हिन्दी का उद्भव एवं विकास Origin and Development of Hindi

 हिन्दी का उद्भव एवं विकास
Origin and Development of Hindi

Origin and Development of Hindi

विश्व में अनेक भाषाएँ हैं जिन्हें मुख्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. भारोपीय
  2. द्राविड़
  3. आस्ट्रिक
  4. चीनी

इनमें भारोपीय समूह सबसे बड़ा है ।

जर्मन विद्वान विल्हेम फॉन हुम्बोल्ट ने सभी भाषाओं को 13 समूहों में बांटा है ।

  1. द्राविड़
  2. हेमेटिक
  3. चीनी
  4. सेमेटिक
  5. आग्नेय
  6. अमरीकी
  7. वुशमैन
  8. यूराल
  9. काकेशस
  10. बोटू
  11. सूडानी
  12. जापानी-कोरियाई 
  13. भारोपीय

इस समूह में भारोपीय भाषा बोलने वालों की संख्या 73 प्रतिशत से अधिक है । भारोपीय भाषा परिवार को दो बड़े समूहों में वर्गीकृत किया जाता है-

  1. शतम् ( भारत-ईरानी ) 
  2. केंटम् ( यूरोपीय ) ।

शतम् भाषा के पुनः तीन उपभेद हैं 

  1. ईरानी
  2. उरद 
  3. आर्य |

केंटम् ( यूरोपीय )  भाषा समूह में ग्रीक , इटैलिक , जर्मनिक , कोल्कि , तोखारियम , इलीरियन आदि भाषाएँ शामिल हैं । 

भारतीय आर्य भाषा का विकास

भारतीय आर्य भाषा के विकास को तीन कालों में बाँटा जाता है

  1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल- 1500 ई.पू.-500 ई.पू.- वैदिक संस्कृत , लौकिक संस्कृत 
  2. मध्यकालीन आर्य भाषा काल- 500 ई.पू.-1000 ई.पू.- पालि , प्राकृत 
  3. आधुनिक आर्य भाषा काल- 1000 ई. से आज तक- अपभ्रंश तथा हिन्दी सहित आधुनिक भारतीय भाषाएँ 

भारतीय आर्य भाषा का प्रारंभिक रूप ' वैदिक संस्कृत ' के रूप में दिखाई देता है । इसका प्राचीनतम रूप ' ऋग्वेद संहिता ' में देखा जा सकता है । जब वैदिक संस्कृत साहित्यिक भाषा थी तब बोलचाल के रूप में जिस संस्कृत का जन्म हुआ उसे लौकिक संस्कृत कहा गया । रामायण , महाभारत ग्रंथों की रचना लौकिक संस्कृत में हुई । मध्य आर्य भाषा काल में संस्कृत के स्थान पर पालि व प्राकृत जनभाषाओं के रूप में विकसित हुई । प्राकृत भाषा के तीन रूप हैं - 

प्रथम प्राकृत - पालि 

द्वितीय प्राकृत - प्राकृत 

तृतीय प्राकृत - अपभ्रंश 

पालि भारत की प्रथम जन भाषा है । इसे सबसे पुरानी प्राकृत या प्रथम प्राकृत के नाम से जाना जाता है । भगवान बुद्ध और उनके अनुयायियों द्वारा इस भाषा को समृद्ध किया गया । अधिकांश बौद्ध साहित्य पालि भाषा में ही मिलता है । इसी समय भारत में प्राकृत भाषा का विकास हुआ । आचार्य हेमचंद्र ने प्राकृत को संस्कृत से निकली भाषा बताया है । जैन धर्मावलम्बियों द्वारा प्राकृत भाषा के 5 भेद स्वीकारें हैं , जो इस प्रकार हैं-

  1. शौरसेनी- शूरसेन जनपद ( मथुरा ) 
  2. पैशाची- उत्तर पश्चिम ( कश्मीर ) 
  3. महाराष्ट्री- मराठा क्षेत्र ( सौराष्ट्र ) 
  4. अर्द्धमागधी- प्राचीन कौशल राज्य / जैन साहित्य की भाषा 
  5. मागधी- मगध/आधुनिक पटना व आसपास का क्षेत्र

सन् 1000 ई . के आस - पास भारतीय आर्य भाषा एक नये युग में प्रवेश करती है । इस काल में ' अपभ्रंश ' का जन्म हुआ जिसका अर्थ है- टूटा – फूटा । परिनिष्ठित प्राकृत के स्थान पर उत्पन्न अपभ्रंश को देश भाषा , देशी , अपभ्रंश , अवहंस , अवहत्थ , अवह आदि कई नामों से जाना गया है । हिन्दी , गुजराती , बंगला , मराठी , पंजाबी आदि आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंश से ही हुआ उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात रूप प्रचलित हैं , जिनसे विभिन्न आधुनिक भाषाओं का जन्म हुआ । ये निम्न हैं-

  1. शौरसेनी अपभ्रंश- पश्चिमी हिन्दी
  2. पैशाची अपभ्रंश- लहंदा , पंजाबी
  3. ब्राचड़ अपभ्रंश- सिंधी 
  4. गुर्जरी अपभ्रंश- गुजराती , राजस्थानी तथा पहाड़ी ( कुमायुनी , गढ़वाली , नेपाली )
  5. महाराष्ट्री अपभ्रंश- मराठी 
  6. अर्द्ध मागधी अपभ्रंश- पूर्वी हिन्दी ( अवधी , बघेली , छत्तीसगढ़ी ) 
  7. मागधी अपभ्रंश- बिहारी ( भोजपुरी , मगही , मैथिली ) असमिया , उड़िया , बंगला ।

हिन्दी का प्रारंभिक स्वरूप व विकास

हिन्दी शब्द फारसी भाषा का है । फारसी को अवेस्ता भी कहा जाता है । अवेस्ता में ' स ' का उच्चारण ‘ ह ‘ किया जाता है । अतः फारसी भाषा में ' सिन्धु ' को ' हिन्दू' इस देश को ' हिन्द ' कहा गया है । हिन्द देश के निवासियों की भाषा को ' हिन्दवी ' हिन्दुई तथा हिन्दी कहा गया । हिन्दी का मूल संस्कृत है लेकिन इसका विकास संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत , प्राकृत से अपभ्रंश होते - होते शौरसेनी अपभ्रंश की उपभाषा पश्चिमी हिन्दी व पश्चिमी हिन्दी की एक बोली खड़ी बोली के रूप में हुआ जिसे कालान्तर में हिन्दी के मानक रूप में स्वीकार किया गया । काल क्रम की दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दी 13 वीं- 14 वीं शताब्दी में अपने प्रारंभिक रूप में अपभ्रंश से पृथक होती दिखाई देती है । इसे प्रारंभ में भाखा ( भाषा ) , हिन्दवी , दक्खिनी , हिन्दुस्तानी, देहलवी , रेख्ता, उर्दू , खड़ी बोली आदि के नाम से प्रयोग किया गया । ' हिन्दी ' शब्द का प्रथम प्रयोग सैफुद्दीन येज्दी के ग्रन्थ ' जफरनामा ' में मिलता है । आज ' हिन्दी ' शब्द का प्रयोग निम्न तीन रूपों में किया जाता है- 

व्यापक रूप

हिन्दी शब्द का प्रयोग हिन्दी प्रदेशों की 5 उपभाषाओं तथा उनकी सत्रह बोलियों के रूप में हो रहा है । जो निम्न हैं-

  1. शौरसेनी अपभ्रंश- पश्चिमी हिन्दी-  ब्रज, खड़ी बोली, बांगरु, कनौजी, बुंदेली
  2. अर्द्ध मागधी अपभ्रंश- पूर्वी हिन्दी- अवधी,बघेली,छत्तीसगढ़ 
  3. मागधी अपभ्रंश- बिहारी- भोजपुरी, मैथिली, मगही 
  4. गुर्जरी अपभ्रंश- राजस्थानी- मारवाड़ी, मेवाती/अहीरवाटी, ढुढ़ाड़ी, मालवी 
  5. खस अपभ्रंश- पहाड़ी- कुमायुनी, गढ़वाली, पश्चिमी पहाड़ी

शौरसेनी अपभ्रंश की प्रमुख बोलियां

ब्रज भाषा

ब्रज क्षेत्र में बोली जाने वाली इस भाषा का क्षेत्र मथुरा , आगरा , अलीगढ़ , धौलपुर , मैनपुरी , एटा , बँदायू एवं बरेली के अन्तर्गत आता है । इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । सरलता , सरसता एवं कोमलता इसकी विशिष्ट पहचान है । उच्च स्तर का साहित्य इसमें उपलब्ध है । सूरदास , नंददास , केशव , बिहारी , देव , भूषण , घनानंद , रसखान , रहीम इसके प्रमुख साहित्यकार रहे हैं । भारतेन्दु हरिश्चन्द , प्रसाद आदि साहित्यकारों ने भी अपनी प्रारंभिक रचनाओं में ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। 

ब्रज भाषा की वैयाकरणिक विशेषताएँ 

  • औकारान्त होना ब्रज भाषा में शब्दों का प्रायः औकारान्त होना पाया जाता है । जैसे- लाया का लायौ , अपना का अपनौ ।
  • ब्रज भाषा में पुल्लिंग एकवचन शब्दों के अन्त में उ तथा स्त्रीलिंग शब्दों के अन्त में इ ध्वनि रहती है । जैसे- मालिक का मालिक तथा रात का राति ।
  • ब्रजभाषा में ण का न ,क का च , ल कार , डकार , न का ल और ल का न प्रयोग होता है , जैसे- रणवीर का रनवीर , साला का सारौ , गिल्टी की गिन्टी , नम्बर का लम्बर , साड़ी का सारी , क्यों का च्यो आदि ।
  • ब्रज भाषा में स , ष , श के स्थान पर केवल स का प्रयोग होता है , जैसे- श्याम का स्यामू , श्यामल का सावरौ ।
  • ब्रजभाषा में ' मैं ' के स्थान पर ' हाँ ' का प्रयोग होता है , जैसे- हाँ नहीं जातु , आज हौं दिल्ली जातु ।
  • ब्रजभाषा में ' व ' के स्थान पर ' म ' का प्रयोग होता है , जैसे गाँव के स्थान गांम , आवेंगे के स्थान पर आमेगें आदि ।
  • ब्रजभाषा में भविष्य काल की क्रियाएँ ' द ' और ' ह ' प्रत्ययों के योग से बनती है , जैसे- बू खातु होगौ ।
  • भूतकाल की सहायक क्रिया के रूप में हो , हे , ही , भयौ , भयै का प्रयोग होता है , जैसे का भयौ ( क्या हुआ ।
  • ब्रजभाषा में संज्ञार्थक क्रियाएँ न और ब के योग से बनती है , जैसे- महां देखवौ कौ कछु ना ( वहाँ देखने को कुछ नहीं ) ।
  • ब्रजभाषा में संख्या वाचक शब्दों के रूप में कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है , जैसे- एकु , द्वै , तीनि , चारि , छै , ग्यारा , तेरा , पन्द्रा , किरोड आदि । 
  • ब्रजभाषा में निम्न विशिष्ट अव्यय का प्रयोग होता है , जैसे अजौं , अजहूँ , इतै , मनौ आदि । 
  • ब्रजभाषा में अबै , तबै , इति , उत , कित , तित आदि का प्रयोग होता है । 

खड़ी बोली 

उत्तरप्रदेश के पश्चिमी जिलों में बोली जाने वाली इस बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । खड़ी बोली नाम कैसे पड़ा इस पर काफी विवाद है । सर्वाधिक मान्यता यह है कि खड़ी शब्द मूलत : ' खरी ' से बना है और खरी ' का अर्थ है- शुद्ध । जब साहित्य में प्रयोग के लिए अरबी – फारसी को निकाल कर इसे शुद्ध रूप में प्रयुक्त किया गया तो इसे खरी बोली कहा गया , जो बाद में खड़ी बोली हो गया । खड़ी बोली के दो साहित्यिक रूप हैं , हिन्दी और उर्दू । हिन्दी में संस्कृत तत्सम शब्दों की अधिकता है जबकि उर्दू में अरबी - फारसी शब्दों की । कुछ विद्वानों के अनुसार उर्दू अलग न होकर हिन्दी की एक शैली मात्र है । यही हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा एवं राजभाषा है।

खड़ी बोली की वैयाकरणिक विशेषताएँ

  • इसमें शब्दों का प्रायः आकारान्त होना पाया जाता है , जैसे पाया , आया , मोटा , पड़ा आदि ।
  • खड़ी बोली में न का उच्चारण ण के रूप में होता है । जैसे खाणा , पाणा , आणा , दाणा आदि ।
  • खड़ी बोली में शब्दों में द्वित्व की प्रमुखता पाई जाती है । जैसे- लोट्टा , बेट्टा , गड्डी आदि ।
  • खड़ी बोली में ऐ का उच्चारण ए तथा औ का उच्चारण ओ के रूप में होता है , जैसे- पैर का पेर , पैसा का पेसा , आदि ।
  • खड़ी बोली में कुछ शब्दों का विशेष उच्चारण होता है , जैसे स्टेशन का टेशन , दूध का दूद , अब का इब , आदि ।
  • खड़ी बोली में आके , पाके , उठके , लाके , पीके , सुनके आदि पूर्वकालिक क्रियाओं का प्रयोग होता है ।
  • खड़ी बोली में कुछ संख्याओं के प्रयोग अलग हैं , जैसे- ग्यारह का ग्यारै , सौलह का सोले , उन्नीस का उन्नी आदि । 

बांगरू 

इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । इसे हरियाणवी , देसाड़ी एवं जाटू नाम से भी जाना जाता है । यह दिल्ली , करनाल , रोहतक , हिसार , पटियाला , जींद और नाभा क्षेत्र में प्रमुख रूप से बोली जाती है । पंजाबी और राजस्थानी का इस पर काफी प्रभाव दिखाई देता है । इसमें उच्च स्तरीय साहित्य का अभाव है ।

कन्नौजी

कन्नौजी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । इसमें इटावा , फर्रुखाबाद , कानपुर , शाहजाँपुर , हरदोई , पीलीभीत आदि जिले आते हैं । इसके प्रमुख कवि चिन्तामणि , मतिराम , भूषण आदि हैं । इसे ब्रज भाषा की विभाषा भी माना जाता है ।

बुन्देली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बोली जाने के कारण यह बुन्देली कहलाई । इसका क्षेत्र झाँसी , ललितपुर , ग्वालियर , सागर , बांदा , दमोह , हम्मीरपुर , ओरछा तथा इसके आसपास हैं । इसमें लोकसाहित्य काफी रचा गया है । लोकगाथा ' आल्हाखंड ' इसी भाषा की रचना है ।

अर्द्ध मागधी अपभ्रंश की प्रमुख बोलियां

अवधी

यह बोली पूरे अवधी क्षेत्र में बोली जाती है । जिसमें लखनऊ , लखीमपुर , फैजाबाद , बारांबाकी , सीतापुर , रायपुर , आदि जिले आते हैं । इसे कौशली तथा बैसवाड़ी भी कहा जाता है । अवधी का विकास अर्द्ध मागधी अपभ्रंश से हुआ है । अवधी में विशुद्ध साहित्य व लोकसाहित्य प्रचुर मात्रा में मिलता है । इसके प्रमुख साहित्यकारों में तुलसीदास,जायसी,कुतबन , आलम , मुल्लादाउद , चतुर्भुजदास , लालदास , नारायणदास , जानकीशरण , माधवानंद आदि है । 

वैयाकरणिक विशेषताएँ

  • अवधी भाषा में विशेषण अपने मूल रूप में प्राय : अकारान्त होते हैं , जैसे- छोटा के स्थान छाट , बड़ा का बड़ , भला का भल आदि । 
  • अवधी में ऐ के स्थान पर अइ तथा ओं के स्थान पर अउ का प्रयोग होता है । जैसे- अइसा , पइसा , अउरत , अउर आदि ।
  • अवधी भाषा में संज्ञा शब्दों में प्राय : इया और वा शब्द जुड़े हुए रहते हैं । जैसे- खटिया , बिलइया , बिटिया , जगदीशवा आदि ।
  • अवधी भाषा में ण का न , य का च , क का ग , लकार और ष का ख ध्वनि परिवर्तन होता है , जैसे- वाणा बान , यज्ञ का जज्ञ , काक का काग , बिजली का बिजुरी , भाषा का भाखा ।
  • अवधी भाषा में स्त्रीलिंग प्रत्यय के रूप में नि , नी , इनि , आइन का प्रयोग होता है , जैसे- सेठिन , पण्डिताइन , लोहारिन आदि ।
  • अवधी में व के उच्चारण के स्थान पर उ का प्रयोग होता है , जैसे- वकील के स्थान पर उकील , वह के स्थान पर उही आदि । 

बघेली

बघेल खण्ड क्षेत्र में बोले जाने के कारण यह बघेली कहलाई । दमोह , माडला , बालाघाट , जबलपुर , रींवा आदि जिले व इसके आसपास का क्षेत्र इसके अन्तर्गत आता है । बघेली में लोकसाहित्य ही मिलता है । 

छत्तीसगढ़ी

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में बोली जाने वाली यह भाषा रायपुर , रायगढ़ , नंदगांव , बिलासपुर , खेरागढ़ आदि जिले इसके क्षेत्र में आते हैं ।

मागधी अपभ्रंश की प्रमुख बोलियां

भोजपुरी

भोजपुर नामक गाँव के नाम के आधार पर इसका नाम भोजपुरी रखा गया है । यह पूर्वी मिर्जापुर , बनारस , राँची व पटना के पास तक , गोरखपुर , देवरिया , पलामू , शाहाबाद आदि क्षेत्रों में बोली जाती है । इसका विकास पश्चिमी मागधी अपभ्रंश से हुआ है । इसकी चार प्रमुख उपबोलियाँ है- उत्तरी , दक्षिणी , पश्चिमी तथा नागपुरिया भोजपुरी । भोजपुरी में साहित्य नहीं के बराबर है । लोक साहित्य विपुल मात्रा में है । इसकी लिपि नागरी है ।

मगही

यह गया , पटना , हजारीबाग , मुंगेर , पालामाऊ , भागलपुर एंव राँची के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है । यह मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से विकसित हुई है । इसमें लोक साहित्य प्रचुर मात्रा में मिलता है जिसमें गोपीचन्द एवं लोरिक प्रसिद्ध है । इसकी लिपि प्रमुखतः कैथी एवं नागरी है । वर्तमान में नागरी का चलन बढ़ा है ।

मैथिली

बिहारी की यह प्रमुख बोली है । मिथिला क्षेत्र में बोले जाने के कारण इसे मैथिली कहा गया है । इसके क्षेत्र पूर्वी चम्पारन , मुजफ्फरपुर , मुंगेर , दरभंगा , पूर्निया आदि है । इसका उद्भव मागधी के मध्य रूप से माना गया है । मैथिली की प्रमुख छ उपबोलियाँ उत्तरी मैथिली , दक्षिणी मैथिली , पूर्वी मैथिली , पश्चिमी मैथिली , छिका - छिकी एवं जोलहा बोली आदि है । इसके लिखने में तीन लिपियों का प्रयोग होता है- मैथिली लिपि ( मैथिली ब्राह्मणों में ) , कैथी लिपि , ( स्थानीय लोग ) और नागरी लिपि ( साहित्य रचनाओं में ) धीरे - धीरे नागरी लिपि का प्रयोग बढ़ता जा रहा है । 

गुर्जरी अपभ्रंश की प्रमुख बोलियां

मारवाड़ी

राजस्थान के पश्चिमी भाग में बोले जाने के कारण इसे पश्चिमी राजस्थानी भी कहा जाता है । जोधपुर , अजमेर , जैसलमेर , बीकानेर , सिरोही आदि जिले इस बोली के अन्तर्गत आते हैं । मारवाड़ी में प्रचुर मात्रा में साहित्य व लोकसाहित्य मिलता है । मीराबाई, कन्हैयालाल सेठिया , मेघराज मुकूल , ताराप्रकाश जोशी , विजयदान देथा , यादवेन्द्र शर्मा ' चन्द्र ', लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत आदि राजस्थानी भाषा के सशक्त हस्ताक्षर हैं ।

ढूंढ़ाड़ी

इसे पूर्वी राजस्थानी भी कहा जाता है । यह जयपुर , दौसा , किशनगढ़ , टोंक , बूँदी , आदि में बोली जाती है । इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से हुआ है । इसमें केवल लोकसाहित्य मिलता है । ढूँढाड़ी में संत काव्य भी मिलता है । तोरावाटी , काठंडा , चौरासी आदि इसकी उपबोलियाँ हैं । 

मेवाती

यह मेवात क्षेत्र में बोली जाती है । इसे उत्तरी राजस्थानी भी कहते हैं । अलवर , भरतपुर , गुड़गाँव व इसके आसपास का क्षेत्र इसके अन्तर्गत आता है । इसकी एक मिश्रित बोली अहीरवाटी है , जिस पर हरियाणवी का अधिक प्रभाव है

मालवी

यह भाषा मुख्यतः मालवा क्षेत्र में बोली जाती है । इन्दौर , उज्जैन , देवास , रतलाम , भोपाल , होशंगाबाद आदि क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं । सोंधवाड़ी , रागड़ी , पाटवी , रतलामी आदि इसकी प्रमुख उपबोलियाँ हैं ।

खस अपभ्रंश की प्रमुख बोलियां

पश्चिमी पहाड़ी

पहाड़ी की पश्चिमी बोलियों के समूह का नाम पश्चिमी पहाड़ी है । यह भद्रवाहमंडी , शिमला , लाहुल स्थिति , कुल्लू मनाली , चकराता आदि क्षेत्रों में बोली जाती है । इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के नागरी रूप से माना जाता है । इसकी प्रमुख उपबोलियाँ सिरमौरी , घाटी , जौनसारी , क्योंठली आदि है । सतलुज वर्ग , कुल्लु वर्ग , मण्डी वर्ग , भद्रीवर्ग की बोलियाँ भी इसी के अन्तर्गत आती हैं । पहले इसमें टाकरी लिपि का प्रयोग किया जाता रहा । अब यह बहीखाता लिखने तक ही सीमित रह गई है । वर्तमान में इसके लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। 

मध्यवर्ती पहाड़ी 

मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्र में बोली जाने के कारण इसे मध्यवर्ती पहाड़ी कहा जाता है । इसका उद्भव भी शौरसेनी के नागर रूप से माना जाता है । इसकी दो प्रमुख बोलियाँ हैं 

  1. कुमायूँनी 
  2. गढ़वाली

कुमायूँनी

इसका प्रमुख क्षेत्र कुमायूँ होने के कारण इसे कुमायूँनी कहते हैं । यह उत्तरांचल प्रदेश के अल्मोड़ा , नैनीताल , पिथौरागढ़ आदि जिलों में बोली जाती है । इसकी प्रमुख उपबोलियाँ खसपरजिया , कुमैयाँ , पछाई , सीराली , दानपुरिया , जोहारी तथा भोटिआ आदि है । इसमें पुराना साहित्य तो नहीं मिलता है परन्तु पिछले डेढ़ सौ वर्षों से साहित्य रचना हुई है । इसके प्रमुख साहित्यकार गुमानोपंत , कृष्णदत्त पांडे , शिवदत्त सत्ती आदि है । इसकी लिपि नागरी है ।

गढ़वाली

इसका क्षेत्र गढ़वाल है । यह उत्तरकाशी , देहरादून , सहारनपुर , बिजनौर आदि क्षेत्र में बोली जाती है । इसमें साहित्य का अभाव है । परन्तु लोक साहित्य प्रचुर मात्रा में है । ' रमोला ' उल्लेखनीय लोक साहित्य है । इसकी प्रमुख उपबोलियाँ में श्रीनगरिया , राठी , दसौलिया , नगपुरिया , सलानी तथा टेरी आदि है । इसमें नागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है ।

भाषा विज्ञान की दृष्टि से

पूर्वी हिन्दी व पश्चिमी हिन्दी की कुल आठ बोलियों को हिन्दी माना जाता है-

  • पूर्वी हिन्दी- अवधी,बघेली,छत्तीसगढ़
  • पश्चिमी हिन्दी-  ब्रज, खड़ी बोली, बांगरु, कनौजी, बुंदेली

संकीर्ण अर्थ में

हिन्दी के मानक स्वरूप ' खड़ी बोली ' को हिन्दी माना जाता है । हिन्दी के औपचारिक , वैधानिक व मानक रूप में आज खड़ी बोली को ही हिन्दी माना जाता है ।

हिन्दी के वर्तमान स्वरूप में आने तक लगभग 1100 वर्ष लगे । आज हिन्दी विश्व की समृद्ध भाषा है । हिन्दी भाषा के विकास में संस्कृत के अलावा बौद्ध भाषा पालि व जैन ग्रन्थों की भाषा प्राकृत का भी विशेष योगदान है । हिन्दी भाषा के इस विकास को निम्न तीन काल खण्डों में विभक्त किया जा सकता है

  1. हिन्दी भाषा का आदिकाल ( 1000 ई . से 1500 ई . तक ) ।
  2. हिन्दी भाषा का मध्यकाल ( 1500 ई . से 1800 ई . तक ) ।
  3. हिन्दी भाषा का आधुनिक काल ( 1800 ई . से आज तक ) ।

हिन्दी भाषा का आदिकाल ( 1000 ई . से 1500 ई . तक )

इस काल की हिन्दी पर अपभ्रंश व प्राकृत भाषा का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है । सर्वप्रथम सिद्धों , नाथों और जैन मुनियों द्वारा रचित दोहे एवं चौपाइयाँ प्राप्त होती हैं । इन पदों में धार्मिक , साम्प्रदायिक एवं समाज सुधार के विचार प्रस्तुत किए गए हैं । सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्त्व का प्रचार करने के लिये जो साहित्य लोक भाषा में रचा , वही हिन्दी के आदिकाल के सिद्ध साहित्य में झलकता है । सिद्ध साहित्य के साधनात्मक रहस्यवाद , तांत्रिक साधना , सांध्य भाषा , उलटबासियाँ , प्रवृत्ति मार्ग तथा नाथ साहित्य के नारी वर्जन , इन्द्रिय संयम पर बल , रूढ़ियों का खण्डन , निवृत्तिमूलक भावना , हठयोग साधना ने हिन्दी की आदिकालीन कविता को प्रभावित किया है । जैन साहित्य से जो मूलतः अर्द्ध मागधी प्राकृत में लिखा गया था । प्रबन्धात्मकता , चरित्र काव्य , गीति तत्त्व , रासौ ग्रंथ , बारहमासा पद्धति आदि का प्रभाव इस काल की हिन्दी पर पड़ा है । बारहवीं शताब्दी में पण्डित दामोदर के प्रसिद्ध ग्रंथ ' उक्ति व्यक्ति प्रकरण’ में प्रयुक्त हिन्दी अपने पूर्ववर्ती परिष्कृत रूप में दिखाई देती है । यह एक व्याकरण ग्रंथ है । इस काल की हिन्दी पर ब्रज भाषा का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है । अपभ्रंश मिश्रित ब्रज भाषा को सामान्यतः पिंगल के नाम से जाना जाता है । अब्दुल रहमान के ग्रंथ संदेशरासक में पिंगल , खड़ी बोली , गुजराती व राजस्थानी का प्रभाव दिखाई देता है । पिंगल के समानान्तर में पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी भाषा के रूप को डिंगल कहा गया । राजस्थान में अनेक रासो ग्रंथ डिंगल के दिखाई देते हैं जिनमें चंदवरदाई का पृथ्वीराज रासो , नरपति नाल्ह का बीसलदेव रासो , जगनिक का परमाल रासो व दलपति विजय का खुमान रासौ प्रमुख है । इस काल की राजभाषा फारसी थी । इसलिए हिन्दी में अरबी , फारसी व तुर्की शब्दों का प्रयोग होने लगा । अमीर खुसरो की रचनाओं में हिन्दी के इस रूप को देखा जा सकता है । अमीर खुसरो ( 1255-1324 ) ने पहेलियों , मुकरियों , दो सखुनों में हिन्दवी तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया है । 

15 वीं शताब्दी के कवि मुल्ला दाउद ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ' चंदायन ' में अवधी , भोजपुरी , ब्रज और खड़ी बोली युक्त भाषा का प्रयोग किया है । मिथलांचल में कवि विद्यापति की ' कीर्तिलता ' और गद्यकार ज्योतिरीश्वर ठाकुर की गद्य रचना ' वर्ण रत्नाकर ' में इस काल की भाषा के प्राचीनतम उदाहरण प्राप्त होते हैं । इस मिश्रित भाषा को कबीर , नानक , धन्ना , रैदास , पीपा आदि कवियों की रचनाओं में सधुक्कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । चौदहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों द्वारा दक्षिण भारत पर आक्रमण करने से उत्तरी भारत की हिन्दवी भाषा का परिचय दक्षिणी भाषाओं से हुआ जिससे दक्षिणी भाषाओं के मिलने से हिन्दी का एक नया स्वरूप सामने आया जिसे दक्खिनी हिन्दी का नाम दिया ।

हिन्दी भाषा का मध्यकाल ( 1500 ई . से 1800 ई . तक )

हिन्दी का यह काल उसकी सहभाषाओं के विकास का काल रहा है । इस काल में ब्रजभाषा , अवधी , राजस्थानी , खड़ी बोली , दक्खिनी , पंजाबी और उर्दू का विकास हुआ । मुगलों के शासन काल में ब्रजभाषा और अवधी में पर्याप्त साहित्य रचा गया । ब्रजभाषा में ' सूरदास ' और अवधी में मलिक मोहम्मद जायसी तथा तुलसीदास ने विशेष ख्याति अर्जित की । राजस्थान में भक्त कवयित्री मीरांबाई आदि रचनाकारों ने हिन्दी के साहित्य को साहित्यिक समृद्धि प्रदान की । धीरे धीरे हिन्दी में ब्रजभाषा का प्रभाव बढ़ता गया और रीतिकालीन आचार्य कवियों द्वारा ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप प्रदान किया । हिन्दी के इस काल में यूरोपियन जातियों का भारत से सम्पर्क स्थापित हुआ जिसके फलस्वरूप पुर्तगाली , फ्रांसीसी , डच , अंग्रेजी आदि भाषाओं के तमाम शब्द हिन्दी घुल मिल गये । आज भी हिन्दी में बड़ी संख्या में इन भाषाओं के शब्दों का प्रयोग सहज रूप में किया जा रहा है । डॉ . भोलानाथ तिवारी ने हिन्दी में 6000 अरबी - फारसी के शब्द बताएँ हैं जिनका आज भी प्रयोग हो रहा है

हिन्दी भाषा का आधुनिक काल ( 1800 ई . से आज तक )

आधुनिक काल में हिन्दी पद्य के साथ - साथ हिन्दी गद्य का प्रयोग एक युगान्तकारी घटना मानी जाती है । दिल्ली और मेरठ के आसपास बोली जाने वाली खड़ी बोली हिन्दी के मानक रूप में स्थापित हुई । भारतेन्दु हरिशचन्द्र को हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग का प्रवर्तक माना जाता है । हिन्दी गद्य की प्रथम रचना अकबर के दरबारी कवि गंगकृत ' चंद छंद बरनन की महिमा ' मानी जाती है । इस काल में हिन्दी के हिन्दुस्तानी लक्ष्य रूप का भी काफी बोलबाला रहा । उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली हिन्दी के विकास का श्रेय सन् 1800 ई . में कलकत्ता में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज को दिया जाता है । इसके संस्थापक जॉर्ज गिलक्रायस्ट , लल्लू लाल गुजराती व सदल मिश्र द्वारा खड़ी बोली हिन्दी को प्रतिष्ठित किया गया । समकालीन गद्य लेखक मुंशी सदासुखलाल तथा इंशा अल्ला खाँ का योगदान भी सराहनीय है । लल्लू लाल ने फोर्ट विलियम कॉलेज के लिए चौदह रचनाएँ लिखी । लल्लूलाल की सबसे प्रमुख रचना ' प्रेमसागर ' है । इसकी भूमिका में ' खड़ी बोली ' संज्ञा का प्रयोग किया गया है । यह ' श्रीमद् भागवत ' के दशम स्कंद का खड़ी बोली में अनुवाद है । लल्लू लाल की अन्य प्रमुख रचनाएँ- ' सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी ' , शकुन्तला नाटक , लतायफे हिन्दी है । लल्लू लाल की भाषा में अरबी - फारसी तथा ब्रजभाषा के शब्दों का बाहुल्य झलकता है । फोर्ट विलियम कॉलेज के ही दूसरे अध्यापक सदल मिश्र ने सन् 1803 में अपने प्रमुख ग्रंथ नासिकेतोपाख्यान की रचना की थी जिसका आधार कठोपनिषद है । इनका दूसरा ग्रंथ रामचरित का आधार आध्यात्म रामायण है । इनकी भाषा में खड़ी बोली के साथ साथ ब्रज , अवधी और भोजपुरी का मिश्रण दिखाई देता है । इंशा अल्ला खाँ इस युग के अन्य प्रमुख गद्यकार हैं जिन्होंने शुद्ध हिन्दवी में उदयभान चरित्र की रचना की जिसे ' रानी केतकी की कहानी ' नाम से हिन्दी की प्रथम कहानी भी कहा जाता है

इस काल में खड़ी बोली के विकास में ईसाईयों का भी विशेष योगदान है । ईसाई पादरियों द्वारा अपने मत के प्रचार के लिए खड़ी बोली हिन्दी में कई पुस्तकों का प्रकाशन कराया । इस काल में हिन्दी के विकास में अनेक पत्र - पत्रिकाओं का योगदान भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । कानपुर से सन् 1826 ई . में पण्डित जुगल किशोर चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र ' उदन्त मार्तण्ड ' प्रकाशित किया गया । यह पत्र साप्ताहिक था । इसके बाद राजा राम मोहनराय ने बंगदूत ( 1829 ) प्रजामित्र ( 1864 ) , बनारस अखबार ( राजा शिवप्रसाद 1845 ) , सुधाकर ( तारा मोहन मित्र 1850 ) , बुद्धि प्रकाश ( मुंशी सदासुखलाल 1852 ) आदि प्रमुख हैं । पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में प्रकाशित ' सरस्वती ' आदि पत्र - पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी के मानक रूप का विकास हुआ ।

हिन्दी गद्य के विकास में राजा शिवप्रसाद व राजा लक्ष्मणसिंह का योगदान 

' राजाशिवप्रसाद सितारेहिन्द ' उस समय हिन्दी - उर्दू के समन्वयकारी लेखक के रूप में सामने आए । 1856 ईस्वी में आप ' इंस्पैक्टर ऑफ स्कूल्स ' के पद पर नियुक्त हुए । हिन्दी के समर्थन में अपने विचारों को प्रसारित करने के लिए आपने ' बनारस अखबार ' नामक हिन्दी पत्र भी निकाला । ' शिवप्रसाद सितारेहिन्द ' ने तथा इनकी मित्र मण्डली ने लोगों को बोलचाल की हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित किया । इसमें अरबी - फारसी शब्दों की अधिकता थी , जिसे देवनागरी लिपि में लिखा जाता है । लोगों ने इनको अंग्रेजों का पिट्ठ मानकर इनका विरोध किया । इनके विरोध में इनके विभागीय साथी ' वीरेश्वर चक्रवर्ती ' ने भी इनकी अरबी - फारसी मिश्रित हिन्दी का विरोध किया । शिवप्रसाद सितारेहिन्द की इस शैली का विरोध करने के लिए ' बाबू तारामोहन मिश्र ने अपने साथियों के साथ काशी से ' सुधाकर ' नामक शुद्ध हिन्दी का पत्र निकाला । ' मुंशी सदा सुखलाल ' ने 1852 में आगरा से ' बुद्धि प्रकाश ' नामक पत्र निकाल कर खड़ी बोली हिन्दी का प्रचार - प्रसार किया । इसी समय ' शिवप्रसाद सितारेहिन्द ' की अरबी - फारसी मिश्रित शैली के विरोध में ' राजा लक्ष्मणसिंह ' ने अरबी - फारसी के शब्दों से मुक्त हिन्दी भाषा का समर्थन किया । ' राजा लक्ष्मण सिंह ' की मान्यता थी कि ' अरबी - फारसी शब्दों के बिना भी हिन्दी गद्य लिखा जा सकता है । इन्होंने अरबी - फारसी के शब्दों के स्थान पर संस्कृत के तत्सम शब्दों के व्यवहार पर जोर दिया । अपनी गद्य रचनाओं में इन्होंने संस्कृत की तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया । अपने पत्र ' प्रजाहितैषी ' के माध्यम से लोगों को शुद्ध भाषा ( संस्कृत शब्दावली युक्त ) लिखने के लिए प्रेरित किया । इनकी यह भाषा जनभाषा से अलग एक कठिन भाषा थी , जो लेखन तक ही सीमित रही । बोलचाल में प्रयोग नहीं हो सकी । ' राजा लक्ष्मण सिंह ने कालिदास के ' अभिज्ञानशाकुन्तलम ' , ' मेघदूत ' और ' रघुवंश ' का हिन्दी अनुवाद भी किया है । हिन्दी की दोनों शैलियों के पक्षधर राजा द्वय की शैलियाँ आगे चलकर 20 वीं शताब्दी में समानान्तर रूप से हिन्दी में विकसित हुई । द्विवेदी युग में राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द ' की शैली का प्रतिनिधित्व ' मुंशी प्रेमचंद ' ने किया । ' राजा लक्ष्मण सिंह ' की शैली को ' आचार्य रामचन्द्र शुक्ल , महावीर प्रसाद द्विवेदी ' और इनके परवर्ती गद्य लेखकों ने अपनाया । 

भारतेन्दु युग में खड़ी बोली हिन्दी गद्य का आरम्भ

' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ' ( 1850-1884 ) ने हिन्दी गद्य के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है । भारतेन्दु की गद्य शैली हिन्दी की मूल प्रकृति के अनुकूल है । उन्होंने न तो संस्कृत के तत्सम शब्दों का अनावश्यक रूप से प्रयोग किया और न ही उनका बहिष्कार किया । इन्होंने अरबी - फारसी के शब्दों का संतुलित रूप में प्रयोग किया । वहीं इनकी भाषा में ब्रजभाषा , देशज शब्दों का बड़ा स्वाभाविक ढंग से प्रयोग हुआ है । भारतेन्दु से पूर्व खड़ी बोली हिन्दी में कहीं ब्रज भाषा का प्रभाव दिखाई देता था तो कहीं पूर्वी हिन्दी की छाप , कहीं अरबी - फारसी के शब्द अधिक थे तो कहीं इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की भरमार थी । भारतेन्दु ने एक सर्वमान्य , सर्वस्वीकृत और सर्वग्राह्य रूप की खड़ी बोली का लेखन किया । इनके इसी रूप को आगे बीसवीं शताब्दी में भी अपनाया गया । भारतेन्दु युग को गद्य की विविध विधाओं उपन्यास , निबंध , नाटक , इतिहास , आलोचना , संस्मरण , यात्रा विवरण आदि के युग प्रवर्तक के रूप में भी याद किया जायेगा । भारतेन्दु ने ' कविवचनसुधा ' और ' हरिश्चन्द्र चन्द्रिका ' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी गद्य का प्रचार - प्रसार किया । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काल में प्रतापनारायण मिश्र , बालमुकुन्द गुप्त तथा बालकृष्ण भट्ट की त्रयी ने हिन्दी गद्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की । ' प्रतापनारायण मिश्र ' ने ' ब्राह्मण ' नामक पत्र निकाला और ' हिन्दुस्तान ' ( 1883 ई . ) पत्र के कुछ समय तक संपादक रहे । ' बालमुकुन्द गुप्त ' , ' भारत - मित्र ' नामक पत्र में नियमित रूप से रहे । इनके लेख ' शिवशंभू के चिठ्ठे ' काफी चर्चित रहे । सन् 1887 ई . में इन्होंने ' हिन्दी प्रदीप ' नामक पत्र इलाहाबाद से निकाला । ‘ बालमुकुन्द गुप्त ' जीवन भर पत्रकारिता से जुड़े रहे । इन्होंने ‘ चुनार ' , ' कोहिनूर ' , ' हिन्दी - हिन्दोस्तान ' , ' हिन्दी बंगवासी ' तथा ' भारत - मित्र ' आदि पत्रों का सम्पादन किया । इस युग के अन्य लेखकों में श्री निवासदास , राधाकृष्णदास सुधाकर द्विवेदी , कार्तिक प्रसाद खत्री , राधाचरण गोस्वामी बद्रीनारायण चौधरी , श्रद्धानंद फिल्लौरी , किशोरीलाल गोस्वाम आदि ने हिन्दी गद्य के विकास में विभिन्न प्रकार से योगदान दिया । भारतेन्दु युग में ' देवकीनन्दन खत्री ' एक लोकप्रिय उपन्यासकार के रूप में सामने आते हैं । इनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए बांग्ला भाषियों ने भी हिन्दी सीखी और उनके उपन्यासों की भाषा का रसास्वादन किया । देवकीनन्दन खत्री के ' चन्द्रकान्ता ' ( 1882 ) और ' चन्द्रकाता सन्तति ' ( 24 भाग 1886 ) इस काल के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले उपन्यास रहे हैं । इसी युग में बांग्ला भाषी नवीनचंद्र राय ( 1837-1890 ) ने हिन्दी में ' ज्ञान - प्रदायिनी ' ( 1867 ई . ) पत्रिका निकाल कर हिन्दी गद्य के विकास में योगदान दिया । ' स्वामी दयानन्द सरस्वती ' ने आर्य समाज के माध्यम से हिन्दी के विकास एवं प्रचार और प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । एम. के. गाँधी , दयानंद सरस्वती तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया । आजादी के बाद 14 सितंबर , 1949 को हिन्दी को देश की राजभाषा घोषित किया गया । हिमाचल प्रदेश , हरियाणा , राजस्थान , उत्तरप्रदेश , उत्तराखण्ड , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ , बिहार , झारखण्ड तथा केन्द्र शासित दिल्ली हिन्दी भाषी राज्य हैं

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