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Showing posts from May, 2020

हिन्दी साहित्य का इतिहास भक्तिकाल : सूफी काव्यधारा (History of Hindi literature Bhaktikal : Sufi poetry)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास भक्तिकाल : सूफी काव्यधारा या प्रेमाश्रयी शाखा (History of Hindi literature Bhaktikal : Sufi poetry or romantic branch)

हिन्दी साहित्य में सूफी काव्य                           हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग भक्तिकाल की निर्गुणभक्ति धारा के अंतर्गत सन्त काव्य व सूफी काव्य दो धाराएं हैं। सूफी काव्य धारा को प्रेममार्गी शाखा , प्रेमाश्रयी शाखा , प्रेमाख्यान काव्य परम्परा , रोमांसिक कथा काव्य परम्परा आदि नामों से भी जाना जाता है। इस शाखा में प्रेमतत्व की प्रधानता है। यह प्रेम भावना भारतीय प्रेम से थोड़ी अलग है। यह स्वच्छंद प्रेम है जिसे अंग्रेजी में रोमांस कहा जाता है । यह मर्यादावादी दाम्पत्य प्रेम से हटकर है। स्वच्छंद प्रेम समाज की मान्यताओं को स्वीकार नही करता । हिन्दी के मध्यकालीन ग्रन्थों में इसी प्रेम का चित्रण किया गया है।
आचार्य शुक्ल इन प्रेमाख्यानों पर फ़ारसी मसनवियों का प्रभाव मानते हैं। परंतु इस प्रकार के प्रेम का चित्रण प्राचीन भारतीय साहित्य में भी प्रचुर मात्रा में किया गया है। ऋग्वेद में पुरुरवा-उर्वशी आख्यान , महाभारत में नल-दमयंती आख्यान , राधा-कृष्ण आख…

हिन्दी साहित्य का इतिहास : भक्तिकाल (History of Hindi literature: Bhaktikal)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास : भक्तिकाल (सामान्य परिचय , उद्भव एवं विकास , सामान्य परिस्थितियां , प्रवृतियां ) History of Hindi literature: Bhaktikal (General Introduction, Origin and Development, General Conditions, Trends)


हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल              हिन्दी साहित्य इतिहास में मध्यकाल(1375-1900वि.) को दो भागों में विभाजित किया गया है अ. पूर्व मध्यकाल(1375-1700वि.) , ब. उत्तर मध्यकाल(1700-1900) । इनमें से पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल व उत्तर मध्यकाल रीतिकाल नाम दिया गया है। आचार्य शुक्ल 1375 से 1700 वि. तक के कालखण्ड को भक्तिकाल स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार इस कालखण्ड में भक्ति भावना की प्रधानता थी इसलिए प्रवृत्ति की दृष्टि से यह नाम उचित है। डॉ.नगेन्द्र अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से 1350ई. से 1650ई. तक भक्तिकाल की सीमा स्वीकार करते हैं। ग्रियर्सन ने सबसे पहले भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए इसे हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा ।
भक्ति आंदोलन के उद्भव की परिस्थितियां
धार्मिक परिस्थितियां           धार्मिक दृष्टि से यह कालखण्ड काफी उथलपुथल भरा रहा। बौद्ध धर्…

हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल - साठोत्तरी एवं समकालीन कविता(History of Hindi literature - Sixty and contemporary poetry)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल - साठोत्तरी एवं समकालीन कविता(History of Hindi literature Modern period - Sixty and contemporary poetry)





हिंदी में साठोत्तरी एवं समकालीन कविता
हिन्दी साहित्य के इतिहास में  1960ई. के बाद कि कविता को अनेक नाम दिए गए जिनमें प्रमुख है-
1.साठोत्तरी कविता                साठोत्तरी कविता 1960ई. बाद लिखी गयी असन्तोष, अस्वीकृति, विद्रोह को स्वर देने वाली कविता। यह उस मोहभंग को व्यक्त करती है जो स्वतंत्रता के बाद लोगों के हृदय में उत्पन्न हुआ।
2.समकालीन कविता                   समकालीन कविता अपने युग व परिवेश से जुड़ी हुई है। यह हमारी आशा , आकांक्षा , राग-द्वेष , हर्ष-विषाद , सभी अपने में समाए हुए है।
3.अकविता          अकविता के प्रवर्तक श्याम परमार हैं। इसमें यथार्थ का चित्रण , प्रौढ़ मानसिकता एवं अंतर्विरोधों का अन्वेषण है।
4.युयुत्सुवादी कविता                     युयुत्सुवादी कविता के प्रवर्तक शलभ श्रीराम सिंह हैं।
5.बीट कविता         बीट कविता के प्रवर्तक राजकमल चौधरी हैं। इसका जन्म अमेरिकी बिटनिक के प्रभाव से हुआ। यह उन्मुक्त यौन संबंधों की वकालत करती है।
6. अस्…

हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-प्रयोगवाद और नई कविता(History of Hindi literature, modern period-experimentalism and new poetry)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-प्रयोगवाद और नई कविता(History of Hindi literature, modern period-experimentalism and new poetry)


प्रयोगवाद और नई कविता                         हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप आया। प्रगतिवाद मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित था। परन्तु दर्शन की कट्टरता- सामाजिक यथार्थवाद,वर्ग संघर्ष, प्रतिबद्धता और सामूहिकता के कारण साहित्य एकरस हो गया,वैयक्तिकता के लिये कोई स्थान शेष नही रहा।और न ही कला समस्या के लिए कोई सरोकार।प्रगतिवाद के इन्ही विचारात्मक दबावों के परिणामस्वरूप प्रयोगवाद का हिन्दी साहित्य में उदय हुआ।प्रयोगवादी कवि ने अपनी कविता में अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख को, अपनी व्यक्तिगत संवेदनाओं को नए-नए माध्यमों से व्यक्त किया।प्रयोगवादियों ने भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता को महत्व दिया।

हिन्दी कविता में प्रयोगवाद और नई कविता का जन्म व परिसीमा                                                                                    हिन्दी काव्य में प्रयोगवाद का आरम्भ 1943 ई. में सचिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक क…

हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-प्रगतिवाद(History of Hindi literature - Progressivism)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिककाल-प्रगतिवाद (परिचय,नामकरण, समयसीमा, परिस्थितियां,प्रमुख लेखक व कवि,प्रवृतियां)
History-Progressivism of Hindi literature (introduction, nomenclature, timelines, circumstances, major writers and poets, trends)



प्रगतिवादी कविता                प्रगति शब्द का शाब्दिक अर्थ है-आगे बढ़ना,किन्तु हिंदी साहित्य में प्रगतिवादी शब्द का प्रयोग इस अर्थ में न होकर उस विचारधारा के अर्थ में हुआ है जो विचारधारा राजनीतिक क्षेत्र में साम्यवाद या मार्क्सवाद कहलाती। अतः हम कह सकते हैं कि साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लिखी गयी कविता प्रगतिवादी कविता है। साम्यवादी विचारधारा समाज को दो वर्ग शोषक व शोषित वर्ग में बांटकर देखती है।शोषक वर्ग में पूंजीपति, उद्योगपति और जमींदार आते हैं जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करते हैं।शोषित वर्ग गरीब,मजदूर, किसान और श्रमिक आते हैं जिनका शोषण किया जाता है।
        साम्यवादी विचारक समाज मे समता स्थापित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं शोषण की प्रक्रिया बन्द हो। इसलिये प्रगतिवादी कविता भी शोषण का विरोध करती है।
हिंदी कविता में प्रगतिवाद का जन्म व परिसीमा  …

हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-छायावाद (परिचय,नामकरण, समयसीमा, परिस्थितियां,प्रमुख लेखक व कवि,प्रवृतियां)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक काल-छायावाद (परिचय,नामकरण, समयसीमा, परिस्थितियां,प्रमुख लेखक व कवि,प्रवृतियां) History of Hindi literature Modern periodicism(chhaayaavaad)-introduction, nomenclature, timelines, circumstances, major writers and poets, trends

छायावाद का जन्म व परिसीमा                  छायावाद का हिन्दी में उदय द्विवेदी युग के बाद हुआ।छायावादी काव्य की सीमा 1918-1936ई.तक मानी जा सकती । आचार्य शुक्ल छायावाद का आरंभ 1918ई. से मानते हैं, क्योंकि छायावाद के प्रमुख कवियों जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला,महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाएं इसी समय के आसपास लिखनी शुरू की थी।1918 में प्रसाद का झरना, 1916 में जूही की कली निराला,1918 में पन्त पल्लव की कुछ कविताएं भी प्रकाशित हो चुकी थी।प्रसाद की कामायनी 1935ई.में प्रकाशित हुई तथा प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1936ई. में हुई।इन दोनों बातों को ध्यान में रखकर छायावाद की अंतिम सीमा 1936ई.मानना ही अधिक समीचीन है।
छायावाद का अर्थ और परिभाषा                       मुकुटधर पाण्डेय ने श्री शारदा पत्रिका में एक निबंध प…