पद्मावती समय Padmavati Samaya पद 1-15

 पद्मावती समय 
Padmavati Samaya
भाग – 2 (पद 1-15 व्याख्या सहित)

पद्मावती समय padmavati samaya

[ 1 ]

  •  पूरब दिस गढ़ गढन पति , समुद शिखर अति दुग्ग ।
  • तह सु विजय सुरराज पति , जादू कलह अभग्य ।। 
  • हसम हयग्गय देस गति , पति सायर मज्जादा प्रबल
  • भूप सेवहि सकल , धुनि निसान बहु साद ।। 

व्याख्या 

कवि राजा विजयपाल के किले का वर्णन करता हुआ कहता है कि पूर्व दिशा में , सब दुर्गा का स्वामी समुद्र शिखर नाम का एक अत्यन्त विशाल दुर्ग है । वहाँ यादव वंश का , देवों का स्वामी इन्द्र के समान प्रतापी राजा विजयपाल अखण्ड रूप में राज्य करता था । उस राजा विजयपाल के देश में विशाल सेना थी जिसमें अगणित हाथी - घोडे थे । अर्थात् विजयपाल के राज्य में विशाल अश्व सेना तथा गज सेना विद्यमान थी । वह सागर - पर्यन्त पृथ्वी का स्वामी था अथवा उसकी कीर्ति समुद्र पर्यन्त समूची पृथ्वी पर फैली हुई थी । बड़े - बड़े शक्तिशाली राजा उसके अधीन थे , उसकी सेना में रत रहते थे । विजयपाल की सेना के द्वारा जब नगाडे बजाए जाते थे , तब उसकी भयंकर ध्वनि सभी दिशाओं में , धरती से अम्बर तक फैल जाती थी । 

विशेष :  दोहा छन्द का प्रयोग है । ' गढ़ गढ़न ' , " हसम हथग्गय में छेकानुप्रास अलंकार है । 

[ 2 ]

  • धुनि निसान कहु साव नाव सुरपंथ बजत बिन । 
  • दस हजार हय चढ़त हेम नग जटिल साज तिन । 
  • गज असंख गजपतिय मुहर सेना तिय संरवह ।
  •  इन नायक का घटी पिनाक घटमट रज रख्खह । 
  • दस पुत्र पुत्रिय एक रूप रथ सुरंग डम्मर उमर । 
  • भंडार लक्षिय अगनित पदम सो पदमसेन कुंवर सुपर ।।

व्याख्या 

कवि राजा विजयपाल की सैन्य शक्ति और धन वैभव का गौरवपूर्ण वर्णन करते हुए कहता है कि राजा विजयपाल के समुद शिखर दुर्ग में जब नगाड़े बजते थे , तब उनका भयंकर नाद सभी दिशाओं में गूंज उठता था । प्रतिदिन वहीं पंचम स्वर में मेरी नाद होता रहता था । राजा की सेना में दस हजार अश्वारोही सैनिक थे जिनके वस्त्र हीरे - मोतियों से जड़े हुए थे । राजा की सेना में असंख्य हाथी थे । गज सेना के जो योद्धा हाथियों पर सवार हो कर सेना की अग्रिम पंक्ति बनाते थे उनकी संख्या तीन शंख थी अथवा घुडसवार सैनिकों की संख्या से गज सेना के सैनिकों की संख्या तिगुनी थी । विजयपाल एक शक्तिशाली सेनानायक था । उसके हाथ में सदा शिवजी के धनुष जैसा धनुष रहता था जिसके बल पर वह पृथ्वी - भर के राजाओं को नियन्त्रित रखता था । उसके दस पुत्र और एक पुत्री सभी एक समान गुणवान थे । राजा विजयपाल के रथों की ध्वजाएँ , जब रथ चलते थे , तब आक्रोश में फहराती थीं । राजा के कोष में अनगिनत पदम् धन भरा हुआ था । वह पद्यसेनी नाम की स्त्री का पति था ।

विशेष : पद में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है ।' रज रख्याह ' , ' पुत्र पुत्रिय ' में छेकानुप्रास अलंकार है । 

[ 3 ]

  • पद्मसेन कुंवर , ता घर नारि सुजांन ।
  • ता उर एक पुत्री प्रकट , मनहुँ कला ससिभान ।। 

व्याख्या 

महाप्रतापी राजा विजयपाल के घर में पद्मसेन नाम की एक चतुर रानी थी । उस रानी के गर्भ से चन्दमा की कला के समान सुन्दर एक पुत्री उत्पन्न हुई । भाव यह है कि रानी के गर्भ से उत्पन्न पुत्री चन्द्रकला के समान सुन्दर लग रही है । वह चन्द्रमा के समान प्रतिदिन रूप - सौन्दर्य में अद्वितीय होती जा रही है जैसे चांद पूर्णमासी तक बढ़ता रहता है । 

विशेष : पुत्री प्रकट ' में छेकानुप्रास अलंकार है । ' मनहुँ कला ससिभान ' में उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर एवं स्वाभाविक प्रयोग है । दोहा - छन्द का सफल प्रयोग है । 

[ 4 ] 

  • मनहुं कला ससिबहन , कला सोलह सो बन्निय । 
  • बाल बेस ससि ता समीप , अमित रस पिन्निय ।। 
  • बिगसि कमल मिग अमर , बैन पंजन मग लुट्टिय । 
  • हरि कीट अरु बिम्ब , मोति नब सिष अहिघट्टिय ।। 
  • छप्पति गयन्द हरि हंस गति , बिह बनाय संथै सजिय । 
  • पदमिनिय रूप पदमावतिय , मनहुं काम कामिनि रायि ।।

व्याख्या

कवि अपनी अद्भुत कल्पना के आधार पर कहता है कि उसे देख कर लगता है कि मानो वह चन्द्रमा की कला है । ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा की सोलह कलाओं द्वारा उसे बनाया गया है । भाव यह है कि वह चन्द्रमा के समान सुन्दर है । वह अभी बाल्यावस्था में ही है । उसके अद्वितीय सौन्दर्य को देख कर ऐसा प्रतीत होता है , मानो चन्द्रमा उसके पास आकर उसके सौन्दर्य रूपी अमृत का पान कर रहा है । कवि के कहने का अभिप्राय है कि उसका सौन्दर्य चन्द्रमा के समान मन और आंखों को सुख और शान्ति देता है । कवि उसके नख - शिख का वर्णन करते हुए पुनः कहता है कि उसके मुख , नेत्र , हाथ और चरण आदि सुन्दर अंगों ने विकसित कमल , अमर वेणु तथा खंजन पक्षी के सौन्दर्य को भी लूट लिया है , अर्थात् पद्मावती के शरीर की सुगन्ध ने कमलों की सुगंध को क्षीण कर दिया है । नेत्रों ने हिरणों की मोटी आंखों को जीत लिया है , उसके लम्बे बालों ने अमरों का मान मर्दन कर दिया है , उसके मधुर स्वर की माधुरी ने मुरली की मधुरता को पराजित कर दिया है तथा नेत्रों की बाल सुलभ चंचलता ने खंजन पक्षी की चंचलता को भी पराजित कर दिया है । भाव यह है कि पद्मावती के अंग - प्रत्यंग इतने सुन्दर हैं कि उसके समक्ष सभी उपमान फीके पड़ जाते हैं । ऐसा लगता है मानो पद्मावती के अंगों ने इन परम्परागत उपमानों की सुन्दरता को छीनकर अपने ऊपर धारण कर लिया है जिसके फलस्वरूप यह उपमान फीके पड़ गये हैं । पद्मावती परम सुन्दरी है । नख से लेकर शिख तक पद्मावती का समूचा सौन्दर्य , हीरा , शुक , बिम्ब , फल तथा मोतियों द्वारा निर्मित हुआ है । अर्थात् पद्मावती का गौर वर्ण हीरे के समान सुशोभित हो रहा है । उसकी नासिका को देखकर तोते की चोंच का आभास होता है । उसके अधर लाल बिम्ब फल के समान सुशोभित हो रहे हैं । उसके हाथ - पैर की अंगुलियों के नख मोती के समान कांतिमान है । पुनः कवि पद्मावती की मन्द मन्थर गति का आकर्षण वर्णन करते हुए कहता है कि उसकी सुन्दर गति को देखकर हाथी , सिंह और हंस पराजित होकर छिप जाते हैं । भाव यह है कि उसकी गति में हाथी जैसी मस्ती , सिंह जैसा गर्व और हंस जैसी मन्थरता है , परन्तु पद्मावती की गति में अधिक मस्ती , गर्द तथा मन्थरता है इसलिए उसकी गति देखकर ये तीनों प्राणी लज्जित होकर छिप जाते हैं । पद्मावती का समूचा शरीर सुगठित एवं सुडौल है । ऐसा लगता है मानो विधाता ने उसे सांचे में ढालकर बनाया है ।  पद्मावती का शरीर शचि के समान सुन्दर एवं सुगठित है । उस पद्मावती का रूप पद्मिनी नारी के समान सुन्दन एवं आकर्षक है । उसके रूप को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता ने एक दूसरी कामदेव की पत्नी रति को बना दिया है अर्थात पदमावती इन्द्र की पत्नी शचि और कामदेव की पत्नी रति के समान अप्रतिम सुन्दरी है ।

विशेष: कवित्त छन्द है । मनहुं कला ससिभान ' , ' मनहुं काम कामिनि रचिय ' में उत्प्रेक्षा अलंकार है । बाल बेस ' , ' हरि हंस ' में छेकानुप्रास अलंकार है । पद में अतिशयोक्ति अलंकार है । 

[ 5 ] 

  • मनहुं काम कामिनी रचिय , रघिय रूप की रास ।
  •  प पंछी सब मोहिनी , सुर , नर , मुनियर पास ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पद्मावती का रूप देखकर ऐसा लगता है मानो विधाता ने रूप की राशि , कामदेव की पत्नी ' रति ' को अपने समक्ष रखकर पुनः पद्मावती की रचना की है । कहने का भाव है कि पद्मावती रति के समान ही अनिन्ध सुन्दरी है । मानो विधाता ने पद्मावती के रूप में एक अन्य रति का निर्माण कर दिया है । उसका रूप सौन्दर्य इतना आकर्षक है कि वह पशु - पक्षियों को भी मोहित कर लेता है । पशु - पक्षियों की तो क्या चर्चा , देवता , मनुष्य और श्रेष्ठ मुनि भी उसके सौन्दर्य जाल में बंध जाते हैं । भाव यह है कि ये सभी उसके रूप - सौन्दर्य के फंदे में पड़कर आसक्त हो जाते हैं । इस प्रकार पद्मावती परम् सुन्दरी है । 

विशेष : दोहा - छन्द का सुन्दर प्रयोग हुआ है । मनहुं काम कामिनि रचिय ' में उत्प्रेक्षा अलंकार है । रचिय रूप ' , ' पसु पंछी ' में छेकानुप्रास अलंकार है । 

[ 6 ]

  • सामुद्रिक लच्छन सकल , चौसठि कला सुजान । 
  • जानि धतुरवस अंग घट , रति बसन्त परमान ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई पद्मावती के शारीरिक सौष्ठव का वर्णन करते हुए कहता है कि पद्मावती के शारीरिक अंगों में सभी मंगलकारी सामुदिक लक्षण विद्यमान हैं । वह चौसठ कलाओं में पारंगत है , कुशल है । इसके साथ - साथ वह चौदह विद्याओं की पूर्ण ज्ञाता है तथा वेदों के छह अंगों या षट - दर्शन की ज्ञाता है । भाव यह है कि उस राजकुमारी ने सभी विद्याओं , वेद वेदांगों तथा सभी दर्शन का ज्ञान भी प्राप्त कर रखा था । वह रति के समान सुन्दरी है तथा बसन्त के समान पूर्ण यौवना है अर्थात् जिस प्रकार बसन्त के आगमन से प्राकृतिक सौन्दर्य खिल उठता है , उसी प्रकार यौवन के आगमन से पद्मावती के सभी अंग प्रत्यंग सौन्दर्य के कारण सुशोभित हो रहे हैं । 

विशेष: दोहा छन्द का सफल प्रयोग है । उपमा अलंकार है । 

[ 7 ] 

  • सखियन संग खेलत फिरत , महलनि बाग - निवास । 
  • कीट इक्क दिलिय नयन , तब मन भयौ हुलास ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पद्मावती अपनी सखियों के साथ मिलकर अपने महल के उद्यान में अथवा उद्यान में स्थित महल में खेल रही थी । एक दिन उसे एक तोता दिखाई दिया । उसे देखकर उसका मन प्रसन्नता से भर गया ।

[ 8 ] 

  • मन अति भयौ हुलास , बिगसि जनु कोक किरन रवि । 
  • अरुन अधर लिय सबर , बिम्बफल जानि कीट छवि ।।
  • यह चाहत चत्र चकित , उह जु तविकय सरप्पि मर ।
  • चंच बहुट्टिय लोग , लियो तब गहित अप्प कर ।। 
  • हरवत अनन्य मन महि हुलास , लै जु महल भीतर गई ।
  • पंजर अनूप जग मनि जटित , सौ तिहि महं रयत माई ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनोरम चित्रण करता हुआ कहता है कि उस शुक अर्थात् तोते को देखकर पद्मावती का मन अत्यधिक आनन्दित हो उठा । उस तोते को देखकर पद्मावती इस प्रकार प्रफुल्लित ( आनन्दित ) हो उठी जिस प्रकार सूर्य की प्रथम किरण को देखकर चकवा पक्षी आनन्दित हो उठता है । यहां कवि ने एक सुप्रसिद्ध कवि समय की ओर संकेत किया है जिस प्रकार रात्रि होने पर चकवा चकवी से अलग हो जाता है , लेकिन प्रभात होने पर चकवी से पुनः मिलने की आशा में उसका मन उत्साहित हो उठता है । अतः कवि यहां स्पष्ट करना चाहता है कि शुक को देखकर पद्मावती का मन भी प्रफुल्लित हो उठा । यहां कोक का अर्थ कमल भी लगाया जा सकता है । तदनुसार हम इसका अर्थ करेंगे जिस प्रकार सूर्य की पहली किरण का स्पर्श पाकर कमल खिल जाता है उसी प्रकार से पद्मावती उस शुक को देखकर प्रसन्न हो गई । उस शुक ने सुन्दर पद्मावती के ऊपर और नीचे लाल रंग के दोनों ओठों को लाल कान्ति के कारण बिम्ब फल समझ लिया अर्थात तोता पदमावती लाल होठों को बिम्ब फूल समझकर उस पर लुभा गया । इधर पद्मावती भी आश्चर्यचकित नेत्रों से उस तोते की तरफ देख रही थी , परन्तु उधर विम्ब फल खाने के लालच में तोते ने पदमावती लाल होठों पर झप्पटा मारा और अपनी चोंच से पकड़ कर चिपक गया । तब पद्मावती ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर शुक को पकड़ लिया । तोते को पकड़कर वह बड़ी प्रसन हुई और मन में आनन्दित हो उठी । प्रसन्नतापूर्वक वह उसे अपने महल में ले गई । वहां महल मैं रत्न और मणियों से जड़ा एक सुन्दर पिंजरा था । उसी पिंजरे में पदमावती ने तोते को बन्द कर लिया । 

विशेष : कवित्त छन्द का प्रयोग है । ' अरुन अधर ' , ' झरप्पि झर ' , ' चंच चहुट्टिय ' , ' मन महि ' में छेकानुप्रास अलंकार है । 'चाहत थप चकित ' में वृत्यानुप्रास अलंकार है । 

[ 9 ] 

  • तिहि महल रखत भइय , गइय बेल सब भुल्ल । 
  • चित्त चछुट्टयौ कीट सों , राम पढ़ावत फुल्ल ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई कहते हैं कि राजकुमारी पद्मावती उस तोते को महल में रखने लगी । उस तोते में राजकुमारी का मन कुछ इस तरह रम गया कि वो उसे राम-राम बुलवाने में लगकर अन्य सभी खेल-कूद आदि क्रियाएँ जैसे करना ही भूल गई ।

[ 10 ] 

  • कीट कुंवरि तन निरपि विषि , नप सिष ली यह रूप । 
  • करता करी बनाय कै , यह पमिनि सरूप ।
व्याख्या

कवि वर्णन करते हुए कहता है कि तोते ने राजकुमारी के शरीर की तरफ देखा और नख से लेकर शिख तक पैर के अंगूठे के नाखून से लेकर सिर की चोटी तक उसके रूप सौन्दर्य पर दृष्टिपात किया । वह मन ही मन सोचने लगा कि विधाता अर्थात् ईश्वर ने पद्मावती के सुन्दर रूप का निर्माण किया है । कहने का भाव यह है कि तोता पद्मावती के सुन्दर रूप को देखकर सोचने लगा कि विधाता ने बड़ी रुचि के साथ इस पद्मावती के शरीर का गठन किया है । 

[ 11 ] 

  • कुटिल केश सुदेश , पौहप रवियत पिक्क सद ।
  • कमलगंध वयसंध , हंसगति चलत मन्द - मद ।। 
  • सेत वस्त्र सोहै सरीप , नय स्वांति बुच जस ।
  • भमर भंवहि भुल्लाह सुभाय , मकरन्द बास रस ।। 
  • मैन निरखि सुध पाय सुक , यह सुदिन मूरति रचिय । 
  • उमा प्रसाद हर हेरियत , मिलहि राज प्रथिराज जिय ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई शुक अर्थात तोते के माध्यम से पदमावती के मनभावन अप्रतिम रूप सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उसके काले बाल धुंघराले और और सुन्दर है , जिसमें सुन्दर फूल गूंथे हुए हैं । भाव यह है कि उसने फूलों की वेणी धारण कर रखी है । उसकी वाणी कायेल के समान मधुर और सुरीली है । ऐसी पद्मावती कमलगंधा है अर्थात् उसके शरीर से कमलों की सुगन्ध आती है , इसलिए उसे पद्मावती कहा गया है । उसकी आयु वयः सन्धि की आयु है , अर्थात् न अभी उसमें पूर्ण यौवन का आगमन हुआ है और न ही बचपन समाप्त हुआ है , अर्थात् वह किशोरावस्था और यौवनावस्था के मध्य है । वह हंस की गति के समान मन्थर गति से चलती है । उसके शरीर पर श्वेत वस्त्र सुशोभित हो रहे हैं । ऐसा लगता है कि मानो उसके वस्त्र स्वाती नक्षत्र की बूंद अथवा मोती के समान उज्ज्वल और सुन्दर हैं । उसके शरीर से उत्पन्न होने वाली सुगन्ध का पान करने के लिए भवरे अपने चंचल स्वभाव को भूलकर उसी के चारों ओर मंडराते रहते हैं । अर्थात् चक्कर लगाते रहते हैं । भौरों का चंचल स्वभाव होता है । वे किसी एक फूल पर टिक कर नहीं बैठते , बल्कि भिन्न - भिन्न फूलों का रसपान करते हैं , परन्तु आज वे चंचलता को भूलकर पद्मावती के शरीर के इर्द - गिर्द चक्कर काट रहे हैं । परम सुन्दरी पद्मावती के ऐसे अद्वितीय सौन्दर्य को देखकर तोते को अत्यधिक सुख की प्राप्ति हुई है । वह सोचने लगा कि विधाता ने कोई सुन्दर घड़ी और दिन देखकर ही पदमावती के सुन्दर शरीर की रचना की है । यह सोचकर मन ही मन वह पार्वती की वन्दना करके शिव की ओर इस आशा से देखने लगा कि यदि शिव पार्वती की कृपा हो जाये तो यह पद्मावती पृथ्वीराज को प्राप्त हो जाएगी । अतः वह मन ही मन शिव और पार्वती से पद्मावती और पृथ्वीराज विवाह के लिए स्तुति करने लगा ।

विशेष : कवित - छंद का सुन्दर प्रयोग है । ' कुटिल केश ' , ' साहे सरीर ' , ' नन निरखि ' . ' हर हेरियत ' में छेकानुप्रास अलंकार है । ' मन्द मद ' मैं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है । भमर भंवहि मुल्लहि में वृत्यानुप्रास अलंकार है । 

[ 12 ]

  • सूक समीप मन कुंवरि की , लग्यौ बचन के हेत । 
  • अति विचित्र पंडित सुआ , कथत कथा अमेत ।।

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई तोते के मनभावन गुणों का चित्रण करते हुए कहते है कि उस तोते के पास रहते हुए पद्मावती का मन उसकी बातों में लग गया । अर्थात् राजकुमारी पद्मावती उस शुक के प्रति इतनी आकर्षित हो गई कि उसका मन तोते की बातें सुनने में लगा रहता था । उधर वह तोता भी बड़ा विचित्र विद्वान था अर्थात् उसके पास ज्ञान का भण्डार था । वह राजकुमारी पद्मावती को अनेक प्रकार की कहानियों ( कथाएँ ) सुनाता रहता था अर्थात् पद्मावती तोते से असंख्य कहानियों सुनती रहती थी । इन कहानियों से पद्मावती का मन आनन्द से परिपूर्ण हो जाता था ।

 [ 13 ] 

  • पुच्छत बचन सुवाले , उच्चरिय कीट सच्च सच्चाये । 
  • कवन नाम तुब देस , कवन चन्द कर परवेस ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि वह श्रेष्ठ नारी पद्मावती उस तोते से यह बात पूछने लगी और कहने लगी - हे तोते ! तुम मुझे सच - सच बताओ , तुम्हारा नाम क्या है ? और तुम्हारा देश कौन सा है ? अर्थात् तुम किस देश के रहने वाले हो ? साथ ही तुम यह भी बताओ कि तुम्हारे देश में कौन राजा राज्य करता है ? अर्थात् उस राजा का क्या नाम है ?

विशेष : गाथा छन्द का सफल प्रयोग किया है । यह छन्द प्राकृत भाषा का सर्वाधिक प्रिय और प्रमुख छन्द था । अक्सर कवि लोग कथा वर्णन में ही इसका प्रयोग करते थे । कवि चन्द ने भी गाथा छन्द का सफल प्रयोग किया है ।

[ 14 ] 

  • उच्चरिय कीट सुनि पचनं , हिन्दवान दिल्ली गढ़ अयनं ।
  • तहां चन्द अवतार चहुंबान , तह पृथिराज सूर सुभारं ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पद्मावती के वचनों को सुनकर तोता पद्मावती से कहने लगा कि हिन्दुस्तान में दिल्ली गढ़ का नाम एक नगर ( स्थान ) है । वहां पर इन्द्र का अवतार चौहान वंश में उत्पन्न अत्यधिक शूरवीर और बलवान राजा पृथ्वीराज है । 

[ 15 ] 

  • पयामावतिहि कुंवर संघत , बुज कथा कहत सुनि सुनि सुवत ।
  •  हिन्दवान धान उत्तम सुदेस , तह उबत दुग्ण दिल्ली सुदेस ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि वह पक्षी अर्थात् तोता पद्मावती के पास पहुंचकर कहने लगा , “ सुनो , सुनो ! " यह कहकर वह तोता पद्मावती का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अपनी सुन्दर कथा बताने लगा । कहने का तात्पर्य यह है कि तोते ने आग्रहपूर्वक पदमावती का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और कहा कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का सुन्दर एवं उत्तम देश है । वहां पर दिल्ली नाम का एक दुर्ग ( किला ) अपना सिर ऊंचा उठाए खड़ा है ।

विशेष : पद्धरी छन्द का सुन्दर प्रयोग है ।

ये भी देखें

चन्दवरदायी

पद्मावती समय : कथानक

Reet सम्पूर्ण हिंदी कोर्स

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