शिवमंगल सिंह 'सुमन' Shivmangal Singh ‘Suman’

 शिवमंगल सिंह 'सुमन'
Shivmangal Singh ‘Suman’

(5 अगस्त 1915 - 27 नवम्बर 2002)

शिवमंगल सिंह 'सुमन'


हिंदी साहित्य में प्रगतिवादी लेखन के अग्रणी कवि शिवमंगल सिंह सुमन का जन्म 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर में हुआ था । इनके पिता का नाम ठाकुर बख्श सिंह था । इनके पितामह ठाकुर बलराज सिंह जी रीवा सेना में कर्नल थे तथा प्रपितामह ठाकुर चन्द्रिका सिंह जी को सन् 1857 ई० की क्रान्ति में सक्रिय भाग लेने एवं वीरगति प्राप्त होने का गौरव प्राप्त था।

सुमन जी ने आरम्भिक शिक्षा से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा रीवा, ग्वालियर आदि स्थानों में रहकर प्राप्त की । तत्पश्चात् सन् 1940 ई० में इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक (हिन्दी) की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई० में इन्होंने विक्टोरिया कॉलेज में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1948 ई० में माधव कॉलेज उज्जैन में हिन्दी विभागाध्यक्ष बने, दो वर्षों के पश्चात् 1950 ई० में इन्हें ‘हिन्दी गीतिकाव्य का उद्भव-विकास और हिन्दी साहित्य में उसकी परम्परा’ शोध प्रबन्ध पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी० लिट् की उपाधि प्रदान की। इन्होंने सन् 1954-56 तक होल्कर कॉलेज इन्दौर में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य किया। सन् 1956-61 ई० तक नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक और सूचना विभाग में कार्य किया।

सन् 1961-68 तक माधव कॉलेज उज्जैन में ये प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहे। इन आठ वर्षों के बीच सन् 1964 ई० में ये विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कला संकाय के डीन तथा व्यावसायिक संगठन, शिक्षण समिति एवं प्रबन्धकारिणी सभा के सदस्य भी रहे। सन् 1968-70 ई० तक सुमन जी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कुलपति के पद पर आसीन रहे । 1970 ई. ये कुलपति के पद से अवकाश लेकर साहित्य सेवा में रत हो गए । अध्यापक, कुशल प्रशासक, प्रखर चिंतक और विचारक ,प्रसिद्ध हिंदी कवि और शिक्षाविद सदैव अपने प्रशंसकों से कहने वाले -

‘मैं विद्वान नहीं बन पाया। विद्वता की देहरी भर छू पाया हूँ। प्राध्यापक होने के साथ प्रशासनिक कार्यों के दबाव ने मुझे विद्वान बनने से रोक दिया।‘

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का 27 नवम्बर, 2002 ई० का 87 वर्ष की आयु में उज्जैन (म०प्र०) में निधन हो गया।

 इनकी मृत्यु के बाद, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा -

 "डॉ. शिव मंगल सिंह 'सुमन' केवल हिंदी कविता के क्षेत्र में एक शक्तिशाली चिह्न ही नहीं थे, बल्कि वह अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे। उन्होंने न केवल अपनी भावनाओं का दर्द व्यक्त किया, बल्कि युग के मुद्दों पर भी निर्भीक रचनात्मक टिप्पणी भी की थी।"

 प्रमुख कृतियाँ

सुमन’ जी की रचनाओं में दलित, पीड़ित, शोषित एवं वंचित श्रमिक वर्ग को समर्थन किया गया है, साथ ही सामान्य रूप से पूँजीपति वर्ग तथा उनके अत्याचारों का खण्डन भी अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। सामयिक समस्याओं का विवेचन इनकी रचनाओं का प्रमुख अंग रहा है। इनकी कृतियों में आस्था और विश्वास का स्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इन्होंने समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं तथा वर्ण जातिगत विषमताओं एवं भाग्यवादी विचारधारा को खण्डन किया । सुमन जी की कृतियाँ सामाजिक जीवन तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई हैं। इन्होंने प्रारम्भ में प्रेमभाव पर आधारित अनेक गीत लिखे। स्वाधीनता आन्दोलन और शोषित वर्ग की पीड़ा ने इनके काव्य-सृजन की दिशा बदल दी। सुमन जी प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। अपने काव्य के माध्यम से ‘सुमन’ जी ने पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रबल प्रहार किए और पीड़ित मानवता को वाणी दी। साम्यवाद के साथ ही गाँधीवाद में भी इनकी अटूट निष्ठा रही। इनकी रचनाओं में जागरण और निर्माण का सन्देश है। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं - 

कविता संग्रह 

हिल्लोल -1939

जीवन के गान -1942

युग का मोल -1945

प्रलय सृजन -1950)

विश्वास बढ़ता ही गया -1948

विध्य हिमालय -1960

मिट्टी की बारात -1972

वाणी की व्यथा -1980

कटे अँगूठों की वंदनवारें -1991

गद्य रचनाएँ

महादेवी की काव्य साधना

गीति काव्य: उद्यम और विकास

नाटक 

प्रकृति पुरुष कालिदास

सम्मान

1974: साहित्य अकादमी पुरस्कार (मिट्टी की बारात )

1999: पद्म भूषण

1974: पद्म श्री

1958: देव पुरस्कार (विश्वास बढ़ता ही गया)

1974: सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार

1993:शिखर सम्मान

1993:भारत भारती पुरस्कार

साहित्यिक परिचय

राष्ट्रीयता

 शिवमंगल सिंह ' सुमन ' साहित्यकारो की पंक्ति में ऐसे कवि हैं जिनकी कलम हमेशा दीन , दलित एवं सामान्यजन के पक्ष में हो रही है । प्रगतिवादी , सामाजिक एवं अन्य विचारों के साथ - साथ राष्ट्रवादी विचार के लिए भी ' सुमन ' जी की कलम प्रभावशाली रूप से चली है । ' सुमन ' जी एक राष्ट्रवादी कवि भी हैं । ' सुमन ' जी ने भारत की संस्कृति सभ्यता और भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का गौरवगान गाया है । भारत को सत्य , अहिंसा भारत के उच्चतम मूल्य एवं गुण आदि का गौरवपूर्ण उल्लेख करके भारत के भव्य भूतकाल का गौरव गाया है । भारत की ऐतिहासिक धरोहर का गौरवपूर्ण गान करके अपने राष्ट्रवादी विचार - पक्ष को दृढ़ता से प्रस्तुत किया है । 

 ' सुमन ' जी अपने प्रगतिवादी विचारों की शक्ति से शोषणमुक्त राष्ट्र बनाना चाहते हैं यही उनकी प्रगतिवादी राष्ट्रीयता है । हमारा भारत कोटि - कोटि लोगों का नायक है , संपूर्ण देश की मूक , पंगु और आम जनता की आशा एवं भाग्य विधायक है ।

  • " भारत मेरे !
  • चालिस कोटि जनों के नायक
  • देश देश की मूक - पंगु जनता की आशा ,
  • भाग्य विधायक ।।

प्रकृति चित्रण

' सुमन ' जी एक प्रकृतिप्रेमी कवि हैं , इसलिए ' सुमन ' जी की कविताओं में भी प्रकृति चित्रण मिलता है । कवि ' सुमन ' जी प्रकृति को पूर्ण रूप से जी लेने की आकांक्षा रखते हैं , वे संध्या की लाली को पी लेना चाहते हैं तो सूरज का सार प्यार जी भर के चख लेना चाहते हैं ' सुमन ' जी के शब्दों में 

  • " संध्या की लाली मुझको पी लेने दो , 
  • जीवन का यह क्षण जी भर पी लेने दो ।
  • यह सूरज का सार प्यार जी भर चक्खो , 
  • आँखों के अधरों पर उँगली मत रक्खो ।

शरदपूर्णिमा की रात और चाँदनी कवि ' सुमन ' जी को प्रभावित करती है । शरदपूर्णिमा को बरसात शरमाती - सी आकर , आँखों में समा जाती है , इसकी सुंदरता अनमोल है , मन को हर लेनेवाली , शरदपूर्णिमा का प्राकृतिक एवं प्रभावकरूप ' सुमन ' जी की इन पंक्तियों में देखिए 

  • " बीती बेसुध बरसात शरद शरमाती - सी आई , 
  • होठों में हुलसे कंज आँख में कोई इतराई । 
  • गोरे अंगों में कसी फंसी धानी अँगिया निखरी , 
  • आँचल में झूले कौंस हैंसी में शेफाली बिखरी ।
  • साँसों में खिले कपास - प्यास सागर की दहक उठी , 
  • अंतर में उमड़ा ज्वार , ज्वार की कलँगी लहक उठौ ।

युगबोध

' सुमन ' जी ने रूढ़िवाद एवं दकियानुसी मानसिकता तथा वर्ण एवं वर्गविषमता का विरोध करके समाज में समानता स्थापित हो इसके लिए अपने चिंतन से समाज का मार्गदर्शन किया है । ' सुमन ' जी ने आधुनिकता , नवीनता एवं परिवर्तन का हमेशा समर्थन किया है । उनका यह विचार सामाजिक प्रगति के लिए आवश्यक भी है । इनकी प्रगतिवादी कविताओं में व्यक्त विचार  के वैचारिक बिंदुओं से हम मार्गदर्शन प्राप्त करके समाज में स्वस्थता का निर्माण कर सकते हैं । उनका प्रगतिवादि विचार  निश्चय ही समाज के लिए मार्गदर्शक एवं सहायक सिद्ध होगा ।

प्रगतिवादी विचारधारा एक क्रांतिकारी विचारधारा है । प्रगतिवाद शोषितों का समर्थक एवं शोषकों का विरोधी है । इसी " पूँजीवादी शोषक समाज को क्रांति चेतना की चेतावनी ' सुमन ' जो देते हैं । शोषक समाज ने आज तक दगाखोरी , शोषण , षड्यंत्रो के माध्यम से समाज का खून चूसा है , लेकिन अब जागृति आ गई है । क्रांति का आरंभ हो चूका है । इस प्रगतिवादी क्रांति की ज्वाला से अब वे बच नहीं सकेंगे । ' सुमन ' जी के शब्दों में 

  •  बच नहीं सकते दगा कर 
  • कान में ऊँगली लगा कर
  • यह विषम ज्वाला जगाकर
  • ध्वंस होगा तख्न भू - लुंठित तुम्हारा ताज
  • सुन रहे हो क्रांति की आवाज़ ।

नारी चित्रण

' सुमन ' जी नारी को तप और त्याग की मूर्ति समझते है । नारी के तप और त्याग की उच्चतम भावना के कारण ही श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम कार्य एवं साधना सफल होती है । मानवीय जीवन और पुरूष समाज नारी की तप एवं साधना का ऋणी है । हमारे समाज में वीर नारियाँ हुई हैं उसमे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई है तो त्याग और तपस्या की मूर्ति ऐसी यशोधरा जैसी नारी भी हुई है जिसका सिद्धार्थ को बुद्ध बनाने में बड़ा योगदान है । अगर यशोधरा का त्याग न होता तो कदाचित बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त न कर पाते । बहुजनहिताय हेतु यशोधरा ने व्यक्तिगत जीवन का त्याग किया यशोधरा एक मात्र सिद्धार्थ की पत्नी ही नहीं अपितु ऐसे सफल पुरूषों की पत्नियों की प्रतीक हैं जिसका तप और त्याग सफलता का मूल रहा है । ' सुमन ' जी के शब्दों में यशोधरा के माध्यम से नारी का सम्मान , नारी - चैतन्य की पूजा देखिए – 

  • " कभी - कभी सोचता हूँ
  • कौन तपा पंचाग्नि तुम या यशोधरा ? 
  • आग वह किसकी थी जिसने
  • इस जीवन की नींद तुम से छीन ली , 
  • राग वह किसका था जिसने 
  • अपनाया कन - कन को बहुजन हिताय 
  • चिर - विरही संसृति के तुमने जिस 
  • वियोग का संयोग दिया जग को 
  • विहाल बहुजन सुखाय । " 

सामाजिक चेतना

शिवमंगल सिंह ' सुमन ' एक समाजवादी एवं सामाजिक विचारक , चिन्तक कवि एवं लेखक हैं । वे समाज से मुह मोडकर केवल  कवि कर्म में पड़कर कविता लिखनेवालों में से नहीं हैं । इस लिए ही उन्होंने समाज को ध्यान में रखकर समाज केन्द्रित साहित्य सृजन किया । ' सुमन'जी  सामाजिक विषमता के विरोधी है । ऐसी समाज व्यवस्था जिसमें अन्याय , अनीति , शोषण हो उसे स्वीकारा नहीं करते , ये पूँजीवाद के विरोधी हैं । ' सुमन ' जी की सामाजिक चेतना सचमुच ही समाज में चैतन्य , उत्साह एवं उमंग को भर देनेवाली सामाजिक चेतना है । उनके सामाजिक चैतन्य संबंधी विचार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अपनाने योग्य हैं । ' सुमन ' जी आम आदमी को महत्त्व देते हैं । वे मजदुर किसान दीन दलित एवं मध्यवर्ग तथा शोषित एवं पीडित वर्ग के पक्षधर हैं । समाज में दुःख दैन्य देख कर वे खुद दुःखी हो जाते हैं । इसलिए उनकी मानवतावादी दृष्टि प्रभावशाली रूप में उनकी कविताओं में प्रकाशित हुई है । उनके विचार सामाजिक सौहार्दपूर्ण विचार है । उनको मानवता केवल व्यक्तिगत न रह कर समष्टिगत बनकर ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' की विशाल दृष्टि की ओर जाती हुई दिखाई देती हैं । 

  • " आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ अनमना हूँ
  • यह न समझों मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ
  • सत्य कहता हूँ पराए पैर के काँटा रोक सकता
  • भूल से चींटी कहीं दब जाय तो भी हाय करता
  • पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है 
  • कोटि - कोटि बिभूक्षितों का कौर तकल छिन लिया है
  • ' लाभ - शुभ ' लिखकर जमाने का हृदय चूसा जिन्होंने 
  • और कल बंगाल वाली लाश पर थूका जिन्होंने । " 

' सुमन'जी से किसी का दुःख देखा नहीं जाता है , वे सामान्य मनुष्य को भूखा , दुखी या परेशान देखकर खुद दुःखी होते हैं । वे मजदुरो की पीड़ा नहीं देख सकते , उन्होंने सामान्य मनुष्य ऐसे मजदूरो को अपनी कविता में स्थान देकर मनुष्यता की ज्योत प्रज्जवलित की है

  •  ' मैं मजदूर का बेटा
  • मुझे काम दो 
  • बिना मजूरी किए रहा नहीं जाता
  • तुम मुझे बिना काम के रखना चाहते हो
  • भूखा हूँ जीना चाहता हूँ ।।

भाषा-शैली

सुमन जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है। छायावादी रचनाओं की भाषा अलंकरण, दृढ़ता, अस्पष्टता, वयवीयता आदि आपकी रचनाओं में नहीं है। इसके विपरीत स्पष्टता और सरलता है। जनसाधारण में प्रस्तुत होने वाली भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में उर्दू शब्दों को पर्याप्त प्रश्रय मिला है। इनकी खड़ी बोली में संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। साथ ही उर्दू के शब्द भी यत्र-तत्र मिल जाते हैं। सुमन जी एक प्रखर एवं ओजस्वी वक्ता भी थे। अतः इनकी भाषा जनभाषा कही जा सकती है।

सुमन जी की शैली में ओज और प्रसाद गुणों की प्रधानता है। इनकी शैली में सरलता, स्वाभाविकता, ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों का समावेश है। उनके गीतों में स्वाभाविकता, संगीतात्मकता,मस्ती और लयबद्धता है। इन्होंने अपनी रचनाओं में लाक्षणिकता का भी प्रयोग किया है। सुमन जी की कविताओं की अभिव्यक्ति सौन्दर्य की एक विशेषता काव्यवाद का निर्वहन भी है। इसके अन्तर्गत जीवन की वर्तमान समस्याओं का पौराणिक घटनाओं से साम्य स्थापित किया है। आपकी कविताओं में प्रतीक विधान भी दर्शनीय है। सुमन जी की कविताओं में अलंकारों की समास योजना नहीं है। अनायास ही जो अलंकार आपकी कविताओं में आ गये हैं, ये भावोत्कर्ष में सहायक हुए हैं। सुमन जी ने मुक्त छन्द लिखे हैं और परम्परागत शब्दों की समृद्धि में सहयोग दिया है।

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