विनय पत्रिका Vinaya Patrika

 विनय पत्रिका
Vinaya Patrika

पद सं . 137 से 145
(श्री हरि - तोषिणी टीका सं . वियोगी हरि)
विनय पत्रिका Vinaya Patrika

राग बिलावल 

[137]

  • जो पै कृपा रघुपति कृपालु की , बैर और के कहा सरै । 
  • होइ न बाँको बार भक्त को , जो कोउ कोटि उपाय करै ।। १ ॥ 
  • तकै नीच जो मीच साधु की , सो पामर तेहि मीच मरै ।
  • बेद - बिदित प्रहलाद - कथा सुनि , को न भक्ति - पथ पाउँ धरै ।।२ ।। 
  • गज उधारि हरि थप्यो बिभीषन , ध्रुव अबिचल कबहूँ न टरै । 
  • अबरीष की साप सुरति करि , अजहुँ महामुनि ग्लानि गरै ॥ ३ ॥ 
  • सो धौं कहा जु न कियो सुजोधन , अबुध आपने मान जरै । 
  • प्रभु - प्रसाद सौभाग्य बिजय - जस , पांडु - तनै बरिश्राइ बर।।४ ।। 
  • जोइ जोइ कूप खनैगो पर कहँ , सो सठ फिरि तेहि कूप परै । 
  • सपनेहुँ सुख न संतद्रोही कहुँ , सुरतरु सोउ विष फरनि फरे ।। ५ ।। 
  • है काके द्वे सीस ईस के जो हठि जन की सीब चरै ।
  • तुलसिदास रघुबीर - बाँहुबल सदा अभय , काहू न डरै ॥६ ॥ 

भावार्थ

यदि कृपालु रघुनाथजीकी कृपा बनी है , तो औरोके बैर करनेसे क्या पूरा पड़ सकता है ? भगवद्भक्तका बाल भी बांका नहीं होता , चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न करे ।।1।। जो नीच सन्त की मौत विचारता है , वह पापी स्वयं उसी मौतसे मरता है । प्रह्लादकी कथा वेदोमे प्रसिद्ध है , उसे सुनकर ऐसा कौन होगा , जो भक्ति - मार्गपर पैर न रखेगा , भक्तिके सिद्धान्तको न मानेगा ! सभी मानेंगे । भाव यह है , कि प्रह्लादको उसके पिता हिरण्यकशिपु ने अनेक प्रकारसे कष्ट दिये , पर भगवत्कृपासे उसका वह बाल भी बाँका न कर सका , उलटा आपही मारा गया । ' ऐसी भक्तवत्सलता सुनकर ऐसा कौन अभागा होगा , जो उस प्रभुकी भक्ति न करेगा ।। 2 ।। भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार किया , बिभीषणको राज्य पदपर स्थापित किया , ध्रुवको अटल पद दे दिया , और अम्बरीष भक्त के सम्बन्ध में तो कुछ पूछिये ही नहीं । उनको महा - मुनि ( दुर्वासा ) ने जो शाप दिया था , उसे स्मरण कर वह अब भी ग्लानिसे गले जाते हैं , लाजके मारे दबे जाते हैं ( अपना पराभव देखकर और समझकर कि अम्बरीषपर भगवान का हाथ है , दुर्वासा शाप देकर पछताया करते है ) ।।3।। दुर्योधन ने क्या अनिष्ट करनेको छोड़ा , जो कुछ करते बना सभी किया , मूर्ख अपने ही घमंडमें जलता रहा । पर भगवत्कृपासे सौभाग्य , विजय और कीर्तिने पांडवों को ही हठपूर्वक अपनाया , अर्थात् पांडवों को सौभाग्य मिला , विजय - लाभ हुआ और कीर्ति भी मिली ।।4।। जो भी दूसरेके लिए कुवाँ खोदेगा , वह दुष्ट स्वयं उसमें गिरेगा ? सन्तोंके साथ बैर करनेवालेको स्वप्नमे भी सुख मिलनेका नहीं । उसके लिए कल्पवृक्ष तक विषैले फल फलेगा , अर्थात् वह जिस उपायसे सुख चाहेगा उससे उसे दुःख ही मिलेगा ।।5।। किसके दो सिर हैं जो भगवद भक्तकी सीमा लांघेगा अर्थात् जो भी भक्तका अपराध करेगा , वह मारा जायगा । ( हॉ , किसी के दो सिर हो तो ठीक है , एक कट जायगा तो एक तो बच रहेगा । पर यह असंभव है ) । हे तुलसीदास ! जिसे श्रीरघुनाथजीके बाहुबलका भरोसा है , जो उनकी शरणागत हैं , वह सदा निर्भय है , किसीसे भी नहीं डर सकता ।।6।।

[138]

  • कबहुँ सो कर - सरोज रघुनायक , धरिहौ नाथ , सीस मेरे । 
  • जेहि कर अभय किये जन आरत , बारक बिबस नाम टैरे ॥१ ॥
  • जेहि कर - कमल कठोर संभुधनु भंजि जनक - संसय मेट्यो । 
  • जेहि कर - कमल ठाइ बन्धु ज्यों , परम प्रीति केवट भेट्यो ।।२ ।। 
  • जेहि कर - कमल कृपालु गीध कहँ , पिंड देइ निज धामदियो । 
  • जेहि कर बालि बिदारि दास - हित , कपिकुल - पति सुग्रीव कियो ।।३ ।। 
  • आयो सरन सभीत बिभीषन , जेहि कर - कमल तिलक कीन्हों । 
  • जेहि कर गहि सर चाप असुर हति , अभयदान देवन्ह दीन्हों ॥४ ॥ 
  • सीतल सुखद छाहँ जेहि कर की , मेटति पाप , ताप माया । 
  • निसि बासर तिहि कर - सिरोज की , चाहत तुलसिदास छाया ॥ ५ ॥ 

भावार्थ

हे रघुनाथजी ! हे नाथ ! क्या आप कभी अपने उस कर कमलको मेरे माथेपर रखेंगे , जिस हाथसे आपने दुखी भक्तोको अभय कर दिया था , जब कि उन्होने परतंत्रतावश एक बार आपका नाम - स्मरण किया था ? ॥1 ॥ जिस कर - कमलसे महादेवजीका कठोर धनुष तोड़कर आपने महाराज जनकका संदेह हटा दिया था और जिस कर - कमलसे गुह निषादको , भाईके समान उठाकर बड़े ही प्रेमसे छाती लगा लिया था ॥2 ॥ हे कृपालु ! जिस कर - कमलसे आपने जटायु गीधको ( पिताके समान ) पिंड दान देकर अपने लोक अर्थात् साकेतलोक भेज दिया था , और जिस हाथसे , अपने सेवकके अर्थ बालिको मारकर , सुग्रीवको बन्दरोके वंश का स्वामी बना दिया था ॥3 ॥ जिस कर - कमलसे आपने सभय शरणागत विभीषणका राज्याभिषेक किया था और जिस हाथसे , धनुष - बाण उठाकर राक्षसोंका संहार कर देवताओंको अभय - दान दिया था , अर्थात् उनको निर्भय बना दिया था ॥4 ॥ तथा जिस कर - कमल की शीतल और आनन्ददायक छायासे पाप , सन्ताप और अविद्याका नाश हो जाता है , हे नाथ ! आपके कर कमलकी वही छाया ( रक्षा ) यह तुलसीदास रात दिन चाहता है ।।5।।

 [139]

  • दीनदयालु , दुरित दारिद दुख दुनी दुसह तिहुः ताप तई है ।
  • देव , दुवार पुकारत आरत , सबकी सब सुख हानि भई है ॥१ ॥ 
  • प्रभु के बचन बेद - बुध - सम्मत मम मूरति महिदेव मई है । 
  • तिनकी मति रिस राग मोह मद लोभ लालची लीलि लई है ।।२ ।।
  • राज - समाज कुसाज कोटि कटु कलपित कलुप कुचाल नई है । 
  • नीति प्रतीति प्रीति परमिति पति हेतुबाद हठि हेर हई है ॥३ ॥ 
  • आश्रम - बरन - धरम - बिरहित जग , लोक - बेद - मरजाद गई है ।
  • प्रजा पतित पाखंड पापरत , अपने अपने रङ्ग रई है ॥४ ॥
  • सांति सत्य सुभ रीति गई घटि , बढ़ी कुरीति कपट - कलई है ।
  • सीदत साधु साधुता सोचति , खल बिलसत हुलसति खलई है ॥५ ॥ 
  • परमारथ स्वारथ , साधन भये अफल , सफल नहिं सिद्धि सई है ।
  • कामधेनु - धरनी कलि - गोमर , बिबस बिकल जामति न बई है ।।६ ।।
  • कलि - करनी बरनिये कहाँ लौं , करत फिरत बिनु टहल टई है ।
  • तापर दॉत पीसि कर मीजत , को जानै चित कहा ठई है ॥७ ॥
  • त्यों त्यों नीच चढ़त सिर ऊपर ज्यों ज्यो सीलबस ढील दई है । 
  • सरुष बरजि तरजिये तरजनी , कुम्हिलैहै कुम्हड़े की जई है ।।८।।
  • दीजै दादि देखि नातौ बलि , मही मोद - मंगल रितई है । 
  • भरे भाग अनुराग लोग कहैं , राम अवध चितवनि चितई है ॥६ ॥ 
  • बिनती सुनि सानन्द हेरि हँसि , करुना - बारि भूमि भिजई है । 
  • राम - राज भयो काज सकुन सुभ , राजा राम जगत - बिजई है ॥१० ॥ 
  • समरथ बड़ो सुजान सुसाहब , सुकृत - सैन हारत जितई है । 
  • सुजन सुभाव सराहत सादर , अनायास साँसति बितई है ।।११ ॥ 
  • उथपे थपन , उजारि वसावन , गई बहोरि बिरद सदई है । 
  • तुलसी प्रभु आरत - भारतिहर , अभयबाँह केहि केहि न दई है ॥१२ ॥ 

भावार्थ 

हे दीनदयालु रामजी ! पाप , दारिद्र और दुःख इन तीन दारुण तापो - भौतिक , दैविक , दैहिक - से दुनियाँ जली जा रही है ( इसके पहलेके पदोमे गोसाई जीने अपने ही दुःख निवेदन किये हैं , अब इस पदमे सारे संसारकी व्यथा सुना रहे हैं ) । हे भगवन् ! यह बात आपके द्वारपर पुकार रहा है । देखिए , सभीका सब प्रकारसे सुख जाता रहा , सभी निरानन्द दिखाई देते हैं ॥1॥ वेद और पंडितोकी सम्मति है , तथा आपने भी स्वयं श्री मुखसे कहा है , कि ब्राह्मण मेरी ही प्रतिमूर्ति है , अर्थात् वे ' ब्रह्ममय ' है । पर उनकी बुद्धिको क्रोध , राग , मोह , अहंकार , लोभ और लालचने निगल लिया है , अर्थात् उनमें सम , सतोष , दया , धर्म आदि तो रहे नहीं , किन्तु वे कामी , क्रोधी , मूढ और लोभी हो गये हैं ॥2॥ राजसमाज ( क्षत्रिय जाति ) करोड़ों बुरी - बुरी बातो से भरा है , वे ( लूटना , मारना , पर - स्त्री , पर - धन - अपहरण करना , अन्याय करके प्रजाको सताना आदि ) नित्य नई पापपूर्ण चालें चल रहे हैं । नास्तिकताने राजनीति , धर्मशास्त्र , श्रद्धा भक्ति और कुल मर्यादाकी प्रतिष्ठाको , ढूंढ - ढूँढकर , चौपट कर दिया है । साराश यह है , कि जहाँ नास्तिकवाद खड़ा हुआ , परमेश्वरको न माना , वहाँ धर्म - कर्म रह ही कैसे सकते हैं ? क्योकि परमात्मा ही सब धर्मों का मूल है ॥3॥ ससारमे न तो आश्रम - धर्म है और न वर्ण - धर्म ही । लोक और वेद दोनोकी मर्यादा नष्ट होती जा रही है , न कोई लोकाचार मानता है , और न वेदोक्त धर्म ही । प्रजाका हास हो रहा है , पाखंड और पापमे सन रही है । सभी अपने - अपने रंगमे मस्त है , अथवा मनमुखी हो गये हैं , कोई किसीकी नही सुनता ॥ 4 ॥ शान्ति , सत्य और सुमार्ग न्यून हो गये हैं , और दुराचार तथा छल - कपटकी बढ़ती हो रही है । सज्जन कष्ट पाते है , सज्जनता चिंता - ग्रस्त है । दुष्ट मौज कर रहे है और दुष्टता चैनमे है ।।5।। परमार्थ स्वार्थमे परिणत हो गया अर्थात् धर्मके नामपर लोग पेट पालने लगे हैं । साधन निष्फल होने लगे हैं ( इसीसे कोई डरता भी नहीं ) और सारी सिद्धियाँ भी सच्ची नहीं उतरती , झूठी जान पड़ती हैं , अथवा उनमें कुछ बरकत नहीं रही है । कामधेनु - रूपी पृथ्वी कलियुग - रूपी कसाई के हाथमे पड़ गई है । जो उसमें बोया जाता है , वह व्याकुलताके मारे , जमता ही नहीं ( और इसीसे जहाँ - तहाँ दुर्मिक्ष पड़ रहे हैं ) ॥6॥ कलियुगका करतब कहॉ तक बखाना जाय । यह बिना कामका काम करता फिरता है । इतने पर भी दाँत पीस - पीसकर हाथ मल रहा है , अर्थात् मन - ही मन मसोस रहा है कि अभी तो मैंने कुछ भी नहीं कर पाया , न जाने , इसके मनमे अभी क्या - क्या है । साराश यह है , कि वह जो करे सो थोड़ा है ॥ 7॥ ज्यो ज्यों आप शीलके कारण इसे ढील दे रहे हैं , क्षमा करते जाते हैं , त्यो - त्यो यह नीच सिरपर चढ़ता जाता है , अर्थात् दिन - पर - दिन जुल्म करता है । जरा क्रोध करके इसे डाँट तो दीजिए । यह तरजनी दिखाते ही कुम्हड़ेकी बतियाकी नाई मुरझा जायगा , दब जायगा ॥8 ॥ आपकी बलैया लेता हूँ , देखकर न्याय कर दीजिए , नही तो अब पृथ्वी आनन्द – मंगल से खाली होनेवाली है , आनन्द मंगलका , यदि ऐसी ही दशा रही तो , कहीं नाम भी न सुनाई पड़ेगा । ऐसा कीजिए , कि जिससे लोग सौभाग्यशाली होकर प्रेमपूर्वक यह कहे , कि श्रीराम जीने हमे अबाध्य अर्थात् पूर्णतया नित्य कुदृष्टिसे देखा है ।।9 ।। मेरी यह विनती सुनकर , भगवान ने मेरी ओर आनन्द से देखा और मुसकराकर करुणाके जलसे पृथ्वीको भिगो दिया , तर कर दिया ( शान्ति - वर्षा कर दी । बस राम - राज्य होनेसे सब काम सफल हो गये । शुभ शकुन होने लगे , क्योंकि महाराज राम चन्द्रजी जगद्विजयी है । भाव यह है , कि जगद्विजयी रामचन्द्रजीके आगे कायर कलियुगकी एक भी न चली ॥ 10॥ सर्वशक्तिमान् सुचतुर स्वामीने पुण्य रूपी सेनाको हारनेसे जिता लिया , अर्थात् पापोका क्षय कर दिया । उनके सद्भक्त स्वभावसे ही आदरपूर्वक उनकी प्रशसा करते हैं , कि धन्य है ! सहज ही यातनाएँ दूरकर दी ॥ 11 ॥ आपका यह बहाना सदासे ही चला आया है , कि जिनका कहीं ठौर - ठिकाना न हो , उन्हे स्थापित करना ( जैसे विभीषण और सुग्रीवको राज्यपर बिठा देना ) , उजड़े हुएको बसाना और गई हुई वस्तुको फिरसे दिला देना ( जैसे रावण के भयसे डरे हुए देवताओको फिरसे स्वर्गमे बसा देना ) । हे तुलसी ! दुखियोके दुःख हरनेवाले भगवान्ने किस - किसको अभय बॉह नही दी ? अर्थात् सभीकी रक्षा की , जो भी शरण मे गया उनका पालन - पोपण किया ॥ 12 ॥

[140]

  • ते नर नरकरूप जीवत भव - भंजन - पद - बिमुख अभागी । 
  • निसिबासर रुचि पाप असुचि मन , खलमति मलिन निगमपथ - त्यागी ॥१ ॥
  • नहिं सतसंग , भजन नहि हरिको , सवन न राम - कथा - अनुरागी । 
  • सुत - बित - दार - भवन - ममता - निसि , सोबत अति न कबहुँ मति जागी ॥२ ॥
  • तुलसिदास हरिनाम - सुधा तजि , सठ , हठि पियत बिषय - बिष माँगी ।
  • सूकर - स्वान मृगाल - सरिस जन , जनमत जगत जननि - दुख लागी ॥३ ॥ 

भावार्थ

वे अभागे मनुष्य संसारमें नरकरूप होकर जी रहे हैं , जो जन्म मरणसे मुक्त कर देनेवाले श्रीभगवच्चरणोसे विमुख है । रात - दिन उनकी रुचि पापोंमें ही लगी रहती है । उनका मन अशुद्ध रहता है । उन दुष्टोंकी बुद्धि इतनी मलिन रहती है , कि वह वेदोक्तमार्गको छोड बैठती है , अर्थात् पाप करते - करते उन दुष्टोंकी ऐसी प्रकृति हो जाती है , कि उन्हें वेद - विहित कर्म अच्छे ही नहीं लगते ॥1॥ न तो वे संतोंका संग ही करते है , न भगवद्भजन ही और न कानोंमें श्रीराम - कथाका प्रेम ही रहता है । ( फिर करते क्या हैं , सुनिए ) वे सदा पुत्र - कलत्र और धन तथा गृह आदिकी मोह - रात्रिमें सोते रहते हैं , अर्थात् इन्ही सबके मोहमें बदहोश पड़े रहते हैं । उनकी बुद्धि ( इस निद्रासे ) कभी जागती ही नहीं , अर्थात् उनके मनमें क्षणमात्रको भी वैराग्यका उदय नही होता ॥2 ॥ हे तुलसीदास ! जो दुष्ट राम - नाम - रूपी अमृतको छोड़कर हठपूर्वक विषयरूपी ज़हर माँग - मांगकर ( बार - बार विषयो ही की कामना करके पीते हैं , वे मनुष्य सूअर , कुत्ता और गीदड़के समान इस जगत्में केवल अपनी माँ को दुख देने के लिए ही जन्म लेते हैं । तात्पर्य यह है , कि जैसे सूअर आदि सदा विष्टाका भक्षण करते हुए काम - प्रवृत्तिके दास बने रहते हैं , इसी प्रकार वे विषयी मनुष्य आत्म - दर्शनका लाभ छोड़कर विषयोमें फंसे हुए व्यर्थ ही जी रहे हैं , उनका तो मर जाना ही अच्छा है ॥3 ॥ 

[141]

  • रामचंद्र रघुनायक तुम सौ हौं बिनती केहि भाँति करौ । 
  • अघ अनेक अवलोकि आपने , अनघ नाम अनुमान डरौं ।।१ ।।
  • पर - दुख दुखी सुखी पर - सुख ते , संत - सील नहि हृदय धरौं ।
  • देखि आन की बिपति परम सुख , सुनि संपति बिनु आगि जरौं ॥२ ॥ 
  • भक्ति बिराग ग्यान साधन कहि , बहु बिधि डहॅकत लोग फिरौं ।
  • सिव - सरबस सुखधाम नाम तव , बेंचि नरकप्रद उदर भरौं ॥३ ॥ 
  • जानत हौं निज पाप जलधि जिय , जल - सीकर सम सुनत लरौं ।
  • रज - सम पर - अवगुन सुमेरु करि , गुन गिरि सम रज ते निदरौ ॥
  • क्षा नाना बेष बनाय दिवस निसि , परबित जेहि तेहि जुगुति हरौं ।
  • एकौ पल न कबहुँ अलोल चित , हित दै पद - सरोज सुमिरौ ॥५ ॥ 
  • जो आचरन बिचारहु मेरो ,कलप कोटि लगि औटि मरौ । 
  • तुलसिदास प्रभु कृपा विलोकनि , गोपद ज्यों भवसिधु तरौ ॥६ ॥

भावार्थ

हे रघुवंश में श्रेष्ठ रामचंद्रजी ! मै किस प्रकार तुनसे विनय करूँ ? अपने पापाकी ओर देखकर और तुम्हारा अनघ अर्थात् पापरहित नाम विचार कर , मन - ही - मन , डर रहा हूँ । ( इसलिए डरता हूँ , कि पाप और पुण्यकी कभी बनती नहीं है , इन दोनोमे पृथ्वी - आकाशका अंतर है । रघुनाथजी मुझ पापीका उद्धार कैसे कर सकेगे ? ) || 1 || दूसरेके दु.खसे दुखी तथा दूसरेके सुखसे सुखी होना ऐसा जो संतोका शील स्वभाव है , उसे मैं कभी हृदयमे धारण नहीं करता । ( फिर करता क्या हूँ , सो सुनिए ) दूसरोकी विपत्ति देखकर बड़ा प्रसन्न होता हूँ । और दूसरोकी सम्पत्ति देखकर बिनाही आग ईर्ष्या मारे जला जाता हूँ ॥2।। भक्ति , वैराग्य , ज्ञान आदिके साधनोंका उपदेश देता हुआ नाना प्रकारसे लोगोको ठगता फिरता हूँ । शिवका सर्वस्व और आनंदका धाम जो तुम्हारा राम - नाम है , उसे बेचकर ( अर्थात् राम - नाम जप करके यह सिद्ध करता हूँ , कि मै तुम्हारा बड़ा भारी भक्त हूँ ) , पेट भरता हूँ , और उस पेटको , जो नरक भेजनेवाला है । सारांश यह , कि इस पापी पेटके लिए मै तुम्हारे नामकी ओट में अनेक पाप करता है । कुछ उठा नहीं रखता ॥3 ॥ यह जानता हूँ , कि मेरे पाप समुद्रके समान है , पर , जान कर भी , जब यह सुनता हूँ , कि मेरे पाप पानीकी बून्द के बराबर है , तब लड़ने लगता हूँ । तात्पर्य यह है , कि सदा यही चाहता हूँ , कि लोग मुझे पापी न कहें , धर्मधुरंधर कहे ! और दूसरों के धूलके कणके समान अवगुण , सुमेरुपर्वतके समान मानता हूँ । और यदि उनके गुण पर्वतके समान हैं , तो उन्हे धूल समान तुच्छ देखता हूँ । मतलब यह कि मुझे अपना ही सब कुछ अच्छा लगता है , दूसरोका नहीं , ऐसा स्वार्थी हूँ ॥4 ॥ अनेक वेष बना - बनाकर दिन - रात , जैसे - तैसे , दूसरोंका धन बटोरता फिरता हूँ । कभी , एक क्षण भी निश्चल चित्तसे प्रेमपूर्वक तुम्हारे चरणारविन्दों का स्मरण नही करता ।।5।। यदि तुम मेरे आचरणोपर विचार करोगे , मेरे पापका लेखा लगाने बैठोगे , तो करोडो कल्पतक मुझे लौट-लौटकर मरना पड़ेगा , संसार - रूपी कढ़ावेमें जलना होगा , आवागमनके चक्रसे कभी छुटकारा न मिलेगा । हे प्रभो ! पर यदि तुम अपनी करुण दृष्टि से मेरी ओर देख लोगे , तो मै , तुलसीदास , इस संसारको गायके खुर के समान पार कर जाऊँगा , इस संसार - समुदसे अनायास तर जाऊँगा ॥६ ॥

[142]

  • सकुचत हौं अति राम कृपानिधि , क्यों करि बिनय सुनावौं । 
  • सकल धरम विपरीत करत , केहि भाँति नाथ मन भावौं ॥१ ॥ 
  • जानत हौं हरि रूप चराचर , मैं हठि नैन न लावी । 
  • अंजन केस सिखा जुवती तहँ , लोचन सलभ पठावौ ॥२।।
  • स्रवननि को फल कथा तुम्हारी , यह समुझौं समुझावौं । 
  • तिन्ह स्रवननि परदोष निरन्तर , सुनि सुनि भरि भरि तावौं ॥३ ॥
  • जेहि रसना गुन गाइ तिहारे , बिनु प्रयास सुख पावौं ।
  • तेहि मुख पर अपवाद भेक ज्यो , रटि रटि जनम नसावौं ॥४ ।।
  • ' करहु हृदय अति बिमल बसहिं हरि ' , कहि कहि सबहिं सिखावौं । 
  • हौं निज उर अभिमान - मोह - मद - खल - मंडली बसावौं ॥५ ॥ 
  • जो तनु धरि हरिपद साधहि , जन सो बिनु काज गॅवाबौं । 
  • हाटक - घट भरि धरथो सुधा गृह तजि नभ कूप खनावौं ॥६ ॥ 
  • मन क्रम बचन लाइ कीन्हे अघ , ते करि जतन दुरावौ । 
  • पर - प्रेरित इरषा बस कबहुँक , कियक कछु सुभ जो जनावौं ॥७ ॥
  • विप्र - द्रोह जनु बाँट परयो हठि , सब सों बैर बढ़ावौं । 
  • ताहू पर निज मति - बिलास सब , संतन माँझ गनावौं ॥८ ॥ 
  • निगम सेस सारद निहोरि जो , अपने दोष कहावौं । 
  • तौं न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु , कहा एक मुख गावौं ॥६ ॥ 
  • जो करनी आपनी बिचारौं , तौ कि सरन हौं आवौं । 
  • मृदुल सुभाव सील रघुपति को , सो बल मनहिं दिखावौ ॥१० ॥ 
  • तुलसिदास प्रभु सो गुन नहिं जेहि , सपनेहुँ तुमहिं रिझावौं । 
  • नाथ - कृपा भवसिंधु धेनुपद सम , जो जानि सिरावौं ॥ ११ ॥

भावार्थ 

हे कृपानिधि रामजी ! मुझे बड़ा संकोच हो रहा है , मैं किस प्रकार आपको अपनी विनती सुनाऊँ ? जो कुछ भी मैं करता हूँ , वह सब धर्मके विरुद्ध ही किया करता हूँ । फिर भला , आपको मैं क्यों अच्छा लगने लगा ? तात्पर्य यह है , कि आपको तो धर्मात्मा ही प्यारे हैं ; मुझसरीखे पापी नहीं , इससे मुझे आपके सामने आनेमें संकोच होता है ॥1 ॥ यद्यपि मै यह जानता हूँ , कि भगवान् सर्वत्र - जड़ और चैतन्यमें - व्यापक हैं , पर मैं भगवत् - स्वरूपकी ओर हठपूर्वक ध्यान नहीं देता । मैं तो अपने नेत्ररूपी पतंगों की कामिनीरूपी अग्नि शिखामें ( जलनेके लिए ) भेजता हूँ ॥2 ॥ मैं यह स्वयं समझता हूँ और दूसरोंको भी समझाता हूँ , कि इन कानोंकी सार्थकता तो आपकी कथा सुननेमें ही है , पर उन कानोंसे सदा दूसरोंके दोष सुन - सुनकर , मनमें दृढ़तासे भर - भरकर , रखता हूँ , अथवा सुन - सुनकर हृदयमें फूला नही समाता ॥3 ।। जिस जीभसे आपके गुणानुवाद गाकर बिना ही परिश्रमके परमानन्द पा सकता हूँ ; उसी मुखसे उसी जीभसे मेढककी नाई दूसरोंकी निन्दाएँ रटा करता हूँ , जीभको परदोष कहनेके लिए ही मान रखा है ।।4 ।। मैं यह बात सबको समझा - समझाकर सिखाता फिरता हूँ , कि हृदयको नितांत शुद्ध बना डालो , तभी भगवान् उसमें बास करेगे ' कितु मैं अपने हृदयमें अहंकार , अशान और मद - इन दुष्टोंका समाज बसाता हूँ । ( स्वयं तो महाव्यसनी हूँ , पर दूसरोंको सजन बननेका उपदेश देता हूँ । भला , यह कहाँका न्याय है । ) ।।5॥ जिस मानव - शरीरको , धारण कर भक्त - जन वैष्णव पद , मुक्ति पद , प्राप्त करनेकी साधना करते हैं , उसे पाकर मै व्यर्थ ही खो रहा हूँ । घरमे तो सोनेके घड़े में अमृत भरा रक्खा है , पर उसे छोड़कर आकाशमें कुआँ खुदवाता हूँ ! तात्पर्य यह है , कि यह जो कंचन - सी देह है , और जिसमें आत्मस्व रूप - अमृत भरा है , उसे छोड़कर काम - काँचनरूपी मृगजलकी खोजमें मारा - मारा फिरता हूँ | जिसका अस्तित्व ही नहीं , भला , उस जगत्में सुखकी आशा हो सकती है ? कदापि नही ॥6 ॥ मनसे , कर्मसे और वचनसे जो - जो पाप किये हैं , उन्हें मै यत्न कर - कर छिपा रहा हूँ । और दूसरोकी प्रेरणासे अथवा ईर्षावश यदि कभी कोई अच्छा काम बन गया , तो उसे ( ढिंढोरा पीटता हुआ ) जनाता फिरता हूँ ॥ 7 ॥ ब्राह्मणोंके साथ द्रोह करना तो मानो मेरे हिस्से में ही पड़ गया है । जबरदस्ती ही सबसे बैर बिसाहता फिरता हूँ ( यह तो मेरे कर्म हैं , किन्तु ) यह सब होने पर भी , अपनी बुद्धिकी चेष्टासे , अपने सिद्धान्तका गति प्रदान करके अपनेको सब सन्तोंके बीचमें गिनता हूँ । यह सिद्ध करना चाहता हूँ , कि लोग मुझे सन्त - महन्त कहें ॥8॥ वेद , शेषनाग , सरस्वती आदिका निहोरा कर कर भी यदि मै अपने दोषोंका बखान कराऊँ , तब भी , हे प्रभो ! सौ कल्प तक वे समाप्त न होंगे ! फिर , भला मैं एक मुखसे उनका क्या वर्णन करूँ ॥9 ॥ यदि कहीं मैं अपनी करनीपर विचार करने लगूं , तो क्या मैं आपकी शरणमें आने योग्य हूँ ? मतलब यह , कि मै इतना भारी पापी हूँ कि आपकी शरणमें आ ही नही सकता , किन्तु " रघुनाथजीका स्वभाव कोमल है , उनका शील असीम है " यह बल मनको दिखाता रहता हूँ | तात्पर्य यह है , कि जब रघुनाथजी ऐसे सुशील और कोमल स्वभाववाले है , तो वह मुझ सरीखे पापियो और अपराधियोंको शरणमें लेकर क्यो न उद्धार करेंगे ? अवश्य करेंगे । बस , यही सदा मनको साहस बँधाता रहता हूँ ॥ 10॥ हे प्रभो ! इस तुलसीदास के पाप ऐसा एक भी गुण नहीं है , जिसके बलपर भरोसे कर आपको स्वप्नमें भी प्रसन्न कर सके । किन्तु हे नाथ ! आपकी कृपा के आगे यह संसार - सागर गायके खुरके समान है । यह समझकर मनमें सन्तोष कर लेता हूँ ( कि आपकी कृपासे , अपने में कोई साधन न होनेपर भी मै संसार समुद्र को अनायास पार कर जाऊँगा ) ॥ 11 ॥ 

[143]

  • सुनहुँ राम रघुबीर गुसाईं , मन अनीति - रत मेरो । 
  • चरन सरोज बिसारि तिहारे , निसिदिन फिरत अनेरो ॥१ ॥
  • मानत नाहिं निगम - अनुसासन , त्रास न काहू केरो । 
  • भूल्यो सूल ' करम - कोलुन्ह तिल ज्यों बहु बारनि पेरो ॥२ ॥
  • जहँ सतसंग , कथा माधवकी , सपनेहुँ करत न फेरो ।
  • लोभ - मोह - मद - काम - कोह - रत , तिन्ह सों प्रेम घनेरो ॥ ३ ॥ 
  • पर - गुन सुनत दाह , पर - दूषन सुनत हरख बहुतेरो । 
  • आप पाप को नगर बसावत , सहिन सकत पर खेरो ॥४ ॥ 
  • साधन - फल स्रुति - सार नाम तव , भव - सरिता कहँ बेरो ।
  • सोपर - कर काँकिनी लागि सठ , बैंचि होत हठ चेरो ॥ ५ ॥ 
  • कबहुँक हौं संगति सुभाव । तें , जाऊँ सुमारग नेरो । 
  • तब करि क्रोध संग कुमनोरथ देत कठिन भटभेरो ॥६ ॥
  • इक हौं दीन मलीन हीनमति , बिपति - जाल अति घेरो । 
  • तापर सहि न जाय करुनानिधि , मन को दुसह दरेरो ॥७ ॥ 
  • हारि परयो करि जतन बहुतबिधि , तातें कहत सबेरो ।
  • तुलसिदास यह त्रास मिटै जब हृदय करहु तुम डेरो ॥८ ॥ 

भावार्थ

हे रामजी , हे रघुनाथजी , हे प्रभो , सुनिए - मेरा मन अन्यायमें लगा रहता है । आपके चरणारविन्दों को भूलकर दिन - रात इधर - उधर भटकता फिरता है , विषयोंकी ओर दौड़ता रहता है ।।1 ।। न तो वह वेदकी ही भाषा मानता है , और न उसे किसीका डर ही है । वह कई बार कर्मरूपी कोल्हू में तिलकी तरह पेरा जा चुका है , पर अब सारा कष्ट भूल गया है ( यह खबर नहीं , कि दुष्कर्म करनेसे फिर वही दुर्दशा होगी ) ॥2॥ जहाँ सन्त - समागम होता है , अथवा भगवत् कथा होती है , वहाँ स्वप्नमें भी मेरा मन चक्कर नहीं लगाता , भूलकर भी नहीं जाता । जो लोभ , अज्ञान , अहङ्कार , काम और क्रोधमें ही पगे रहते हैं , उन्हीं दुष्टोसे वह अधिक प्रेम करता है ॥3॥ दूसरोंके गुण सुनकर वह ( डाहके मारे ) जला जाता है , और जब दूसरोंकी बुराई सुनता है तब फूलकर कुप्पा हो जाता है ! आप तो स्वयं पापोंका नगर बसा रहा है , पर दूसरे के ( पापोंके ) खेड़ेको भी नहीं देख सकता । भाव यह , कि अपने बड़े - बड़े पापोपर भी कुछ ध्यान न देकर दूसरोंके जरासे पाप पर दिल्लगी उड़ाता है । आपका नाम जो सर्वसाधनोंका फलस्वरूप है , वेदोंका सार है और संसाररूपी नदी पार करनेके लिए बेडा है , उसे दूसरेके हाथमें वह दुष्ट , कौड़ी - कौड़ीके लिए , बेंचता हुआ उनका गुलाम बनता फिरता है , एक - एक कौड़ीके लिए आपके नामको सुनाता फिरता है ॥5॥ यदि कभी सत्संगसे अथवा दैववश सन्मार्गके पास जाऊँ भी , तो इन्द्रियोंकी आसक्ति उस मनको कुमनोरथरूपी धक्का दे देती है । अर्थात् धर्माचारकी ओरसे हटाकर इन्द्रियाँ पुनः इस मनको संसारी वासनाओंमें फंसा देती हैं ॥6 ॥ एक तो मैं वैसे ही दीन , पापी और दुर्बुद्धि हूँ विपत्तियोंके जालमें फँसा पड़ा हूँ और तिसपर , हे करुणालय ! इस मनका असह्य धका लग रहा है । भला मै ( निर्बल जीव ) इस ( सबल ) मनका धक्का कैसे सह सकता हूँ ॥7॥ मैं अनेक यत्न कर - कर हार गया , इससे मैं पहले से ही कहे देता हूँ , कि तुलसीदासका यह भय ( जन्म - मरणका दुःख ) तभी दूर होगा , जब आप उसके हृदयमें निवास करेंगे । अर्थात् आपके ही ध्यानसे मनकी वृत्तियोंका नाश सम्भव है , अन्यथा नहीं ॥8 ॥ 

[144]

  • सो धौं को जो नाम - लाज तें , नहि राख्यो रघुबीर । 
  • कारुनीक बिनु कारन ही हरि हरहिक सकल भव - भीर । १ ॥ 
  • बेद - बिदित , जग - बिदित अजामिल , बिप्रबंधु अघ - धाम ।
  • घोर जमालय जात निवारयो सत - हित सुमिरत नाम ।।२ ।। 
  • पसु पामर अभिमान - सिंधु गज ग्रस्यो आइ जब ग्राह ।
  • सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु , हरथो दुसह उर - दाह ॥३ ॥ 
  • ब्याध निषाध गीध गनिकादिक , अगनित औगुन - मूल । 
  • नाम - ओट तें राम सबनि को दूरि करथो सब सूल ॥४ ॥ 
  • केहि आचरन घाटि हौं तिन तें , रघुकुल - भूषन भूप । 
  • सीदत तुलसिदास निसिबासर परथो भीम तम - कूप ।।५।।

भावार्थ

ऐसा कौन है , जिसे श्रीरघुनाथजीने अपने नामकी लाजसे अपनी शरणमें नहीं रखा , नही अपनाया ? बिना ही किसी कारण के करुणा करनेवाले श्रीहरि संसारके समस्त भय दूर कर देते हैं ( नाम - स्मरण करने वालोंको संसार – सागर से मुक्त कर देते हैं ) ॥1।। सब वेदमें प्रकट है और ससार में भी प्रसिद्ध है , कि अजामिल था तो ब्राह्मण जातिका , पर पापोंका स्थान था , महान् पापकर्मा था । बेचारा जब यमलोक जाने लगा , तब उसने अपने पुत्रका नाम लिया , किन्तु भगवान्ने अपना नाम - स्मरण समझकर उसे यमलोक जानेसे रोक लिया ( धोखेसे ही " नारायण " का स्मरण करनेसे वह मुक्त हो गया ) । फिर भला , जो जानकर भगवत् नाम - स्मरण करेगा , उसकी सद्गति क्यों न होगी ? ॥2 ॥ जब मगरने पशु एवं पापी और महान् अभिमानी हाथीको पकड़ लिया , तब उसके एक ही बार स्मरण करनेपर , हे प्रभो ! आप तत्क्षण वहाँ आ गये और उसकी असह्य हार्दिक पीड़ा शान्त कर दी ( मगरसे छुड़ाकर उसे दिव्य शरीर प्रदान कर दिया ) ॥3 ॥ व्याध ( वाल्मीकि ) , निषाद ( गुह ) , गीध ( जटायु ) , गणिका ( पिगला । इत्यादि अगणित दोषोंकी जड़ थे , किन्तु हे रामजी ! आपने अपने नामकी ओटसे इन सबके सारे दुःखोका नाश कर दिया ॥4 ॥ हे रघुवंशमें श्रेष्ठ ! हे महाराज ! कहिए , इन सबोसे मैं किस आचरणमें कम हूँ ? फिर भी यह तुलसीदास रात - दिन भीषण अज्ञानरूपी कुएँ में पड़ा हुआ दुःख भोग रहा है ? भाव यह है , कि जब आपने बड़े - बड़े दुराचारी पापियोंका भी उद्धार कर दिया , तब मुझ पापीको क्यो भुलाये बैठे हो ? मुझे भी संसार - सागरसे पार कर दीजिये ॥5॥

[145]

  • कृपासिन्धु , जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे । 
  • जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत , तब तिन्हके दुख दाहे ॥१ ॥
  • गज , प्रहलाद , पांडसुत , कपि सब को रिपु - संकट मेट्यो ।
  • प्रनत बन्ध - भय - विकल बिभीषण , उठि सो भरत ज्यों भेट्यो ।।२ ।। 
  • मैं तुम्हरो लेइ नाम ग्राम इको उर आपने बसावों । 
  • भजन , बिबेक , बिराग , लोग भले , मैं क्रम क्रम करि ल्यावों ॥३ ॥ 
  • सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक , करहिं जोर बरिआई । 
  • तिन्हहिं उजारि नारि अरि धन पुर राखहिं राम गुसाईं ॥४ ॥
  • सम - सेवा - छल - दान - दंड हौं , रचि उपाय पचि हारयो । 
  • बिनु कारन को कलह बड़ो दुख , प्रभु सों प्रगटि पुकारयो ।।५ ।। 
  • सुर स्वारथी , अनीस , अलायक , निठुर , दया चित नाहीं । 
  • जाउँ कहाँ को बिपति - निवारक , भवतारक जग माहों ॥६ ।। 
  • तुलसी जदपि पोच तउ तुम्हरो , और न काहू केरो । 
  • दीजै भक्ति - बाँह बारक ज्यों सुबस बसै अब खेरो ॥७ ॥ 

भावार्थ

हे कृपासागर ! यह तुम्हारा दीन दास तुम्हारे द्वारपर न्याय क्यो नहीं पाता ? इसका इन्साफ क्यों नहीं किया जाता ? जब , जहाँ पर , जिन्होंने आर्त हो तुम्हें याद किया , तब वहीं पर तुमने उनके दुःख दूर कर दिये ( ऐसा तुम्भरा स्वभाव है , पर मेरे लिए न जाने क्यों प्रकृति बदल दी ) ॥1॥ हाथी , प्रह्लाद , पाण्डव , सुग्रीव आदि सबके शत्रुओंसे किये गये कष्ट तुमने नष्ट कर दिये । भाई रावणके भयसे व्याकुल और विनम्र विभीषणको उठाकर तुमने , भरतकी नाई छातीसे लगा लिया , बड़े प्रेमसे उसका आलिंगन किया ॥2 ॥ मै तुम्हारा नाम लेकर अपने हृदयमें एक गाँव बसाना चाहता हूँ । उसमें बसाने के लिए मैं धीरे धीरे भजन , विवेक , वैराग्य प्रमुख सजनोको इधर - उधरसे लाता हूँ । भाव यह है , कि मैं हृदयमें जैसे - तैसे सद्भावोंको स्थान देता हूँ ।। 3॥ यह सुन कर क्रोधित हो दुष्ट काम , क्रोध , लोभ , मोह , मद , मात्सर्य जबरदस्ती करते हैं । उन बेचारे भले आदमियोंको उजाड़ - उजाडकर , हे प्रभो ! उस गाँवमें ये दुष्ट स्त्री , शत्रु , धन सम्पत्ति आदिको ला - लाकर बसातेहैं ( अब बताओ , उन सद्भावोंका कैसे निर्वाह हो ? ) ॥4 ॥ साम , दाम , दंड , भेद और सेवा खुशामद करके तथा और - और भी अनेक उपाय कर - कर मैं थक गया हूँ । पर ये नहीं मानते , बिना ही कारणके लड़ाई झगड़े मचाये रहते हैं । इस महान् दुःखको आज मैंने उजागर हो स्वामीके सामने निवेदन किया है , उनके कानमें बात डाल दी है ॥5 ॥ ( यदि कहो , कि और - और देवताओंको क्यों नहीं अपना दुःख सुनाया , तो ) वे देवता स्वार्थी , असमर्थ , अयोग्य और निष्ठुर हैं । उनका चित्त तनिक भी नहीं पिघलता । कहाँ जाउँ ? कौन विपत्ति दूर करनेवाला है ? कौन इस संसार - सागरसे पार उतारनेवाला है ? कोई भी तो नहीं दीख पड़ता ॥6 ॥ तुलसी यद्यपि नीच है , पर है तो तुम्हारा ही , और किसीका गुलाम तो नहीं है । अपना जानकर एकबार भक्तिरूपी बाँह दे दो , हृदयमें अपनी भक्ति थाप दो , जिससे यह खेड़ा स्वतंत्रतापूर्वक आबाद हो जाय । भाव यह है , कि इस हृदयमें एक तुम्हारी भक्ति के प्रतापसे ही ज्ञान , विवेक , वैराग्य श्रादि सद्भावोंका उदय और काम - क्रोधादिका नाश होगा ।।7।।

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