पद्मावती समय Padmavati Samaya (पद 46 - 67 व्याख्या सहित)

 पद्मावती समय 
Padmavati Samaya
भाग – 5 (पद 46 - 67 व्याख्या सहित)

पद्मावती समय Padmavati Samaya

[ 46 ]

  • कम्मान बान कुट्टहिं अपार । 
  • लगत लोह सारधार ।। 
  • घमसान घान सब बीर घेत ।
  • धन श्रोत कहत अरु रक्त रेत ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दवरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पृथ्वीराज और राजा विजय तथा कुमोदमणि की सेनाओं में भयंकर युद्ध होने लगा । युद्ध क्षेत्र में दोनों ओर धनुषों से असंख्य बाण छूटने लगे । उन बाणों के आगे लगी लोहे के फल शत्रुओं के शरीर को तलवार की तीखी धार के समान काटती चली जा रही थी । उस स्थान पर इतना भयंकर युद्ध हुआ कि ( पृथ्वीराज के शत्रुओं के ) सारे वीर योद्धा युद्ध में मारे गये । उस युद्ध क्षेत्र में खून की नदी बहने लगी और धरती उस खून में  भीग कर लाल रंग की हो गई । इस प्रकार पृथ्वीराज ने बड़ी वीरता और साहस के साथ शत्रु सेना का संहार किया । इसकी भयावहता का अनुमान धरती के खून से लाल होने से लगाया जा सकता है ।

[ 47 ]

  • मारे बरात के जोध जोह । 
  • परि रुंड मुंग अरियेत सोह ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पृथ्वीराज ने कुमोदमणि की बारात के सभी योद्धाओं को ढूंढ - ढूंढ का मार डाला , अर्थात् कुमोदमणि की बारात के सभी सैनिक योद्धा उस युद्ध में मारे गये । उनके कटे हुए धड़ और सिर उस युद्ध क्षेत्र में सुशोभित हो रहे हैं ।  इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान ने शत्रु पक्ष की सारी सेना का संहार कर दिया । 

[ 48 ] 

  • परे रहत स्निमेत अरि , करि दिल्लिय मुख रुष्ण । 
  • जीत चल्यी प्रथिराज रिन , सकल सूर भय सुख ।।

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि राजा विजय और कुमोदमणि तथा उसके सभी शत्रु सैनिक युद्ध क्षेत्र में मरे पड़े थे । उन्हें छोड़कर पृथ्वीराज ने ( पद्मावती के साथ ) दिल्ली की ओर मुख किया अर्थात् उन्होंने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया । युद्ध क्षेत्र में पृथ्वीराज विजय प्राप्त करके चल दिया और उसके सभी योद्धा आनन्दित हो उठे , अर्थात् सभी योद्धाओं को इस बात की प्रसन्नता हुई कि वे युद्ध क्षेत्र में विजय प्राप्त कर दिल्ली जा रहे हैं । 

[ 49 ] 

  • पदमावति इम ले चल्यो , हरिवि राज प्रथिराज । 
  • एते परि पतिसाह की , भई जुआनि अवाज ।।

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि राजा कुमोदमणि तथा राजा विजय के साथ हुए युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात् पृथ्वीराज का मन प्रसन्न हो गया और इस प्रकार वह पद्मावती को साथ लेकर दिल्ली की ओर बढ़ने लगा । लेकिन इसी बीच बादशाह शहाबुद्दीन गोरी की आवाज अर्थात् उसकी सेना के नगाड़ों की आवाज सुनाई दी । इस प्रकार शहाबुद्दीन गौरी ने राजनीतिक कूटनीति से समय का लाभ उठाकर पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया । 

[ 50 ] 

  • भई जुआनि अबाज , आय साहाबदीन सुर । 
  • आज गही प्रथिराज , बोलल्लंत गज्जत धुर ।। 
  • व्योध जोधा अनन्त , करिव पती आनि गज्जिय । 
  • बानं नालि हयनालि , तुपक तीरह सब सज्जिय ।। 
  • पर्व पहार मानो सार के , मिरि भुजा गजनेस बल । 
  • आप्त हकारि हंकार करि , चुरासान सुलतान दल ।।

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि जैसे ही शहाबुद्दीन गौरी की आवाज अथवा उसकी सेना के नगाड़ों की आवाज ( ललकार ) पृथ्वीराज तक पहुंची , वैसे ही वह बादशाह गोरी स्वयं अपनी सेना लेकर वहां पहुंच गया । वह गौरी ऊंचे स्वर में गरजता हुआ कह रहा था कि आज मैं अवश्य पृथ्वीराज को पकड़ लूंगा । उसकी विशाल सेना में क्रोध से भरे अनेक योद्धा थे । बादशाह की हाथियों की सेना की पंक्तियां वहां पहुंच कर गर्जना करने लगी , अर्थात् उसके हाथी जोर - जोर से चिंघाड़ने लगे । गौरी की सेना के सभी योद्धा तोपों , छोटी तोपों , हाथियों द्वारा खींचे जाने वाली बड़ी तोपों , तोड़ेदार तोपों तथा धनुष बाण से सुसज्जित थे । कवि के कहने का भाव यह है कि शहाबुद्दीन की विशाल सेना के पास सभी तरह के अस्त्र - शस्त्र थे । सारी सेना जिरह बख्तर से सजी हुई युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़ती ऐसे लग रही थी मानो लोहे के पहाड़ आगे बढ़े जा रहे हों , वे सभी योद्धा अपने स्वामी गजनेश ( गौरी ) का बल अपनी भुजाओं में भरकर युद्ध करने के लिए व्याकुल हो उठे । कहने का भाव यह है कि शहाबुद्दीन अपनी सेना के साथ इसलिए था ताकि सैनिकों का मनोबल बराबर बना रहे और वे साहसपूर्वक युद्ध लड़ते रहे । बादशाह गौरी द्वारा बुलाई गई खुरासान के बादशाह की सेना हुंकार करती हुई वहां आ पहुंची थी , अर्थात् खुरासानी सेना क्रोधित होकर शोर करती हुई वहां पहुंच गई थी । इस प्रकार शहाबुद्दीन गौरी अपने पूरे सैन्यबल के साथ पृथ्वीराज से लड़ने के लिए व्याकुल है । 

[ 51 ]

  • घुरासान सुलतान बंधार भीरं । 
  • बलक सो बलं तेग अच्यूक तीरं ।। 
  • रूहंगी फिरंगी हलबी समानी । 
  • ठटी उठ बल्लोष डालं निसानी ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि शहाबुद्दीन की सेना में खुरासान के सुलतान , कन्धार के सरदार ( मीर ) तथा कलख के बलशाली योद्धा थे । जो बड़ी ताकत के साथ तलवार चलाते थे और उनके तीरों के निशाने बड़े अचूक थे । सभी योद्धा निशाने पर तीर चलाते थे और भयंकर युद्ध करने में दक्ष थे । विभिन्न जातियों के बलोच सेना के झुंड के झुंड अपने दल और कबीले की ध्वजाएं लिए उनके साथ चल रहे थे । इस प्रकार युद्ध कला में निपुण गौरी की सेना युद्ध करने लिए तत्पर थी ।

[ 52 ]

  • मंजारी ची मुब जमुक्क लारी । 
  • हजारी हजारी इकै जोध भारी ।। 
  • तिनं , पचरं पीठ हय जीन सालं । 
  • फिरंगी कती पास सुकलात नालं ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि शहाबुद्दीन गौरी की सेना में बिल्ली की - सी आंखों वाले तथा गीदड़ और लोमड़ी जैसे मुखों वाले अनेक योद्धा थे । इनमें से भी एक - एक योद्धा एक - एक हजार सैनिको का नायक था और वह अकेला एक हजार सैनिकों पर भारी पड़ता था । एक योद्धा एक हजार सैनिकों को पराजित करने की शक्ति रखता था । उन सैनिकों के घोड़े के पीठ पर लोहे की पाखरे थीं , अर्थात् लोहे के जिरह बख्तर उनके घोड़ों की पीठ पर पड़े थे तथा उन पर जीन कसी हुई थीं । उन योद्धाओं के पास विलायती तलवारें , फंदे तथा सुन्दर कलात देश की बनी हुई नाले ( बन्दूक ) थीं । इस प्रकार शहाबुद्दीन की सेना का प्रत्येक सैनिक उस समय के आधुनिक अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित था । 

[ 53 ]

  • जहां मोग बांध मकरी रिछोटी । 
  • घनं सार संमेह अरु चौरं झोटी ।। 
  • एराकी अरबी पठी तेज ताजी । 
  • तुरक्की महावांन कम्मान बाजी ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि जिस स्थान पर उन घोड़ों की लगामें बंधी हुई थी , उस स्थान पर लगाम की रस्सी को मरोड़ कर मजबूती के साथ बनाई गई थी , ताकि लगाम टूट न सके । उन लगामों में मोतियों की मालायें भी गूंथी हुई थीं । उन लगामों में मजबूत लोहे की जंजीरें पड़ी रहती थीं । उन घोड़ों की गर्दन के तथा पूंछ के बाल लम्बे गुच्छेदार चवर के समान थे । यहां कवि ने दो तथ्यों की ओर संकेत किया है । प्रथम तथ्य तो यह है कि घोड़ों की लगाम का एक भाग उनके मुंह में रहता है , यह लोहे की जंजीरों से बना रहता है । यह कवि उसी तरह की लगाम की मजबूती का वर्णन कर रहा है । दूसरा तथ्य है कि - घोड़ों की गर्दन के तथा पूंछ के बाल लम्बे , घने तथा चवर के समान गुच्छेदार थे । गौरी की सेना के घोड़ों में इराकी , अरबी , पठानी , ताजि , तुर्की , महावानी तथा कम्मानी अर्थात् विभिन्न देशों और जातियों के तेज दौड़ने वाले घोडे थे । इस प्रकार शहाबुद्दीन की सेना में विभिन्न देशों के विभिन्न श्रेष्ठ नसलों के घोड़े शामिल थे । 

[ 54 ] 

  • ऐसे असिव असवार अमोल गोल । 
  • मिरे जूनव जेते सुतते अमोलं ।। 
  • तिनं मशि सुलतान साहाय आर्य । 
  • इसे रूप सौ फौज बरनाय गायं ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दवरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि शहाबुद्दीन गोरी की सेना के अगले भाग में इस प्रकार के प्रचंड घुड़सवार योद्धा समूह बांधकर ( गोल कर ) चल रहे थे , अर्थात् वे छोटी छोटी टुकड़ियां बनाकर चल रहे थे । वे युद्ध में जोशीले तथा बहुमूल्य रत्नों के समान थे । ऐसे प्रचंड योद्धाओं के बीच स्वयं बादशाह विद्यमान था । कवि कहता है कि इस रूप में बादशाह की उस सेना का वर्णन किया जा सकता है । कहने का भाव है कि बादशाह शहाबुद्दीन गौरी समूची सेना के मध्य में था और उसकी सेना आगे बढ़ती जा रही थी । इस प्रकार शहाबुद्दीन ने चक्रव्यूह के समान अपनी सैन्य रणनीति बनाई हुई थी ।

[ 55 ] 

  • तिनं घेरियं घेरियं राज प्रथिराज राज । 
  • विहीं ओर घनघोर नीसान बाज ।।

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि ( शाहाबुद्दीन की विशाल एवं प्रचण्ड ) सेना ने वहाँ पहुँच कर पृथ्वीराज को चारों ओर से घेर लिया । इस प्रकार पृथ्वीराज चारों ओर से शत्रुओं द्वारा घिरे हुए सुशोभित होने लगे । चारों ओर से युद्ध के भयंकर नगाड़े बजने लगे अर्थात दोनों ओर की सेनाओं ने युद्ध की घोषणा कर दी । 

[ 56 ]

  • जिय घोर निसान , रान पहुंयान वहाँ विसि । 
  • सकल सूर सामन्त , समरि बल जंत्र मंत्र तिसि ।।
  • उठि राज प्रथिराज , बाग मनों लग वीर नट । 
  • पढ़त तेग मन बेग , लगत मनो बीजु भट्ट घट ।। 
  • थकि रहे सूर कीतिग गिगन , रगन मगन भई श्रोन हर । 
  • हर हरषि वीर जमे हुलसारव रंगि नवरत बर ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि महाराज पृथ्वीराज चौहान के चारों ओर युद्ध के नगाडे भयानक स्वरों के साथ बज रहे थे । उनके सभी वीर सामन्त भी अपने अपने बल तथा युद्ध कौशल को याद करके युद्ध करने के लिए तैयार हो गये । उन वीर योद्धाओं ने युद्ध लड़ने की युक्तियों को याद किया और वे अपनी सम्पूर्ण शक्ति तथा बल के साथ युद्ध करने के लिए तत्पर हो गए । उन्हें गौरी की सेना का किसी प्रकार का भय नही था । स्वयं को तथा अपने योद्धाओं को चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर पृथ्वीराज उत्साह तथा क्रोध से अपने घोङे पर सवार हो गये और घोडे की लगाम को नट के कौशल के समान अपने हाथ से पकड़ लिया । यहां कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि योद्धा घोड़े पर सवार होकर एक हाथ से घोड़े की लगाम को थाम लेता है और दूसरे हाथ में तलवार पकड़ लेता है । ऐसे अवसर पर उनमें नट की - सी कुशलता होनी चाहिए । ( जैसे नट भी अपने सधे हुए पैरों से दोनों हाथों में बांस पकड़कर जब रस्सी पर चलता है तो उसे बड़ी सावधानी के साथ अपना यह काम करना होता है । थोड़ी से असावधानी उसके प्राणों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है । लगभग यही स्थिति एक योद्धा की भी होती है । उसे भी बड़ी कुशलतापूर्वक घोड़े पर सवार होना होता है । विशेषकर उसे घोड़े की लगाम के संकेतों से इधर - उधर दौड़ाना होता है । इसलिए कवि ने पृथ्वीराज के कौशल की तुलना नट के कौशल के साथ की है । पृथ्वीराज की तलवार मन के वेग के समान शीघ्रता से म्यान के बाहर निकली । संसार में मन की गति सर्वाधिक तीव्र मानी जाती है । कवि ने यहां तलवार की तीव्रता की तुलना मन की गति से की है । जब पृथ्वीराज ने म्यान से अपनी तलवार बाहर निकाली तो ऐसा लगा मानो बादलों के समूह में बिजली चमक रही हो । यहां कवि ने म्यान को मेघघटा के समान बताया है तथा तलवार को बिजली के समान । इसका एक अन्य अर्थ यह भी हो सकता है कि पृथ्वीराज की तलवार मन की गति के समान म्यान से बाहर निकली और वह शत्रुओं का संहार इस प्रकार से करने लगी जैसे बिजली मेघ घटाओं को चीरती है । अर्थात् पृथ्वीराज शत्रुओं का अपनी तलवार से संहार करने लगे । पृथ्वीराज चौहान की इस वीरता एवं अद्भुत युद्ध कौशल को देखकर सूर्य भी मानो आकाश में आश्चर्यचकित होकर थम गया । , अर्थात् वह चलना भूलकर अपने स्थान पर खड़ा का खड़ा रह गया । इस युद्ध क्षेत्र में योद्धाओं का इतना खून बहा कि वहां सारी पृथ्वी खून में डूब गई , अर्थात् युद्ध में हुई मार - काट से खून की नदी बहने लगी । कवि पुनः कहता है कि उस युद्ध को देखकर भगवान शंकर के वीर ( गण ) प्रसन्न होकर उल्लसित हो उठे । उत्तेजना के कारण उनके मुख नये लाल रंग से भर गए और वे प्रसन्नतापूर्वक हुंकारने लगे । भाव यह है कि युद्ध की उत्तेजना के कारण उनके मुख लाल हो गये और उनके मुख से हुंकार उत्पन्न होने लगी । इस प्रकार पृथ्वीराज अदम्य उत्साह , साहस तथा वीरता के साथ शत्रुओं का संहार करता रहा । 

[ 57 ] 

  • हुरब रंग नव रत वर , भयो जुन अति चित्त । 
  • निस बासुर समुझि न परत , नको हार नह जित्त ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि उस भयंकर युद्ध के उत्साह के कारण श्रेष्ठ योद्धाओं ने मुख पर नए खून की लालिमा छा गई और उत्साह के कारण वे हुंकारने लगे । दोनों पक्षों के योद्धाओं ने उत्साहपूर्वक भयंकर युद्ध किया । यह युद्ध इतना भयंकर था कि उसके कारण यह पता नहीं चलता था कि रात है या दिन । अभिप्राय यह है कि रात और दिन का अन्तर भी दिखाई नहीं दे रहा था । उस भयंकर युद्ध में दोनों पक्षों में से न किसी की हार हो रही थी , न किसी की जीत । उनमें से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था जिस कारण युद्ध का परिणाम निकलना कठिन हो रहा था । 

[ 58 ] 

  • न को हार नह जित , रहेज न रहहि सूरवर । 
  • धर उप्पर भर परत , करत अति जुद महाभर ।। 
  • कहाँ कमंध कहाँ मध्य , कहाँ कर चरन अन्तरूधि । 
  • काही कंध बहि तेग , कहाँ सिर जुटित उर ।। 
  • कहीं दन्त मत हय पुर परि , कुम्म असुंह ठंड सब । 
  • हिन्दवान रांन भय भान मुष , गवाहिय तेग पहुंवान जय ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि उस भयंकर युद्ध में न तो कोई हार रहा था और न कोई जीत रहा था , अर्थात् दोनों पक्षों में बराबर का युद्ध हो रहा था । दोनों ओर के वीर योद्धाओं में युद्ध लड़ने का इतना उत्साह समाया हुआ था कि वे रोकने पर भी रुक नहीं रहे थे । यदि उनके सेनापति उनको युद्ध लड़ने से रोकते तो भी वे किसी हालत में रुकने वाले नहीं थे बल्कि वे भयंकर मार - काट मचा रहे थे । युद्ध में घायल होकर ये योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़ते थे । उधर महायोद्धा शत्रु के विरुद्ध अत्यन्त भयंकर युद्ध कर रहे थे । उस युद्ध क्षेत्र में कहीं योद्धाओं के धड , कहीं सिर , कहीं हाथ , कहीं पर और कहीं अंतड़ियां चारों तरफ बिखरी पड़ी थी , अर्थात् युद्ध क्षेत्र में यहां - वहां योद्धाओं के कटे हुए अंग बिखरे पड़े थे । कहीं तलवार कंधे को काटती हुई पार हो जाती थी और कहीं योद्धाओं के सिर आपस में टकराकर फूट जाते थे और कहीं तलवारों के वार के कारण योद्धाओं के वक्षः स्थल फट जाते थे । हस्ती सेना और अश्व सेना की मार - काट का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि उस भयंकर युद्ध क्षेत्र में कही तो हाथियों के टूटे हुए दांत पड़े थे , कहीं घोड़ों के तथा कहीं उनके सिर कटे पड़े थे । कहीं हाथियों के मस्तक , सूड तथा धड़ कटकर बिखरे पड़े थे । इस प्रकार चारों ओर लाशों के देर लग गए थे । जब हिन्दू नरेश महाराज पृथ्वीराज चौहान ने हाथ में तलवार पकडी तो उनका मुख सूर्य के समान चमकने लग गया था । अर्थात् उनके मुख का तेज सूर्य के समान दिखाई दे रहा था । इस प्रकार युद्ध में भयंकर महाविनाश हो रहा था । 

[ 59 ] 

  • गही तेग पहुंबान हिन्दवान रान । 
  • गजं जुध परि कोप केहरि समान ।। 
  • करे रुण्ड मुण्ड करी कुम्भ फाटे । 
  • बंर सूर सामन्त हुकि गर्ज भार ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि हिन्दू नरेश महाराज पृथ्वीराज ने हाथ में तलवार पकड़ी और वे हाथियों के झुण्ड पर क्रुद्ध हुए सिंह के समान टूट पड़े । उन्होंने हाथियों के मस्तकों को काटकर धड़ और सिर अलग - अलग कर दिये अर्थात् कहीं रूण्ड पड़े और कहीं मुण्ड । यह देखकर पृथ्वीराज के श्रेष्ठ योद्धा और सामन्त गरजते हुए हुंकारने लगे । यहां पर एक अन्य अर्थ यह भी हो सकता है कि पृथ्वीराज चौहान ने हाथियों पर सवार शत्रु योद्धाओं के सिरों को काटकर अलग कर दिया जिसे देखकर उसके वीर योद्धा हुंकार करने लगे । इस प्रकार पृथ्वीराज का साहस और शौर्य उसकी सेना के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया जिससे उसके सैनिकों में एक नई स्फूर्ति पैदा हो गई । 

[ 60 ]

  • कीटचीह चिक्कार करि कलप भग्गे । 
  • मंद तंजियं लाज उमंग मागे ।। 
  • दौरि गज अन्ध पहुआन केरो । 
  • घेरियं गिरछविहाँ चक्क फेरी ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि हिन्दू नरेश पृथ्वीराज चौहान ने शहाबुद्दीन गौरी की सेना के हाथियों की सूंडों को काट दिया । इसका परिणाम यह हुआ कि वे हाथी सूंड कट जाने के कारण चिंघाड़ते हुए भागने लगे । वे अपने मद को अर्थात् मस्ती को भूलकर लार टपकाते हुए अपनी जान बचाने के उत्साह में जहां तहां भागने लगे । शत्रु सेना की यह स्थिति देखकर पृथ्वीराज ने अपने हाथी को उकसाया और वह अन्धा ( उन्मत ) होकर उन हाथियों का पीछा करने लगा । फिर उसने उन हाथियों को चारों ओर से घेर लिया । हाथियों के भागने से वहां इतनी धूल उड़ी कि उसके कारण हाथियों को कुछ भी नजर नहीं आ रहा था और वे धूल के घेरे में ही चारों ओर चक्कर काटने लगे । इस प्रकार पृथ्वीराज के पराक्रम के सामने शत्रुओं के हाथियों का बल भी क्षीण हो गया था ।

[ 61 ] 

  • गिरछ उडी भान अंधार रैनं । 
  • गई सूधि सुमी नहीं मझिझं नैन ।। 
  • सिर नाय कम्मान पधिराज राज । 
  • पकरिये साहि जिम कलिंग बाज ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि उस भयानक युद्ध में हाथियों की भगदड़ मचने से इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गया और चारों ओर रात्रि कालीन अंधेरा छा गया । ऐसा लगा रहा था कि मानो रात हो गई हो । चारों ओर फैले अंधकार के कारण योद्धा अपनी सुध - बुध खो बैठे थे , क्योंकि उन्हें कुछ भी नजर नहीं आ रहा था । इस अवसर पर महाराज पृथ्वीराज ने बादशाह शहाबुद्दीन की गर्दन में अपना धनुष फंसाकर उसे इस प्रकार पकड़ लिया जैसे बाज गौरया नामक पक्षी को झप्पटा मारकर पकड़ लेता है । इस प्रकार गौरी बंदी बना लिया गया । 

[ 62 ]

  •  ले चल्यो सिताबी कटी फारि फौज । 
  • परे मीर से पंच तहं घेत चौज ।। 
  • रजपुत्त पंचास जुमझे जुमी अमोरं । 
  • बजे जीत के नद नीसांन पोरं ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पृथ्वीराज चौहान शहाबुद्दीन गौरी को बंदी बनाकर शत्रु सेना को चीरता हुआ बड़ी शीघ्रता से अपने हाथी को दिल्ली की ओर बढ़ाने लगा । उस युद्ध क्षेत्र में गौरी के पांच सौ सरदार इस प्रकार मरे पड़े थे जैसे मुर्गी के बच्चे ( चूजे ) मरे पड़े हों । इसके साथ - साथ युद्ध में पीठ न दिखाने वाले अर्थात् हारकर पीछे न मुड़ने वाले पचास राजदूत योद्धा भी वीरगति को प्राप्त हो गये । यह देखकर जीत के नगाड़े बड़ी भयंकरता से बजने लगे । 

[ 63 ]

  • जीत भई प्रथिराज की , पकरि साह लै संग ।
  • दिल्ली दिसि मारगि लगी , उतरि घाट गिरिगंग ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि उस भयंकर युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई । उसने बादशाह गौरी को पकड़ कर कैद कर लिया और उसे अपने साथ लेकर वह पर्वतीय गंगा के घाट पर उतरा और फिर उसे पार करके दिल्ली की दिशा में जाने वाले रास्ते को पकड़ा , अर्थात् पृथ्वीराज चौहान ने एक पर्वतीय क्षेत्र में गंगा नदी को पार किया और शहाबुद्दीन गौरी को साथ लेकर वह दिल्ली की तरफ बढ़ने लगा ।

[ 64 ] 

  • वर गोरी पदमावती , गहि गोरी सुरतांन ।
  • निकट नगर दिल्ली गाट , अत्रभुजा पहुंवान ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पृथ्वीराज चौहान ने एक ओर तो गौरी वर्ण वाली पद्मावती का वरण किया और दूसरी ओर गजनी सुलतान शहाबुद्दीन गौरी को पकड़कर बंदी बना लिया । इस प्रकार पृथ्वीराज दिल्ली पहुंचकर ( सर्वप्रथम ) अष्ट भुजा वाली दुर्गा माँ के मन्दिर में गये । इस प्रकार पथ्वीराज चौहान अपनी वंश परम्परा के अनुरूप अपने आराध्य देव या देवी के प्रति भक्ति भाव प्रकट करने के लिए मन्दिर जाते हैं । 

[ 65]

  • बोलि विप्र सोधे लगन , सुध घरी पर्राव्य । 
  • हर बांसह महंट बनाय , कटि भावरि गठिय ।।
  • मा वेद उच्चरहि , होम चौरी जु प्रति वर । 
  • पदमावती दुलहिन अनूप , दुल्लह प्रथिराज नर ।। 
  • यौ साह साहायवी , अट्ट सहस हय बर सुवर । 
  • दैवानं मान पटमेव की , बड़े राज दुग्गाह हुजर ।। 

व्याख्या 

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि पृथ्वीराज ने ब्राह्मणों को बुलाकर उनसे विवाह का लगन ( शुभ मुहूर्त ) निकालने के लिए कहा । ब्राहाणों ने भी अच्छी प्रकार से शोध करके अर्थात् भली प्रकार गणना करके विवाह का शुभ मुहूर्त निकाला । फिर वहाँ पर हरे बांसों का एक मण्डप सजाया गया , जहाँ पर पृथ्वीराज और पद्मावती ( वर - वधू ) का ग्रंथि बंधन करके भांवरे डलवाकर दोनों का विवाह कर दिया गया । इस अवसर पर यज्ञ की वेदी के पास बैठे हुए ब्राह्मणों ने वेद - मन्त्रों का उच्चारण किया । उसी यज्ञ वेदी पर पद्मावती को पृथ्वीराज के रूप में पति की प्राप्ति हुई । इस विवाह में पद्मावती अद्वितीय दुल्हिन थी और नर - श्रेष्ठ पृथ्वीराज दूल्हा अर्थात् वर थे । इस प्रकार विवाह कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् पृथ्वीराज ने बंदी बनवाए गए सुलतान गौरी को दंडित किया । उसे आठ हजार श्रेष्ठ और सुन्दर घोड़े दण्ड के रूप में देने की आज्ञा दी । तत्पश्चात राजा पृथ्वीराज ने घट्ट भेषी ब्राह्माणों अर्थात् - यति , भोगी , संन्यासी , जंगम , धारण तथा बाह्मणों को दान देकर उन्हें सम्मानित किया और फिर वे सामने स्थित अपने राजमहल ( दुर्ग ) में चला गया अर्थात् पद्माती को साथ ले वह अपने राजमहल में प्रवेश कर गया । इस प्रकार पृथ्वीराज और पद्मावती वैवाहिक सूत्र में बंधकर ग हस्थ जीवन में प्रवेश करते है ।

[ 66 ] 

  • चड़िय राज प्रथिराज , कि साहावदीन सुर । 
  • त्रिपंत सूर सामन्त , बजतनीसांन गजत धुर ।। 
  • चन्दबवनि मगनयनि , कलस ने सिर सनमुन जुध । 
  • कनक धारं अति बनाय , मोतिन बंधाय सुध ।। 
  • मण्डल मयंक वर नार सब , आनन्द कण्ठह गाइयब । 
  • बोरन्त चंवर किंवकरहि , मुकुट सीस तिक घु दिगव ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि असुर शहाबुद्दीन गौरी को दण्डित करके , मुक्त करके स्वयं पृथ्वीराज चौहान अपने दुर्ग में चढ़ गया अर्थात् वह अपने राजमहल में चला गया । अपने राजा की सभी कामनाओं को पूरी हुआ जानकर उसके सभी वीर सामन्त ( योद्धा ) पूर्णतया सन्तुष्ट हो गये , क्योंकि उन्होंने अपने शत्रु पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी । ( खुशी के कारण ) चारों ओर नगाड़ों की ध्वनि गूंजने लगी । चन्द्रमुखी एवं मृगनयनी सुन्दरियां अपने सिरों पर जल से भरे हुए कलश लिए हुए राजा का स्वागत करने के लिए उसके सम्मुख आई । उन्होंने सर्वप्रथम स्वर्ण कलशों को अच्छी प्रकार से सजाया और उनमें सुन्दर मोती भरे । जैसे चन्द्रमा को तारे चारों ओर से घेर कर सुशोभित करते हैं उसी प्रकार पृथ्वीराज चौहान भी उन सुन्दर नारियों से चारों ओर से घिरा हुआ था और वे स्त्रियां अपने आनन्द भरे कण्ठों से मंगल गीत गा रही थीं । जब पृथ्वीराज के सिर पर मुकुट रखकर उसके मस्तक पर तिलक लगाया गया तो सेवक ( किकर ) उन पर चंबर डुलाने लगे , अर्थात् राजा पृथ्वीराज के सिर पर मुकुट रखा गया । उनको तिलक किया गया , क्योंकि वे पद्मावती को जीत कर लाए थे । इस प्रकार सम्पूर्ण राजदुर्ग में खुशी का वातावरण है तथा सभी नर - नारी अपने राजा पृथ्वीराज का स्वागत करने के लिए तत्पर हैं । 

[ 67 ] 

  • चवे राज दुग्गह त्रिपति , सुमत राज प्रथिराज । 
  • अति अनन्द आनन्द सं , हिन्दुकंन सिरताज ।। 

व्याख्या

महाकवि चन्दबरदाई मनभावन चित्रण करता हुआ कहता है कि सुन्दर बुद्धि वाला महाराज पृथ्वीराज चौहान हिन्दुओं में शिरोमणी राजा है , अर्थात् वे हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ राजा है । बड़े आनन्द और प्रसन्नता के साथ महाराज पृथ्वीराज दुर्ग के ऊपर चढ़ गए , अर्थात् उन्होंने अपने किले में प्रवेश किया ।

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