गोस्वामी तुलसीदास Goswami Tulsidas

गोस्वामी तुलसीदास 
Goswami Tulsidas 
( वि.सं. 1554 – वि.सं. 1670 )

गोस्वामी तुलसीदास Goswami Tulsidas

हिन्दी साहित्य के मध्यकालीन(भक्तिकाल) के सन्त , रामभक्त व रामचरितमानस जैसे अद्भुत ग्रन्थ के सृजक कवि गोस्वामी तुलसीदास की जन्म तिथि के सम्बन्ध में विभिन्न मत है । गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस में दिए गए उनके जन्मवृत्त के अनुसार इनका जन्म बाँदा जिले के राजापुर गांव के आत्माराम दूबे तथा पत्नी दुलारी के यहाँ अभुक्त मूल नक्षत्र में सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन हुआ । इसके अतिरिक्त इनके जन्म के सम्बन्ध में यह दोहा भी प्रचलित  है 
  • " सम्वत् पन्द्रह सौ अस्सी , तरणी तनुजा तीर । 
  • श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धर्यो सरीर ।। "
मानस मयंक तथा मूल गोसाई चरित के अनुसार तुलसीदास जी का जन्म सम्वत् 1554 में हुआ था । शिवसिंह सरोज के रचयिता शिवसिंह सेंगर के अनुसार तुलसीदास जी का जन्म सम्वत् 1583 है । जार्ज ग्रियर्सन एवं माता प्रसाद गुप्त , पं . रामगुलाम द्विवेदी,पं . रामनरेश त्रिपाठी एवं रामदत भारद्वाज आदि सम्वत् 1589 को उनका जन्म सम्वत् मानते हैं । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के विचार में गोस्वामी जी का जन्म सम्वत् 1554 मान लेने पर उनके लिए 127 वर्ष तक जीवित रहना असम्भव तो नहीं है किन्तु यह सम्भव है कि मानस मयंक के छन्दों का पाठ अशुद्ध हो । ' राम मुक्तावली ' के आधार पर श्री जगमोहन वर्मा तुलसीदास जी का जन्म सम्वत् 1560 मानते है । कुछ विद्वान सम्वत् 1600 तथा 1668 विक्रमी सम्वत् को उनका जन्मकाल मानते हैं , परन्तु अधिकांश विद्वान 1554 विक्रमी सम्वत् के पक्ष में है अतः उसे ही तुलसीदास जी का जन्मकाल मानना अधिक समीचीन है । गोस्वामी जी के जन्म स्थान के सम्बन्ध में भी पर्याप्त मतमेद पाए जाते हैं । राजापुर , सोरों , तोरी , हस्तिनापुर आदि स्थान उनकी जन्म भूमि के रूप में विवादास्पद रहे हैं । पं . रामगुलाम द्विवेदी , शिवसिंह सरोज ,  मूल - गोसाई चरित , आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आदि के अनुसार तुलसीदास जी का जन्म स्थान राजापुर स्वीकृत है और आज भी वहाँ तुलसीदास का आश्रम तथा मन्दिर विद्यमान है जिससे ये सिद्ध होता है कि तुलसीदास जी की यही है। यही तुलसीदास जी के वंशजों के पास रामचरितमानस की प्राचीन प्रति भी विद्यमान है । तुलसीदास जी का आरम्भिक नाम क्या था ? यह निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता । गीता प्रेस गोरखपुर के रामचरितमानस के अनुसार श्री नरहरिदास जी ने इन्हें ' राम बोला ' नाम दिया था । कहा जाता है कि जन्म लेने के पश्चात् तुलसीदास रोये नहीं , किन्तु उनके मुख से ' राम ' शब्द निकला था । सम्भवतः इसी बात को ध्यान में रखकर श्री नरहरिदास जी ने इन्हें ' राम बोला ' नाम दिया । कवितावली के एक छन्द के अनुसार इनका नाम तुलसी था बाद में दास जुड़ गया था 
" नाम तुलसी पै भाँडे भाग जो कहायो दास , कियो अंगीकार ऐसे बड़े दगा बाज को ।। " 
तुलसीदास जी उच्च ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे यह तो निर्विवाद है । तथापि कुछ विद्वान् इन्हें कान्य कुब्ज ब्राह्मण , कुछ सनाय ब्राह्मण तथा कुछ सरयु पारीण ब्राह्मण मानते हैं । गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित परिचय तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार तुलसीदास जी सरयु पारीण ब्राह्मण दूबे ( द्विवेदी ) थे । इनके पिता का नाम ' आत्माराम दूबे ' तथा माता का नाम ' हुलसी ' था । माता के नाम का परिचय ' रहीम ' के दोहे से भी मिलता है 
  • " सुर - तिय नर - तिय नाग - तिय , अस चाहति सब कोय । 
  • गोद लिए हुलसी फिर तुलसी सो सुत होय ।। “
तुलसीदास जी का बाल्य काल अतीव विषम रहा । अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उत्पन्न होते ही माता-पिता द्वारा इनका परित्याग कर दिया गया । इनका पालन पोषण गृह सेविका पुनियां ने पाँच वर्ष की अवस्था तक किया और जब वह दिवंगत हो गई , तुलसी को उदर पूर्ति हेतु 'द्वार द्वार भटकना पड़ा और यह भटकाव तब तक बना रहा जब तक नरहरिदास जी का आश्रय इन्हें प्राप्त नहीं हो गया । तुलसी कृत विभिन्न रचनाओं में उनकी बाल्य दशा के परिचायक प्रमाण उपलब्ध होते हैं 
  • " तनु तज्यो कुटिल कीट ज्यों , तज्यो मातु पिताहू । 
  • खायो खोंचि मॉगि मैं तेरो नाम लियो । " ( विनय पत्रिका ) 
  • " स्वास्थ के साचिन तज्यो तिजरा को सो टोटका औचक उलटिनहरों । " ( विनय पत्रिका ) 
  • " मातु पिता जग जाह तज्यो । विधि हून लिस्यो कछु माल भलाई ।। " ( कवितावली )
  • तुलसीदास ने अपने गुरु के सम्बन्ध में बहुत कम संकेत दिया है । मानस में उन्होंने अपने गुरु सम्बन्ध में मात्र इतना संकेत दिया है " बन्दी गुरु पद कंज कृपा सिन्धु नए रूप हरि ।
  • महा मोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर । " 
गीता प्रेस , गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ' रामचरितमानस में दिए गए तुलसी के परिचय के अनुसार रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य नरहरि जी तुलसी के आदिम शिक्षा और दीक्षा गुरु थे और उन्हीं से रामकथा सुनने का सौभाग्य सुकर क्षेत्र ( सौरों ) में तुलसी को मिला था । इस सम्बन्ध में तुलसी का आत्मकथ्य  है 
  • " मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सु सुकर खेत । 
  • समुझि नहिं तीस बालपन , तब असि रहेऊ अचेत ।। " 
जहाँ तक वेद वेदांग की शिक्षा का प्रश्न है । शेष सनातन जी को इसका श्रेय जाता है । मानस के मर्मज्ञ विद्वानों में शेष सनातन जी को ही तुलसी का विद्या गुरु प्रतिपादित किया है । डॉ . माता प्रसाद गुप्त के अनुसार तुलसीदास जी के गुरु बहुज्ञ एवं बहुश्रुत महात्मा थे । गोस्वामी तुलसीदास जी का विवाह सं . 1583 ज्येष्ठ शुक्ल 13 गुरुवार को भारद्वाज गोत्रीय , सुन्दर , विदुषी कन्या रत्नावली के साथ हुआ था जो दीनबन्धु पाठक की पुत्री थी । रत्नावली के एक दोहे के अनुसार तुलसीदास जी ने 15 वर्ष तक वैवाहिक जीवन व्यतीत किया था । रत्नावली के प्रति उनका विशेष अनुराग ही उनके वैराग्य का कारण बना और प्रकारान्तर से अभ्युदय का भी । 
पत्नी की वाणी के कुठाराघात से उद्वेलित हो विरक्त बन गोस्वामी जी ने विभिन्न तीर्थ स्थानों की यात्रा की थी । इन तीर्थ धामों में काशी , चित्रकूट , अयोध्या , प्रयाग , हरिद्वार आदि प्रमुख हैं । चित्रकूट , अयोध्या , काशी आदि पावन तीर्थों में इन्हें सन्त समागम का पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ जिससे इनकी वैराग्य भावना अधिक प्रबल हुई । गृहस्थ आश्रम का परित्याग करने के पश्चात् गोस्वामी जी सर्वप्रथम प्रयाग पहुंचे थे और फिर काशी । कहा जाता है कि ये काशी में महामारी से भी पीड़ित हुए थे । गृहस्थ का परित्याग करने के पश्चात् गोस्वामी जी सर्वप्रथम प्रयाग पहुंचे । काशी में तुलसीदास जी रामकथा कहने लगे । लोकप्रचलित कथा के अनुसार वहीं इन्हें एक दिन एक प्रेत मिला , जिसने इन्हें हनुमान जी का पता बतलाया । हनुमान जी से मिलकर तुलसीदास जी ने उनसे भगवान् श्री राम के दर्शन कराने की प्रार्थना की । हनुमान जी ने कहा- " तुम्हें चित्रकूट में श्री राम के दर्शन होंगे । " इस पर तुलसीदास ने चित्रकूट की यात्रा की । चित्रकूट पहुँचकर रामघाट पर इन्होंने अपना आसन जमाया । एक दिन जब वे कामद गिरी की प्रदक्षिणा करने के लिए निकले तो दो घुडसवार राजकुमारों के दर्शन हुए जो कि वास्तव में श्री राम और लक्ष्मण थे । तुलसीदास जी उन्हें देख मुग्ध तो हुए पर पहचान न पाए बाद में हनुमान जी से सारा भेद जानकर उन्हें अत्यधिक पश्चाताप हुआ । हनुमान जी ने उन्हें सांत्वना दी और बताया कि कल प्रातः उन्हें श्री राम दर्शन का सौभाग्य पुनः मिलेगा । सम्वत् 1607 विक्रमी मौनी अमावस्या बुधवार के दिन तुलसी को चन्दन लेने का आग्रह करते बालक के रूप में भगवान श्री राम के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । हनुमान जी ने यह सोचकर कि कहीं ये फिर से धोखा न खा जाएँ उन्हें चेताने के लिए यह दोहा पढ़ा 
" चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर । 
तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक देत रघुवीर ।। " 
तुलसीदास उस अद्भुत रूप को निहारकर शरीर की सुधि भूल गए । भगवान् ने अपने हाथ में चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास के मस्तक पर लगाया और अन्तर्धान हो गए । गोस्वामी जी के जीवन का अधिकांश काल चित्रकूट अयोध्या और काशी में ही व्यतीत हुआ ।
तुलसी के जीवन काल में ही उनका यश चारों ओर व्याप्त हो चुका था । उनकी प्रसिद्धि से जलने वाले कुछ तथा कथित पण्डितों ने तत्कालीन सुप्रसिद्ध विद्वान मधुसूदन सरस्वती को ' रामचरितमानस ' का अवलोकन कर अपनी सम्मति देने के लिए इस दृष्टि से उकसाया था , जिससे यदि उनकी सम्मति तुलसी के विपक्ष और उनके पक्ष में हो तो वे तुलसी को नीचा दिखाएँ परन्तु विद्वान , विद्वान ही होता है । मधुसूदन सरस्वती ने ' मानस ' का अवलोकर कर न केवल प्रसन्नता व्यक्त की बल्कि लिखा 
  • " आनन्दकानने हास्मि जगपतुलसी तकः । 
  • कविताम जरी भाँति राम अमर भूषिता ।। " 
अर्थात -  इस काशी रूपी आनन्द वन में तुलसीदास चलता फिरता ( जंगम ) तुलसी का पौधा है । उनकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुन्दर है । जिस पर श्री राम रूपी भंवरा सदा ही मँडराया करता है । 
नाभादास जी इन्हें साक्षात् वाल्मीकि का अवतार मानते थे । इस सम्बन्ध में उनकी पंक्ति प्रसिद्ध है 
" कलि - कलुष जीव निस्तार हित वाल्मीकि तुलसी भये । " 
रहीम खानखाना भी उनके प्रशंसक थे ओर इसीलिए तुलसी दास ने लिखा 
" सुर तिय नर तिय नग तिय अस चाहती सब कोय । "
के उत्तर में लिखा था 
" गोद लिये हुलसी फिरें , तुलसी सो सुत होय । " 
उपलब्ध जानकारी के अनुसार तुलसी की वृद्धावस्था में रुदबीसी तथा मीन की शनि दशा जैसे विषम योग पड़े थे जिनके कारण देश में भयंकर दुर्भिक्ष तथा महामारी का प्रकोप हुआ था । काशी भी इन उपद्रवों से संत्रस्त थी । तुलसी दास जी भी महामारी का शिकार बने थे और अपवाहुक ( Armeric Ciatica ) से ग्रस्त हो गये । परिणामतः 1670 विक्रमी में तुलसी ने रामचरितमानस रूपी अक्षय निधि विश्व को सौंप महाप्रयाण किया । इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो दोहे प्रसिद्ध हैं , जिनमें से दूसरे को अधिक प्रमाणिक माना जाता है -
  • " सम्वत् सोलह सौ असी , असी गंग के तीर । 
  • श्रावण शुक्ला तीज शनि , तुलसी तज्यौ शरीर ।। "
  • " सम्वत् सोलह सौ अशी , असी गंग के तीर । 
  • श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी तज्यो शरीर । " 
कहा जाता है कि मृत्यु के समय तुलसीदास जी ने यह दोहा कहा था 
  • " राम नाम जस बरनिकै , भयो चहत अब मौन । 
  • ' तुलसी ' के मुख दीजिए ,अबहि तुलसी पान । " 

कृतियाँ

हिन्दी के अधिकांश विद्वान गोस्वामी तुलसीदास जी 12 कृतियों को ही प्रमाणित मानते हैं जो निम्न हैं-
  1. श्रीरामचरितमानस (प्रबन्धकाव्य)
  2. विनयपत्रिका (गीतात्मक प्रबन्धकाव्य)
  3. कवितावली (मुक्तकप्रधान प्रबन्धकाव्य)
  4. रामगीतावली(गीतात्मक प्रबन्धकाव्य)
  5. कृष्ण गीतावली (गीतात्मक प्रबन्धकाव्य)
  6. रामाज्ञा प्रश्न (मुक्तक प्रबन्धकाव्य)
  7. रामलला नहछू (खण्डकाव्य)
  8. जानकीमंगल (खण्डकाव्य)
  9. पार्वतीमंगल (खण्डकाव्य)
  10. दोहावली (मुक्तककाव्य)
  11. बरवै रामायण (मुक्तक प्रबन्धकाव्य)
  12. हनुमान बाहुक (स्तुतिपरक मुक्तक काव्य)
इनमें रामचरितमानस , दोहावली , कवितावली , गीतावली , विनय पत्रिका आदि बड़े ग्रन्थ हैं । कुछ विद्वान कलिधर्म निरूपण ' को भी तुलसी की प्रमाणिक रचना मानते हैं । इन सभी रचनाओं में ' रामचरितमानस ' सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है । 

 साहित्यिक परिचय

तुलसी , सुर और केशव की काव्य कला की दृष्टि में रखकर इनके सम्बन्ध में कहा गया 
  • " सूर सूर तुलसी ससी , उडुगन केसवदास । 
  • अबके कवि खद्योत सम , जहँ तहँ करें प्रकास ।। " 
शशि से उपमित गोस्वामी तुलसीदास निश्चय ही हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कवि हैं । उनकी कृतियाँ हिन्दी साहित्य की धरोहर तो हैं ही परन्तु भारतीय धर्म , सभ्यता और संस्कृति स्तम्भ भी हैं । तुलसीदास जी महान् कवि होने के साथ साथ सर्वथा निरभिमानी भी थे । महत्त्वपूर्ण कृतियों का स्रष्टा होते हुए भी उन्होंने कहीं भी अपने सम्बन्ध में ऐसा संकेत नहीं दिया जिससे यह आभास हो कि कवि को अपने कृतित्व पर गर्व है । इसके विपरीत उन्होंने विनम्र स्वरूप का परिचय इस प्रकार किया है 
  • " कवि न होउं नहि चतुर कहा , मति अनुरूप राम गुन गाऊँ । 
  • कविता विवेक एक नाहि मोरे , सत्य कह लिखि कागद कोरे ।। " 
जब तुलसीदास ने प्रणयन के क्षेत्र में पदार्पण किया तब प्रणयन की भाषा थी संस्कृत । विद्वता की छाप उसी के द्वारा लगाई जाती थी । भाषा में रचना करना सिद्धान्तों के उपहासास्पद बनना था । परन्तु गोस्वामी तुलसीदास ने परम्परा की परवाह न कर जनसामान्य की भाषा को अपने रचना कर्म का माध्यम बनाकर न केवल यह सिद्ध किया कि वे मुक्त है , बल्कि यह भी सिद्ध किया कि वे वस्तुतः सच्चे सन्त है और इसलिए जनसामान्य के कल्याण और अभ्युदय के लिए कृत संकल्पित हैं । अपने आराध्य श्री राम में अनन्य आस्था रखने के कारण उन्हें विश्वास था कि उनकी रचनाएँ राममय होने के कारण सज्जन समुदाय द्वारा अवश्य समादृत होगी । उनका यह विश्वास कितना सही था आज भी इसका अनुमान लगाया जा सकता है । शताब्दियों के पश्चात् भी उन कृतियों को उतना ही सम्मान है जितना उस युग में था , आज भी गोस्वामी जी अपनी अनुपम , लोकोपकारी साहित्य साधना के द्वारा महाकवि पद पर अधिष्ठित हैं । तुलसीदास जी की काव्य कला का विवेचन दो दृष्टियों - भाव पक्ष और कला पक्ष से किया जा सकता है ।

भाव पक्ष 

गोस्वामी तुलसीदास जी भक्त कवि हैं । उनके उपास्य देव हैं श्रीराम । जो मूर्तिमान धर्म है- " रामो विग्रहवान् धर्मः । " तुलसी का सम्पूर्ण वांग्मय अपने आराध्य श्रीराम के गुणगान से ओत - प्रोत है । श्री राम के शील स्वभाव तथा मर्यादा पुरुषोत्तम रूप पर तुलसी पूर्ण रूप से मुग्ध हैं और इसलिए कहते हैं 
" सुनि सीता पति सील सुभाउ । मोदन , मन , तन , पुलक , नयन जल सो नर खेहर खाई ।। " 
इन्हीं शील स्वभावादि पर अनुरक्त होकर गोस्वामी जी ने रामचरितमानस , गीतावली , कवितावली , विनय पत्रिका , जान की मंगल , रामलला नहछू , बरवै रामायण आदि कृतियों में श्री राम का गुणगान किया है 
" एक भरोसे एक बल एक आस बिस्वास । 
स्वाति सलिल रघुनाथ जसु , चातक तुलसीदास ।। " 
तुलसी का काव्य अतीव विशद और व्यापक है । मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का आधार लेकर उसमें भारतीय जीवन दर्शन की सम्पूर्ण व्याख्या की गई है । रामचरितमानस में हिन्दु धर्म , सभ्यता और संस्कृति को इस प्रकार अनुस्युत किया गया है कि उसके कारण भारत के ही नहीं विदेशों के व्यक्ति और परिवार भी लाभान्वित होते चले आ रहे हैं । अपने धर्म के प्रति आस्थावान् बने रहने के लिए प्रेरित हुए हैं । पारिवारिक आदर्श की शिक्षा का तो मानस जीता - जागता विश्वविद्यालय ही है । विनय पत्रिका का प्रणयन तो हुआ ही है कलियुग के भय मुक्ति पाने हेतु भगवान् श्री राम का अनुग्रह पाने के लिए परन्तु इसमें विभिन्न देवताओं से तुलसी अपने आराध्य के चरणों में अनुराग की याचना करते हैं । जानकी से भी अवसर पाकर भगवान् श्री राम ने अपनी संस्तुति की याचना इस रूप में करते हैं 
" कबहुंक अंग महावार पाइ मेरिओ वेधि धायबी कछु वाराण कथा चलाई ।। " 
गोस्वामी जी ने गीतावली और कवितावली में श्री राम के मनोहर चरित्र का ही वर्णन किया है । ' जानकी मंगल ' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि जानकी के विवाह से सम्बद्ध कृति है । ' बरवै रामायण में भावपूर्ण बरवै प्रयुक्त हुए हैं । यथावसर तुलसी ने लोक व्यवहार ज्ञान का भी परिचय कराया है । जनकपुर की स्त्रियों श्री राम के गुणों पर मुग्ध हैं , परन्तु विवाह के अवसर पर वे ठिठीली करने से नहीं चूकती । वे परिहास में जानकी को राम से श्रेष्ठ बताते हुए कहती हैं 
" गरव करहु रघुनन्दन जनि मन मोह ।
देखा आपनी मूरति सिय के छह ।। " 
इस प्रकार तुलसी की विभिन्न रचना का अध्ययन करने पर विदित होता है कि वे वस्तुतः सिद्ध हस्त कवि थे । उन्होंने स्थलों के अनुरूप भावपूर्ण शैली में इस प्रकार अपने विचार प्रकट किये हैं कि उनका पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रहता ।

रस 

शास्त्रों में नौ रसों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है 
  • " श्रृंगार हास्य करुण रौदवीर भयानकाः । 
  • विभत्सावभुत संझौष शान्तो नयमो रसः ।। " 
आधुनिक काल में अथवा यह कहना अधीक संगत होगा - मध्यकाल में इन रसों की संख्या बढ़ाकर ग्यारह कर दी गई थी । ये दो अन्य रस है- वात्सल्य रस तथा भक्ति रस । भक्ति मार्ग के आचार्यों के अनुसार भक्ति स्वयं एक परिपूर्ण रस है जिसमें भक्तों का हृदय सदैव तरंगायित रहता है परन्तु काव्य शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान भक्ति रस की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार नहीं करते । ये केवल श्रृंगार , हास्य , करुण , रौद , वीर , भयानक , वीभत्स तथा अद्भुत रस की ही सत्ता मानते हैं और इन्हीं में अन्य रसों का अन्तर्भाव स्वीकार करते हैं । कुछ विद्वान वात्सल्य को पृथक रस मानते हैं । तुलसीदास जी ने शास्त्रानुमोदित नवों रसों तथा वात्सल्य और भक्ति रस का सुन्दर वर्णन अपनी कृतियों में किया है । 
श्रृंगार रस
काव्य शास्त्रकारों ने इसे रसराज कहा है । इसका स्थायी भाव रति है । गोस्वामी जी ने श्रृंगार का सन्तुलित , मर्यादित वर्णन किया है । श्रृंगार के दोनों पक्ष - संयोग और वियोग का इतना संयमित वर्णन तुलसी के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर पाया है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसी के श्रृंगार के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- " सीताजी द्वारा श्रृंगार के संचारी भाव क्रीड़ा की व्यंजना के लिए कैसा अवसर चुना है - वन के मार्ग में ग्रामीण स्त्रियाँ राम की ओर लक्ष्य करके सीता से पूछती हैं कि ये तुम्हारे कौन हैं ? इस पर सीता क्या कहे ? वह " तिनहिं विलोकि विलोकति धरनी । दुई संकोच सकुचित बर बरनी ।। " ‘विलोकति धरनी ' कितनी स्वाभाविक चेष्टा है । संकोच द्वारा कवि ने सीता के ह्रदय की कोमलता और अभिमान शून्यता कितने स्वाभाविक ढंग से व्यंजित कर दी है । सीताजी की बगारी चेष्टाओं का विधान अत्यन्त कुशलता और भावुकता के साथ गोस्वामी जी ने किया है " बहुरिबदन बिधु अंचल डॉकी । पिय तन चिह मह करि बाँकी ।। " " खंजन मंजु तिरीछे नैननि , निज पति कहेउ तिन्हें सिय सैननि ।। " श्री राम-सीता के विवाह का श्रृंगार रस परक वर्णन तुलसी की कुशलता , रस प्रयोग पटुता का परिचय करा देता है " दुलह श्रीरघुनाथ बने , दुलहि सिय सुन्दर मन्दिर माहीं । गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि , वेद जुवाजुरि विन पदाहि ।। राम को निहारती जानकी कंकन के नग की परछाही । यातें सबै सुधि भूलि गई , कर टेकि रही पल टारति नाहीं ।। " 
विप्रलम्भ श्रृंगार के वर्णन में भी गोस्वामी जी पूर्णतः सफल रहे हैं सीताहरण के पश्चात् राम वियोग दशा के वर्णन को इसके प्रमाण रूप में लिया जा सकता है " हे खग मग हे मधुकर अनी । तुम देखी सीता मग नैनी ।। " " किमि कहि जात अनख तोहि पाही । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं । " राम के वियोग में सुमन्त के घोड़ों के अड़ जाने का वर्णन भी कवि की वर्णन कुशलता का परिचायक है " सोक सिथिल रघुसकइन हॉकी , रसुवर बिरह पीर उर बाँकी । जो कह रामु लखनु वैदेही , हिकरि हिकरि हित हेरहिं तेही ।। " इसी प्रकार सीता के वियोग वर्णन में भी कवि ने अपनी कुशलता की छाप छोड़ी है " देखित प्रगट गगन अंगारा , अवनि न आवत एको तारा । पावकमय ससि स्रवत न आगी , मानहु मोहिं जाति हत भागी । सुनहि विनय मय विटप अशोका , सत्य नाम करु हरु मम शोका । नूतन किसलय अनल समाना , देहि आगिनी जाति करहि निदाना ।। " 
वीर रस 
उत्साह स्थायी भाव वाले वीर रस की आचार्यों ने बहुत प्रशंसा की है । गोस्वामी जी ने इस रस का भी अतीव सुन्दर वर्णन किया है " जो राउर अनुसासन पाऊँ , कन्दुक इव ब्रह्माण्ड उठाऊँ । काचे घट जिमि सारौं फोरी , सकर मेरू मूलक इव तोरी ।। " अति विसाल तरु एक उपारा , विस्थ कीन्ह लंकेस कुमारा । रहे रहा नट ताके लगा , गहि गहि कपि मर्द निज अंगा । " " कट कटान कपि कुंजर मारी , दुहु भुजदंड तमकि महि मारी । ढोलत धरनि सभासद से , चले आजि भय मारुत ग्रसे ।। " 
करुण रस 
इस रस का स्थायी भाव शोक है । रामचरितमानस ' में कई प्रसंग इस रस के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं- रावण की  मृत्युपरान्त मन्दोदरी विलाप का एक उदाहरण द्रष्टव्य है " पति सिर देखत मन्दोदरी । मुरछित विकल धरनि खसि परी । पति सिर देखि ते करहिं पुकारा । छटे कच नहिण्युष संकरा ।। "
शान्त रस
इस रस का स्थायी भाव राम अथवा निर्वेद है । संसार की अनित्यता इसका आलम्बन है । श्री राम के स्वरूप वर्णन में ' शान्त शाश्वतम प्रमेय मनघम् ' आदि में इन्होंने सर्वत्र शान्त रूप का दर्शन कराने का प्रयास किया है । विनय पत्रिका की निम्न पंक्तियों में शान्त रस का सुन्दर परिपाक मिलता है " जागु जागु जीवजन जो है जग जामिनी । देह गेह नेह जानि जैसे घन दामिनी ।। "
हास्य रस 
स्थायी भाव है हंसी तथा आलम्बन है विचित्र वेश , विचित्र चेष्टाएँ आदि । मानस के बालकाण्ड में शिव - विवाह प्रसंग में इसका वर्णन हुआ है " ससि ललाट सुन्दर सिर गंगा । नयन तीनि उपवीत भुजंगा ।। गरल कण्ठ उन नर - सिर माला । असिव वेष सिव धाम कृपाला ।। कर त्रिशुल अरु समा विराजा । चल बसह पकि बाजहिं बाजा ।। देखि सिवहिं सुरत्रिय मुसुकाही । बरलायक दुलहिनी जग लाँहि ।। 
वात्सल्य रस 
इसका स्थायी भाव अपत्य स्नेह है । तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में इस रस का सुंदर वर्णन किया है " सुन्दर श्रवण सुचारु कपोला । अति प्रिय मधुर तो तरे बोला ।। चिक्कन कच कुंचित गमुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ।। पीत अगुलिया तनु पहिराई । जानु जानि विचरनि मोहिं भाई । रूप सकहिं नहि कहि श्रुति शेषा । सो जानइ सपनेहुँ जोहिं देखा ।। " एकहि विधि सिसु विलेय प्रभु कीन्हा । सकल नगरवासिन्ह सुख दीन्हा ।। लै उछंग कबहुँ के हलराये । कबहुं पालने घलि झुलावै ।। 
भक्ति रस
आचार्यों ने भक्ति को स्वयं एक स्वतन्त्र रस माना है । इसका स्थायी भाव है आराध्य के प्रति अनन्य श्रद्धा । " सात्विक अशा धेनु सुहाई । जी हरि कृयाँ हृदय बस आई ।। जब तप व्रत जम नियम अपारा । ये श्रुति ह सुभ धर्म आधारा ।। भाव सहित खोजइ जो प्रानी । घाव भगति मनि सब कुछ खानी ।। " 

कला पक्ष 

गोस्वामी जी ने काव्य की सभी शैलियों में रचनाएँ की हैं । ' रामचरितमानस ' महाकाव्य है । जानकी मंगल , पार्वती मंगल खण्ड काव्य है । विनय पत्रिका , दोहावली मुक्तक काव्य है । गीतावली विनय पत्रिका गीति काव्य हैं । गीतावली , कवितावली मुक्तक काव्य होते हुए भी प्रबन्धात्मक गुण युक्त रचनाएँ हैं । इस प्रकार इस महाकवि की सर्वतोमुखी प्रतिभा अपनी प्रभा से सबको चमत्कृत कर देती है । मानस के आरम्भ में अपनी रचना का उद्देश्य गोस्वामी जी ने “ स्वान्तः सुखाय ' बताया है । विनय पत्रिका के अध्ययन से विदित होता है कि ' स्वान्तः सुखाय ' के साथ साथ गोस्वामी जी ने आत्माभिव्यक्ति का माध्यम भी अपनी रचनाओं को बनाया है । 

भाषा

भाषा पर गोस्वामी जी का असाधारण अधीकार था । उन्होंने मुख्य रूप से अवधी को आत्मभिव्यक्ति का साधन बनाया है , परन्तु ब्रज भाषा के भी वे सिद्ध हस्त कवि तथा प्रयोक्ता थे । इनकी अवधि जायसी से भिन्न सुसंस्कृत एवं परिमार्जित है । अवधी को निखारने एवं उसे माधुर्य प्रदान करने का श्रेय एकमात्र गोस्वामी जी को है । भाषा के सफल प्रयोक्ता के रूप में जब उनके साहित्य का अध्ययन किया जाता है तब विदित होता है कि भोजपुरी , बुन्देलखण्डी , अरबी , फारसी , संस्कृत , प्राकृत एवं अपभ्रंश आदि भाषाओं के भी वे जानकार थे और इसीलिए अपने काव्य में इन भाषाओं के शब्दों का वे समुचित प्रयोग कर सके । माधुर्य , ओज और प्रसाद इन तीनों गुणों से सम्बन्धित उनकी भाषा वस्तुतः ही आकर्षक है । अवसरानुकूल शब्दावली का प्रयोग इस भाषा को इतना जीवन्त बना देता है कि उसका प्रभावी सीधा हृदय पर होता है जनकपुर की वाटिका में कंकण , किंकिणी की मधुर ध्वनि सुनते ही राम का ध्यान अनायास उस ओर आकृष्ट हो जाता है । इस अवसर पर तुलसी द्वारा प्रयुक्त भाषा उसी माधुर्य और आकर्षण को प्रकट करती है " कंकन किंकिनी नूपूर धुनि सुनि । कहत लखन सन राम हिये गुनि ।। " जहाँ युद्ध का प्रसंग आया है वहीं ओज पूर्ण भाषा का प्रयोग करके तुलसी ने उसका यथावत् निर्दशन किया है । गीतावली , कवितावली . रामचरितमानस के सुन्दर लंकादि काण्डों में इसके प्रचुर उदाहरण विद्यमान है " महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहिकीस । माहि पटका गजराज इव सपथ करइ दससीस ।। " 
मुहावरे और कहावतों के प्रयोग से भाषा में अपूर्व प्रेषणीयता आ जाती है । गोस्वामी जी ने इनका समुचित प्रयोग कर अपनी भाषा को अधिक सजीव , सशक्त तथा आकर्षक बनाया है । उनके कुछ मुहावरे द्रष्टव्य है - धोबी कैसो कूकर , न घर को , न घाट को ।, सावन अंधही ज्यो सूझत रंग हरो । , बाँझ कि जान प्रसव के पीरा । ( आदि ) गोस्वामी जी की भाषा के सम्बन्ध लनकरआचार्य शुक्ल ने लिखा है ... " सबसे बड़ी विशेषता गोस्वामी जी की है भाषा की सफाई और रचना की निर्दोषिता जो हिन्दी के और कवि में तो ऐसी नहीं है । सारी रचना इसका उदाहरण है । " 

शब्द शक्ति 

अभिधा , लक्षणा और व्यंजना शब्द की तीन शक्तियाँ हैं इनका समुचित प्रयोग कवि साहित्य क्षेत्र में अपनी महत्ता सिद्ध कर सकता है । भाव और विचार को गति प्रदान करके लक्षणा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । गोस्वामी जी ने इसका सफल प्रयोग किया है " सीवत साधु साधुता सोपति । खल बिलसति दुलसति खलई है ।। " इसमें खलई और साधुता का लाक्षणिक प्रयोग दर्शनीय है । मानस में राम वन गमन के समय सीता - राम संवाद में व्यंजना का सफल प्रयोग गोस्वामी जी ने किया है " मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मोहि को भोगु ।। यह एक ही पंक्ति श्री राम के उपदेश पर ताला डाल देती है । 

चित्रात्मकता 

भाषा में अथवा विशेषतः अव्य काव्य में चित्रात्मकता आने से वर्ण्य विषय का महात्व बढ़ जाता है , अतः चित्रात्मकता उत्तम काव्य की विशेषता मानी गई है । गोस्वामी जी के काव्य में बहुल : चित्रात्मकता का प्रयोग हुआ है । जिससे पाठक उनके हृदयगत भाव तक पहुँच सकता उदाहरण दष्टव्य है । लंका से लौटकर हनुमान सीता की दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं " रघुकुल तिलक वियोग निहरि । मैं देखी जब जाइ जानकी मनहुं विरह मूरति मन मारे । चित्र से नयन अरु गढे से चरन कर मळे से स्तवन नहिं सुनत पुकारे । रसना पटति नाम कर सिए चिर रहै नित निज पद कमल निहारे ।। 

छन्द - अलंकार

गोस्वामी जी ने अपने युग में प्रचलित सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है । दोहा , चौपाई , कवित्त , सवैया , सोरठा , बरवै , छन्द आदि उनके द्वारा प्रयुक्त उनके युग में प्रचलित छन्दों का सफल प्रयोग उनकी विभिन्न रचनाओं में हुआ है । उनके द्वारा प्रयुक्त प्रत्येक छन्द में उनकी प्रकृति के अनुरुप लय और भावानुकूलता का समावेश उनकी विदग्धता का परिचायक है । 
गोस्वामी जी अलंकारवादी नहीं , अलंकार प्रेमी थे । काव्य सन्दर्भ में अलंकार प्रयोग काव्य में शोभा वृद्धि अथवा वहाँ चमत्कार लाना है । तुलसी इस विशेषता के प्रति सतत् जागरुक रहे हैं । और उन्होंने इनका समुचित सफल प्रयोग अपनी कृतियों में किया है । कुछ अलंकारों का प्रयोग दष्टव्य है 
अनुप्रास : " कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि । मंगल मूरति मारुति नन्दन ।। " 
यमक : भवात विदेहु विदेहु विसेषि ।
 वक्रोक्ति , विप्सा , पुनरुक्ति प्रकाश आदि इनकी कृतियों में यथावसर प्रयुक्त हुए हैं । उत्प्रेक्षा , उपमा , रूपक अलंकारों का प्रयोग तुलसी ने प्रचुरता से किया है । रामचरितमानस में वर्षा वर्णन उत्प्रेक्षालंकार की छटा दर्शनीय है 
" भूमि परत भा डावर पानी । जिमि जीवहिं माया लपटानी । 
" सिमिटि सिमिटि जल भरहि तलावा । जिमि सद्गुण सज्जन पहिं आवा ।। " 
गोस्वामी जी ने सर्वाधिक प्रयोग रूपक अलंकार का किया है । छोटे - छोटे निरंग एवं परम्परित रूपकों के अतिरिक्त बड़े - बड़े सांग रूपों का भी प्रयोग कवि ने रामचरितमानस , गीतावली एवं विनय पत्रिका में किया है । इन लंबे सांग रूपों में सादृश्य एवं साधर्म्य का आद्योपान्त निर्वाह हुआ है । मात्र चमत्कार प्रदर्शक अलंकारों का प्रयोग तुलसी को पसन्द नहीं था । परिणामतः मुद्रा , चित्र प्रहेलिका आदि अलंकारों की उन्होंने अवहेलना सी ही की है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसी पर तुलनात्मक दृष्टि से प्रकाश डालते हुए लिखा है " बिहारी रीति.ग्रन्थों के सहारे जबरदस्ती निकाल - निकालकर दोहों के भीतर श्रृंगार रस के विभाव अनुभाव और संचारी ही भरते रहे । " केवल एक ही महात्मा और है जिनका नाम गोस्वामी जी के साथ लिया जा सकता है वे हैं - प्रेम स्रोत स्वरूप भक्त वर सुरदास जी । जब तक हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी हैं । तब तक सूरदास और तुलसीदास का जोड़ा अमर है । ....... न जाने किसने यमक के लोभ से यह दोहा कह डाला कि " सुर.सुर तुलसी ससी उडुगन केसवदास । " यदि कोई पूछे कि जनता के हृदय पर सबसे अधिक विस्तृत अधिकार रखने वाला सबसे बड़ा कवि कौन है तो उसका एकमात्र वही उत्तर ठीक हो सकता है कि भारत हृदय , भारती कण्ठ भक्त चूडामणि गोस्वामी तुलसीदास । सारांश में तुलसी की कविता के विषय में तुलसी के ही शब्दों में यह कहना पर्याप्त होगा 
" कविता भनिति भूति तल सोई । सुर सरि सब कहुँ हित होई ।। 
तुलसी के काव्य का एक और महत्वपूर्ण गुण है उनका अर्थ गांभीर्य । कथावाचकों ने तो एक - एक चौपाई के अनेकों अर्थ निकाले हैं । डॉ . बलदेव प्रसाद मिश्र ने तुलसी काव्य के अर्थ गांभीर्य के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश डाला है । निष्कर्ष रूप में तुलसी का काव्य भाव तथा कला पक्ष दोनों ही दृष्टियों से अनुपम है ।
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