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Showing posts from June, 2020

हिन्दी व्याकरण - क्रिया Verb

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हिन्दी व्याकरण - क्रिया Verb


क्रिया किसी शब्द या शब्द समूह द्वारा किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है , उसे क्रिया कहते हैं ।

जैसे – 
राम भोजन कर रहा है ।
रमा गा रही है ।
सुरेश सो रहा है ।
बच्चा रो रहा है ।
मोहन खेल रहा है ।

उपर्युक्त वाक्यों में कर रहा है , गा रही है , सो रहा है , रो रहा है , खेल रहा है क्रियापद हैं । क्रिया के बिना कोई वाक्य पूर्ण नही होता । प्रत्येक वाक्य में क्रिया होना आवश्यक है । क्रिया के बिना वाक्यांश हो सकता है , पूर्ण वाक्य नही । क्रिया वाक्य को पूर्णता देती है ।

धातुक्रिया का मूलरूप धातु कहलाता है ।

जैसे – खा , पी , गा , जा , चल , लिख आदि ।

धातु के भेदमुलधातुयौगिक धातु
मुलधातुये स्वतंत्र होती हैं , इन्हें किसी भी सहायक शब्द की आवश्यकता नही होती ।

जैसे – जा , चल , सक , सो , हंस आदि ।

यौगिक धातुमूल धातु में प्रत्यय का योग करके , दो या दो से अधिक धातुओं के योग से या संज्ञा या विशेषण में प्रत्यय जुड़ने से बनी धातु को यौगिक धातु कहते हैं

जैसे – खाना , जाना , चलना , उठना , बैठना
             चलवाना , उठवाना , बैठाना , चलना-फिरना , उठना-बैठना , गाना-बजाना आदि ।


य…

हिन्दी व्याकरण - विशेषण Adjective

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हिन्दी व्याकरण - विशेषण Adjective


विशेषणसंज्ञा या सर्वनाम की विशेषता ( गुण , दोष , रंग , आकार-प्रकार , संख्या ) बताने वाले शब्द को विशेषण कहते हैं ।

जैसे – काला , लम्बा , चौड़ा , एक किलो , भारी , दयालु , क्रूर , सुन्दर आदि ।

उदाहरण

काला कुत्ता ।
लम्बा सांप ।
एक किलो शक्कर ।
राम बड़ा दयालु है ।
राधा सुंदर है ।

उपर्युक्त वाक्यों में काला , लम्बा , एक किलो , दयालु , सुंदर  शब्द क्रमशः कुत्ता , सांप , शक्कर , राम , राधा की विशेषता बता रहे हैं ।

विशेष्यजिस संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता बताई जाती है , उसे विशेष्य कहते हैं । 

ये आम मीठे हैं ।
वे पुष्प सुंदर हैं ।
श्याम होनहार विद्यार्थी है ।

उपर्युक्त वाक्यों में मीठे , सुंदर , होनहार आदि शब्द क्रमशः आम , पुष्प व श्याम आदि संज्ञा शब्दों की विशेषता बता रहे हैं । अतः मीठे , सुंदर व होनहार विशेषण तथा आम , पुष्प व श्याम विशेष्य हैं ।

विशेषण शब्द प्रायः विशेष्य के पहले लगते हैं किंतु कभी-कभी विशेष्य के बाद भी इनका प्रयोग किया जाता है ।

प्रविशेषणवे शब्द जो विशेषणों की विशेषताएं बताएँ , उन्हें प्रविशेषण कहते हैं ।

राम बहुत अच्छा विद्यार्थी है ।
आज बहुत अधि…

हिन्दी व्याकरण - सर्वनाम Pronouns

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हिन्दी व्याकरण - सर्वनाम Pronouns

वे शब्द जो संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं उन्हें सर्वनाम कहते हैं । जैसे -  मैं , तुम , आप , यह , वह , क्या , कुछ , कौन आदि ।
सर्वनाम संज्ञा शब्द की बार-बार आवृत्ति से बचाते हैं । सर्वनामों के प्रयोग से भाषा की सुंदरता में वृद्धि होती है । साथ ही वाक्य सरल व संक्षिप्त भी होता है । यदि सर्वनामों का प्रयोग न करें तो हमें संज्ञा शब्दों का बार-बार प्रयोग करना पड़ेगा जिससे भाषा रूप अटपटा व दुरह हो जाएगा । 

सर्वनाम के उदाहरण – 
राम अच्छा विद्यार्थी है । राम प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है । राम के पिता किसान है । राम की माँ गृहिणी है । राम की बहिन भी अच्छी पढ़ रही है ।

इन वाक्यों में बार बार ‘राम’ संज्ञा का प्रयोग हुआ है जिससे भाषा का स्वरूप अटपटा हो गया है । वहीं अब यदि हम सर्वनामों का प्रयोग करते हुए वाक्य निर्माण करें तो भाषा सरल , संक्षिप्त व सुंदर हो जाती है –

राम एक अच्छा विद्यार्थी है । वह प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है । उसके पिता किसान है । उसकी माँ गृहिणी है । उसकी बहिन भी अच्छी पढ़ रही है ।


हिन्दी में मूल सर्वनाम 11 हैं –
मैं , तू , आप , यह , वह ,…

हिन्दी व्याकरण - संज्ञा Hindi grammer - Noun

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हिन्दी व्याकरण - संज्ञा  Hindi grammer - Noun


परिवर्तन या विकार के आधार पर शब्दों के दो भेद किये जा सकते हैं (1) विकारी शब्द (2) अविकारी शब्द । संज्ञा , सर्वनाम , क्रिया , विशेषण विकारी शब्द हैं ।

संज्ञा शब्द की व्युत्पत्ति  संज्ञा शब्द सम उपसर्ग पूर्वक ज्ञा(जानने) धातु से बना है । जिसका शाब्दिक अर्थ है ठीक प्रकार से जानना या ठीक से ज्ञान करवाने वाला । इसका अंग्रेजी पर्याय noun  है ।
संज्ञा की परिभाषासंज्ञा उस विकारी शब्द को कहते हैं जिससे किसी वस्तु , प्राणी , प्राणी , स्थान , गुण , भाव आदि के नाम का बोध होता हो जैसे – पंखा , पुस्तक , कुर्सी , गाय , भैंस , मछली , जयपुर , बीकानेर ,दिल्ली , बचपन , बुढापा , मिठास , अपनत्व आदि ।

संज्ञा विकारी शब्द है तो लिंग , वचन , कारक , पुरुष , काल , आदि के कारण इसके रूप में परिवर्तन होता है।

परिभाषा में प्रयुक्त 'वस्तु' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है, जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक न होकर उनके धर्मो का सूचक भी है। साधारण अर्थ में 'वस्तु' शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं होता ।
संज्ञा के भेद हिन्दी भाषा मे संज्ञा के प्रायः तीन भेद

हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन व नामकरण Time division and naming of Hindi literature

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हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन व नामकरण Time division and naming of Hindi literature

साहित्य सृजन निरन्तर निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। किसी भी भाषा का साहित्य स्थिर न होकर निरन्तर परिवर्तनशील होता है। इसके परिवर्तनों का व साहित्य के समुचित अध्ययन के लिए उसे कालानुक्रम में विभक्त किया जा न आवश्यक है।  किसी भी साहित्य के इतिहास का काल - विभाजन करने की सर्वाधिक उपयुक्त प्रणाली उस साहित्य में प्रवाहित साहित्य धाराओं , विविध प्रवृत्तियोंके आधार पर उसे विभाजित करना है । युग की परिस्थितियों के अनुकूल साहित्य में विषय तथा शैलीगत प्रवृतियों परिवर्तित होता रहता है । हिन्दी में भी एक विशेष काल में समाज की विशेष परिस्थितियाँ एवं तत्सम्बन्धी विचारधाराएँ रही है और उन्हीं के अनुरुप साहित्यिक रचनाएँ  हुई है ।
 काल विभाजन के सम्बंध में आचार्य शुक्ल का मत है- " जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है तब यह निश्चित्त है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ - साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है । आदि से अन्त तक इन्ही चित्तवृत्तियो…

हिन्दी नाटक एवं नाटककार Hindi drama and playwright

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हिन्दी नाटक एवं नाटककार Hindi drama and playwright


हिन्दी नाटक का जन्म व विकास नाटक साहित्य का विकास भारतेन्दु युग से माना जाता है , संस्कृत नाटकों की क्षति हो जाने के बाद आदिकाल और मध्यकाल में नाटक को किसी प्रकार का परश्रय नहीं मिला । परम्परा के अनुसार लोकनाट्य अवश्य प्रचलित रहे । भारतेन्दुजी  के पिता गोपालचन्द्र द्वारा लिने ' नहुष (1814)' नाटक  को हिन्दी का प्रथम नाटक माना है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल विश्वनाथ सिंह द्वारा रचित नाटक ' आनन्द रघुनन्दन ' को हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक स्वीकार करते है । डॉ . सोमनाथ गुप्त , डॉ . लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय , बाबू गुलाब राय आदि विद्वानों ने भी आनन्द रघुनन्दन को हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक स्वीकार किया है । डॉ . दशरथ ओझा  इसे संस्कृत शैली का प्रथम हिन्दी नाटक मानते है । डॉ . विजयेन्द्र स्नातक तथा डॉ . कृष्णलाल  ' नहुष ' को हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक मानते है । हिन्दी में नाटक का समुचित विकास आधुनिक युग में आरम्भ  होता है ।  सन् 1850 से अब तक के नाटक साहित्य को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता -
भारतेन्दु युग ( 1850-1900)प्रस…