वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन Vaidyanath Mishra Nagarjuna

 वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन 
Vaidyanath Mishra Nagarjuna
 

(30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन

बाबा नागार्जुन का जन्म 30 जून 1911 ई०  को अपने ननिहाल  सतलखा,मधुबनी में हुआ । इनका पैतृक गाँव तरौनी,दरभंगा था । इनके पिता गोकुल मिश्र और माता उमा देवी थी । इनके बचपन का नाम 'ठक्कन मिसर' था  । गोकुल मिश्र और उमा देवी को लगातार चार संताने हुईं और असमय ही वे सब चल बसीं । संतान न जीने के कारण गोकुल मिश्र अति निराशापूर्ण जीवन में रह रहे थे । अशिक्षित ब्राह्मण गोकुल मिश्र ईश्वर के प्रति आस्थावान तो स्वाभाविक रूप से थे ही पर उन दिनों अपने आराध्य देव शंकर भगवान की पूजा ज्यादा ही करने लगे थे। वैद्यनाथ धाम (देवघर) जाकर बाबा वैद्यनाथ की उन्होंने यथाशक्ति उपासना की और वहाँ से लौटने के बाद घर में पूजा-पाठ में भी समय लगाने लगे। "फिर जो पाँचवीं संतान हुई तो मन में यह आशंका भी पनपी कि चार संतानों की तरह यह भी कुछ समय में ठगकर चल बसेगा। अतः इसे 'ठक्कन' कहा जाने लगा। काफी दिनों के बाद इस ठक्कन का नामकरण हुआ और बाबा वैद्यनाथ की कृपा-प्रसाद मानकर इस बालक का नाम वैद्यनाथ मिश्र रखा गया।"

नागार्जुन के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रह गयी थी। वे काम-धाम कुछ करते नहीं थे। सारी जमीन बटाई पर दे रखी थी और जब उपज कम हो जाने से कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं तो उन्हें जमीन बेचने का चस्का लग गया। जमीन बेचकर कई प्रकार की गलत आदतें पाल ली । जीवन के अंतिम समय में इनके पिता नागार्जुन के लिए मात्र तीन कट्ठा उपजाऊ भूमि और उतनी ही वास-भूमि छोड़ गये, वह भी सूद-भरना लगाकर। बहुत बाद में नागार्जुन दंपति ने उसे छुड़ाया।

ऐसी पारिवारिक स्थिति में बालक वैद्यनाथ मिश्र पलने-बढ़ने लगे। छह वर्ष की आयु में ही इनकी माता का देहांत हो गया। इनके पिता अपने एक मात्र मातृहीन पुत्र को कंधे पर बैठाकर अपने संबंधियों के यहाँ, इस गाँव--उस गाँव आया-जाया करते थे। इस प्रकार बचपन में ही इन्हें पिता की लाचारी के कारण घूमने की आदत पड़ गयी और बड़े होकर यह घूमना इनके जीवन का स्वाभाविक अंग बन गया। "घुमक्कड़ी का अणु जो बाल्यकाल में ही शरीर के अंदर प्रवेश पा गया, वह रचना-धर्म की तरह ही विकसित और पुष्ट होता गया।

नागार्जुन की आरंभिक शिक्षा लघु सिद्धांत कौमुदी और अमरकोश के सहारे आरंभ हुई। उस जमाने में मिथिलांचल के धनी अपने यहां निर्धन मेधावी छात्रों को प्रश्रय दिया करते थे। इस उम्र में बालक वैद्यनाथ ने मिथिलांचल के कई गांवों को देख लिया। बाद में विधिवत संस्कृत की पढ़ाई बनारस जाकर शुरू की। वहीं इन पर आर्य समाज का प्रभाव पड़ा और फिर बौद्ध दर्शन की ओर झुकाव हुआ। उन दिनों राजनीति में सुभाष चंद्र बोस इनके प्रिय थे। बौद्ध के रूप में उन्होंने राहुल सांकृत्यायन को अग्रज माना। बनारस से निकलकर कोलकाता और फिर दक्षिण भारत घूमते हुए लंका के विख्यात 'विद्यालंकार परिवेण' में जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। राहुल और नागार्जुन 'गुरु भाई' हैं। लंका की उस विख्यात बौद्धिक शिक्षण संस्था में रहते हुए मात्र बौद्ध दर्शन का अध्ययन ही नहीं हुआ बल्कि विश्व राजनीति की ओर रुचि जगी और भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन की ओर सजग नजर भी बनी रही। 1938 ई० के मध्य में ये लंका से वापस लौट आये। फिर आरंभ हुआ इनका घुमक्कड़ जीवन। साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ नागार्जुन राजनीतिक आंदोलनों में भी प्रत्यक्षतः भाग लेते रहे। स्वामी सहजानंद से प्रभावित होकर उन्होंने बिहार के किसान आंदोलन में भाग लिया और मार खाने के अतिरिक्त जेल की सजा भी भुगती। चंपारण के किसान आंदोलन में भी इन्होंने भाग लिया। वस्तुतः ये रचनात्मकता के साथ-साथ सक्रिय प्रतिरोध में विश्वास रखते थे। 1974 जेपी आंदोलन में भाग लेते हुए इन्होंने कहा था

"सत्ता प्रतिष्ठान की दुर्नीतियों के विरोध में एक जनयुद्ध चल रहा है, जिसमें मेरी हिस्सेदारी सिर्फ वाणी की ही नहीं, कर्म की हो, इसीलिए मैं आज अनशन पर हूँ, कल जेल भी जा सकता हूँ।"

और सचमुच इस आंदोलन के सिलसिले में आपात् स्थिति से पूर्व ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फिर काफी समय जेल में रहना पड़ा।

ये लम्बे समय तक दमे से पीड़ित रहे और 5 नवम्बर 1998 को यह हिन्दी-पुत्र हमेशा-हमेशा के लिए हमें अलविदा कह गया । 

पुरस्कार

साहित्य अकादमी पुरस्कार -1969 (मैथिली में, 'पत्र हीन नग्न गाछ' के लिए) , भारत भारती सम्मान (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा) , मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार द्वारा) , राजेन्द्र शिखर सम्मान -1994 (बिहार सरकार द्वारा) , साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फेलोशिप से सम्मानित , राहुल सांकृत्यायन सम्मान (पश्चिम बंगाल सरकार ) आदि अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से इन्हें समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा ।

प्रमुख रचनाएँ

हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन लगभग अड़सठ वर्ष (सन् 1929 से 1997) तक रचनाकर्म से जुड़े रहे। इन्होंने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बांग्ला में मौलिक रचनाएँ कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बांग्ला से अनुवाद कार्य भी किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु इन्होंने हिन्दी साहित्य में  नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। काशी में रहते हुए इन्होंने 'वैदेह' उपनाम से भी कविताएँ लिखी । श्रीलंका में 'विद्यालंकार परिवेण' में 'नागार्जुन' नाम ग्रहण किया। आरंभ में इनकी हिन्दी कविताएँ 'यात्री' के नाम से ही छपी । कुछ मित्रों के आग्रह पर इन्होंने हिन्दी में नागार्जुन के अलावा किसी नाम से न लिखने का निर्णय लिया ।

नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो 1929 ई० में लहेरियासराय, दरभंगा से प्रकाशित 'मिथिला' नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी रचना 'राम के प्रति' नामक कविता थी जो 1934 ई० में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक 'विश्वबन्धु' में छपी ।

कविता-संग्रह

युगधारा -1953

सतरंगे पंखों वाली -1959

प्यासी पथराई आँखें -1962

तालाब की मछलियाँ-1974

तुमने कहा था -1970

खिचड़ी विप्लव देखा हमने -1970

हजार-हजार बाँहों वाली -1971

पुरानी जूतियों का कोरस -1983

रत्नगर्भ -1984

ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!! -1985

आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने -1986

इस गुब्बारे की छाया में -1987

भूल जाओ पुराने सपने -1994

अपने खेत में -1997

प्रबंध काव्य

भस्मांकुर -1970

भूमिजा

उपन्यास

रतिनाथ की चाची -1948

बलचनमा -1952

नयी पौध -1953

बाबा बटेसरनाथ -1954

वरुण के बेटे 

दुखमोचन 

कुंभीपाक

हीरक जयन्ती 

संस्मरण

एक व्यक्ति: एक युग 

कहानी संग्रह-

आसमान में चन्दा तैरे 

आलेख संग्रह-

अन्नहीनम् क्रियाहीनम्

बम्भोलेनाथ 

बाल साहित्य

कथा मंजरी भाग-1

कथा मंजरी भाग-2

मैथिली रचनाएँ

चित्रा (कविता-संग्रह) 

पत्रहीन नग्न गाछ 

बांग्ला रचनाएँ

मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -1997 (देवनागरी लिप्यंतर के साथ हिंदी पद्यानुवाद)

साहित्यिक परिचय

नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। इनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है। इनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है। मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है। इनके गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन इनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है। नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं। 

आज़ादी के बाद लम्बे समय तक ये पत्रकारिता से भी जुड़े रहे।  जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं।

नागार्जुन की कविताओं के प्रमुख विषय प्रकृति , प्रणय , सामाजिक जीवन की विषमता , राजनैतिक अव्यवस्था , आर्थिक असमानताजनित शोषण , उत्पीड़न तथा धार्मिक अंधता के साथ - साथ जीवन के गहरे यथार्थ से सम्बन्धित हैं । नागार्जुन की कविताओं में उपलब्ध प्रमुख प्रवृत्तियाँ ये हैं - राष्ट्रीयता , युगीन विषमता की अभिव्यंजना , आस्था और निष्ठा , व्यंग्यशीलता जागरण का स्वर और रागात्मक संवेदना आदि । 

राष्ट्रीयता

नागार्जुन को देश की धरती से और उस पर बसने वाली जनता से गहरा प्यार है । ये जन मंगल के आकांक्षी और जागरण के प्रतीक रहे हैं । इनकी अनेक कविताओं में राष्ट्रीय भावों में सजी हुई सशक्त रचनाएँ है जो प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में उभरी हैं । इनकी राष्ट्रीयता के कई रूप हैं । कभी तो ये जनमंगल की भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं , कभी धरती और धरतीवासियों की तकलीफों का अनुभव करके उन्हें सहानुभूति का अर्घ्य प्रदान करते हैं और कभी राष्ट्रीयता के प्रतीक और देश की आभा के पुरोधा नेताओं और महात्माओं के प्रति अपनी श्रद्धा भक्ति प्रकट करते हैं । युगधारा काव्य कृति में संकलित तर्पण , ' शपथ ' शीर्षक से लिखी गयी कविताओं में नागार्जुन की राष्ट्रीयता को देखा जा सकता है । ' तर्पण ' में गांधीजी की मृत्यु पर खेद व्यक्त करते हुए आशा व्यक्त की  है कि उनके स्वप्न सत्य बनकर खिलेंगे । इन्होंने लिखा है –

  • जिस बर्बर ने कल तुम्हारा खून किया वह नहीं मराठा हिन्दू है । 
  • वह प्रहरी है स्थिर स्वार्थों का वह मानवता का महाशत्रु । ' 

वस्तुतः नागार्जुन की कविताओं में राष्ट्रीयता और जन जागृति का सशक्त एवं विश्वसनीय चित्र अभिव्यक्त हुआ है । चीन के आक्रमण से इनकी देश भक्ति में डूबी आत्मा कराह उठती है और वह आक्रोशमयी वाणी में यहाँ तक लिख देता है कि ' आओ हम माओं को जिन्दा गाढ़ दें । ' फाहियान के वंशधर कविता भी राष्ट्रीयता की इसी जमीन पर लिखी गयी है । उसमें भी कवि का क्षोभ निहित है- ' कहा था कभी कन्यूशियस के बेटों ने नमो बुद्धाय बुद्धं शरणं गच्छामि चीख रहे वही अब जोरों से - नमो युद्धाय , युद्ध शरणं गच्छामि ।

प्रकृति चित्रण

बाबा नागार्जुन के काव्य में - प्रकृति की ताजा छवियों को देखा जा सकता है - गाँव की भी और नगर की भी । ये प्रकृति छवियाँ युग की भयंकरताओं से गुजरते - गुजरते कवि के मन को कभी बाँधती हैं और कभी लुभाती रही हैं । इस तरह यथार्थ का दारुण विष पीने के बाद उससे कवि की श्रमजनित स्थिति को ताजगी मिलती रही है । प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रमाणस्वरूप ' बादल को घिरते देखा है , बसन्त की अगवानी , नीम की टहनियाँ , काली सप्तमी का चाँद , शरद पूर्णिमा और झुक आये कजरारे मेघ ' आदि की गणना की जा सकती है । 

इन कविताओं में कहीं प्रकृति की सरलता और मोहकता अभिव्यंजित हुई है और कहीं उसकी संश्लिष्ट दृश्यावली । लगता है कि कवि के भीतर का कलाकार पूरी तरह सजग है तभी तो वह अपनी राग चेतना को धक्का देकर कवि की कलम तूलिका को बाह्य प्रकृति की टटकी छवियाँ उतारने की प्रेरणा दे देता है । कवि की सहृदयता , सौंदर्याभिरुचि और विशिष्ट रागात्मक संवेदना की पहचान कराने वाली ये पंक्तियाँ देखिए 

  • अमल धवल गिरि के शिखरों पर 
  • बादल को घिरते देखा है
  • छोटे - मोटे मोती जैसे 
  • उसके शीतल तुहिन कणों को 
  • मानसरोवर के उन स्वर्णिम 
  • कमलों को गिरते देखा है 
  • बादल को घिरते देखा है ।

प्रेम

बाबा नागार्जुन की कविताओं में अभिव्यंजित प्रणय - भाव सामाजिक शील का उल्लंघन कहीं भी नहीं करता है । इनका प्रेम स्वस्थ मनोभूमि पर चित्रित गार्हस्थिक प्रेम है । शालीनता , गरिमा और उदात्तता उसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं । ' सिन्दूर तिलकित भाल ' प्रेमानुभूतियों को व्यंजित करने वाली शीर्षस्थानीय कविता है । इसमें प्रिया की स्मृति के समानान्तर ही नागार्जुन का कवि मिथिलांचल की सुखद , मादक स्मृतियों में भी डूब जाता है । आम , लीचियाँ , धान के खेत , कमल , कुमुदिनी , ताल , मखाना और वेणुबन भी उसकी आँखों में तैर जाते हैं । 

नागार्जुन का विरह मात्र विरह नहीं है । उसमें करुणा का गहरा पुट है । इस प्रकार नागार्जुन की प्रणय - भावना स्वस्थ , जीवन्त और प्रेरणास्पद है । स्वतन्त्र प्रेम की परिचायिका पंक्तियाँ इस प्रकार हैं 

  • तुम नहीं हो पास
  • मैं तो तरसता हूँ 
  • प्यार के दो बोल
  • सुनने के लिए 
  • एक की ही दस अंगुलियाँ 
  • नहीं हैं काफी कदाचित् 
  • रेशमी परितृप्तियों का 
  • जाल बुनने के लिए । 

और जब कवि रेशमी परितृप्तियों का जाल बुन लेता है , तो जी भरकर गंध , रूप , रस और स्पर्श का भोग भी कर लेता है । इसी क्रम में कवि की उस मनोदशा को भी विस्मत नहीं किया जा सकता , जिसके वशीभूत होकर वह सहज अनुराग और सौंदर्यानुभूतियों से भरकर प्रभात बेला में अपने पास ही लेटी प्रिया को जगाता हुआ विहाग गीत गाने का अनुरोध करता है । कवि ने स्वस्थ प्रेम की जमीन पर खड़े होकर लिखा है 

  • पास ही सोई पड़ी
  • श्लथ कुंताला 
  • प्रेयसी की थपथपाई पीठ
  • जग गई तो 
  • दिखाकर तारे बचे दो चार 
  • कहा मैं ने पकड़
  • उसका हाथ
  • दो घड़ी का हमारा 
  • इनका रहा है साथ 
  • हो रहे विदा
  • गा दो सुमुखि एक विहाग । 

वस्तुतः नागार्जुन का प्रेम जीवन की अनिवार्यता है । प्रणय का स्वस्थ , सहज , शालीन और पुनीत रूप ही कवि को अधिक प्रिय रहा है । प्रेम के उस छिछले वासनायुक्त आलिंगन चुम्बन और परिरम्भण वाले रूप को नागार्जुन के कवि ने कभी स्वीकार नहीं किया है । यह वह अनुराग है जिसका प्रारम्भ , विकास और परिणति सभी स्थितियों में एक समान है - एक सामाजिकता है और है एक स्वस्थ शालीन आभा ।

व्यंग्यशीलता 

बाबा नागार्जुन के काव्य की सर्वप्रमुख विशेषता व्यंग्यशीलता है । इनका व्यंग्य सटीक , पैना और धारदार है । उसमें भीतर तक छीलते जाने की क्षमता है , सतहीपन से वह कोसों दूर है , किन्तु जीवन के चौराहे पर खड़ा होकर सब ओर देखकर मुस्कराता प्रतीत होता है मानो वह कह रहा हो- ' अरे बच्चू मेरी पीन और पैनी मार से बचकर जाएगा कहाँ ? ' हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में यदि व्यंग्य का सफल प्रयोक्ता कोई है , तो वे नागार्जुन हैं । इनके करीबी दोस्त इन्हें इसी गुण के कारण ' नागा बाबा ' तक कह देते हैं । इनके व्यंग्य में बेपदर्गी , करुणा , विनोदी वृत्ति पैनापन और वक्रता का अद्भुत समीकरण है । उनके अधिकांश व्यंग्य एक सच्चे और जनहितैषी कवि के व्यंग्य हैं । उनका पैनापन जन - जीवन में व्याप्त व्यथा और तत्प्रेरित रिक्तता के कारण है । व्यंग्य प्रधान कविताओं में ' रामराज्य ' , प्रेत का बयान , आए दिन बहार के , महाप्रभु जानसन के प्रति , चन्दन और पानी , दीपक और बाती , विज्ञापन सुन्दरी , सौंदर्य प्रतियोगिता , चौराहे के उस नुक्कड़ पर , तालाब और मछलियाँ और देवता और गंगा मैया आदि कितनी ही कविताओं के नाम लिए जा सकते हैं । 

इन सभी रचनाओं में राजनीतिक नेताओं पर , काँग्रेसी नेताओं पर , भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं पर , अतिरिक्त कर - प्रणाली पर , पूँजीपतियों पर , शिक्षक की दयनीयता पर , फैशनपरस्तों पर , कृत्रिम प्रदर्शनों पर , सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों पर , साधु के रूप में जमे बैठे शैतानों पर और नारी की पराधीनता आदि पर तीखे , किन्तु महीन व्यंग्य किए गए हैं । इनमें से पंचवर्षीय योजनाओं के कारण करवृद्धि और योजनाओं की क्रियान्विति पर व्यंग्य का एक उदाहरण

  • आजादी की कलियाँ फूटी
  • पांच साल में होंगे फूल
  • पाँच साल में फल निकलेंगे
  • रहे पंत जी झूला झूल 
  • पाँच साल कम खाओ भैया 
  • गम खाओ पन्द्रह साल 
  • अपने हाथों से झाँको
  • यों आँखों में धूल ।

समसामयिक बोध 

बाबा नागार्जुन की प्रगतिशीलता का एक उल्लेख्य आयाम समसामयिक चिन्तन और संदर्भो से सम्बन्धित है । नागार्जुन न केवल सामाजिक यथार्य के कवि रहे हैं , अपितु दिन - प्रतिदिन , क्षण - प्रतिक्षण की स्थितियों से भी प्रतिबद्ध रहे हैं । उनकी प्रतिबद्धता स्वस्थ जीवन मूल्यों के निर्माण की कटिबद्धता भी है और काव्य की अनिवार्यता भी है । इसी अनिवार्यता का परिणाम है कि वे बड़ी तीव्रता के साथ समसामयिक संदर्भो , स्थितियों और घटनाओं को अपने काव्य में वाणी देते रहे है । उनकी अनुभूतियों के गोलक में सामाजिक , धार्मिक , राजनैतिक , राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय और दैनिक घटनावली के बिम्ब स्वत : ही सिमटते गये हैं और बँध से गये हैं यथार्थ और व्यंजनामूलक शिल्प में । एक ओर देश अपने निर्माण की दिशा में संलग्न हो और दूसरी ओर देशव्यापी महँगाई महामारी की तरह फैलती जा रही हो , तब कवि की अनुभूति इस रूप में व्यक्त होती है पैटन टैंक उन्होंने तोडे महंगाई के टैंक कौन तोड़ेगा ? कवि नागार्जुन अपने समय का न केवल सजग कवि है , अपितु समय का सचेत सार्थवाह भी है । यही कारण है कि यदि वह बढ़ती हुई महँगाई को देखकर चिन्तित है पुलिस छात्र संघर्ष , देशव्यापी भ्रष्टाचार , स्वार्थ , अवसरवादिता और कुत्सित विचारणा के प्रति भी सतर्क है । उसकी दाहिनी आँख में यदि सामाजिक विकृतियों के ध्वंस का संकल्प दीपित है तो बायी आँख में उन विकृतियों को चुन - चुनकर दाई आँख तक पहुंचाने का श्रमजनित भाव भी प्रतिभासित है । देशव्यापी भ्रष्टाचार को देखकर उनका हृदय कराह- उठता है । वह अष्टाचार को रावण का रूप देकर अपना आक्रोश इस प्रकार व्यक्त करता है

  • राम - राज में अब की
  • रावण नंगा होकर नाचा है
  • सूरत शक्ल वही है भैया
  • बदला केवल ढांचा है
  • नेताजी की नीयत बदली
  • फिर तो अपने ही हाथों
  • भारत माता के गालों पर
  • कसकर पड़ा तमाचा है ।

विद्रोह और क्रांति 

बाबा नागार्जुन के काव्य का एक महत्वपूर्ण स्वर विद्रोह और क्रांति से सम्बन्धित है । क्रांति और विद्रोह की वाणी बोलने वाला कवि व्यंग्यपरक शैली में अन्याय और अत्याचार का विरोध करता है । यदि छद्मवेशी नेताओं को देखकर उसका मन विद्रोह कर उठता है तो छल - कपट का व्यवहार करने में पटु राजनीतिज्ञों पर वह बरस पड़ता है । धोखाधड़ी , भष्टाचार , पाखण्ड , स्वार्थ , लोभ और ईर्ष्या आदि भावों के सहारे कालयापन करने वाले व्यक्तियों और साधुवेशी कुकर्मियों से उसे नफरत है । ऐसे लोगों के प्रति उसका आक्रोश पैनी और चुभने वाली शैली में व्यक्त हुआ है । क्रांति और विद्रोह की शैली में कवि ने लिखा है 

  • देश हमारा भूखा नंगा
  • घायल है बेकारी से
  • मील न रोटी भर के 
  • दर - दर बने भिखारी - से 
  • स्वाभिमान सम्मान कहाँ है 
  • होली है इन्सान की
  • बदला सत्य , अहिंसा बदली
  • लाठी गोली डंडे हैं
  • कानूनों की सड़ी लाश पर 
  • प्रजातंत्र के झंडे हैं
  • निश्चय राज्य बदलना होगा
  • शासक नेताशाही का
  • पद लोलुपता
  • दलबन्दी का
  • भ्रष्टाचार तबाही का ।

युगीन विषमता

बाबा नागार्जुन के काव्य की एक अन्य प्रमुख प्रवृत्ति युगीन विषमताओं और विकृतियों की तीखी व्यंजना है । इन्होंने समाजव्यापी कुरीतियों , विकृतियों और असंगतियों को यथार्य की खुनी आंखों से देखा है । समूचे भारत के दुख - दर्द , शंका - कुशंका , पीड़ा - छटपटाहट  , ग्रामीण व नगरीय जीवन की विषमताओं , मजदूरों की विषमताओं , अभावों में पल रही जिन्दगी , नगरीय परिवेश में व्याप्त आपाधापी , स्वार्थपरत यांत्रिकता और शोषण तथा पूंजीपतियों के अत्याचार व उत्पीड़न की कथाओं के सहारे विकसित व्यथा प्रसंगों की मुंहबोलती तस्वीर इनकी कविताओं में कैद है । असल में समूचा युग और आजादी के बाद का भारत नागार्जुन ने शब्दों में बांध दिया है । भुखमरी , अकाल , बाढ़ , महामारी , महंगाई और बेरोजगारी के प्रकोप और फूत्कार से त्रस्त जनता के दुख -दर्दों  को शब्दों का सादा जामा पहनाकर भी कवि सघन प्रभाव उत्पन्न कर सका है

  • कहीं बाढ़ भूचाल कहीं पर , कहीं अकाल कहीं बीमारी
  • महंगाई की क्या नजीर दूं मानो दुपद सुता की सारी । 
  • भूखों मरो चबाओ पली , मगर अन्न का नाम न लेना 
  • कहीं न तुम भी पकड़े जाओ , कहीं सफाई पड़े न देना । 

' प्यासी पथराई आंखों की ' आदम का तबैला कविता में एक मध्य वित्तीय परिवार के करुण चित्र हृदय को द्रवित कर देते हैं

  • उपर देखते हैं बाल्टियों के ढेर , 
  • पितरों की प्यासी रूहें । 
  • अंगूठा चूसती है नवजात बच्ची , 
  • खिड़की से लटका है लाल खिलौना ।
  • शोषितों और उपेक्षितों के प्रति सहानुभूति 

बाबा नागार्जुन की कविताएँ भारत के जनजीवन की मुंह बोलती तस्वीर हैं , जिनमें नगरीय और ग्रामीण समाज की विषमताओं , विवशताओं और विकृतियों के गहरे रंग भरे गये हैं । लोक - चेतना के कवि नागार्जुन ने संतप्त , उपेक्षित और मर्दित जन - समुदाय का चित्रण करके ही नहीं छोड़ दिया है , अपितु उसके प्रति अपनी गहरी सहानुभूति भी अर्पित की है । स्वयं संघर्षों में पलने के कारण तथा निरन्तर विषमताओं की चक्की में पिसते रहने के कारण नागार्जुन का मन पर्याप्त मानवीय और सहानुभूतिशील हो गया है । ' सच न बोलना ' और ' राम राज ऐसी कविताएँ हैं जिनमें कवि पूँजीपतियों के दारुण अत्याचारों में पिसती जनता के प्रति द्रवित है । जब वह कहता है कि 

  • ' खादी ने मलमल से अपनी साठ - गाँठ कर डाली है , 
  • बिड़ला , टाटा और डालमिया की तीसों दिन दिवाली है

या 

  • जमींदार है साहूकार है बनिया है , व्यापारी है , 
  • अन्दर - अन्दर विकट कसाई बाहर खदरधारी है 

तो युगीन विकृतियों से पीड़ित कवि की आत्मा न केवल चीत्कार करती है , अपितु वह इनके दवारा उपेक्षितों प्रति सहानुभूति व करुणार्द्र होकर उन्हीं की पंक्ति में जा खड़ा होता है । नींद नहीं आती है कविता में भी कवि कृषकों और मजदूरों के प्रति पर्याप्त सहानुभूतिशील हो उठा है 

  • कुली मजदूर है बोझा ढोते हैं खींचते हैं ठेला
  • भूल , धुँआ भाप से पड़ता है सबका पाला
  • थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर 
  • सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन ।

सहानुभूति और करुणा

सहानुभूति और करुणा का भाव भी नागार्जुन के काव्य का सशक्त स्वर है । उनकी करुणा और सहानुभूति का जल न केवल मजदूरों कलाकारों और मध्यवर्गीय व्यक्ति के मानस की प्यास बुझाता है , अपितु पुलिस के जुल्म से त्रस्त और क्षुब्ध विद्यार्थी वर्ग को भी उतनी ही शक्ति देता है । शिक्षा के मंदिरों में पुलिस की दखलंदाजी कवि की आत्मा को कचोटती है और उसका सारा आक्रोश उन पर उतरता है जो विद्यार्थियों को उत्तेजक कार्यवाहियाँ करने को प्रेरित करते हैं । वी . एन . कॉलेज पटना में हुए गोलीकाण्ड से दुखी होकर ही नागार्जुन ने ' ऐसा क्या अब फिर फिर होगा कविता लिखी थी । प्रेत का बयान ' कविता में भी जहाँ कवि जीवन की विसंगतियों , भयावहताओ और त्रासद स्थितियों को संकेतित करता है , वहीं उसकी करुणापूरित वाणी प्राइमरी शिक्षक की पीड़ित स्थितियों पर भी मरहम लगाती है । प्राइमरी स्तर के शिक्षक को केन्द्र बनाकर लिखी गयी यह कविता करुणा की भावभूमि पर लिखी जाकर अनेक सामाजिक विसंगतियों को प्रस्तुत करती है । इसमें संकेतित है कि मनुष्य अनिवार्य सुविधाओं के अभाव में काल कवलित हो रहा है । भुखमरी सर्वत्र व्याप्त है । फलतः : सामाजिक जीवन असंगतियों से ग्रसित है । अकाल , बुखार और कालाबाजार जैसी भयावह स्थितियों से जीवन अस्त व्यस्त हो रहा है । 

अत : यह कह सकते हैं कि नागार्जुन का काव्य एक चेतन कलाकार का काव्य है- उस कलाकार का जिसने जीवन को उसकी समस्त स्वीकृतियों के साथ देखा है । उसकी भयावहताओ त्रासदियों और पीड़ाओं के जटिल दुर्गम जाल में फंसे मानव समाज को समता , सहानुभूति , करुणा , आस्था और संकल्पी वृत्तियों का संदेश दिया है और इस प्रकार एक स्वस्थ समाज के निर्माण का प्रयास किया है । वह एक ऐसा कवि जो वादी , प्रवादी और प्रयोगों के जंगल में कभी भूल से भी नहीं गया है । उसकी पहुंच खेत , बबिहान , मजदूर किसान और मध्यवर्गीय व्यक्ति और जनजीवन तक रही है और उनकी ही जिन्दगी बिम्ब उसकी कविताओं में बंधते गये है ।

भाषा 

नागार्जुन कला के प्रति सतर्क कभी नहीं रहे । उनकी दृष्टि तो कथ्य की ओर रही है । उनकी मान्यता तो यह रही हैं कि काव्य वजनी हो , बात गहरी हो तो शिल्प स्वत : ही तद्नुकूल आचरण करने लगता है । नागार्जुन ने कतिपय कविताओं में संस्कृत शब्दावली का प्रयोग भी किया है । जहाँ संस्कृतनिष्ठ शब्दावली काम में ली गयी है , वहीं वह शब्दावली कवि की प्रकृति के अनुकूल प्रतीत नहीं होती है । ' भस्मांकुर ' काव्य की भाषा तो अधिकांशत : तत्समीकरण की प्रवृत्ति युक्त है । इसी प्रकार ' बादल को घिरते देखा है और ' जन - वंदना कविताओं में भी संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के दर्शन होते हैं ।

नागार्जुन की काव्य - भाषा में जहाँ एक ओर संस्कृत के शब्दों का प्रयोग हुआ है , वहीं तदभव शब्द भी प्रचुरता से आये हैं । जनकवि होने के नाते नागार्जुन की कविताओं में लोकभाषिक आग्रह अधिक दिखाई देता है । जनता के मन की बात को जनता की भाव में कहने वाला नागार्जुन अपनी भाषिक संरचना में सरल , स्पष्ट और बोलचाल के शब्द को ही अधिक अपनाता रहा । उनकी भाषा भावों के अनुसार न केवल बदलती रही है , अपितु जनमानस की संवेदनाओं के रंगों में ही बनती भी रही है । भाषा को सामान्य स्तर पर लाने के प्रयास में ही नागार्जुन ने ग्रामीण शब्दों का प्रयोग किया है । बंगला , अंग्रेजी , उर्दू और फारसी के शब्दों का सहयोग नेकर नागार्जुन ने अपनी अभिव्यंजना को सरल से सरलतम और स्पष्ट से स्पष्टतर बनाने का प्रयास किया है । 

छन्द-अलंकार

बाबा नागार्जुन के काव्य में प्रयुक्त छन्दों का निजी वैशिष्ट्य भी है और शास्त्रीय आधार भी है । उन्होंने प्रगीतों की भी सृष्टि की है और मुक्त छन्द का प्रयोग भी सफलतापूर्वक किया है । जितनी सफलता उन्हें प्रगीत सृष्टि में मिली है , उतनी ही सफलता मुक्तछंदीय प्रयोगों में । छन्दबद्ध तुकान्त कविताओं में गेयता है , लय है , तुक - ताल है । छन्दबद्ध कविताओं में कुछेक कविताएँ ऐसी भी हैं जो छंदों की सीमा को स्वीकारती हुई भी अतुकांत हैं । कहीं - कहीं तुकांत कविताओं में मात्रिक क्रमबद्धता का अभाव भी दिखाई देता है । केदार अग्रवाल को सम्बोधित कविता इसी प्रकार की है । स्वतन्त्र और मुक्त छन्द का प्रयोग भी नागार्जुन ने बड़ी सफलता से किया है । ' बौद्ध भिक्षुणी ' से सम्बन्धित कविता इसका सफल उदाहरण है । प्रेत का बयान , वे और तुम जैसी कविताएँ भी छांदसिक कलात्मकता का ही उदाहरण हैं । भस्मांकुर काव्य बरवै छन्द में लिखी गयी रचना है । 19 मात्राओं के इस छन्द के प्रयोग से नागार्जुन ने अपनी मौलिकता प्रकट की है । इससे आनाध्य काव्य में न केवल सरसता , मधुरता और स्निग्धता का संचार हुआ है अपितु प्रवाहशीलता व गत्वरता का विनियोग भी सहज ही हो गया है ।

जनता की भाषा में अपनी बात कहने वाले बाबा नागार्जुन अलंकारों के पीछे नहीं पड़े है । अपनी बात कहने की उनकी अलग अदा है । फिर जिनके पास अदा हो और अपनी भाव पूंजी हो तो वह किसी बाहरी तत्व का सहारा क्यों ले ? , यदि किसी को ऐसे अदाकार की अदा पसन्द हो तो वह चाहे तो उसकी अदा का हमराज बन जाये । नागार्जुन एक ऐसे ही- अदाकार हैं । उन्हें अलंकारों की जरूरत नहीं पड़ी है । अलंकार भले ही उनकी अदा के कायल होकर उनके पास चले गये हों और आकस्मिक रूप से आये मेहमान की तरह यदि उन्हें कवि ने उपकृत कर दिया हो , तो जुदा बात है । सौ बात की बात यह है कि नागार्जुन ने अलंकारों के प्रति ममत्व नहीं दिखाया है । हॉ , अपनी भावानुभूतियों की अभिव्यक्ति करते समय स्वत : ही चलकर आये मित्र की तरह उन्हें निराश लौटाया भी नहीं है । फलतः जहाँ तहाँ उपमा , रूपक , असंगति , विरोधाभास , मानवीकरण और उत्पेक्षा आदि के प्रयोग मिल जाते हैं । उनका प्रकाशित काव्य ' भस्मांकुर ' अवश्य ऐसा है जिसमें अनेक नये पुराने अलंकारों को अपनाकर कवि ने अपने कथ्य को मार्मिक शैली में प्रेषणीय बनाया है । उपमा के कतिपय आकर्षक प्रयोग ' भस्मांकुर में देखे जा सकते हैं ।

बिम्ब-प्रतीक 

नागार्जुन के बिम्बों में ताजगी है , सरसता है , चुटीलापन है और कहीं - कही वे स्मृति के सहारे भी खड़े किये गये हैं , किन्तु अधिकांश ऐन्द्रिय संवेदनों के सहारे निर्मित हुए हैं । नागार्जुन के दृश्य या चाक्षुष बिम्ब सर्वाधिक स्पष्ट और प्रभावशाली बन पड़े हैं । नागार्जुन के काव्य में भावबिम्बों की भी कमी नहीं है । इन्होंने प्रेमजनित स्थितियों में सम्बन्धित अनेक बिम्ब प्रस्तुत किए हैं ।नागार्जुन ने ऐन्द्रिय बिम्बों के दृश्य , श्रव्य , घण , रंग , आस्वादय और स्पर्श बिम्बों की सफल सृष्टि की है । ' भस्मांकुर ' काव्य में नागार्जुन ने कम्पन बिम्ब , ' थरमल इमेजेज तक का प्रयोग किया है । 

नागार्जुन ने सफल और आकर्षक बिम्बों की सृष्टि की है । उन्हें सर्वाधिक सफलता वस्तुपरक या चाक्षुष बिम्बों और ऐन्द्रिय संवेदना पर आधारित बिम्बों में मिली है । उनका काव्य प्रतीकों , बिम्बों दोनों ही दृष्टियों से न केवल कलात्मक है , अपितु पाठकीय संवेदना को गहरे तक छूता है । 

बाबा नागार्जुन का काव्य जनकाव्य है । उसमें सीधी और सरल भाषा शैली को अपनाया गया है , किन्तु ये सीधे सरल और व्यावहारिक शब्द ही अनेक बार प्रतीक बनकर आये हैं । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि एक सफल व्यंग्यकार होने के नाते नागार्जुन के काव्य में प्रतीक अपनी अनिवार्यता लेकर आये हैं । प्रतीकों के सहारे ही यह कवि अपने अभीष्ट भाव की व्यंजना कर सकने में सफल हुआ है । ' भुस का पुतला कविता में कांग्रेसियों को भुस का पुतला कहा गया है । देश की विविध समस्याओं को सुलझाने में उनकी असमानता को कवि नागार्जुन ने खेत में खड़े मौन पुतले के समान माना है । 

नागार्जुन ने प्रतीकों में समसामयिक समस्याओं , नेताओं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तियों आदि पर करारे व्यंग्य किये हैं और इन सभी के लिए उसने प्रतीकों का प्रयोग किया है । इनमें अर्थ - भार वहन करने की अद्भुत क्षमता है , प्रेषणीयता का विलक्षण गुण है और ये प्रतीक ही है जो कवि के अभिप्रेत को मनोरंजक और प्रभावी शैली में व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं ।

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