भाषा Language

 भाषा  Language

Language

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । समाज में अन्य लोगों से वह अपने भाव एवं विचार बातचीत के द्वारा सम्प्रेषण करता है । भाव - विचार के आदान प्रदान की यह प्रक्रिया अनेक तरीकों से , अनेक रूपों में होती है । अपने भाव या विचार दूसरों तक पहुंचाने या प्राप्त करने के साधन को मोटे तौर पर दो रूपों में देखा जा सकता है- मूक और मुखर । मूक साधन में वाणी का प्रयोग सर्वथा नहीं होता है जबकि दूसरे साधन मुखर में वाणी का ही महत्व है ।

मूक साधन 

इन्हें पुनः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

इंगित भाषा

इंगित भाषा के अन्तर्गत वे चेष्टाएँ जैसे - हाथ - हिलाना , नेत्र भंगिमा , मुख विकार , गर्दन हिलाना इत्यादि आती हैं । ठीक इसी प्रकार अपने विभिन्न भावों जैसे कि घृणा , क्रोध , उल्लास , प्रेम , सहमति , असहमति की अभिव्यक्ति विविध आंगिक चेष्टाओं के माध्यम से मनुष्य करता आया है । अमरीका के पश्चिमी प्रदेशों में इण्डियन जातियों में ऐसी इंगित भाषा देखी गई है । ऑस्ट्रेलिया के कुछ आदिम जनजातियों को रात में बात - चीत करते समय आग का सहारा लेना पड़ता है । इंगितों के सहारे वे अपनी बात को समझाते हैं ।

संकेत भाषा

भावाभिव्यक्ति का दूसरा एक तरीका यह भी है कि भाव या विचार को किसी संकेत या प्रतीक के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाय । उदाहरण के रूप में शिक्षक के द्वारा मेज पर हाथ पटकना- इसके द्वारा शांत हो जाने का संकेत । रेलगाडी को लाल या हरी बत्ती द्वारा रुकने या जाने का संकेत । 

इंगितों - संकेतों के माध्यम से होने वाले भाव या विचार के आदान - प्रदान का क्षेत्र व्यापक होते हुए भी इसे भाषा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसकी अपनी कुछ सीमाएं भी हैं ।

मुखर साधन

मनुष्य अपने भाव विचार के आदान - प्रदान हेतु जिस दूसरे साधन को अपनाता है , वह मुखर साधन है । इसके अन्तर्गत मानव और मानवेत्तर सभी प्रणियों की बोलियों का समावेश होता है । मुखर साधन में वाक् का प्रयोग होता है । पुन: इसके व्यक्त वाक् और अव्यक्त वाक् दो विभाग किये जा सकते हैं । 

अव्यक्त वाक् 

मानव की अपेक्षा मानवेत्तर भाषा में बहुत अन्तर तो होता है , लेकिन मूलभूत अन्तर यह है कि प्राणियों की भाषा अनिश्चित और अस्पष्ट होती है ; अत: उसे अव्यक्त वाक् या वाणी कहा गया है ।

व्यक्त वाक्

मानव द्वारा जिस मुखर साधन का प्रयोग किया जाता है उसे व्यक्त वाणी अर्थात् निश्चित स्पष्ट वाणी कहा जाता है । मानव द्वारा प्रयुक्त बोली की निश्चितता एवं स्पष्टता के पीछे उसका चिंतन है । एक सुव्यवस्थित चिंतन , प्रयत्न के परिणाम स्वरूप निःसृत होने के कारण ही वह स्पष्ट एवं निश्चित होती है । उसका अध्ययन विश्लेषण किया जा सकता है । उसे सीखा और सिखाया जा सकता है । मनुष्य की भाषा ही उसके भावों , विचारों को स्पष्टता , पूर्णता एवं सुनिश्चितता प्रदान करती है । मनुष्य द्वारा प्रयुक्त वाणी आवश्यक नहीं कि हमेशा सार्थक ही हो । मानव कृत ध्वनियाँ सार्थक भी हो सकती है और निरर्थक भी । भाषा विज्ञान केवल सार्थक ध्वनियों का अध्ययन विश्लेषण करता है ।

भाषा के संबंध में एक और बात महत्वपूर्ण है वह यह कि भाषा के द्वारा हमेशा अपने भावों की शत प्रतिशत अभिव्यक्ति नहीं होती है । कभी कभार भावातिरेक की स्थिति में भाषा असमर्थ हो जाती है तब भंगिमा के द्वारा भाव की अभिव्यक्ति होती है । साहित्य में विरह , मिलन आदि विविध स्थितियों में साहित्यकार नायक नायिकाओं की भाव - भंगिमा का सुन्दर अंकन करता है । 

भाषा केवल भाव - विचार की अभिव्यक्ति का ही नहीं विचार करने एवं सोचने का भी माध्यम - साधन हैं । बिना भाषा मनुष्य का विचार करना , सोचना भी बंद हो जाता है । अतः भाषा एवं विचार का अटूट सम्बन्ध सिद्ध होता है । वर्षों से भाषा से या भाषा द्वारा मनुष्य और समाज दोनों का निरन्तर विकास होता आया है , हो रहा है और होता रहेगा । मनुष्य और भाषा का पारस्परिक टकराव ही नये चिंतन , नयी संस्कृति , नयी सोच और नये समाज को जन्म देता है । मानव और मानवेत्तर भाषा में यह मूलभूत अन्तर है कि- बरसों से पशु - पक्षियों की वही भाषा है जब कि मानव भाषा में और मानव समाज में निरन्तर विकास और परिवर्तन देखा जा सकता है ।

भाषा की परिभाषा 

मानव भाषा को निश्चित सीमा में बांधना अर्थात उसकी परिभाषा देना उतना आसान नहीं है । आदिकाल से मानव भाषा को परिभाषित करने का उपक्रम भारत एवं पश्चिम में अनेक विदनान ने किया तथापि किसी की परिभाषा को भाषा के पूर्ण स्वरूप का उद्घाटन करनेवाली परिभाषा का नाम नहीं दिया जा सकता ।

परिभाषा शब्द अपने आप में बड़ा अस्पष्ट है क्योंकि , जिरो हम परिभाषा कहते है वह परिभाष्य वस्तु के लक्षणों , उद्देश्यों आदि के आधार पर उसकी व्याख्या भर होती है । विवेच्य वस्तु का यथाशक्ति पूर्ण एवं संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक होता है । यह कार्य परिभाषा के द्वारा सम्पन्न होता है । शास्त्रकारों ने परिभाषा की परिभाषा देते हुए लिखा है । 

" तदेव हि लक्षण ( यदव्यान्त्यतिव्यान्त्यसंभवरूप ) दोषत्रय शून्यम् " 

अर्थात जो अव्याप्ति , अतिव्याप्ति और असंभव रूप तीनों दोषों से मुक्त हो , वह परिभाषा है । यहाँ भाषा की परिभाषा देते समय इस बात का ध्यान रखा जायेगा । भाषा की निश्चित परिभाषा तक पहुँचने के लिये भारतीय एवं पश्चिमी विद्वानों के द्वारा भाषा के सम्बन्ध में जो विचार व्यक्त किये गये हैं उन्हें जानना आवश्यक है ।

संस्कृत आचार्यों का मत

प्राचीन संस्कृत विद्वानों में भाषा संबंधी चिंतन देखने को मिलता है ।

महर्षि पतंजलि ने भाषा के संबंध में कहा है " व्यक्त वाचि वर्णा येषां त इमे व्यक्त वाच : ' अर्थात् जो वाणी वर्गों में व्यक्त होती है उसे भाषा कहते हैं । 

आचार्य भर्तृहरि ने ' वाक्य पदीय ' में शब्द की उत्पत्ति और ग्रहण के सम्बन्ध में लिखा है 

" शब्दकारणमभर्धस्य स हि तेनोपजन्यते

तथा च बुद्धिविषयाददथ्राच्छब्दः प्रतीयते । 

बुद्धयर्थादेव बुद्धयर्थे जाते तदानि दृश्यते । 

अर्थात् आशय यह है कि . " शब्द - व्यापार या भाषण - प्रक्रिया बुद्धियों के बीच आदान प्रदान का माध्यम है । "

हिंदी विद्वानों के मत 

" भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली - भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकता है । " -पंडित कामता प्रसाद गुरू 

" भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चारित मूलत : प्रायः यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की दर व्यवस्था है जिसके दवारा किसी भाषा समाज के लोग आपस में विचार को आदान-प्रदान करते हैं । डॉ . भालानाथ तिवारी

" मनुष्य और मनुष्यों के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा , और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्ति ध्वनि संकेतों को जो व्यवहार होता है उसे भाषा कहते हैं । । " -डॉ . श्याम सुन्दर दास

"जिसकी सहायता से मनुष्य परस्पर विचार विनिमय या सहयोग करते हैं उस यादृच्छिक रूढ़ ध्वनिसंकेत प्रणाली को भाषा कहते हैं । " -डॉ . देवेन्द्रनाथ शर्मा 

" ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृदयगत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है ।“ डॉ . पी.डी. गुण 

" अर्थवान् कण्ठ से निःसृत ध्वनि समष्टि ही भाषा है । ” सुकुमार सेन 

भाषा मनुष्य की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं , जिसमें मनुष्य अपने उच्चारणोपयोगी शरीरावयवों से उच्चारण किये गये वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों दवारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं " डॉ . मंगलदेवी शास्त्री

पाश्यात्य विद्वानों के मत

भाषा यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके जरिए एक सामाजिक समुदाय के लोग जो एक ही संस्कृति के सहचर हैं , भावविनिमय या संवाद करते हैं । -इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका 

भाषा सम्प्रेषण का एक साधन है , जिसके द्वारा अलग - अलग मानव समुदाय अपने अपने अनुभवों का विश्लेषण करते है । -मार्टिने एलीमेन्टस ऑफ जनरल लिग्विस्टिकस

भाषा उन वाचिक प्रतीकों की यादृच्छिक व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज विशेष के सदस्य परस्पर व्यवहार और क्रिया - प्रतिक्रिया में संलगन होते हैं ।-स्त्रुत्वाँ 

भाषा वाक् प्रतीकों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति है । - स्वीट

विचारों की अभिव्यक्ति के लिये उच्चरित ध्वनि प्रतीकों के प्रयोग को भाषा कहते हैं । -ए.एच.गार्डनर

विचारों , भावनाओं और इच्छाओं को स्वेच्छा से उत्पन्न प्रतीकों के माध्यम से सम्प्रेषित करने की विर्युद्ध मानवीय ओर यत्नज पद्धति को भाषा कहते हैं । उच्चारण अवयवों से उत्पन्न माध्यम - प्रतीक प्राथमिकत : श्रावणिक होते हैं ।-एडवर्ड सपीर

भाषा का सार तत्व यह है कि - वह एक मानवीय सक्रियता है , मनुष्य - मनुष्य के बीच पारस्परिक बोध के लिए सक्रियता , ताकि वक्ता के मन की बात को श्रोता समझ सके । -येस्पर्सन

भाषा सीमित ध्वनियों से संयोजित व्यवस्था है , जिसका उद्देश्य अभिव्यक्ति होता है । -क्राचे एस्थेस्किस

चॉम्सकी भाषा को परिभाषित करते हुए उसे असीम ओर सीमित वाक्य समूहों का समुच्चय मानते हैं । -चॉम्सकी

भाषा यादृच्छिक ध्वनि - प्रतीकों की वह व्यवस्था है , जिसके सहारे कोई सामाजिक समुदाय परस्पर सहयोग करता है । -ब्लाग तथा ट्रेगर

भाषा एक व्यवस्थित ध्वनि योजना है , जिसका प्रयोग वास्तविक सामाजिक स्थितियों में किया जाता है । दूसरे शब्दों में भाषा को संदर्भ जनित व्यवस्थित ध्वनि योजना कहना समीचीन होगा । -ए.मैकिनटोश - एम.के.हैलिडे

भाषा संचरित होती है , अर्थात् प्रत्येक भाषिक उक्ति सिद्धांतों के आधार पर संघटित होती है । ये सिद्धांत प्रयुक्त शब्दों के रूप , शब्द क्रम आदि का निश्चय करते हैं ।- जे.पी. एलेन और एस.पिट काडर

इस प्रकार देखा जा सकता है कि भारतीय संस्कृत विद्वानों तथा भाषाविदों के द्वारा तथा पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा भाषा को परिभाषित करने का यत्न समय - समय पर होता रहा है तथापि भाषा की अपनी प्रकृति परिवर्तनशीलता एवं सृजनात्मकता को मद्देनजर रख प्रत्येक समय पर भाषा नया रूप धारण करती है अत : किसी एक परिभाषा को समीचीन या उपयुक्त कहना ठीक नहीं हैं । हाँ यह जरूर है कि कुछ परिभाषाएँ आज के स्वरूप के अधिक करीब एवं स्पष्टता उजागर करने में सहायक सिद्ध होती है ।

 उपयुक्त सभी मतों को ध्यान में रखते हुए भाषा के स्वरूप को निम्नलिखित बिंदुओं से व्यक्त किया जा सकता है -

भाषा प्रतीकात्मक होती है अर्थात् ध्वनि , शब्द , रूप , वाक्य , अर्थ प्रत्येक स्तर पर भाषा में प्रतीक ही है । भाषा प्रतीकों की व्यवस्था है ।

भाषा ध्वन्यात्मक प्रतीकों की व्यवस्था होती हैं । भाषा में प्रयुक्त प्रतीक ध्वन्यात्मक होते हैं मानव उच्चारण अवयवों से उच्चारित - वाक प्रतीक होते है । अन्य साधनों से अन्य प्रकार की ध्वनियों जैसी ताली बजाना , चुटकी बजाना आदि से जो ध्वनि उत्पन्न होती है वह ध्वनि भाषा के अन्तर्गत नहीं आती है भले ही उससे कामचलाऊ विनिमय होता हो । 

भाषा में प्रयुक्त ध्वनि प्रतीक यादृच्छिक होते है । ध्वनि , शब्द , रूप आदि सभी स्तर पर भाषा की व्यवस्था यादृच्छिक होती है । यादृच्छिक अर्थात् ' माना हुआ । भाषा में प्रयुक्त प्रतीक भाषा भाषी समाज द्वारा माने हुए होते है , व्यक्ति द्वारा नहीं समष्टि भाषा में ध्वनि - समष्टि या शब्द का जो अर्थ होता है वे यों ही , बिना किसी तर्क , या नियम व्याकरण आदि के माना हुआ होता है । यदि यह सम्बन्ध सहजात , तर्कपूर्ण , स्वाभाविक या नियमित होता तो सभी भाषाओं में साम्य मिलता । उदाहरण के रूप में अंग्रेजी में जिसे ' वाटर ' कहते हैं उसे हिन्दी में ' पानी ' या अन्य भाषाओं में अलग - अलग शब्द प्रतीकों से पहचाना जाता है । अगर यह संबंध यादृच्छिक नहीं होता तो संसार की सभी भाषाओं में एक वस्तु के लिए एक ही शब्द प्रतीक का प्रयोग होता । ऐसी स्थिति में भाषा भी एक ही होती । लेकिन ऐसा नहीं है । 

भाषा की विविध परिभाषाओं के विश्लेषण से भाषा के दो पक्ष उभर कर सामने आते हैं पहला है भाषा का मानसिक पक्ष और दूसरा है उसका भौतिक पक्ष । मानसिक पक्ष भाषा का अमूर्त या अप्रकट रूप है जबकि भौतिक मूर्त या प्रकट रूप । किसी भी वक्ता के बोलने वाले के मन में भावों और विचारों की अवस्थिति अमूर्त रूप में रहती ही है उन्हें प्रकट करने की इच्छा होने पर वक्ता को वागिन्द्रियों की मदद लेनी पड़ती है जिससे वह भाषा को मूर्त रूप देता है । श्रोता या सुनने वाले के मन में भी भावों और विचारों के रूप में भाषा अमूर्त रूप में मौजूद रहती है । वक्ता के अभिप्राय को श्रोता इसी कारण यथावत समझ लेता है क्योंकि वक्ता द्वारा उच्चारित भाषा श्रवणेन्द्रिय के माध्यम से उसके मन में स्थित विचारों से सामंजस्य बैठा लेती है । संप्रेषणीयता और ग्राह्यता की इस प्रक्रिया से ही विचारों का पारस्परिक विनिमय भाषा के माध्यम से संभव हो जाता है । इस प्रक्रिया में वक्ता और श्रोता के मध्य सामंजस्य होना अति आवश्यक है । यदि श्रोता वक्ता की भाषा नही जानता तो अर्थ संप्रेषण नहीं हो पाएगा । कई बार वक्ता और श्रोता के मध्य बौद्धिक स्तर भेद के कारण भी अर्थ संप्रेषण में बाधा पहुंचती है । भाषा की इसी विशेषता को लक्ष्य कर बी.एल. हार्फ ने अपनी पुस्तक Linguistic velativity ( भाषा सापेक्ष्यता ) में कहा है " भाषा विश्व को देखने के लिए एक प्रकार की ऐनक है जो केवल एक भाषायी समाज के लिए नजर बनने का काम करती है । दूसरा समाज उसे ऐनक के रूप में व्यवहत नहीं कर पाता है और करे भी तो देख नहीं पाता हैं । 

भाषिक संप्रेषण के आधार पर भाषा के तीन पक्ष माने गये हैं –

  1. उच्चारण पक्ष 
  2. संवहन पक्ष 
  3. ग्रहण पक्ष 

उच्चारण पक्ष

वक्ता के मन में अवस्थित भाव या विचार पहले मानसिक स्तर पर वाक्य के रूप में आकार ग्रहण करते हैं इसके पश्चात वक्रता क्रम से वाक्य की ध्वनियों को उच्चारित करता है । उदाहरण के लिए तुम घर जाओ = त् + उ + म् + अ + घ + अ + र + अ + ज + अ + ओ । भाषा के इस पक्ष का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है ।

संवहन पक्ष

जब वक्ता ध्वनियों का उच्चारण करता है तो वे वायु तरंगों से प्रवाहित होती हुई श्रोता के कर्ण कुहर में प्रवेश करती है । जैसे शांत तालाब में कंकड़ फैंकने पर लहरों का एक वृत्त आकार ग्रहण करता है और कुछ दूरी तक जाते जाते लहरों का वृत क्षीण होकर पुन : जल में खो जाता है , उसी प्रकार उच्चरित ध्वनियां एक खास दूरी के बाद सुनाई नहीं देती । इसे भाषा का संवहन पक्ष कहते हैं इस पक्ष का अध्ययन भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत सूक्ष्मता से एवं विस्तार पूर्वक किया जाता है । 

ग्रहण पक्ष

वक्ता जिन ध्वनियों का उच्चारण करता है , वे वायुतरंगों के माध्यम से श्रोता के कानों तक पहुंचती है और उसके मन में उसी शब्द बिंब का निर्माण करती है जो वक्ता के मन में अवस्थित था । यही अर्थ बोध है । कान के जरिए ध्वनियां मस्तिष्क तंतुओं तक किस प्रकार पहुंचती है और उनसे शब्द बिंब कैसे बनता है ? इस पहलू का अध्ययन शरीर विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है ।

जब दो व्यक्ति बातचीत करते है तो क्रमश : दोनों वक्ता एवं श्रोता की भूमिका का निर्वहन करते हैं । वक्ता की बात खत्म होने पर वह श्रोता बन जाता है और श्रोता वक्ता । यह क्रम बातचीत समाप्त होने तक चलता रहता है । 

भाषा की अपनी व्यवस्था होती है । हर भाषा की ध्वनि , शब्द , रूप , वाक्य एवं अर्थस्तर की निश्चित व्यवस्था होती है व्यवस्था के कारण ही भाषा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व होता है । व्यवस्था के कारण ही वह भाषा बनती है , उसे मानक स्थान की प्राप्ति होती है अन्यथा वह बोली या सामान्य ध्वनियों का समूह मात्र रह जाती है । व्यवस्था से ही भाषा की पहचान होती है । 

भाषा का प्रमुख प्रकार्य सम्प्रेषण है अर्थात् भावों विचारों का आदान - प्रदान । दुनिया में अभी तक इससे अधिक समर्थ और सक्षम साधन नहीं बना है । यदि सृष्टि परमात्मा द्वारा रचित सुन्दर सृजन है तो इस सृष्टि में भाषा सबसे महत्वपूर्ण विचार - विनिमय साधन है । भाषा के माध्यम से सामान्य से लेकर विशेष प्रकार के भाव - विचारों का आदान - प्रदान होता है । दुनिया में मानव समाज , संस्कृति सभ्यता या विविध क्षेत्रों में हुए विकास और उस विकास को जन - जन तक पहुंचाने का माध्यम एकमात्र भाषा है । भाषा का प्रयोग निश्चित मानव - समुदाय या समाज विशेष में होता है । भाषा के प्रयोक्ताओं का वर्ग तथा उसका निश्चित क्षेत्र होता है । जैसे मराठी का महाराष्ट्र , गुजराती का गुजरात , असमिया का असम , आदि । वैसे भाषा प्रयोग की दृष्टि से किसी सीमांकन की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि एक वक्ता और श्रोता अर्थात दो समान भाषाभाषी मिलने पर दुनिया में कहीं भी किसी भी भाषा को बोला - समझा जा सकता है ।

निष्कर्षत : कहा जा सकता है कि - " भाषा मानव उच्चारण अवयवों से उच्चरित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा समुदाय विशेष के लोग परस्पर विचार - विनिमय करते हैं । " 

भाषा के अभिलक्षण

जब भाषा के अभिलक्षण की बात की जाती है तो उससे आशय यह है कि भाषा ( मानव भाषा ) की विशेषता या मूलभूत लक्षण कौन से हैं जो उसे मानवेत्तर भाषा से अलग करते है । ऐसी कौन सी बात है जिससे मानव भाषा मानवेत्तर भाषा या अन्य भाषा रूपों से अलगाती है । संसार में मानवभाषा संप्रेषण का सर्वोत्कृष्ट साधन हैं । सृष्टि में सभी पशु - पक्षी , जीव जन्तु ओर यहां तक वनस्पति , पेड़ - पौधों , जलवायु आदि के बीच भी एक विशेष प्रकार से तार जुड़ा हुआ है पारस्परिक जुड़े तन्तु से परस्पर आदान प्रदान भी होता है । सम्प्रेषण को व्यापक धरातल पर देखने पर विभिन्न ज्ञानानुशासनों ने अपने - अपने क्षेत्र में खोज करके इस बात को एक या दूसरे रूप में , एक या दूसरा नाम देकर इसे सिद्ध किया है । यहां उस विस्तृत संदर्भ की चर्चा असंगत होगी परन्तु मोटे तौर पर मानव और मानवेत्तर भाषा के बीच अन्तर के प्रमुख मुद्दों की चर्चा करना आवश्यक है । जिसकी चर्चा जाने माने भाषा वैज्ञानिकों ने की हैं जिसकी पीठिका पर भाषा के अभिलक्षणों की बात की जा सकती है । 

मानव और मनावेत्तर भाषा 

भाषा की परिभाषा की चर्चा करते समय मानव और मानवेत्तर भाषा के कुछ मूलभूत मुद्दों का जिक्र किय गया है । वस्तुत : कुछ साम्य होते हुए भी मानव और मानवेत्तर भाषा एक नहीं है । इस बात को भूलना नहीं चाहिए । प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक हॉकेट Hockett : The origin of speech लेख में , मैकमेल : Mc Neill : The Aquisition of Language लेख में , तथा चोम्सकी - Chomsky : Cartesian Linguistics में इस विषय पर अपने विचार प्रकट किये हैं । हॉकेट ने मानव ओर मानवेत्तर भाषा की तुलना सर्जनात्मकता यादृच्छिकता तथा पैटर्न की वैधता आदि तेरह आधारों पर की है । मैकनेल ने दो आधारों की बात की है संरचनात्मक ओर प्रकार्यात्मक , जैसे संरचनात्मक दृष्टि से मानव भाषा में योजन - व्यवस्था होती है । विभिन्न ध्वनियों के संयोग से शब्द , शब्दों के संयोग से वाक्य बनते हैं । प्रकार्यात्मक आधार में तीन प्रकार्य की चर्चा है- वस्तुओं को संकेतिक करने वाला वस्तुपरक प्रकार्य , भावों को संकेतक करने वाला भाव  प्रकार्य तथा बाह्य घटनाओं या आंतरिक स्थिति के विषय में कथन करने वाला प्रकथनपरक प्रकार्य है । 

चोम्सकी ने सृजनात्मकता के आधार पर मानव और मानवेत्तर भाषा को अलगाने का प्रयास किया है । मानव अपनी भाषा के माध्यम से नये या पुराने भावों को असीमित रूप में अभिव्यक्ति दे सकता है जबकि मानवेत्तर भाषा में अभिव्यक्ति की शक्ति सीमित होती है , दूसरी बात यह कि - मानवेत्तर भाषा प्राय : उद्दीपन अनुप्रक्रिया के रूप में ही होती है जब कि मानव भाषा नहीं । तीसरी प्रमुख बात यह कही है कि मानव भाषा किसी भी अननुमानित , अज्ञान , या नये से नये संदर्भ को अभिव्यक्ति देने में समर्थ होती है जब कि मानवेत्तर भाषा में यह क्षमता नहीं होती है । मानव और मानवेत्तर भाषा को अलगाने की इस प्रक्रिया से ही भाषा के अभिलक्षणों का जन्म हुआ । अलग - अलग भाषा वैज्ञानिकों ने इन अभिलक्षणों की चर्चा अलग - अलग संख्या में गिनाते हुए की है जैसे हॉकेट ने सात अभिलक्षणों का उल्लेख किया है तो हिन्दी भाषा वैज्ञानिकों ने भी अलग - अलग नाम देकर उसकी चर्चा की हैं । संख्या या नाम के चक्कर में पड़े बिना भाषा की प्रकृति को समझना आवश्यक है अत : यहां हिन्दी के प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक भोलानाथ तिवारी द्वारा चर्चित भाषा के प्रमुख दस अभिलक्षणों की चर्चा प्रस्तुत है ।

यादृच्छिकता 

' यादृच्छिक ' का अर्थ है - ' जैसी इच्छा हो ' या ' माना हुआ । भाषा का यह प्रमुख अभिलक्षण है । भाषा में यादृच्छिकता सभी स्तर पर पायी जाती है । भाषा में जो ध्वनि , शब्द , रूप , वाक्य या अर्थ होता है वह किसी भाषाभाषी समाज द्वारा माना हुआ होता है । यादृच्छिकता वैयक्तिक नहीं समाज , भाषाभाषी द्वारा माना हुआ वैशिष्ठ्य है । जैसे कोई एक व्यक्ति कहे कि मैं ' किताब ' को ' ताकिब ' कहूंगा ऐसा मान लेता है तो वह भले ही माने पर इससे संप्रेषण नहीं होगा । जब तक यह समाज द्वारा स्वीकृत या समाज द्वारा माना नहीं जाता तब तक वह यादृच्छिक नहीं होगा । दूसरी बात यह कि यादृच्छिकता से आशय यह है कि - वह तर्कप्रसूत नहीं होता | शब्द प्रतीक से जिस वस्तु का अर्थ बोध होता है उसके बीच कोई तार्किक या वैज्ञानिक संबंध नहीं होता है और न ही कोई सहजात संबंध होता है । जैसे ' किताब ' शब्द प्रतीक और उस शब्द प्रतीक से मानसिक प्रत्यय के द्वारा जिस वस्तु को बोध होता है उनके बीच का संबंध माना हुआ होता है । हिन्दी भाषाभाषी समुदाय द्वारा उस वस्तु के लिए ' किताब ' शब्द माना हुआ है स्वीकृत है । अत : ' किताब ' शब्द बोलते ही जैसे कोई हिन्दी भाषा - भाषी सुनता है तो उसके मस्तिष्क में किताब की छवि आ जाती है । वैसे ही हिन्दी भाषा में ' किताब ' है अग्रेजी भाषा में book " तो गुजराती में ' चौपडी या पुस्तक ' | वस्तु एक है पर उस वस्तु या भाव के लिए प्रयुक्त शब्द प्रतीक अलग - अलग होते हैं । यह यादृच्छिकता के कारण ही है ।

अनुकरणशीलता 

भाषा अर्जित संपत्ति है । मनुष्य को भाषा जन्म से या पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त नहीं होती है । मनुष्य जिस परिवार , समाज में जन्म लेता है वहीं से भाषा का अर्जन करता है | भाषा सीखी जाती हैं | भाषा सृजन की प्रक्रिया अनुकरण के द्वारा होती है । प्रत्येक मनुष्य अनुकरण करके ही भाषा सीखता है । अनुकरण की यह प्रक्रिया दो रूपों में होती है । बालक अपने माता पिता , परिवार , पास - पड़ोस या अपने आस - पास के वातावरण से जाने अनजाने भाषा सीखता है । इस प्रकार से भाषा अधिगम की प्रक्रिया को अनौपचारिक अनुकरण के द्वारा भाषा अर्जन की प्रक्रिया कहा जाता है । जबकि , बालक एक उम्र के बाद स्कूल , कॉलेज , विश्वविद्यालय या अनौपचारिक रूप से शिक्षा देने वाली संस्थाओं से जो भाषा अर्जन करता है , उसे अनौपचारिक भाषा अधिगम प्रक्रिया कहा जाता है । संभव है कि जहाँ बालक औपचारिक रूप से भाषा सीखने के क्रम में गलत उच्चारण , अपूर्ण जानकारी के कारण या अनुकरण में खामी के कारण भाषा का अर्जन दोषपूर्ण रूप में करता है । इन सारे भाषा संबंधी दोषों का उपचार एवं निदान औपचारिक भाषा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के अन्तर्गत हो जाता है । एक बात और भी ध्यान रहे कि - मनुष्य जीवनभर अनौपचारिक रूप से भाषा का अर्जन करता ही रहता है , औपचारिक शिक्षा उसे भाषा सीखने सिखाने के लिए व्यवस्थित दिशा निर्देशन करती है । समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी सामाजिक , आर्थिक आदि व्यावहारिक कार्यों में भाषा ही माध्यम के रूप में काम करती है । अत : मनुष्य जीवन के हर कदम पर भाषा का अर्जन करता रहता है- अनुकरण के भाषा के माध्यम से उसके व्यक्तित्व का विकास भी होता है । भाषा सीखने योग्य होती है अत : उसी अधिगम्यता के रूप में समाज के विविध क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त होती है इसी को सांस्कृतिक संप्रेषणीयता या परम्परानुगामिता भी कहा जाता है । कुल मिलाकर कहें तो भाषा मनुष्य को मानवेत्तर पशु - पक्षी , जीवों की भांति जन्मजात या आनुवांशिक रूप में नहीं मिलती उसे सीखना - अर्जित करना पडता हैं यह अर्जन अनुकरण के रूप में होता है । 

सृजनात्मकता

मानव और मानवेत्तर भाषा को अलगानेवाला यह अभिलक्षण है प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक चौम्सकी ने सृजनात्मकता को आधार बनाकर भाषा के असीमितता के तत्व की चर्चा की है । भाषा में सीमित ध्वनियाँ , शब्द रूप होने के बावजूद मानव अपनी आवश्यकता अनुसार नित्य नवीन वाक्यों का प्रयोग करता रहा है और भाव विचार के आदान - प्रदान की शृंखला अविरत रूप से बरसों से जारी है । उसमें कहीं कोई अवरोध या बाधा उपस्थित नहीं हुई है । सब से महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हमेशा नये वाक्यों के प्रयोग के उपरान्त भी वक्ता श्रोता के बीच सम्प्रेषण सहजता , सरलता से हो जाता है दोनों की भाषिक क्षमता के अनुरूप वाक्य निरन्तर संप्रेषण का प्रकार्य पूर्ण करते हैं । मानवेत्तर भाषा में यह संभव नहीं है । एक पशु वर्षों से जैसा बोल रहा है वैसा ही आज भी बोलता है । इसी कारण मानवेत्तर भाषा में सृजनात्मकता या नया नहीं हैं । मानव भाषा में सृजनात्मकता होने के कारण ही बरसों से सभी भाषा में भाषा - भाषी भाषा का प्रयोग अपनी इच्छा और आवश्यकता अनुसार करते आ रहे हैं तथापि भाषा हर प्रयोक्ता को हर समय नयेपन या ताजगी की अनुभूति कराती है जैसे मैं , तुम , वह . इन धारी शब्दों से . मुझे , तुमसे वह बात कहने के लिये मिलता है । वह तुमसे मुझे मिलवाने की इच्छा रखता है , तुम मुझसे मिलो , उसमें उसकी खुशी है , मुझे तुमको उससे मिलवाना है । आदि अनेक वाक्यों की रचना हो सकती है ।

परिवर्तनशीलता 

भाषा परिवर्तनशील होती है । भाषा की जीवन्तता का यह प्रमाण है | भाषा और समाज का अन्तः सम्बन्ध होता है । समाज भी परिवर्तनशील होता है । समाज के परिवर्तन से आशय । समाज में रहनेवाले लोग - मनुष्य आदि का परिवर्तन । यह परिवर्तन भौतिक और मानसिक दोनों स्तर पर होता है परिस्थितियाँ बदलने पर भाषा भी मानद और समाज के अनुरूप अपना रूप बदलती है मनुष्य अपनी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भाषा - प्रयोग में बदलाव लाता है । परिवर्तन कभी स्वयं होता है तो कभी परिस्थितिवश | भाषा परिवर्तन के कई कारण होते हैं | भाषा परिवर्तन द्रुतगति से नहीं अपनी गति से होता है । संस्कृत , पाली , प्राकृत , अपभ्रंश से अनेक आधुनिक भारतीय आर्य - भाषाओं के विकास का इतिहास इसका प्रमाण है । केवल हिन्दी भाषा की ही बात करें तो सौ साल पहले की हिन्दी और आज की हिन्दी में निश्चित रूप से परिवर्तन आया है । संचार एवं प्रौटयोगिकी क्षेत्र के विकास , भूमंडलीकरण के चलते परिस्थितयों में आये परिवर्तन ने अनेक नये शब्दों का जन्म दिया है तो कुछ का परिवर्तन भी किया गया । भाषा - व्यवस्था के ढांचे में -नये वाक्य , अर्थ परिवर्तन आदि स्पष्ट नजर आते हैं । उदाहरण के रूप में -संगणक , मोबाईल , इंटरनेट , कोरोना , लॉकडाउन आदि नये शब्द तथा उससे सम्बन्धित नयी संकल्पना प्रस्तुत करने वाले पारिभाषिक शब्द , अवधारणा आदि को लिया जा सकता है । पुराने उदाहरण में देखें तो संध्या का सांझ , सूर्य का सूरज होना शब्द स्तरीय परिवर्तन है तो वैसे ध्वनि , रूप , अर्थ स्तर पर परिवर्तन के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं । भाषा में आनेवाला परिवर्तन ही भाषा को सृजनात्मक क्षमता प्रदान करता है साथ ही नयापन भी । इस अभिलक्षण के कारण ही मानवभाषा पशु - पक्षियों , अन्य जीव - जन्तुओं की भाषा से अलग पड़ती है । मानवेत्तर भाषा में परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं होती है ।

बहुघटकता या विच्छिन्नता 

भाषा अनेक स्तरीय व्यवस्था होती है । मानव भाषा की यह विशिष्टिता है कि - विभिन्न भाव एवं विथार की अभिव्यक्ति मनुष्य जिस भाषा के माध्यम से करता है वह अनेक घटकों से निर्मित होती है । जैसे कई ध्वनियाँ मिलकर शब्द , कई शब्दों के योग से वाक्य बनता है । मानव अपनी भावाभिव्यक्ति जिस प्रकार भाषा के माध्यम से करता है वैसे मानवेत्तर भाषा से पशु - पक्षी या अन्य जीव जन्तु नहीं कर सकते । और न ही उनकी अभिव्यक्ति को हम खंडों या टुकड़ों में विश्लेषित कर सकते हैं जैसे किसी मानव भाषा में हुई अभिव्यक्ति को भाषिक विश्लेषण से स्पष्ट कर सकते हैं । उदाहरण के रूप में नर - मादा पशु की आपसी भावोत्तेजक ध्वनियों को विश्लेषण संभव नहीं है जबकि मानव भाषा में हुई बातचीत को वाक्य , पद , शब्द , ध्वनि आदि में विभाजित किया जा सकता है । इस प्रकार मानव भाषा की एकाधिक इकाईयों के योग से निर्मित होने को ही बहुतघटकता या विच्छिन्नता कहा जाता है ।

अभिरचना की द्वैतता

मानव भाषा में दविस्तरीय अभिरचना होती है । जैसे एक स्तर पर भाषा सार्थक होती है तो दूसरे स्तर पर वह अर्थभेदक होती है । भाषा की दो स्तरीय व्यवस्था को ही अभिरचना की द्वैतता कहा जाता है । उदाहरण के रूप में एक वाक्य ले- सोहन स्कूल जाता है यह वाक्य स्तर है जिसका एक सुनिश्चित अर्थ है । वाक्य को विभाजित करने पर सोहन , स्कून जाता है इकाईयाँ मिलती हैं जिन्हें रूपिम कहा जायेगा । रूपिम स्तर पर भाषा सार्थक होती है परन्तु जैसे उसका आगे विभाजन करते हैं जैसे सोहन का स् + ओ + इ + अ + न + अ वैसे ही अन्य रूपिमों का विभाजन करने पर जो ध्वनियाँ प्राप्त होती है वह सार्थक नहीं होती हैं , और न ही उसे निरर्थक कहा जा सकता है । क्योंकि निरर्थक होने पर भला ये सार्थक शब्दों का निर्माण कैसे कर सकती हैं । इस स्तर पर वे अर्थभेदक होती हैं । अर्यात सार्थक न होने के बावजूद एक ध्वनि दूसरी ध्वनि के साथ मिलकर सार्थक शब्द का निर्माण करती है । जैसे क और ' ल का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता है पर दोनों के योग से कल सार्थक शब्द का निर्माण होता है । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भाषा की अभिरचना द्वैतता में एक स्तर पर भाषा सार्थक होती है जैसे - वाक्य , पद , शब्द तो दूसरे स्तर पर अर्थभेदक होती है जैसे ध्वनि स्तर पर । 

वक्ता - श्रोता की दोहरी भूमिका 

मानव भाषा में कम से कम दो मनुष्यों के बीच आदान - प्रदान की , संप्रेषण की प्रक्रिया घटित होती है । भाषा बोली जाती है अत : वहाँ वक्ता आ जाता है । भाषा सुनी जाती है अत : वहाँ श्रोता की भूमिका होती है । वक्ता - श्रोता के बीच बोलते - सुनने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है अर्थात् उदाहरण के रूप में सोहन बोलता है और रमेश सुनता है तब सोहन वक्ता है और रमेश श्रोता है । पर जब सोहन की बात सुनकर रमेश बोलता है और सोहन सुनता है तब सोहन श्रोता हो जाता है और रमेश वक्ता । भाषा - व्यवहार में वक्ता श्रोता की भूमिका हमेशा बदलती रहती है अत : भाषा में वक्ता हमेशा वक्ता या श्रोता हमेशा श्रोता नहीं रहता है । भूमिकाओं का बदलाव ही वक्ता - श्रोता की दोहरी भूमिका का निर्देश करता है ।

दिशा और काल की अंतरणता

मानवेत्तर भाषा से मानवभाषा को अलग करने वाला यह एक अन्य अभिलक्षण है । मानव भाषा के लिये स्थान और काल का बंधन नहीं होता है । जैसे मानव भाषा वर्तमान काल की सूचना तो देती है पर उसी भाषा से हम अतीत और भविष्य के विषय में भी बातचीत कर सकते हैं । उदाहरण के रूप में खड़ी बोली वर्तमान की भाषा है पर इस वर्तमान की भाषा से हम अतीत की सभी भाषाओं , परिस्थितियों के बारे में बात कर सकते हैं । ऐसा नहीं कि खड़ी बोली 1 वीं सदी में नहीं थी तो उस समय की बात नहीं कर सकते हैं । ठीक वैसे ही सौ साल के बाद क्या होगा उसके विषय में वर्तमान की भाषा में सूचना दे सकते हैं ऐसा नहीं कि उस समय वर्तमान भाषा होगी या नहीं यह तय न होने के कारण हम नहीं बता सकते । इस प्रकार भाषा कालांतरित होती है । कालांतरण की भांति भाषा स्थानान्तरण के बंधन से भी मुक्त होती है । जैसे हिन्दी , हिन्दी भाषी प्रदेशों में तो भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि यह अन्य प्रदेशों या विदेशों में नहीं बोली जा सकती । दो समान भाषा - भाषी मिलने पर भाषा का प्रयोग विश्व में कहीं भी किसी भी स्थान पर किया जा सकता है । भाषा को काल की तरह स्थान का बंधन भी नहीं होता है । 

असहजवृत्तिकता 

मानवेत्तर भाषा सहजवृत्तिक होती है अर्थात् पशु - पक्षियों में जो वृत्ति जगती है तदनुसार ध्वनियां निकालते हैं । वहाँ कोई बात छिपाने या ढंकने की नहीं होती है | मानव भाषा के माध्यम से मानव अपने भावों एवं विचारों का आदान - प्रदान करता है परन्तु हमेशा भाव एवं विचारों की सहज अभिव्यक्ति नहीं होती है । कभी कभार मानव अपने भाव या विचार को छिपाने के लिए भी भाषा का प्रयोग करता है । अर्थात् भाषा का कृत्रिम , सहज - वृत्तिक प्रयोग संभव है । उदाहरण के रूप में घर में पति - पत्नी के बीच झगड़ा होता है , परस्पर अत्यन्त गुस्से में होने पर भी उसी समय आकस्मिक किसी मेहमान के आने पर प्रसन्नता की मुद्रा में खुशी की अभिव्यक्ति करते हैं । जबकि , वे वास्तव में गुस्से में होते हैं और आकस्मिक आये अतिथि के विषय में मन में न जाने क्या सोचते हैं पर भाषा में प्यार मोहब्बत की अभिव्यक्ति करते है | किसी भाषा वैज्ञानिक ने कहा है कि भाषा से जहां एक ओर सत्य का उद्घाटन हो सकता है वही भाषा से मनुष्य सत्य को छिपा भी सकता है । निष्कर्षत : कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से मानव भाषा ऐसी विलक्षण विशेषताओं से युक्त होती है जिसके परिणाम स्वरूप वह जहां एक मानवेत्तर भाषा से अलग तो होती ही है पर साथ में मानव एवं मानव समाज के विकास एवं प्रगति की कहानी भी कहती है ।

भाषा और भाषिक व्यवहार 

भाषा की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह विचारों को संप्रेषित करने का जरिया है , लेकिन इस संप्रेषण के माध्यम द्वारा अनुष्य केवल पारस्परिक वार्तालाप ही नहीं करता विचार करता है , भाषण देता है , अभिनय एवं विनय करता है तथा स्वागत वार्तालाप जैसे अनेक कार्य कलापों में भाषा का सहारा लेता है । भाषा के विविध प्रयोगों और उपयोगों को भाषिक व्यवहार कहा जाता है । मनुष्य के भाषिक व्यवहार को तीन भागों में बांट सकते हैं-

  1. स्वागत या आत्मालाप 
  2. बातचीत या वार्तालाप
  3. भाषण ( एक वक्ता द्वारा बड़े समुदाय को संबोधित करना )

स्वागत या आत्मालाप

इसका आशय है अपने जीवन में विविध स्थितियों में स्वागत वार्तालाप करता है । विशेषकर विचार करते समय किसी आवेश अथवा उत्तेजना के क्षणों में परीक्षा आदि के लिये किसी सूत्र को कंठस्थ करते हुए अथवा पठित अंश को दोहराने के लिये ओर प्रार्थना तथा ईश्वर के सामने आत्मनिवेदन करते हुए , इन सबके अतिरिक्त नहाते हुए गुनगुनाना , बहुत छोटे शिशुओं से बातें करना , सुसुप्तावस्था में कुछ - कुछ बोलना आदि इसके अंतर्गत आते है । इस प्रकार का भाषिक व्यवहार कमोबेश हर वर्ग के लोगों में लक्षित किया जाता है ।

बातचीत या वार्तालाप

भाषिक व्यवहार का सबसे सशक्त व्यापक और महत्वपूर्ण पक्ष है बातचीत या वार्तालाप । इसमें वक्ता और श्रोता दोनों की अवस्थिति होती है और वक्ता श्रोता का स्थान बदलता रहता है । यह सिलसिला काफी देर तक चलता रह सकता है । कभी - कभी यह बातचीत दो या अधिक लोगों के बीच भी होती है । संभाषण की अनेक स्थितियां इस वर्ग में आती हैं । जिनमें आज्ञा , अनुज्ञा , निर्देश , प्रश्न उत्तर , भावाभिव्यक्ति आदि अनेक रूप परिलक्षित हो सकते है ।

भाषण ( एक वक्ता द्वारा बड़े समुदाय को संबोधित करना )

भाषिक व्यवहार का यह पहलू एक वक्ता का अपेक्षाकृत बडे समुदाय से रूबरू होना है इसमें वक्ता मुखर होता है जबकि श्रोता निष्क्रिय । कुछ अपवादों को छोड़ दे तो विद्यालयों , महाविद्यालयों की कक्षाएँ , राजनीतिक नेताओं की जनसभाएं , संतों ओर महात्माओं के प्रवचन , आकाशवाणी और दूरदर्शन की वार्ताएँ , समाचार बुलेटिन , रेल्वे स्टेशनों और हवाई अड्डों की घोषणाएँ , एक पक्षीय भाषण के विविध उदाहरण है ।

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