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हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-प्रगतिवाद(History of Hindi literature - Progressivism)

आधुनिक काल-प्रगतिवाद 
Progressivism of Hindi literature






प्रगतिवाद
प्रगतिवादी कविता
                प्रगति शब्द का शाब्दिक अर्थ है-आगे बढ़ना,किन्तु हिंदी साहित्य में प्रगतिवादी शब्द का प्रयोग इस अर्थ में न होकर उस विचारधारा के अर्थ में हुआ है जो विचारधारा राजनीतिक क्षेत्र में साम्यवाद या मार्क्सवाद कहलाती। अतः हम कह सकते हैं कि साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लिखी गयी कविता प्रगतिवादी कविता है। साम्यवादी विचारधारा समाज को दो वर्ग शोषक व शोषित वर्ग में बांटकर देखती है।शोषक वर्ग में पूंजीपति, उद्योगपति और जमींदार आते हैं जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करते हैं।शोषित वर्ग गरीब,मजदूर, किसान और श्रमिक आते हैं जिनका शोषण किया जाता है।
        साम्यवादी विचारक समाज मे समता स्थापित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं शोषण की प्रक्रिया बन्द हो। इसलिये प्रगतिवादी कविता भी शोषण का विरोध करती है।

हिंदी कविता में प्रगतिवाद का जन्म व परिसीमा

                      हिंदी में प्रगतिवाद का आरम्भ 1936ई. में होता है। 1936-1943ई. तक के कालखण्ड को प्रगतिवादी युग के नाम से जाना जाता है।जिन कवियों ने साम्यवाद से प्रभावित होकर अपनी रचनाएं की उन्हें प्रगतिवादी कवि कहते हैं। 1935ई. में पेरिस एम.फार्स्टर की अध्यक्षता में पेरिस में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का अधिवेशन हुआ। इसी तर्ज पर 1936ई. सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनन्द ने भारत में भी प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।इसका पहला अधिवेशन 1936ई. में ही लखनऊ में मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।इस अधिवेशन में प्रेमचंद ने क्रांतिकारी भाषण दिया जिसे हम प्रेमचंद की अंतिम वसीयत मान सकते हैं “साहित्यकार, देशभक्ति व राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई ही नही बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।” बाद में इस संघ के सभापति रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरु व श्रीपाद अमृत डांगे जैसे महानुभाव भी रहे। 1936 में ही प्रसिद्ध छायावादी हस्ताक्षर सुमित्रानंदन पंत ने युगांत में छायावाद के अंत की घोषणा की। 1937ई. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की प्रसिद्ध प्रगतिवादी कविता वह तोड़ती पत्थर से ही प्रगतिवादी कविता की शुरुआत हो गयी।परन्तु प्रगतिवाद की व्यवस्थित शुरुआत नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ, त्रिलोचन आदि ने ही कि।


प्रमुख प्रगतिवादी कवि व रचनाएं-


नागार्जुन (30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) 

            हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बांग्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बांग्ला से अनुवाद कार्य भी किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन ने मैथिली में यात्री उपनाम से लिखा। इनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था।

कविता-संग्रह-

युगधारा -1953
सतरंगे पंखों वाली -1959
प्यासी पथराई आँखें -1962
तालाब की मछलियाँ-1974
तुमने कहा था -1970
खिचड़ी विप्लव देखा हमने -1970
हजार-हजार बाँहों वाली -1971
पुरानी जूतियों का कोरस -1983
रत्नगर्भ -1984
ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!! -1985
आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने -1986
इस गुब्बारे की छाया में -1987
भूल जाओ पुराने सपने -1994
अपने खेत में -1997


प्रबंध काव्य-



भस्मांकुर -1970
भूमिजा
उपन्यास-
रतिनाथ की चाची -1948
बलचनमा -1952
नयी पौध -1953
बाबा बटेसरनाथ -1954
वरुण के बेटे 
दुखमोचन 
कुंभीपाक
हीरक जयन्ती 
संस्मरण-
एक व्यक्ति: एक युग 


कहानी संग्रह-


आसमान में चन्दा तैरे 


आलेख संग्रह-


अन्नहीनम् क्रियाहीनम्
बम्भोलेनाथ 


बाल साहित्य-


कथा मंजरी भाग-1
कथा मंजरी भाग-2


मैथिली रचनाएँ-

चित्रा (कविता-संग्रह) 
पत्रहीन नग्न गाछ 


बांग्ला रचनाएँ-


मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -1997 (देवनागरी लिप्यंतर के साथ हिंदी पद्यानुवाद)


 गजानन माधव मुक्तिबोध (13 नवंबर 1917 – 11 सितंबर 1964) 


                                            ये हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार थे। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है।
रचनाएं

काव्य संग्रह

 चाँद का मुँह टेढ़ा है – 196
भूरी-भूरी खाक धूल – 1980, 


निबंध व समालोचना


नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध-1964
एक साहित्यिक की डायरी- 1964
कामायनी: एक पुनर्विचार- 1973
समीक्षा की समस्याएं-1982


कहानी संग्रह 


काठ का सपना -1967
सतह से उठता आदमी-1970


उपन्यास


 विपात्र -1970


मुक्तिबोध रचनावली, नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित, (6 खंड)-1980




प्रमुख कहानियां


काठ का सपना
क्‍लॉड ईथरली
जंक्‍शन
पक्षी और दीमक
प्रश्न
ब्रह्मराक्षस का शिष्य
लेखन

केदारनाथ अग्रवाल (01 अप्रैल 1911-22 जून 2000)

                 अपूर्वा के लिये 1986 का साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवाद के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।

 प्रमुख कृतियाँ

काव्य संग्रह
युग की गंगा
फूल नहीं रंग बोलते हैं
पंख और पतवार (1979)
गुलमेंहदी, हे मेरी तुम!
बोलेबोल अबोल
जमुन जल तुम
मार प्यार की थापें
 अपूर्वा


  संस्मरण 


बस्ती खिले गुलाबों की 
उपन्यास पतिया
बैल बाजी मार ले गये


 निबंध संग्रह 


समय समय पर(1970) 
विचार बोध(1980)
विवेक विवेचन (1980) 


शिवमंगल सिंह 'सुमन' (1915-2002)



कविता संग्रह


हिल्लोल -1939
जीवन के गान -1942
युग का मोल -1945
प्रलय सृजन -1950)
विश्वास बढ़ता ही गया -1948
विध्य हिमालय -1960
मिट्टी की बारात -1972
वाणी की व्यथा -1980
कटे अँगूठों की वंदनवारें -1991


गद्य रचनाएँ


महादेवी की काव्य साधना
गीति काव्य: उद्यम और विकास


नाटक


प्रकृति पुरुष कालिदास



त्रिलोचन(20 अगस्त 191709-दिसम्बर 2007)


              इन्हें हिन्दी साहित्य की प्रगतिवादी काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। ये आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभों में से एक हैं। इस त्रयी के अन्य दो सतंभ नागार्जुन व शमशेर बहादुर सिंह थे।


कविता संग्रह


धरती(1945),
गुलाब और बुलबुल(1956),
दिगंत(1957),
ताप के ताए हुए दिन(1980),
शब्द(1980),
उस जनपद का कवि हूँ (1981)
अरधान (1984),
तुम्हें सौंपता हूँ(1985),
मेरा घर,
चैती,
अनकहनी भी कुछ कहनी है,
जीने की कला(2004)


कहानी संग्रह


देशकाल


डायरी


दैनंदिनी



 रांगेय राघव (17 जनवरी 1923 – 12 सितंबर 1962) 


             ये हिंदी के उन विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभावाले रचनाकारों में से हैं जो बहुत ही कम उम्र लेकर इस संसार में आए, लेकिन अल्पायु में ही एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि, इतिहासवेत्ता तथा रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वंय को प्रतिस्थापित कर दिया, साथ ही अपने रचनात्मक कौशल से हिंदी की महान सृजनशीलता के दर्शन करा दिए।

प्रमुख रचनाएं 


काव्य संग्रह

अजेय खण्डहर
मेधावी
पांचाली
राह के दीपक


यात्रा वृत्तान्त


महायात्रा गाथा (अँधेरा रास्ता के दो खंड)
महायात्रा गाथा, (रैन और चंदा के दो खंड)


भारतीय भाषाओं में अनूदित कृतियाँ


जैसा तुम चाहो
हैमलेट
वेनिस का सौदागर
ऑथेलो
निष्फल प्रेम
परिवर्तन
तिल का ताड़
तूफान
मैकबेथ
जूलियस सीजर
बारहवीं रात


उपन्यास


विषाद मठ
उबाल
राह न रुकी
बारी बरणा खोल दो
देवकी का बेटा
रत्ना की बात
भारती का सपूत
यशोधरा जीत गयी आदि



शमशेर बहादुर सिंह (13 जनवरी 1911- 12 मई 1993)


                आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं।
प्रमुख रचनाएं


 काविता-संग्रह 


कुछ कविताएं-1956
कुछ और कविताएं-1967
चुका भी नहीं हूं मैं-1975
इतने पास अपने-1980
उदिता - अभिव्यक्ति का संघर्ष-1980
बात बोलेगी-1981
काल तुझसे होड़ है मेरी-1988


निबन्ध-संग्रह


 दोआब


कहानी-संग्रह


 प्लाट का मोर्चा


इनके अतिरिक्त सुमित्रानंदन पंत,निराला,रामधारी सिंह दिनकर, नरेन्द्र शर्मा आदि की रचनाओं में भी प्रगतिवादी तत्व मिलता है।





प्रगतिवादी काव्य की प्रवृतियां:


शोषितों की करुणा का चित्रण

                        प्रगतिवादी कविता के केंद्र में समाज का वो वर्ग जो हमेशा पद दलित रहा है कि करुणा का गान है।
दिनकर के शब्दों में-
श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,



मां की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।




युवती के लज्जा-वसन बेच जब व्याज चुकाये जाते हैं,




मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं,




पापी महलों का अहंकार तब देता मुझको आमंत्रण,




शोषकों के प्रति रोष


                 प्रगतिवाद में शोषक वर्ग को स्वार्थी,अन्यायी, निर्दयी एवं कपटी कहा है। प्रगतिवादी पूंजीवाद को समाप्त कर देना चाहते हैं-
हो यह समाज चिथड़े-चिथड़े
शोषण पर जिसकी नींव पड़ी

धर्म व ईश्वर के प्रति अनास्था

                       प्रगतिवादी धर्म व ईश्वर को शोषण का हथियार मानते है। दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में लिखा है-
भाग्यवाद आवरण पाप का और शस्त्र शोषण का।
जिससे रखता दबा एक जन भाग दूसरे जन का।

क्रांति की भावना

                   सामाजिक समता के लिये प्रगतिवादी हिंसा को भी उचित ठहराते हैं।
काटो-काटो काटो कर लो,
साइत और कुसाइत क्या है।
मारो-मारो मारो हसियाँ,
हिंसा और अहिंसा क्या है

नारी चित्रण

              प्रगतिवादियों की नारी न तो कल्पना लोक की कोई परी है और न सौंदर्य की मूर्ति, अपितु इस लोक की मानवी है।
वह तोड़ती पत्थर
देखा मेने उसे इलाहाबाद की सड़क पर
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार,
सामने तरु मलिका अट्टालिका प्रकारा

जीवन का यथार्थ चित्रण

                       प्रगतिवादी कवियों की रचनाओं में कल्पना के स्थान पर जीवन में व्याप्त विषाद,भूख,गरीबी,बेरोजगारी, और कठिनाइयों का यथार्थ चित्रण है।

शैलीगत विशेषताएं

                     इनकी भाषा सरल व शैली अलंकार विहीन है।मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ है।आम आदमी की भाषा में काव्य सृजन हुआ है।बनावटीपन का सर्वथा अभाव है।
पन्त लिखते हैं-
तुम वहन कर सको जन मन में मेरे विचार।

वाणी मेरी चाहिए तुम्हें क्या अलंकार।।


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