस्तिष्क प्लेटिनम के तार के समान है । उसके सम्पर्क से विभिन्न अनुभूतियों संवेदन या भाव नये - नये रूप धारण किया करते हैं । किन्तु वह स्वयं उनसे अप्रभावित रहता है । कलाकार जितना कुशल होता है उसके भोक्ता व्यक्ति तथा सृष्टा मन का अन्तर उतना ही स्पष्ट होता है । The more perfect the artist , the more completely separate in him will be the man who suffers and the mind which creates . 

अर्थात् कवि के स्वानुभूत संवेदनों और भावों से काव्य में अभिव्यक्त संवेदन और भाव सर्वथा भिन्न होते हैं । इसके विपरीत , अप्रौढ कवि अपने ही भावों को वाणी देने का प्रयास करता है , जिससे उसका काव्य घटिया हो जाता है ।

वस्तुनिष्ठ समीकरण या मूर्त – विधान

कवि की भाव सम्पदा को भावक के मन में यथावत कैसे उतारा जाए अथवा आमूर्त भाव को भावक तक कैसे पहुँचाया जाए ? इस प्रश्न का समाधान करने के लिए इलियट ने मूर्त विधान या वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धान्त प्रस्तुत किया । अमूर्त का सम्प्रेषण नहीं हो सकता । ऐसी स्थिति में किसी मूर्त वस्तु की सहायता से अमूर्त को संप्रेषित किया जाए । इस दृष्टि से कला के रूप में भाव को अभिव्यक्त करने का माध्यम है- वस्तु समुदाय , परिस्थिति , घटना - पंखला का प्रस्तुतीकरण । इससे लेखक और पाठक के मध्य सम्पर्क स्थापित होता है । लेखक जो कुछ कहना चाहता है वह विषय वस्तु का रूप धारण कर लेता है । विषय - वस्तु के इसी आकार और स्वरूप के साथ समीक्षा का सम्बन्ध रहता है । इलियट ने लिखा है- " The only way of expressing emotion in the form of art is by finding an objective correlative in other words , a set objects , a situntion , a chain of events which shall be the formula or that particular emotion , such that when the external facts ...... are given the emotion is immediately evoked . " " संवेगी और भावों को कला में अभिव्यक्त करने का एकमात्र ढंग है- वस्तुनिष्ठ समीकरण की प्राप्ति । दूसरे शब्दों में , वस्तुओं , स्थितियों और घटनाओं की श्रृंखला को इस ढंग से संयोजित करना कि वे विशिष्ट संवेगों से सम्बद्ध होकर अभिव्यक्त हो सकें । " 

समीक्षा का उद्देश्य

इलियट ने कई प्रकार के आलोचना के उद्देश्यों का निरूपण किया है । उसके अनुसार “ लिखित शब्दों द्वारा किसी कलाकृति की व्याख्या और उसका प्रतिपादन समीक्षा है । इसी प्रकार समीक्षा का मूल तत्त्व है- अच्छी कविता के चयन की ओर बुरी कविता के त्याग की क्षमता । " The rndiment of criticism is the ability to select a good poem and reject a bad poem . " आलोचना के उद्देश्यों पर इलियट का अभिमत है कि आलोचना की दृष्टि सदा उद्देश्य पर रहनी चाहिए । स्थूल रूप से उसके दो उद्देश्य है- 

  • कलाकृतियों का विशदन 
  • रुचि का परिष्कार । 

इसके अतिरिक्त साहित्य का बोध और आस्वाद भी उसके उद्देश्य है । निष्कर्षतः इलियट की दृष्टि में आलोचना के निम्नलिखित कार्य हैं

  • काव्य के स्वरूप का अनुसंधान ।
  • साहित्य और जीवन्त - परम्परा का रक्षण ।
  • अच्छे बुरे काव्य का भेद निरूपण ।
  • रचनाओं का विशदन ।
  • रुचि का परिष्कार ।
  • साहित्य के बोध और आस्वाद का संवर्धन ।

इलियट की समीक्षा पद्धति

इलियट के प्रभाव के कारण पश्चिम की नई समीक्षा में नई प्रवतियों का आविर्भाव हुआ है । इलियट अभिजात - वर्ग में पैदा हुआ था , धर्म और दर्शन का भी उसने गम्भीर अध्ययन किया था । इसका यह परिणाम हुआ कि संवेदनात्मक स्थितियों की अभिव्यक्ति के लिए उसने प्राचीन काव्य - भंगिमाओं का सहारा लिया । परम्परा का प्रगति के साथ मेल बैठाने का उसने प्रयत्न किया । अपनी रचनाओं में उसने आधुनिक जगत् को निःसहाय , विश्वासहीन और संस्कृतिविहीन चित्रित किया है । इससे छुटकारा पाने के लिए उसने धर्म का सहारा लिया है । साहित्यिक समीक्षा का आधार उसने एक निश्चित नैतिक और धर्म - विज्ञान सम्बन्धी दृष्टिकोण माना है । इलियट ने रोमांसवादी और व्यक्तिवादी प्रवतियों के विरोध में क्लासिसिज्म को अपनाकर उसे एक नया सन्दर्भ देने का प्रयत्न किया । उसने काव्य - सर्जन को आत्माभिव्यक्ति न मानकर मनोभावों का पुनः सृजन कहा है तथा कविता में व्यक्ति की अभिव्यंजना न मानकर व्यक्तित्व का तिरोधान स्वीकार किया है । इस प्रकार नाटक को निर्वैयक्तिकता का सर्वश्रेष्ठ रूप स्वीकार किया  है । यहाँ कला - वस्तु पर अधिक जोर देने के कारण मनोभावों ( इमोशन्स ) का महत्त्व कम हो गया है । मैथ्यू आर्नल्ड की भांति इलियट की आलोचना दृष्टि भी सर्वव्यापक थी । स्पष्टतः आन्तरिक असंगतियों के कारण इलियट की काव्य - सम्बन्धी मान्यताएँ स्पष्ट रूप में हमारे सामने न आ सकी , फिर भी संसार उनके प्रभाव से अछूता न रहा ।

सार

इलियट आधुनिक युग के न केवल सर्वश्रेष्ठ कवि हैं , बल्कि आलोचनात्मक वृत्ति के समर्थ व्याख्याता भी हैं । उनकी कृतियाँ व्यवस्था के प्रयोजन से प्रेरित है । इतिहास - बोध और परम्परा की धारणाओं के अन्तर्गत अतीत के समय साहित्य को वर्तमान के लिए और दूसरे देशों के साहित्यों को किसी एक देश के लिए सार्थक तथा उपादेय मानना इलियट की प्रमुख देन है । परम्परा की तरह काव्य भी निर्वैयक्तिकता का सिद्धान्त उनके लेखन में सर्वत्र व्याप्त हैं । रोमांटिक भावधारा की अतिवैयक्तिकता के फलस्वरूप उन्होंने अपना यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया है । वस्तुनिष्ठता भी इसका एक पक्ष है । काव्य और आलोचना दोनों में इलियट निर्वैयक्तिकता एवं वस्तुनिष्ठता समर्थक है । वस्तुतः निर्वैयक्तिकता एवं वस्तुनिष्ठता आभिजात्यवादी धारणाएँ हैं जिन्हें ये साहित्य के लिए हितकर समझते हैं । इलियट काव्यानुभूति को विशिष्ट अनुभूति मानते हैं । रिचर्ड्स की तरह सामान्य अनुभूति नहीं । पर्याय रूप में काव्यानन्द लौकिक आनन्द से विशिष्ट है । इस अंश में इलियट की मान्यता भारतीय काव्य शास्त्र की मान्यता के निकट है , जिसमें काव्यानन्द को अलौकिक माना गया है । निःसंदेह कवि और आलोचक के रूप में इलियट को जो प्रसिद्धि मिली , वह अन्य किसी को अपने जीवन - काल में नहीं मिली ।

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