हिन्दी साहित्य का इतिहास : भक्तिकाल (History of Hindi literature: Bhaktikal)

भक्तिकाल  Bhaktikal 

भक्तिकाल

हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल
             हिन्दी साहित्य इतिहास में मध्यकाल(1375-1900वि.) को दो भागों में विभाजित किया गया है अ. पूर्व मध्यकाल(1375-1700वि.) , ब. उत्तर मध्यकाल(1700-1900) ।
इनमें से पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल व उत्तर मध्यकाल रीतिकाल नाम दिया गया है। आचार्य शुक्ल 1375 से 1700 वि. तक के कालखण्ड को भक्तिकाल स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार इस कालखण्ड में भक्ति भावना की प्रधानता थी इसलिए प्रवृत्ति की दृष्टि से यह नाम उचित है। डॉ.नगेन्द्र अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से 1350ई. से 1650ई. तक भक्तिकाल की सीमा स्वीकार करते हैं। ग्रियर्सन ने सबसे पहले भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए इसे हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा ।

भक्ति आंदोलन के उद्भव की परिस्थितियां


धार्मिक परिस्थितियां

          धार्मिक दृष्टि से यह कालखण्ड काफी उथलपुथल भरा रहा। बौद्ध धर्म विकृत होकर हीनयान व महायान में पहले ही बंट चुका था । नाथों व सिद्धों का प्रभाव कम हो रहा था । साथ ही यहाँ के निवासी एक नए धर्म मुस्लिम धर्म से भी परिचित हो रहे थे जो कि मुर्ति पूजा का विरोधी था जबकि हिन्दू मूर्ति पूजक । हिन्दुओं और मुसलमानों में धर्म का बाह्याडंबर तो था लेकिन आंतरिक शुद्धि का आभाव था ।
भक्ति का जो स्रोत दक्षिण भारत में प्रकट हुआ उसके प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर भारत में अनुकूल वातावरण था । बौद्ध धर्म की विकृतियों के विरोध में शंकराचार्य ने अद्वेतवाद का प्रचार किया । विष्णु के अवतारों के प्रति आस्था व विश्वास में वृद्धि हुई और रामानन्द ने भक्ति के द्वार सबके लिए खोल दिए।
सूफी धर्म का प्रचार भी एक बहुत बड़े क्षेत्र में हुआ। प्रेम
मार्ग पर आधारित सूफी धर्म की जड़ें भारत में पनपने लगी थी ।  

सामाजिक परिस्थितियां

          इस काल खण्ड में मुगलों के आगमन की वजह से बहुत से सामाजिक परिवर्तन हुए । हिन्दुओं और मुसलमानों में परस्पर आत्मीयता का अभाव था। हिन्दू कन्याओं को सम्पन्न मुसलमान क्रय करके या अपहरण करके अपने घर ले जाते थे।
छुआछुत , ऊंचनीच की भावना विद्यमान थी । परदा प्रथा इस युग की खास आवश्यकता बन गयी थी । स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था।

राजनीतिक परिस्थितियां

          इस कालखण्ड में राजनीतिक रूप से हिन्दू पराभव हो गए थे।उत्तर भारत में 1350 से 1526 तक तुगलक वंश ,सैयद वंश , लोदी वंश का शासन रहा । उसके बाद मुगलों का शासन रहा । शाहजहां का शासन भक्तिकाल की अंतिम सिमा है । इस काल के अधिकांश शासकों में धार्मिक सहिष्णुता का अभाव था । जनता में भी सद्भावना नही थी । दोनों सम्प्रदायों के धर्माचार्य भी विद्वेष बढाने का कार्य कर रहे थे।

भक्ति आंदोलन उदय के कारण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठापित हो जाने से हिन्दू जनता निराश , हताश व पराजित हो गयी थी । पराजित मनोवृत्ति में ईश्वर की भक्ति की ओर उन्मुख होना स्वाभाविक था।


आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- भक्तिभावना पराजित मनोवृत्ति की उपज नही है और न ही इस्लाम के बलात प्रचार के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई। हिन्दू सदा से आशावादी जाति रही है तथा किसी भी भक्त कवि के काव्य में निराशा का पुट नही है।


ग्रियर्सन भक्ति आंदोलन का उदय ईसाई धर्म के प्रभाव से मानते हैं। जो कि हास्यास्पद है।


डॉ.सत्येंद्र के अनुसार-भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानन्द।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी साहित्य में भक्ति आंदोलन का प्रारंभ दक्षिण भारत के आलवार भक्तों की परम्परा से हुआ । उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों ने इस आंदोलन के प्रचार प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 
भक्ति आंदोलन प्राचीन भारतीय मनीषा , ज्ञान , दर्शन की अविच्छिन्न धारा है जो अत्यंत शक्तिशाली एवं व्यापक है ।

आलवार भक्त

        आलवार भक्त तमिल भाषा में वैष्णव भक्तों को कहा जाता है। वहीं शैव भक्तों को नायनमार कहा जाता है। आलवार का अर्थ होता है ‘भगवान में डुबा हुआ' । इनका काल 6-9वीं शताब्दी के बीच रहा। उनके पदों का संग्रह "दिव्य प्रबन्ध" कहलाता है जिसमें 4000 पद संकलित हैं। इसे 'वेदों' के तुल्य माना जाता है। आलवार सन्त भक्ति आन्दोलन के जन्मदाता माने जाते हैं। इनकी संख्या 12 हैं। उनके नाम हैं -

(1) पोय्गै आलवार
(2) भूतत्तालवार
(3) पेयालवार
(4) तिरुमालिसै आलवार
(5) नम्मालवार
(6) मधुरकवि आलवार
(7) कुलशेखरालवार
(8) पेरियालवार
(9) आण्डाल
(10) तोण्डरडिप्पोड़ियालवार
(11) तिरुप्पाणालवार
(12) तिरुमंगैयालवार।

भक्ति काल की सामान्य प्रवृतियां


लोकमंगल की भावना

         भक्ति काव्य लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत है। लोककल्याणकारी तत्व सर्वत्र व्याप्त हैं। सदाचार , कर्मण्यता व आत्मपरिष्कार पर बल दिया गया है।

समन्वयात्मकता

       भक्ति काव्य में भाषा , शिल्प , धर्म सभी जगह  देखी जा सकती है।

नामस्मरण पर बल

        भक्ति काल के सगुण व निर्गुण दोनों कवियों ने नाम स्मरण पर बल दिया है।
तुलसी- कलयुग केवल नाम आधारा,सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा 
कबीर-
     निर्गुण राम जपहुँ रे भाई।

गुरु महिमा पर विशेष बल

           भक्तिकाल के सभी कवियों ने गुरु की महत्ता पर विशेष बल दिया है।
सूरदास- श्रीवल्लभ गुरु तत्व सुनायो
          लीला भेद बतायो।
जायसी- बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।

प्रेम की महत्ता पर बल

          इन के मत में प्रेम एक मानवतावादी मूल चेतना है जिसके प्रकाश से भेदभाव नष्ट हो जाता है।
मीरां- अंसुवन सींचि सींचि प्रेम बेली बोई।

लोक भाषओं की प्रधानता

          भक्ति काव्य लोकभाषाओं के प्रसार का काल रहा। रामभक्त व प्रेममार्गी कवियों ने अवधि , कृष्ण भक्त कवियों ने ब्रज व कबीर आदि सन्त कवियों ने सधुक्कड़ी भाषा में अपना संदेश जन साधारण तक पहुंचाया ।


भक्ति काल का वर्गीकरण

आचार्य शुक्ल के अनुसार-  

        भक्तिकाल

     निर्गुण भक्तिधारा                      सगुण भक्तिधारा 

सन्तकाव्यधारा,सूफीकाव्यधारा   रामभक्तिधारा,कृष्णभक्ति धारा


इन चारों काव्यधाराओं के चार प्रतिनिधि कवि हैं:
निर्गुण भक्तिधारा
1. सन्त काव्यधारा या ज्ञानाश्रयी शाखा- कबीर
2. सूफी काव्यधारा या प्रेमाश्रयी शाखा- जायसी
सगुण भक्तिधारा
3. रामभक्तिधारा – तुलसीदास
4. कृष्णभक्तिधारा – सूरदास

निर्गुण भक्तिधारा : ज्ञानाश्रयी शाखा या सन्त काव्यधारा

सन्त शब्द की व्युत्पत्ति

      सत्य या सत रूपी तत्व का साक्षात्कार करने वाला।
डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल के अनुसार – सन्त का सम्बंध शांत से है और इसका अर्थ है निवृत्ति मार्गी या वैरागी । जो आत्मोन्नति एवं लोकमंगल में रत रहे वो सन्त है। परंतु हिन्दी साहित्य में निर्गुणोपासक ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों को सन्त कहा जाता है।

सन्त काव्य का दार्शनिक आधार

              सन्त काव्य शंकराचार्य एवं उपनिषदों द्वारा स्थापित अद्वेत दर्शन । , नाथ पंथियों से शून्यवाद, योगसाधना, गुरु महिमा । , इस्लाम के एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा व अवतारवाद का खंडन । , सूफियों से प्रेम भाव को ग्रहण किया है।
बौद्धों व वैष्णवों की अहिंसा भी सन्त काव्य की आधार है।

प्रमुख सन्त कवि एवं रचनाएं


कबीर(1398-1518)

      कबीर की भाषा सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी हैं। इनकी भाषा में हिंदी भाषा की सभी बोलियों के शब्द सम्मिलित हैं। राजस्थानी, हरयाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, ब्रजभाषा के शब्दों की बहुलता है।

कृतियां


धर्मदास ने उनकी वाणियों का संग्रह " बीजक " नाम के ग्रंथ मे किया जिसके तीन मुख्य भाग हैं : साखी , सबद (पद ), रमैनी

साखी

   साखी संस्कृत शब्द साक्षी का विकृत रूप है और धर्मोपदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अधिकांश साखियां दोहों में लिखी गयी हैं पर उसमें सोरठे का भी प्रयोग मिलता है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धांतों का निरूपण अधिकतर साखी में हुआ है।

सबद 

   सबद गेय पद है जिसमें पूरी तरह संगीतात्मकता विद्यमान है। इनमें उपदेशात्मकता के स्थान पर भावावेश की प्रधानता है ; क्योंकि इनमें कबीर के प्रेम और अंतरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।


रमैनी 

    रमैनी चौपाई छंद में लिखी गयी है इनमें कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

रैदास(रविदास)(1398-1448)

           रैदास जी जाती से चमार थे।कुछ विद्वान मीरा का गुरु मानते हैं। रामानन्द के 12 शिष्यों में से एक हैं।

कृतियां

 रविदास की बानी
40 पद गुरुग्रंथ साहब में संकलित

नानकदेवजी(1469-1538)

          सिख सम्प्रदाय के प्रवर्तक ।

कृतियां


जपुजी
असादीवार
रहिरास
सोहिला
गुरुग्रंथ साहब में कुछ पड़ संकलित

हरिदास निरंजनी(1455-1543)

       निरंजनी सम्प्रदाय के कवि।

 कृतियां


अष्टपदी
जोगग्रन्थ
ब्रह्मस्तुति
हंसप्रबोध ग्रन्थ
निर्पखमूल
पूजाजोग
समाधिजोग
संग्रामजोग

दादूदयाल(1544-1603)

        दादूपंथ या परमब्रह्म सम्प्रदाय के प्रवर्तक। रज्जब,सुन्दरदास,प्रगदास,जनगोपाल आदि के गुरु।

कृतियां


हरडे वाणी – इनके शिष्य सन्तदास एवं जगन्नाथ दास द्वारा इनकी रचनाओं का संकलन।
अंगवधू
दादूदयाल-परशुराम चतुर्वेदी द्वारा संपादित


मलूकदास(1574-1682)

      आलसियों के महामन्त्र के रचयिता।
अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम ।
दास मलूका कह गए सबके दाता राम ।।

कृतियां


ज्ञानबोध
रतनखान
भक्तिविवेक
भक्त वच्छावली
राम अवतार लीला
ब्रजलीला
ध्रुवचरित
सुखसागर

सुन्दरदास(1596-1689)

        दादू के शिष्य और प्रतिभाशाली कवि। केशव की रसिकप्रिया एवं नन्ददास की रसमंजरी की निंदा की ।

कृतियां


ज्ञानसमुद्र
सुंदर विलास

अन्य महत्वपूर्ण कवियों में लालदास, बाबा फरीद , शेख मुजजीब, जाम्भोजी, रज्जब , मीरा , गुरु अर्जुन देव जी, गुरु गोंविद सिंह जी आदि हैं।


सन्त काव्यधारा या ज्ञानाश्रयी शाखा की प्रवृतियां


भाव प्रधानता

      सन्त कवियों की रचनाएं भाव प्रधान हैं कला प्रधान नही।कविता इनका उद्देश्य कभी नही रही कविता तो इनके लिए साधन मात्र है।

निर्गुणोपासक

     ये ईश्वर को निर्गुण, निराकार,अजन्मा,अविनाशी एवं सर्वव्यापी मानते हैं तथा उसी की उपासना पर बल देते हैं।

ज्ञान को महत्त्व

      सन्त काव्य में ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। यह ज्ञान वेद-पुराण या कुरान से नही अपितु चित्त की निर्मलता एवं हृदय की पावनता से प्राप्त किया जाता है।

गुरु की महत्ता

      सन्त काव्य में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है।गुरु ही ब्रह्म का साक्षात्कार करवाता है, वही ज्ञान नेत्र खोलता है।

अद्वैतवाद दर्शन

         सन्त कवियों की दार्शनिक मान्यताएं शंकर से प्रभावित है।ब्रह्म व जीव की एकता,माया का अस्तित्व स्वीकार करना ,ईश्वर को निर्गुण निराकार बताना, आत्मा की सर्वशक्तिमता का प्रतिपादन सब शंकर के अनुसार है।


जातिप्रथा व बाह्यडम्बरों का खण्डन

             सन्त कवियों का मूर्ति पूजा, तीर्थाटन, व्रत, नमाज, ऊंच-नीच, छुआछूत, वर्णाश्रम व्यवस्था आदि का निर्भीकता पूर्वक खण्डन किया है। ये धर्म के सामान्य तत्वों सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, संयम, सदाचार को मानव के लिए आवश्यक मानते हैं।

भाषा अपरिष्कृत

     सन्त काव्य की भाषा अपरिष्कृत है। ये साहित्यिक भाषा के स्थान पर बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं।देशाटन के कारण इनकी भाषा पर ब्रज,अवधि,खड़ीबोली, राजस्थानी, पंजाबी, फ़ारसी, अरबी आदि भाषाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है। आचार्य शुक्ल इनकी भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहते हैं।

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